आलेख
मैथिल संस्कृति: लालित्य और लोक सरोकार
डॉ. महेंद्र नारायण राम
(डा महेन्द्र नारायण राम ने मैथिल संस्कृति और मिथिला के लोकसाहित्य, लोकदेवता तथा लोकसरोकार पर विपुल काम किया है। ये मैथिली के महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिनके लेखन में 'आम आदमी' प्रमुखता से आते हैं। एक आयोजन में इनके द्वारा पढ़ा गया उपरोक्त शीर्षक लेख के प्रमुख अंशों को हम 'अंतरंग' के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। मूल मैथिली से इसका हिन्दी अनुवाद पूनम झा 'सुधा' ने किया है।)
मिथिला का भू-भाग बड़ा है। यहाँ का समाज अलग-अलग स्तरों का है। अलग-अलग समाज का प्रभाव होने पर भी यहाँ का व्यवहार, खान-पान, रहन-सहन, विचार और बोलचाल दूसरे लोगों को भी अधिक प्रभावित करता है। कोकटी धोती (धोती का प्रकार, जो सिर्फ मिथिला में पहनी जाती है), सिर पर पाग, पटुआ साग, तिलकोर के पत्ते, मछली-चावल, पान-मखान और अतिथि का आदर आदि लोक-व्यवहार और सरोकार उच्च पदस्थ आसन ग्रहण कराते हैं। श्रेष्ठ संस्कृति के साथ लालित्य चमत्कृत करता है।
वस्तुतः संस्कृति मनुष्य को परिष्कृत और समृद्ध बनाने वाला गुणों के रूप में चिह्नित होती है। यह संवेदनशीलता का काम करते हुए निर्मित होती है। मैथिली भाषा का माधुर्य और मैथिली संस्कृति का लालित्य जगत में प्रसिद्ध है। अनुपम है, मनोरम है, अद्वितीय है। इसके विभिन्न पक्षों का दर्शन निम्नलिखित संस्मरणात्मक बानगी से कराना समीचीन होगा।
मिथिला में जब दामाद आते हैं तो यहाँ की सासू मां सामने नहीं आती हैं; वे अपने झरोखे या दरवाजे के पीछे से देखती हैं कि दामाद के आदर-सत्कार में कोई त्रुटि नहीं हो रही है।
अपने कैरियर के आरंभ में मैं डेकोरेटर एवं पेंटर रहा हूँ। एकबार, मड़बा (मंडप) सजाने के लिए कबिलपुर (दरभंगा) गया था। हमारे यहाँ के डॉक्टर थे- सुरेंद्र लाल दास। वे मुझे अपनी भतीजी की शादी में वहाँ ले गए थे। वहाँ मैंने देखा कि एक पचास-पचपन वर्ष के वृद्ध दामाद को महिलाएँ पाग पहनाकर गाती हुई आँगन में लेकर आ रही थीं। मुझे पता चला कि किसी भी उत्सव पर पुराने दमाद को नये दामाद की तरह सत्कार में कोई कमी नहीं की जाती है।
मेरा ससुराल अवाम (दरभंगा) है। संयोगवश, दरभंगा महाराज का ससुराल भी उसी गाँव में रहा है।
एक दिन हाथी पर चढ़कर उन्होंने अपने अमला-फमला के साथ गाँव भ्रमण हेतु निकले। रास्ते में कुछ लोग जैसे मुसहरनी आदि टोकरी-कुदाल लेकर खेत से शकरकन्द निकालने जा रहे थे। उन्होंने महाराज को देख लिया। आपस में बातें हुईं और किसी ने पूछ बैठा- यह कौन है? दूसरे ने कहा- यह दरभंगा महाराज हैं।
इस पर उसने कहा- ‘वो महाराज होंगे कहीं के, मगर यहाँ के दामाद हैं। मजाक में किसी ने उन पर टोकरी भर राख फेंक दी। हंगामा हो गया। परंतु महाराज ने कहा- 'इन्हें मेरे पास ले आइए। आज ही और अभी-अभी मुझे लगा कि मैं ससुराल में हूँ।' और महाराज खुश होकर उन्हें उपहारस्वरूप जमीन दी।
