Sunday, December 21, 2025

मैथिल संस्कृति : लालित्य आ लोक सरोकार

आलेख

मैथिल संस्कृति: लालित्य और लोक सरोकार

डॉ. महेंद्र नारायण राम
.            (डा. महेन्द्र नारायण राम)

.           (पूनम झा 'सुधा')

(डा महेन्द्र नारायण राम ने मैथिल संस्कृति और मिथिला के लोकसाहित्य, लोकदेवता तथा लोकसरोकार पर विपुल काम किया है। ‌ये मैथिली के महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिनके लेखन‌ में 'आम आदमी' प्रमुखता से आते हैं। एक आयोजन में इनके द्वारा पढ़ा गया उपरोक्त शीर्षक लेख के प्रमुख अंशों को हम 'अंतरंग' के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। मूल मैथिली से इसका हिन्दी अनुवाद पूनम झा 'सुधा' ने किया है।)

मिथिला का भू-भाग बड़ा है। यहाँ का समाज अलग-अलग स्तरों का है। अलग-अलग समाज का प्रभाव होने पर भी यहाँ का व्यवहार, खान-पान, रहन-सहन, विचार और बोलचाल दूसरे लोगों को भी अधिक प्रभावित करता है। कोकटी धोती (धोती का प्रकार, जो सिर्फ मिथिला में पहनी जाती है), सिर पर पाग, पटुआ साग, तिलकोर के पत्ते, मछली-चावल, पान-मखान और अतिथि का आदर आदि लोक-व्यवहार और सरोकार उच्च पदस्थ आसन ग्रहण कराते हैं। श्रेष्ठ संस्कृति के साथ लालित्य चमत्कृत करता है।

वस्तुतः संस्कृति मनुष्य को परिष्कृत और समृद्ध बनाने वाला गुणों के रूप में चिह्नित होती है। यह संवेदनशीलता का काम करते हुए निर्मित होती है। मैथिली भाषा का माधुर्य और मैथिली संस्कृति का लालित्य जगत में प्रसिद्ध है। अनुपम है, मनोरम है, अद्वितीय है। इसके विभिन्न पक्षों का दर्शन निम्नलिखित संस्मरणात्मक बानगी से कराना समीचीन होगा।

मिथिला में जब दामाद आते हैं तो यहाँ की सासू मां सामने नहीं आती हैं; वे अपने झरोखे या दरवाजे के पीछे से देखती हैं कि दामाद के आदर-सत्कार में कोई त्रुटि नहीं हो रही है।

अपने कैरियर के आरंभ में मैं डेकोरेटर एवं पेंटर रहा हूँ। एकबार, मड़बा (मंडप) सजाने के लिए कबिलपुर (दरभंगा) गया था। हमारे यहाँ के डॉक्टर थे- सुरेंद्र लाल दास। वे मुझे अपनी भतीजी की शादी में वहाँ ले गए थे। वहाँ मैंने देखा कि एक पचास-पचपन वर्ष के वृद्ध दामाद को महिलाएँ पाग पहनाकर गाती हुई आँगन में लेकर आ रही थीं। मुझे पता चला कि किसी भी उत्सव पर पुराने दमाद को नये दामाद की तरह सत्कार में कोई कमी नहीं की जाती है।

मेरा ससुराल अवाम (दरभंगा)  है। संयोगवश, दरभंगा महाराज का ससुराल भी उसी गाँव में रहा है।

एक दिन हाथी पर चढ़कर उन्होंने अपने अमला-फमला के साथ गाँव भ्रमण हेतु निकले। रास्ते में कुछ लोग जैसे मुसहरनी आदि टोकरी-कुदाल लेकर खेत से शकरकन्द निकालने जा रहे थे। उन्होंने महाराज को देख लिया। आपस में बातें हुईं और किसी ने पूछ बैठा- यह कौन है? दूसरे ने कहा- यह दरभंगा महाराज हैं।

इस पर उसने कहा- ‘वो महाराज होंगे कहीं के, मगर यहाँ के दामाद हैं। मजाक में किसी ने उन पर टोकरी भर राख फेंक दी। हंगामा हो गया। परंतु महाराज ने कहा-  'इन्हें मेरे पास ले आइए। आज ही और अभी-अभी मुझे लगा कि मैं ससुराल में हूँ।' और महाराज खुश होकर उन्हें उपहारस्वरूप जमीन दी।

