उसरल बजारमे बुलैत रा ना सुधाकर
प्रदीप बिहारी
मैथिलीक लोकप्रिय रचनाकार प्रफुल्ल कुमार 'मौन'क मादे हुनक नेपाल प्रवासक अन्य महत्वपूर्ण काजक अलावे सुनैत रही जे हुनक प्रेरणास्वरूपें तीन टा प्रतिभाशाली रचनाकार नेपालमे लिखब शुरू कयलनि। ओ तीनू छलाह- भुवनेश्वर पाथेय, रा ना सुधाकर आ जीतेन्द्र जीत। ई बात ताहि समयक थिक जाहि समय हम मैथिली-लेखनमे डेगा-डेगी देब' शुरू कयने रही। तें ई तीनू नाम हमर मानसपटल पर छपा गेल छल।
एहि तीनू नाममे श्रद्धेय भुवनेश्वर पाथेयसं कहियो भेट नहि भ' सकल, मुदा हुनक कथा सभ पढ़लाक बाद हुनकासं भेट नहि होयबाक कचोट थोड़ेक कम भ' गेल। आदरणीय भाइ रा ना सुधाकर आ जीतेन्द्र जीतसं भेटो भेल आ हिनका दुनू गोटेक रचनासभ सेहो पढ़ैत रहबाक अवसर भेटैत रहल। श्रद्धेय 'मौन' जीसं बरोबरि भेट होइत रहल, से एहि दुआरे जे ओ बेगूसराय बरोबरि आबथि। हुनक पुत्री एत' रहैत छथिन। दोसर, एहि दुआरे जे अपन नाट्य-संस्था 'नवतरंग'क लोक कला सम्बन्धी क्रिया-कलापमे मौन जीक सर्वविध सहयोग आ आशीर्वाद संस्थाकें भेटैत रहल छैक। ओ एहि त्रयी सभक मादे कहैत रहथि, हिनकालोकनिक रचनाक धर्म आ मर्म कहैत रहथि। तें ई तीनू सीनियर हमर आदरणीय रहलाह अछि।
मिथिला मिहिर जखन 1973 ई मे 'नवतूर' स्तंभ शुरू कयलक, तखन ई लोकनि प्रमुखतासं मिथिला मिहिरमे छपैत रहलाह। ओहिसं पहिनहुं यथास्थान छपथि। तें पढ़बाक अवसर भेटैत रहल।
आब तं एहि त्रयीमे मात्र जीतेन्द्र जीत बांचल छथि, जे बहुत पहिनहिं साहित्य-लेखनसं विमुख भ गेल छथि। ओ विराटनगर मे रहितो नहि छथि आब। एही वर्ष 2016क जनवरी मे रा ना सुधाकर दिवंगत भ' गेलाह।
रा ना सुधाकर अपन नामक कारणे सेहो लेखक वर्गमे आकर्षणक बिन्दु छलाह, काज आ स्वभावक कारणें तं सहजहिं। हम बहुत दिन बाद बुझलहुं जे 'रा ना' माने राम नारायण। हमरालोकनिक सामान्य रूपें बाजबाक जे टोन होइए, तदनुसार 'रा आ ना' कें जोड़ि क' राना उच्चारित सहजहिं भ' जाइत छैक, से हमरो होअए आ बहुतो लोककें होनि। बाद मे जखन 'रा ना'क माने बुझल तं अपने पर हंसी उठल। हाय रे हम! अमरुख कहीं के।
एकबेर हुनकासं एहि मादे पुछने रहियनि, तं कहलनि, "अहांक देशसं अंगरेज एखनो नहि गेल-ए। अपन नांगरि लोकक मोनमे गाड़नहि अछि। तें राजकाजसं ल' क' बाजा-भुक्की मे सेहो अंगरेजिए 'एब्रिभिएसन' चलैए। एत' नेपालमे से नहि चलै छै। एत' आफ्नो भाषा आफ्नो देश, प्राणभन्दा प्यारो छ। माने अपन भाषा आ अपन भेष प्राणहुं सं प्रिय अछि।"
रा ना सुधाकर हमरा कखनहुं 'अहां' तं कखनहुं 'हौ' कहि सम्बोधन करथि। माने हमरासं गप करबाकाल फ्री स्टाइल मे गप करथि, से हमरा नीक लागय। हुनक 'हौ' कहब बेसी नीक।
हुनकासं धुरझार भेट होयबाक अवसर तं नहि भेटल, मुदा कार्यक्रम आदिमे कहियोकाल भेट होइत रहल। मुदा जखन भेटथि, आत्मीयतासं भरल। घरक लोक सन। पत्राचार धरि होइत रहल, से ताधरि, जाधरि नेपाल-भारतक बीचक हुलाक (पोस्टल) सेवा बन्न नहि भेलैक। प्राय: दू वा तीन बेर हम हुनका ओहिठाम (रानी, विराटनगर) गेल छी। से जहिया गेलहुं, लागनि जे कत' धरी, कत' उसारी?