हमारे बगल में फुलपरास विधानसभा क्षेत्र है। एक बार माननीय देवेन्द्र प्रसाद यादव के त्यागपत्र देने पर माननीय कर्पूरी ठाकुर ने यहां से चुनाव लड़ा था। विरोधी प्रत्याशी थे रामजयपाल सिंह यादव। फुलपरास यादव बहुल क्षेत्र है। रामजयपाल बाबू जहाँ-तहाँ, जिन-जिन के दरवाजे पर गए, जोड़ी धोती, सुपाड़ी, चादर, तौलिया से उनका स्वागत-सत्कार किया गया। पर लौटते समय सब कहने लगे, ‘वोट हम कर्पूरी ठाकुर को ही देंगें।’
मैं अपने विवाहोपरांत दो महीने के भीतर ससुराल गया। दरवाजे पर एक 7–8 वर्ष का बच्चा था। उसने मुझसे कुशल-क्षेम पूछा और कहा, ‘कहिए कुशल । गाँव-घर का समाचार ठीक है न, मेहमान?’ मैंने कहा- हाँ। फिर उसने माँ का हाल पूछा। मैं गुस्सा हो गया और थोड़ा आगे बढ़ा। ससुर जी बोले- ‘नहीं-नहीं, आप मत गुस्सा करिए, यह आपके ससुर जी ही लगेंगे। अधिकांश लोग यहाँ आपके ससुर ही होंगे।’
इस तरह, दामाद के सामने सास नहीं आना और सास द्वारा सत्कार में किसी भी तरह की कमी न हो, इसका ध्यान रखा जाना; नए दामाद को भी पुराने दामाद जैसा ही सत्कार मिलना; गाँव के स्त्री-पुरुष द्वारा समान आदर-सत्कार किया जाना; समान जाति के रहते हुए भी सत्कार में कमी नहीं रख, उत्तम व्यक्तित्व के पक्ष में मतदान का निर्णय लिया जाना; बच्चों द्वारा कम उम्र में सम्बन्ध के अनुरूप मजाक करना; समधन को लक्ष्य कर हँसी-ठिठोली करना; यह मिथिला की संस्कृति और लोक-सरोकार का लालित्य नहीं है? यदि नहीं, तो और क्या है?
मैथिली संस्कृति किसी विशेष प्रयत्न का प्रतिफल नहीं है, अपितु यहाँ की आन्तरिक और बाह्य संरचना है एवं तदनुरूप विकसित समस्या तक का समाधान है। वर्गीय समाज में वर्चस्व की संस्कृति के विरुद्ध अपने लिए नये प्रतीक, बिंब, गाथा, गीत और व्यवहारों को अपनाते हुए परिवर्तन का प्रतिबिंब विविध प्रकार के लोगों के सन्दर्भ में दिखाई देता है। यह सब मैथिल लोगों की संस्कृति है। अब भी यह इतना समृद्ध है कि वाचिक सरोकारों में विद्यमान लोककाव्य, लोकगाथा, लोकगीतों, लोकनृत्यों, नाटकों, लोकचित्रों, लोककथाओं, लोकोक्तियों, लोकवचनों एवं लोकपर्वों में मिथिला, मैथिल और मैथिली का लालित्य दर्शन करा रहा है। इसके अंतर्गत विभिन्न युगों का इतिहास, समाज-दर्शन और लोकजीवन का चारित्रिक उत्कर्ष सहज रूप में देखा जा सकता है।
उपरोक्त विभिन्न पक्षों पर दृष्टिपात करने पर स्पष्ट होता है कि मिथिला में मैथिली लोकगाथाएं मध्यकालीन या पूर्व-मध्यकालीन सामाजिक घटनाओं पर आधारित हैं। जागीरदारों एवं सामंतों के सामाजिक सरोकारों के विरुद्ध कई संगठित/असंगठित विद्रोह हुए, जिसे निर्ममतापूर्वक कुचल दिया गया, जिसका प्रभाव जनमानस पर इस कदर पड़ा कि कई लोकनाटक हुए, कई कवियों ने उनके जीवन-संकटों की गाथा को केंद्र में रखकत रचना की, जो आज भी लोगों के गले में प्रवाहमान है। लोरिक, मनियार, दीनाभद्री, सलहेस, शशिया, महराज प्रभृति कई गाथाएँ सामने आईं; इनके गाथा-गायन और लोकपूजन में वर्गीय सीमाएँ टूट गीं।
