Monday, February 16, 2026

प्रगति पथपर मैथिली (टिप्पणी)

प्रगति पथपर मैथिली

प्रदीप बिहारी

मैथिलीक प्रगति पथक आकलन करबाक क्रममे पहिने एहि बातक गिरह बान्हब जरूरी जे मैथिली माने मैथिली भाषा टा नहि। मैथिली माने अखण्ड मिथिला, मिथिलाक समाज। समाजक अवधारणाकें मानितहि साहित्य, कला, संस्कृति आदि आदि स्वत: सोझांमे आबि जाइत अछि। आ सांच तं ई जे समाजक बिना कोनो भाषाक अस्तित्वक कामना धरि नहि कयल जा सकैत अछि आ ने कोनो भाषाक बिना समाजक। दुनू एक-दोसराक पूरक अछि। 
       कोनो भाषाक प्रगतिक आधारकें बुझबा लेल जरूरी छैक जे ओहि भाषामे सामाजिक सम्पर्क कतेक भ' रहल छैक, साहित्य, शिक्षा, भाषाक प्रयोग कतेक भ' रहल छैक आ ओ भाषा अपन सांस्कृतिक धरोहरिकें सम्हारैत नव युगीन बोधकें कत' धरि आत्मसात क' रहल अछि।
       मैथिलीक स्थितिमे एहि बिन्दु सभपर विचार करैत एहि बातपर प्रसन्न भेल जा सकैत अछि जे हमर सभक आधार माने अतीत गौरवशाली अछि आ पुरखेक अरजल पर हम सभ एखनो मोंछ पर ताओ द' रहल छी।
       हमर भाषा मैथिली संविधानक आठम अनुसूची मे स्थान पौलकि। एक समय रेडियोक शोभा सेहो बढ़ौलकि। विद्यालय-महाविद्यालयमे चर्चामे रहल (ओना दोसर रूपें एखनो चर्चामे अछि), साहित्य अकादेमीक भाषा बनलि, सरस्वती, ज्ञानपीठ पुरस्कार लेल सेहो चौकठि ओगरलकि, भारतीय भाषा संस्थानमे सेहो एकटा कुर्सी भेटलैक। ई सभ बात हमरा सभकें तोष द' सकैत अछि।
        हमरा सभके तोष द' सकैत अछि जे मैथिली दसकोसी-पंचकोसीसं बहरा क' देश-विदेश गेलीह। ग्लोबलाइजेशनक भार उघैत ग्लोबल भेलीह। फिल्ममे जगह बनौलनि। शहर, महानगर आ परदेशमे जेना-जेना लोक गाम छोड़ि गेलाह, मैथिलीक संस्था बना-बना कहियोकाल मैथिल होयबाक बात मोन पाड़ैत रहलाह।
       संतोष करबा लेल आर बहुत रास बात भ' सकैत अछि। निर्भर एहि बातपर करैछ जे अहां कत्तेमे संतुष्ट भ' पबैत छी। आउ, किछु एहन सत्य पर गप करी जे चिन्ता आ चिन्तन लेल नोतैत अछि।
       मैथिलीक सामाजिक सम्पर्क पर विचार करैत एहि बात पर ध्यान देब आवश्यक जे मैथिली अपन समाजसं कतेक धरि जुड़ि सकल अछि। मुदा ओहिसं पहिने इहो विचारणीय जे मैथिलीक समाज कोन? एहि प्रश्नक पारिभाषिक उतारा तुरंत मोन मे अबैत अछि- कोनो जाति, धर्म आ क्षेत्रक मैथिली भाषी समाज मैथिलीक समाज थिक। मुदा व्यावहारिक दृष्टिएं ई एकटा अनुत्तरित प्रश्न एखनहु बनल अछि । मिथिलाक गाम दुबरायल जाइत अछि। रोजगार लेल पलायन अछि आ ताहि संग सभसं पहिने मैथिली छुटैत छथि।
      कहल जाइत रहल अछि जे मिथिला विद्वानक नगरी अछि। ई मान्यता हमरा सभक माथ ऊंच करैत अछि। हम सभ गर्वसं गबैत छी- 'जत' सुग्गा भखैत अछि पुराण, हुनक गाम देखियह।' शिक्षा आ विद्वताक एहन परम्परा पर गर्व करैत-करैत हम सभ वर्तमानमे ओकर अंशो भरि सम्हारि क' नहि राखि सकलहुं अछि। मिथिलामे वर्तमान शिक्षाक हालति कनियो नुकायल नहि अछि। जखन मिथिलेमे शिक्षाक ई हाल अछि तं मैथिलीमे शिक्षाक मादे कहले ने जा सकैए। मातृभाषाक माध्ययमसं शिक्षाक लेल हम सभ आफन तोड़ने छी, मुदा पढ़निहार छात्र कोना आओत, कत' सं आओत, ताहि पर हमरा सभ चिन्तन नहि क' पाबि रहल छी। हम सभ अपने परिवारक कतेक छात्रकें मैथिली पढ़ौलहुं अछि? कतेक प्रतिशत? एखनि गामो घरक मजदूर वर्गक लोकक कनियो आर्थिक स्थिति नीक होम' लगैत छै तं अपन बच्चा लेल तथाकथित पब्लिक स्कूल तकैए, जत' मातृभाषाक माध्ययमे शिक्षाक कोनो अवधारणे नहि छै।