ओहो प्राय: दू बेर बेगूसराय आयल रहथि, से 'सगर राति दीप जरय' केर गोष्ठीमे। गोष्ठीक बाद दू दिनक लेल हम अपना ओहिठाम रोकि लेने रहियनि। मोन पड़ैए, ताहि समय ओ ख्यातिलब्ध कथाकार राजेन्द्र विमल प्रति सम्मान व्यक्त करैत कहने रहथि जे विमल जी हुनका कथाकार बनबामे बड़ सहायक भेल रहथिन।
बहुत प्रकारक कष्टक अछैतो हुनका चेहराक मुस्की मलिन नहि होनि। छोटछीन फैक्ट्री मे आ तकर बाद तेहने सन प्राइवेट फॉर्मक अल्पवेतन भोगी नोकरिहारा सुधाकर जी अपन मुस्की मलिन नहि कयलनि। गरल रूपी जीवन-संघर्षकें मुस्कियाइत पीबैत रहलाह आ जीबैत रहलाह। 'हर फिक्र को धुएं में उड़ता चला गया...' सन।
ई बात तय छैक जे एहन लोककें समाज सेहो हतोत्साहित करैत छैक। खाहे लेखक ओ कतबो पैघ किएक ने होथि। से जातिगत समाज आ पेशागत समाज दुनू। एहन लोक जकरा लेल अवसरवादिता पोटासियम साइनाइड सन होइत छैक, आजुक समाज कछेरे मे छोड़ि दैत छैक। साहित्यिक मान-सम्मान आ उचित मूल्यांकनक दृष्टिकोणे रा ना सुधाकरक संग तेहने सन भेलनि। हुनको लेल अवसरवादिता आ लल्लो-चप्पो पोटासियम साइनाइडे सन छलनि, जकरा ओ जीवनपर्यंत नहि चिखलनि।
रा ना सुधाकर गद्य आ पद्य दुनू विधामे लिखलनि। दुनूमे उत्तम लिखलनि। मैथिली साहित्यक माथ ऊंच करबा योग्य। मुदा, हम हुनका मूलत: कथाकार मानैत छियनि। ओना हुनकर कविता आ गीतसभ सेहो चर्चित रहलनि अछि।
एकबेर विराटनगर मे भेटक क्रममे अपन एक सय गीतक पाण्डुलिपि देखौने रहथि। नाम छलैक- सयपत्री। एक सय गीतक संग्रह। हुनक इच्छा रहनि ने कथा-संग्रहक बाद ई छपनि। मुदा, से इच्छा संगहि गेलनि। आम आदमीक लेल सभ तरहक स्वादक गीतसभ रहैक एहि पाण्डुलिपिमे। किछुक मुखड़ा एखनो मोन पड़ैए-
"सुग्गा हमर अहीं छी, मैना हमर अहीं छी।
सम्पूर्ण जिन्दगी के अएना हमर अहीं छी।।
# # # # #
एक टा दोसर स्वादक गीत-
"के खुआ देलकौ मेला मे पान बहिना
ई छौंड़ा सब होइ छै बैमान बहिना..."