क्षेत्रीय-जातीय विशिष्टताओं से गुंथे मिथिला के पारंपरिक लोकनृत्यों में मृदंग नृत्य, पखावज नृत्य, धोबिया नृत्य, चमरनटुआ और डम्फा-बाँसुरी, कठघोड़ा नृत्य, पमरिया नृत्य, मयूरा नाच, लोरिक नाच, नटुआ दयाल सिंह, डोमकच, कौआ हकनी, कीर्तनियाँ नाच, पूजा-आरती नृत्य, डमरू नाच, नारदीय नृत्य, भाओ नृत्य, बक्खो नृत्य, झरनी नृत्य, खजन चिड़ैया नृत्य, विद्यापति नाच, कठपुतली नाच, करिया झुमरी नृत्य इत्यादि शामिल हैं। मिथिला जनपदीय की लोक-संस्कृति आत्मीय लालित्य से भरी है।
उसी तरह लोग मानस की अभिव्यक्ति से ओत-प्रोत भित्ति-चित्र और मालाकार, कुंभकार द्वारा विभिन्न रंगों से सज्जित चित्रित वस्तुएँ मांगलिक कार्य-व्यवहार में आती हैं। सिंदूर और पिठार से बनी अरिपन, बड़े-बड़े पत्तों पर बने कोहबर में साँप, बिच्छू, कछुआ, तोता आदि का चित्र प्राकृतिक मौलिक सांस्कृतिक चेतना और चिंतन के रहस्यमय तथ्यों को उजागर करते हैं, जिन्हें देख जर्मन मानवशास्त्री 'मोसर स्मिथ' द्वारा 'टूरजन पेंटिंग शैली' निर्मित किया गया।
मिथिलाओं में गोदना केवल शरीर का स्थायी अलंकार नहीं था; वह जातिगत परिचिति, बीमारी से बचने का उपाय, विषहर कीड़ा से सुरक्षा, जादुई प्रभाव और पराशक्ति के प्रकोप को अनुकूल करने तथा प्रजनन के प्रतीक के रूप में लोक सरोकार को भी प्रतिष्ठित करना है।
इसी तरह थान एवं गह्वर में गजारोही सलहेस, अश्वरोही ब्रह्म बाबा, व्याघ्ररोही मधुकर बाबा, कलश चौमुख दीप, खिदोदनी, बाँस का डाला, दौरी, सूप, मेघ डम्बर, बेना, फुलडाली, सिकी की पौती, मौनी, चंगेरी पनबट्टा, कुश का आसन, मूज की चटाई, लाहक लहठी, काठक सिन्दूरघोरा, साँप एवं विभिन्न जातियों के हस्तशिल्प, हाथ से बने मूर्ति-शिल्प आदि ये सब वस्तुएँ वास्तव में मैथिल संस्कृति का सौंदर्यबोधी, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आर्थिक चेतना का प्रतीक हैं। लोक-सरोकार और लोक-चिन्तन का प्रतिफल लोककला के रूप में विस्तृत रूप से विद्यमान होना अस्वाभाविक नहीं है।
संस्कृति नदी की तरह प्रवाहमान होती है। वह जल जहाँ-जहाँ बढ़ता है, वहाँ-वहाँ अपना गुण छोड़ता और वहाँ-वहाँ का गुण-अवगुण ग्रहण करता जाता है। इसी तरह मैथिली संस्कृति देश के अन्य प्रांतों, स्थानों होते हुए सम्पूर्ण विश्व में फैल गई है; इसका कारण यह है कि मैथिल अपना शिक्षा-दीक्षा, रोज़ी-रोज़गार हेतु देश-विदेश में प्रवासी रूप में निवास करते हैं। मैथिलों ने कई संस्कृतियों को अपने में समेट लिया और वहाँ अपनी संस्कृति फैला दी। यह लालित्य का विस्तार भी अस्वाभाविक नहीं है। इस विस्तार में परंपरा का टूटना और नई परंपरा का विकास होना स्वाभाविक है; तब भी संस्कृति को राजनीति से प्रभावित कर देना गलत है। इस कृत्य के जड़ में मनोवैज्ञानिक तत्वों का विकसित होना भी अस्वाभाविक नहीं है। कहीं-कहीं इस विकसित परंपरा को लेकर शर्मनाक भाव-बोध भी उत्पन्न होते हैं। पर दोनों परंपराओं का निर्वहन करना भी अनिवार्य हो जाता है। इस संदर्भ में यहाँ केवल एक दृष्टांत देना आवश्यक है।