हमारे बगल में फुलपरास विधानसभा क्षेत्र है। एक बार माननीय देवेन्द्र प्रसाद यादव के त्यागपत्र देने पर माननीय कर्पूरी ठाकुर ने यहां से चुनाव लड़ा था। विरोधी प्रत्याशी थे रामजयपाल सिंह यादव। फुलपरास यादव बहुल क्षेत्र है। रामजयपाल बाबू जहाँ-तहाँ, जिन-जिन के दरवाजे पर गए, जोड़ी  धोती, सुपाड़ी, चादर, तौलिया से उनका स्वागत-सत्कार किया गया। पर लौटते समय सब कहने लगे, ‘वोट हम कर्पूरी ठाकुर को ही देंगें।’

मैं अपने विवाहोपरांत दो महीने के भीतर ससुराल गया। दरवाजे पर एक 7–8 वर्ष का बच्चा था। उसने मुझसे कुशल-क्षेम पूछा और कहा, ‘कहिए कुशल । गाँव-घर का समाचार ठीक है न, मेहमान?’ मैंने कहा- हाँ। फिर उसने माँ का हाल पूछा। मैं गुस्सा हो गया और थोड़ा आगे बढ़ा। ससुर जी बोले- ‘नहीं-नहीं, आप मत गुस्सा करिए, यह आपके ससुर जी ही लगेंगे। अधिकांश लोग यहाँ आपके ससुर ही होंगे।’

इस तरह, दामाद के सामने सास नहीं आना और सास द्वारा सत्कार में किसी भी तरह की कमी न हो, इसका ध्यान रखा जाना; नए दामाद को भी पुराने दामाद जैसा ही सत्कार मिलना; गाँव के स्त्री-पुरुष द्वारा समान आदर-सत्कार किया जाना; समान जाति के रहते हुए भी सत्कार में कमी नहीं रख, उत्तम व्यक्तित्व के पक्ष में मतदान का निर्णय लिया जाना; बच्चों द्वारा कम उम्र में सम्बन्ध के अनुरूप मजाक करना; समधन को लक्ष्य कर हँसी-ठिठोली करना; यह मिथिला की संस्कृति और लोक-सरोकार का लालित्य नहीं है? यदि नहीं, तो और क्या है?

मैथिली संस्कृति किसी विशेष प्रयत्न का प्रतिफल नहीं है, अपितु यहाँ की आन्तरिक और बाह्य संरचना है एवं तदनुरूप विकसित समस्या तक का समाधान है। वर्गीय समाज में वर्चस्व की संस्कृति के विरुद्ध अपने लिए नये प्रतीक, बिंब, गाथा, गीत और व्यवहारों को अपनाते हुए परिवर्तन का प्रतिबिंब विविध प्रकार के लोगों के सन्दर्भ में दिखाई देता है। यह सब मैथिल लोगों की संस्कृति है। अब भी यह इतना समृद्ध है कि वाचिक सरोकारों में विद्यमान लोककाव्य, लोकगाथा, लोकगीतों, लोकनृत्यों, नाटकों, लोकचित्रों, लोककथाओं, लोकोक्तियों, लोकवचनों एवं लोकपर्वों में मिथिला, मैथिल और मैथिली का लालित्य दर्शन करा रहा है। इसके अंतर्गत विभिन्न युगों का इतिहास, समाज-दर्शन और लोकजीवन का चारित्रिक उत्कर्ष सहज रूप में देखा जा सकता है।

उपरोक्त विभिन्न पक्षों पर दृष्टिपात करने पर स्पष्ट होता है कि मिथिला में मैथिली लोकगाथाएं मध्यकालीन या पूर्व-मध्यकालीन सामाजिक घटनाओं पर आधारित हैं। जागीरदारों एवं सामंतों के सामाजिक सरोकारों के विरुद्ध कई संगठित/असंगठित विद्रोह हुए, जिसे निर्ममतापूर्वक कुचल दिया गया, जिसका प्रभाव जनमानस पर इस कदर पड़ा कि कई लोकनाटक हुए, कई कवियों ने उनके जीवन-संकटों की गाथा को केंद्र में रखकत रचना की, जो आज भी लोगों के गले में प्रवाहमान है। लोरिक, मनियार, दीनाभद्री, सलहेस, शशिया, महराज प्रभृति कई गाथाएँ सामने आईं; इनके गाथा-गायन और लोकपूजन में वर्गीय सीमाएँ टूट गीं।