रा ना सुधाकर अपन कथा सभक शीर्षकक कारणें सेहो चर्च/कुचर्च मे रहलाह। जेना, शुद्धतावादी आ परम्परावादी सभकें हुनक कथा 'चोलियामे चोर बसे गोरी', 'चान असोथकित अछि' आ 'खुट्टी पर टांगल ब्रा' नहि पचलनि। भेलनि जे 'दीयरि', 'संधि', 'प्रदक्षिणा' आ 'थकुचल मासुक बुट्टी' आ 'छागर' सन कथाक लेखन एहन-एहन कथा किएक लिखै छथि? आ झट द' फ्रायड मनोविज्ञानसं लिप्त चोला ओढ़ा देल गेलनि सुधाकर जीकें। मुदा, किनसाइत एहि कथासभक आन्तरिक मर्म बुझबाक प्रयास करितथि ओसभ। जे, से...
रा ना सुधाकर अपन कथासभक परिवेश गामसं अनैत छथि। मिथिलाक कोनो गामसं, जाहि ठामक लोक आ गप, आह्लाद आ वैमनस्यता, प्रेम आ घृणा हुनका मोन-प्राणमे बैसि गेल रहैत छनि। ओत्तहिसं कथा उठबैत छथि। ओ कथा उठबैत छथि जोगबनी-रानी (विराटनगर)क बॉर्डर एरियासं, जत' भूख छै, पटोर आ मारकीनक अद्भुत समावेश (कथा- संधि) छैक आ छैक दाम्पत्यक अस्वीकृति-स्वीकृति आ भारत-नेपालक बीचक मनमोटाओक परिणाम। आ 'संधि' सन कथा लिखैत छथि।
ओ अपन कथाक भाषा सभ अनैत छथि अपन पात्र आ परिवेशक आत्मासं। हिनक कथा 'प्रदक्षिणा'मे से देखल जा सकैछ। कथानायक बहुतो समयक बाद गाम जाइए आ तखन जे बदलल गाम देखैए, तकर अद्भुत चित्र एहि कथामे छैक। नायक अपन 'स्व' कें तकैत अछि। पूरे गामक परिक्रमाक बादो अपन बहिक्रमक मित्र-बन्धुसं भेट नहि होइत छैक। कथानायकक मन:स्थितिक चित्रण मनोयोगपूर्वक भेल अछि। पाठककें अपने गाम सन घटना लागब कथाकारक सफलता सिद्ध करैत अछि। एहि कथाक भाषा, जकर चर्च हम कयल अछि, एहि वाक्यमे देखल जा सकैछ-
"मोटरसाइकिल पर ऑफिस जायब आ विधवाक संग लसरघंटी।"
ई एक टा बानगी देल अछि।
कहल गेलैए- जे गामसं नहि जुड़ल अछि, ओकरा लग नीक भाषा नहि छैक। सुधाकर जीक रचना सभकें पढ़ैत हुनक गामसं जुड़ल गहिराइ बुझना जाइछ। इहो कहल जाइ छै जे 'जकरा लग अतीत छैक, ओकर वर्तमान महत्वपूर्ण होयतैक।' ई बात सुधाकर जी पर सेहो लागू होइत छनि। हुनको लग गामक अतीत छनि, प्राय: तें ओहो महत्वपूर्ण छथि।
हिनक ओ कथा जकरा फ्रायड मनोविज्ञानक चिप्पी लगाओल गेल, ओ अछि- 'खुट्टी पर टांगल ब्रा।' ई कथा 1984 ई मे छपल छल। एक टा चोटी लेल नायिका बुचियाकें दोकानदार गंगबा कोना तंग करैत अछि, तकर चित्रण भेल अछि। पहिलुक देल 'ब्रा'क दाम कोना असूल' चाहैत अछि, तकर चित्रण अछि। बुचियाक दयनीयताक गलत फैदा उठबैत अछि गंगबा। मुदा, एहि कथामे बुचियाक प्रतिरोध सोझां अबैत छैक।
एहि कथामे प्रयुक्त शिल्प देखबा योग्य अछि। वातावरण-निर्माणमे जाहि प्रतीक सभक प्रयोग भेल अछि, से कथाक गुणवत्ताकें स्थापित करैत अछि। जेना-
'एक दिस बुचिया संग जे भ' रहल छै। दोसर दिस लकड़ीक ठाहीक आवाज- चोली भीतर हैसा...जोर लगा क' हैसा...'