मैथिलों में विवाह पूर्व या अन्य अवसर पर उबटन लगाने की प्रथा प्राचीन काल से प्रचलित है। उबटन में मेथी का प्रयोग होता है; वैसे ही हल्दी लगाने की भी प्रथा है। इन दोनों में औषधीय गुण हैं। घर-घर में तुलसी का पौधा मिलता है; बेटी-बहू उसकी जड़ में पानी डालते हैं, शाम में दीप जलाते हैं। बेल का पत्ता शिवजी को चढ़ाते हैं। ये वनस्पतियाँ औषधीय एवं पर्यावरणीय महत्व की वस्तुएँ हैं, जिनका उपयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। इनके प्रयोग का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी स्वास्थ्य पर प्रभाव होता है। साथ ही, इनसे संदर्भित गीत पारंपरिक ज्ञान के स्रोत हैं; ये मैथिली संस्कृति में रुढ़ हो गए हैं। पर ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव से ये प्रथाएँ भी लुप्त हो रही हैं। बाजार में रंग-विरंगे क्रीम और लोशन आने से नानी-दादी मेथी क्यों पीसेंगी? वर-वधू को विवाह पूर्व उबटन क्यों लगाया जाएगा? अब तो उबटन के 'फ्लेवर' आने लगे हैं।
बच्चे समाज के भविष्य हैं। हमारी संस्कृति में लोरी, अंग मलेस (मालिश), झुलुआ, रूठे बच्चों को मनाना, खान-पान और खेल-गीत, ये सारी कार्य-सम्पादन दादी-नानी द्वारा किया जाने वाला सांस्कृतिक ज्ञान था। पर अब इस पर बाजारवादी प्रभाव पड़ा है, जिसके कारण हम उन पारंपरिक चीज़ों से दूर हो रहे हैं । जैसे 'ईल सन, कील सन, धोबियाक पाट सन, कुम्हराक चाक सन...' (मालिश करते वक्त बच्चों को सुनाने जाने वाले पद) इत्यादि। परंपरागत गान-गीतों की जगह आधुनिक, बाजार से संचालित गीत हर जगह आ गए हैं।
बच्चों का दुलार-प्यार करने के लिए, रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए, दादी-नानी गाया करती थीं-
“अटकन मटकन दहिया चटकन,
केरा कूश महागर जागर,
पुरनिक पत्ता हिलै डोलै,
माघ मास करैला फरै
तै पर सबहिक ना की?
आमुन गोटी जामुन गोटी
तेतरी सोहाग गोटी
लैह पुत्ता डाभर
करय लेल कामर
बांस काटे ठांय-ठांय
नदी गुंगुआय
कमल फूल दुनू अलगल जाय
सिंगही लेबह कि मुंगरी?
ऐसे माध्यमों से बच्चों को बहुत सारा ज्ञान मिलता था। जैसे तालाब में कमल के पत्ते का तैरते रहना, पानी में कमल के फूलों का तैरना, बांस काटने से आनेवाली आवाज जैसी प्राकृतिक बातों को गीत-गाना के माध्यम से परिचित कराया जाता था, पर अब बाजार के प्रभाव से परिवर्तित गीत दिखाई दे रहे हैं-
“अटकन मटकन हार्लिक्स चटकन,
लेमनचूस महागर जागर,
बिजली पंखा नाचे गोल,
पाँच वर्ष पे जनमत फूले
ताहि पर सबहक ना की?