       ओना इहो बात सांच जे मैथिली लोक किएक पढ़त आ किएक अपन नेनाकें पढ़ाओत? मैथिलीमे रोजगारक कतेक संभावना छैक? प्राध्यापक बनि सकैत छी, मुदा जनसंख्याक संग आनुपातिक दृष्टिकोणसं तकरो कतेक संभावना। पहिने विभिन्न विश्वविद्यालयमे मैथिली पढ़निहारक संख्या संतोषजनक छल, आब तं छात्रक अभावमे कतोक महाविद्यालय मे मैथिली विभाग बन्न अछि। 
        कने साहित्यिक प्रगतिक गप करी। हम सभ कहि तं दैत छियैक जे मैथिली साहित्य देशे कि विदेशियो भाषाक समकक्ष ठाढ़ अछि। एहू उक्तिक पक्षमे मैथिली साहित्यक पुरने पीढ़ीक आधार पर ठाढ़ छी हम सभ। मानल जे एखनुक रचनामे नव विषयवस्तु, नव शिल्पक प्रयोग बढ़ल अछि, मुदा एहि वृद्धि कें संतोषप्रद नहि मानल जा सकैत अछि।
        सोसल मीडियाक एहि युगमे सभसं बेसी साहित्ये प्रभावित भेल अछि। ओहूमे पठनीयता। डिजिटल माध्यम अपना सभ ओहिठाम ठोरे टा पर अछि। 
         पहिने प्रकाशन कठिन छल, तं लेखन गुणवत्ता छल। आब प्रकाशन सहज भेल अछि तं साहित्य लेखन तूर सन भेल अछि। बहरायल आ फाहा बनि उड़ि गेल। पहिने कम-सं-कम हजार प्रति पोथी छपैत छल आ बिकाइतो छल, मुदा आब बेसी-सं-बेसी एक सय प्रति छपाइत अछि। सेहो अधिकांश बिलहले जाइत अछि। पोथीक पीडीएफ-पीडीएफक खेल बेसी होइत अछि। किछु पोथीकें भाग्यशाली मानि सकैत छी, जे बिकाइत अछि। मुदा तेहन पोथीक प्रतिशत एतेक कम अछि जे रेखांकित नहि कयल जाइत अछि। पहिने किछु संस्था सभ पोथी प्रकाशनमे रुचि लैत छलाह, आब लेखक अपना पाइक छपबैत छथि आ बिलहै छथि। एहन हालमे प्रमुख गतिक ग्राफकें कोना नापल जा सकैत अछि?
        चूंकि मैथिली शिक्षाक माध्यम नहि बनि सकल अछि, तें पठनीयताक संकट अछि। नव पीढ़ीक लेल उदासीनताक कारण अछि। 
       मैथिलीक हाल ई अछि जे ई भाषा कलममे जतबे मजगूत अछि, कंठमे ओतबे कमजोर। मैथिली घर-परिवारमे प्रचलित नहि भ' सकलीह अछि।
        फेसबुकक कारणें लेखक बढ़लाह अछि, साहित्यक गुणवत्ता घटल अछि। जाहि प्रकारक उजाहि सम्पादक विहीन फेसबुक नामक पत्रिका पर उठल छैक, मैथिली कलममे सेहो कमजोर होम' लगलीह अछि।
         हं, मैथिलीक प्रयोग रील आ स्टोरी बनयबामे बढ़ल अछि। यू ट्यूब मे बढ़ल अछि। ई भाषाक प्रचार लेल जतबे सहायक अछि, भाषाक संग दुराचार लेल सेहो ओतबे। थोड़ेक सावधानी सं एहि चैनलक सकारात्मक उपयोग क' भाषाक विस्तृतिक प्रयास कयल जा सकैत अछि।
      सरकारी उपेक्षाक विरुद्ध सेहो प्रयास जरूरी। मैथिली भाषाक मुद्दा भोटक मुद्दा बनय। आ, ताहि लेल जरूरी छैक जे मिथिलाक सभ वर्गक लोक एकरा अपन अस्मितासं जोड़ि क' देखथि। एखनहु समय नहि बितलैए। कवि उदय चन्द्र झा 'विनोद'क कविता एखनो प्रासंगिक अछि- किछु नहि बितलैए...
       अंतमे, हम पुन: ओही गप पर जोर देब' चाहब जे पुरखाक बनाओल देबाल पर रंग-रोगन जरूरी, मुदा ओहूसं जरूरी जे अपन देबाल सेहो ठाढ़ कयल जाय। मैथिलीकें कंठ-कंठ धरि पहुंचाएल जाय। 
                   ++++++
मिथिला विभूति पर्व रहिका (मधुबनी) 30 मार्च 2025 विचार गोष्ठीमे पढ़ल गेल।