'छाउरक ढेरी पर एकटा कुत्ता मूइल मैनाकें गिधनि रहल छलैक।'
बुचियाक प्रतिवाद आ परुषक प्रति आक्रोश एहन भ' जाइत छैक, जकर चित्र कथाक अंतमे रहि तरहें उकेरल गेल अछि- 'भाइयो जखन खुट्टी परक ब्रा छूबै छै तं पुरुष मानसिकताक प्रति आक्रोश बहराइत छै बुचियाक।'
ई कथा एक टा आर ग्राफ बनबैत अछि। ओ ग्राफ थिक मैथिली कथामे स्त्रीकें चेष्टगर होयबाक ग्राफ।
ई कथा पढ़ैत काल ललितक कथा 'कंचनियां' मोन पड़ैत रहल। 'कंचनियां'क एक टा अंश मोन पड़ल, जत' गरीबीसं फिरीसान आ बेमार ओकर माय कहै छै- 'मालिक के धेने रही, बेर छै कुबेर छै।'
बेजाय तं कंचनियो के लागल रहै, मुदा मायक बेरामी दुआरे चुपचाप समान ल' क' घुरल छलि। मुदा, एहि कथा मे बुचिया एक लोइया थूक फेकि क' घुरै छै। ई बात मैथिली कथा आ स्त्री द्वारा प्रतिवादक बढ़ैत ग्राफकें कहैत छैक।
ओना स्त्री-विमर्शक दृष्टिएं देखी तं सुधाकर जीक सभ कथा एहि विमर्शकें नोतैत अछि। हिनक कथा सभक स्त्री मिथिलाक ओ स्त्रीसभ छथि, जे अपन जीवन नहि जीबि सकैत छथि। चूल्हि, चालनि आ चिनवार सं आगांक कोनो सपना हुनकासभक लेल रह' नहि देने रहनि तात्कालिक समाज। आ सैह हिनक कथा सभमे आयल अछि। जस के तस।
कथा 'छागर'मे माय आ पत्नीक बीच पिचाइत पुरुषक प्रतिस्थापन बड़ कौशलपूर्वक कयने छथि। नायिका रूपा सासुक प्रतिकार करै छै। पति ओकरा ओधबाध करैत छै। माय-पत्नीक घिच्चातिरीमे बेटाक असहजता बड़ फड़िच्छ भ' क' एहि कथामे अबैत छैक। कथाक अंत, हिनक आने कतोक कथा जकां प्रतीकात्मक भेल छैक। कथाक अंत बुझू जे कविताक एहि पांतिसं होइत छैक- 'ओकरा मोन पड़ि गेलैक जे हनीफ कसाउ छागर कें खुट्टापर लटकौने छूरा सं बुट्टी काटि-काटि तराजू पर जोखैत रहय।
एहि तरहक प्रतीकात्मक अंत सुधाकर जीक कथाक विशेषता छलनि। एहन अंत कथा 'चान असोथकित अछि' मे सेहो देखल जा सकैछ- 'दोसर दिन सभ देखलक जे मनटून के पैर मे सुशील बाबू बला चप्पल झलकि रहल छलनि।'
कहबाक माने ई जे रा ना सुधाकर अपन कथा सभकें पहिने जीबैत छलाह, तखन लिखैत छलाह। आ ई बात हुनका अपन तूरक अग्रणी पीढ़ी मे आ मैथिली कथाक महत्वपूर्ण श्रेणीमे रखने छलनि। मुदा, ई बात तं ओ बुझताह, जे हुनका गहनतासं पढ़ि सकलाह वा सकताह। प्रश्न ई उठैछ जे हमर साहित्यक नब पीढ़ी कोना पढ़त? जाहि भाषामे कोनो लेखकक पुस्तकाकार पहिल कृति हुनक मृत्युसं किछुए पहिने आबय, तखन ओहि लेखककें नब पीढ़ी कोना चिन्हत?