पटनाक गोटी दिल्लीक गोटी
मिनिस्ट्रीक सोहाग गोटी
लैह पुत्ता डिप्लोमा
देखह सिनेमा
प्रेस छापय धांय-धांय
रेडियो गुंगुआय
मानव सभ्यता अलगल जाय
एटम लेबह कि पौड़की?
इस तरह के बोल आधुनिकता की ओर इशारा करते हैं।
श्रम संस्कृति की उपज है लगनी, जांता चलाना, ढेकी से धान कुटना, ओखली और मूसल से चिउरा कुटना आदि। ऐसे कार्यों के लिए मिथिला में अवसरपरक गीत हैं। जैसे जांता चलाते समय गाये जाने वाला गीत 'जंतसार' कहलाता है। पर अब जांता का स्थान मिक्सी ने ले लिया; ओखली और मूसर का स्थान मिल ने ले लिया है। बटगबनी का स्थान 'डी जे' ने लिया है। श्रम-शक्ति गीत विलुप्त हो गये हैं।
गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक 'विवाह-संस्कार" महत्वपूर्ण है। हमारे यहाँ घर-देखना, सिद्धांत, फलदान, छेका, देवी पूजन, मटकोर, अठोंगर, मड़बा घुमाना (इस क्रिया में वर को कन्या के भाई द्वारा गले में गमछा लगा कर मंडप के चारों ओर तीन बार घुमाया जाता है), आशीर्वाद देना, सातगाँठ बांधना, सप्तपदी, कोहबर बनाना, मड़वा बनाना, मंडप-पूजा, कन्या निरीक्षण, सिंदूरदान, हल्दी-दौर, द्वार-छेकना, बारात निकलना, बारात अभिनन्दन, बरात भोजन, कन्या विदाई आदि कई रीति-रिवाज़ों का पालन किया जाता है। इन सभी रस्मों का अपना विशिष्ट महत्व है, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है।
बारात और समधी के भोजन के समय गीत सुनाने की परम्परा भी मिथिला में है। इन गीतों में विनोद के साथ-साथ गालियों की बहुलता भी होती है, जिसे 'डहकन' कहा जाता है। कुछ बानगी देखी जा सकती है-
सुनू समधी सरकार
हम छी गरीबक आधार
जे छथि भात लेने ठाढ़
ओ छथि मैया के भतार।
(समधी जी सुनिये, हमलोग गरीब के आधार हैं, जो भात लेकर खड़े हैं, वह आपकी मां के भर्तार यानि पति हैं।)
समधिन के बाड़ी मे उपजल आलू
समधिन के ल' गेल जनकपुर के भालू
(समधन की बाड़ी में आलू उपजा और समधन को जनकपुर का भालू ले गया)
पाहुन गारि नहि दै छी, हंसी करै छी
हमर कका कुमार, अहांक काकी मंगै छी...
(दामाद जी! गाली नहीं दे रही हूँ, पूछ रही हूँ । मेरे काका जी कुंवारे हैं, उनके लिए आपकी काकी मांग रही हूँ । इसी तरह हरेक सम्बन्ध के लिए पद जोड़े जाते हैं।)
मिथिला में दामाद को साले, सालियां, सरहज आदि कदम-कदम पर हास-परिहास के साथ गालियां सुननी पड़ती हैं। हास-परिहास करने वाले सम्बन्ध में गांव के कोई भी हो सकते हैं। मनोरंजन के साथ उल्लास से भरी यह संस्कृति मैथिलत्व की पहचान है।
घर पर मेहमानों का स्वागत, रिश्तेदारों का आगमन, बेटे-बेटी के विवाह में तैयारी आदि में पूरा गाँव योगदान देता है। विवाह समारोह में उमंग, उल्लास, हँसी, गीत-संगीत, ससुराल-पक्ष और मायका-पक्ष के बीच हल्की नोक-झोंक, बच्चों की चहल-पहल ये सब वातावरण को खुशियों से भर देते हैं। यह पारिवारिक और सामूहिक सहयोग समाज की मजबूती और आपसी प्रेम का परिचायक है।
मिथिला में विवाह से पूर्व गोत्र-मूल देखकर ही शादी तय की जाती है। यहाँ दहेज-प्रथा को सामाजिक कुरीति माना गया है; बावजूद इसके अब यह प्रथा सामाजिक रीतियों से जुड़ी हुई है।
मिथिला का 'झरनी गीत' जो मुसलमान के ताजिया निकालने के समय गाया जाता है। यह गीत मिथिला में मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दु जाति के लोग भी गाते हैं और ताजिया में सम्मिलित होते हैं। आपसी प्रेम और सौहार्द्र का यह अनूठा संगम मिथिला की सांस्कृतिक पहचान भी है। हिन्दू और मुस्लिम मैथिल सांस्कृतिक लालित्य मिथिला को चमत्कृत करता है। पर, वैश्वीकरण की आंधी ने इसे भी विस्मृत करने लगी है।
मिथिलांचल की घरेलू गीत परंपरा, कजरी, झूमर आदि, सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। अमान, तलमा, भंगरा, हरगीला, उखवा, समार आदि जैसे हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित गीत मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को और भी उज्ज्वल बनाते हैं। विवाह अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों में दोनों समाजों की परंपराओं का सम्मिश्रण दिखता है; यही दर्शाता है कि मिथिला की संस्कृति सामंजस्य, प्रेम और सहअस्तित्व की प्रतीक है।
नीचे दिए गए गीत में भी मुस्लिम और मैथिल संस्कृति का रंग एक साथ झलकता है। गीत में महरम, कंगना, शाखा, मांग, श्रृंगार सभी का उल्लेख मिलता है, जो इसकी सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है। गीत का रूप देखा जा सकता है-
हाय हाय कोने रंग मुंगिया, कोने रंग मोतिया
कोने रंग ननदो, तोरे भैया हाय।
हाय हाय लाले रंग मुंगिया, सबूज रंग मोतिया
गोरे रंग भौजो, मोरे भैया हाय।
(इस गीत में ननद-भाभी के बीच संवाद है। भाभी पूछती है- किस रंग का मूंगा है, किस रंग का मोती है और किस रंग के तुम्हारे भैया हैं? तो ननद जवाब देती है- लाल रंग का मूंगा है, सबूज (हरा) रंग का मोती है और गोरे रंग के मेरे भैया हैं।)
हिन्दू-मैथिल संस्कृति हो या मुस्लिम-मैथिल संस्कृति, दोनों की लालित्य परंपराएँ हमें जोड़ने का काम करती हैं।
मैथिल लोकनाट्य किसी न किसी प्रकार से हमेशा पर्व से जुड़ा रहा है। इसी बहाने सामाजिक विशेषता और विसंगति उजागर होती है। धार्मिक आस्था से जुड़े रहने के कारण जीवन्त और कालजयी होता है। इसका एक उदाहरण 'जट-जटिन' लिया जा सकता है, जो अकाल पड़ने पर इन्द्र देवता से बारिस के लिए गुहारस्वरूप किया जाता है। इस लोकनाट्य में नव दम्पत्ति के उपालंभ ऋंगार, वियोग और फिर संयोग की भावना दिखाया गया है। इसमें कृषक वर्ग के आधारभूत सुविधा पाने का संघर्ष भी है।