रा ना सुधाकर जी एहि अवसादमे जीबैत रहलाह आ अपन पोथी सभक प्रकाशनक प्रति उदासीन भ' गेलाह। ई उदासीनता एहू दुआरें छलनि जे स्वयं सक्षम नहि छलाह। अंतिम समयमे 'नेपाल विद्यापति पुरस्कार कोष' द्वारा कथा-संग्रह 'दीयरि' कें 'नेपाल विद्यापति मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार- 2061' देल गेलैक।
अंतिम समयक ई पुरस्कार झुनझुने सन लागल होयतनि सुधाकर जीकें। एहन झुनझुना जे अपने कमे बजा सकल होयताह...।
सुधाकर जीक साहित्य बेसी-सं-बेसी पाठक धरि पहुंचय, तकर खगता छैक। मैथिली भाषा-साहित्य लेल नेपालमे बहुत रास काज भ' रहल छैक, से सरकारी आ गैर सरकारी, दुनू स्तरपर। हुनक साहित्यपर शोध होअय, हुनक रचनासभ छात्र-छात्रा आ आम पाठक धरि पहुंचय। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा हुनक रचनासभक नेपाली अनुवाद कराओल जाय। आदि, आदि।
तें रा ना सुधाकर जीक साहित्य कें उचित मान-सम्मान आ स्थान हेतु भागिरथक प्रतीक्षा छैक- नेपाल आ भारत, दुनू ठाम।
हं, कतोक झंझावात, कष्ट, अवसाद भोगैत रहलाक बादो व्यक्ति रा ना सुधाकर बहुत आग्रही लोक छलाह। साहित्ये जकां सत्कार सेहो हुनक मोन-प्राणमे छलनि। से अभावमे रहितो निमाहैत रहलाह।
एकबेरक बात मोन पड़ैए। हम अबेर क' जोगबनी बॉर्डर पहुंवल रही। जनवरी मासमे (प्राय: दू वा तीन जनवरी) बेगूसराय सं अपन स्कूटरेसं चलि गेल रही। बॉर्डर बन्न भ' गेल रहैक। जोगबनीक एक्साइज ऑफिस मे एक गोटें परिचित रहथि। ओत्तहि स्कूटर राखि बॉर्डर टपलहुं। कनिये आगां गेलहुं कि भाइ रा ना सुधाकर बुलैत भेटलाह। हमर अयबाक पूर्व जनतब रहनि। देखितहिं बजलाह, "बड़ अबेर भ' गेलह? सोचने रही जे सबेरे अयबह त' दुनू भाइ बैसब आ बड़ीकाल धरि बतिआएब। मुदा आब अबेर भ' गेल। तोहर भोजनो सेरा गेल हेतह।"
हम कहलियनि, "अबेर भेनहि की? चलू ने आर अबेर धरि बैसब।"
"मुदा बैसब कोना? घरमे थोड़े किछु राखल रहै छै?चलह..."
आ मुस्किआइत एक टा बन्न होइत दोकान दिस बढ़ैत बजलाह, "उसरल बजारमे ज' किछु भेटि गेल त' घरेमे बैसब। बच्चासभ सूति रहल हैत।"
हम हुनक पछोड़ ध' लेने रही।
'उसरल बजार' हुनका मुहसं बहराएल ई शब्द हमरा मोनमे बैसि गेल।
हुनका गेलाक बाद दू बेर जोगबनी बॉर्डर टपलहुं अछि। लागल जे भाइ रा ना सुधाकर हमर प्रतीक्षामे बुलैत होयताह। आ हम चारुकात नजरि खिड़बैत हुनका ताक' लगलहुं। हुनका बिनु तं ई उसरले बजार ने? सोचलहुं, भविष्योमे जं आयब, तं ई बजार उसरले लागत।
#####