मैथिल संस्कृति के लालित्य की विशेषता यह है कि किसी भी प्रतीकात्मक झलक को महज सतही स्थान न देकर एक बौद्धिक-सांस्कृतिक प्रतिनिधि रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए हर चीज पर विस्तार से विमर्श करने की आवश्यकता पड़ती है ताकि समय और सेवा के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक लालित्य समेटा जा सके। यदि विस्तार से लिखा जाए तो कितना कुछ होगा, पर यहाँ सीमित प्रयास ही किया गया है।
मिथिला का सांस्कृतिक विकास विभिन्न स्तरों पर प्रवासी मैथिलों के माध्यम से भारत के विभिन्न प्रांतों में नए आयाम के साथ मिथिला-मैथिली की परिचिति दे रहा है। इस संदर्भ के कुछ बिन्दु यहां उल्लेखनीय है-
1. प्रवासी मैथिलों के द्वारा विद्यापति पर्व-महोत्सव, मिथिला विभूति पर्व-महोत्सव एवं मीडिया के विभिन्न माध्यमों से मिथिला के सम्पूर्ण सांस्कृतिक जानकारियों का विस्तार हो रहा है। इसी माध्यम से मिथिला की गरिमा, ज्ञान, दर्शन, संस्कृति और संस्कार की परिचिति वैश्विक स्तर पर हो रही है।
2. पाग (सिरो परिधान) मिथिला की परिचिति है। इसकी अलग संस्कृति और मिठा है। धोती, पाग और चादर के विशिष्टता की परिचिति भी वैश्विक स्तर पर हुई है।
3. 'पग पग पोखरि माछ मखान' (कदम-कदन पर तालाब, मछली और मखान) की महत्त पूरे विश्व ने जाना है।
4. विश्व के विभिन्न स्थलों पर तुलसी पूजन तथा छठ-पूजा का विधिपूर्वक आयोजन हो रहा है।
5. मिथिला का प्रसिद्ध लोकचित्र 'मिथिला पेंटिंग/मधुबनी पेंटिंग अब बौद्धिक स्तर पर पूरे विश्व में स्थापित हो गया है।
6. साढ़े नौ सौ बीघे में फैली मिथिला के लोक देवता राजा सलहेस की फुलबाड़ी, जो अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य के लिए उल्लेखनीय है, जो ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सम्पदा के रूप में वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि पा चुकी है। यहां लगने वाला वार्षिक मेला को अन्तर्राष्ट्रीय मेला का स्थान प्राप्त हो चुका है।
7. अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा-पूजन के अवसर पर मिथिला से साजे गये हजारो प्रकार के भार (उपहार)-संस्कृति भी वैश्विक स्तर पर चर्चे का विषय है।
8. विलुप्त होती मैथिली की लिपि 'मिथिलाक्षर' की परिचिति भी वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है।
9. भारत सरकार ने राजा सलहेस को यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सूचीबद्ध करने के लिए अनुशंसा भेजा है।
इस तरह की परिचिति के बावजूद कई ऐसे कार्य हैं जो मैथिल संस्कृति जे चहुदिस विकास के लिए किया जान है। बानगी इस प्रकार है-
1. जिस तीव्र गति से हमने अपनी संस्कृति को वैश्विक स्तर पर परिचिति दिलाने का काम किया है, उसके स्थायित्व के लिए हमें अपने घर-परिवार में अपने बच्चों के साथ मातृभाषा की प्राथमिकता देनी होगी। हम इस काम को भूलते जा रहे हैं।
2. राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत झांकी में मैथिल संस्कृति संदर्भित झांकी के प्रदर्शन का प्रयास हो।
3. वैश्विक स्तर पर 'मिथिलाक्षर' के प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।
4. मैथिली/मिथिला से सम्बन्धित अवसरों पर मिथिला के पारम्परिक पोशाक को धारण कर अपनी नीजता कायम रखें।
5. मैथिली नाटक/सिनेमा के प्रस्तुतीकरण को और भी विस्तारित किया जाना चाहिए।
7. सांस्कृति सम्पदा के विस्तार और संरक्षण के लिए इसे चिह्नित कर संरक्षण का उपाय हो।
8. विभिन्न पर्व/महोत्सव/समारोह के माध्यम से व्यष्टि से समष्टि चेतना के प्रति युवाओं को अपनी संस्कृति के प्रति उत्प्रेरित करना आवश्यक है। इस कश्ती को वे ही आगे ले जा सकते हैं।
निष्कर्षतः यह गंभीरतापूर्वक समझना और सोचना आवश्यक है कि हम आकाश में जरूर उड़ें, पर डोर धरती पर ही रखें।
#####
मूल मैथिली से अनूदित : पूनम झा 'सुधा'