क्षेत्रीय-जातीय विशिष्टताओं से गुंथे मिथिला के पारंपरिक लोकनृत्यों में मृदंग नृत्य, पखावज नृत्य, धोबिया नृत्य, चमरनटुआ और डम्फा-बाँसुरी, कठघोड़ा नृत्य, पमरिया नृत्य, मयूरा नाच, लोरिक नाच, नटुआ दयाल सिंह, डोमकच, कौआ हकनी, कीर्तनियाँ नाच, पूजा-आरती नृत्य, डमरू नाच, नारदीय नृत्य, भाओ नृत्य, बक्खो नृत्य, झरनी नृत्य, खजन चिड़ैया नृत्य, विद्यापति नाच, कठपुतली नाच, करिया झुमरी नृत्य इत्यादि शामिल हैं। मिथिला जनपदीय की लोक-संस्कृति आत्मीय लालित्य से भरी है।

उसी तरह लोग मानस की अभिव्यक्ति से ओत-प्रोत भित्ति-चित्र और मालाकार, कुंभकार द्वारा विभिन्न रंगों से सज्जित चित्रित वस्तुएँ मांगलिक कार्य-व्यवहार में आती हैं। सिंदूर और पिठार से बनी अरिपन, बड़े-बड़े पत्तों पर बने कोहबर में साँप, बिच्छू, कछुआ, तोता आदि का चित्र प्राकृतिक मौलिक सांस्कृतिक चेतना और चिंतन के रहस्यमय तथ्यों को उजागर करते हैं, जिन्हें देख जर्मन मानवशास्त्री 'मोसर स्मिथ' द्वारा 'टूरजन पेंटिंग शैली' निर्मित किया गया।

मिथिलाओं में गोदना केवल शरीर का स्थायी अलंकार नहीं था; वह जातिगत परिचिति, बीमारी से बचने का उपाय, विषहर कीड़ा से सुरक्षा, जादुई प्रभाव और पराशक्ति के प्रकोप को अनुकूल करने तथा प्रजनन के प्रतीक के रूप में लोक सरोकार को भी प्रतिष्ठित करना है।

इसी तरह थान एवं गह्वर में गजारोही सलहेस, अश्वरोही ब्रह्म बाबा, व्याघ्ररोही मधुकर बाबा, कलश चौमुख दीप, खिदोदनी, बाँस का डाला, दौरी, सूप, मेघ डम्बर, बेना, फुलडाली, सिकी की पौती, मौनी, चंगेरी पनबट्टा, कुश का आसन, मूज की चटाई, लाहक लहठी, काठक सिन्दूरघोरा, साँप एवं विभिन्न जातियों के हस्तशिल्प, हाथ से बने मूर्ति-शिल्प आदि ये सब वस्तुएँ वास्तव में मैथिल संस्कृति का सौंदर्यबोधी, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आर्थिक चेतना का प्रतीक हैं। लोक-सरोकार और लोक-चिन्तन का प्रतिफल लोककला के रूप में विस्तृत रूप से विद्यमान होना अस्वाभाविक नहीं है।

संस्कृति नदी की तरह प्रवाहमान होती है। वह जल जहाँ-जहाँ बढ़ता है, वहाँ-वहाँ अपना गुण छोड़ता और वहाँ-वहाँ का गुण-अवगुण ग्रहण करता जाता है। इसी तरह मैथिली संस्कृति देश के अन्य प्रांतों, स्थानों होते हुए सम्पूर्ण विश्व में फैल गई है; इसका कारण यह है कि मैथिल अपना शिक्षा-दीक्षा, रोज़ी-रोज़गार हेतु देश-विदेश में प्रवासी रूप में निवास करते हैं। मैथिलों ने कई संस्कृतियों को अपने में समेट लिया और वहाँ अपनी संस्कृति फैला दी। यह लालित्य का विस्तार भी अस्वाभाविक नहीं है। इस विस्तार में परंपरा का टूटना और नई परंपरा का विकास होना स्वाभाविक है; तब भी संस्कृति को राजनीति से प्रभावित कर देना गलत है। इस कृत्य के जड़ में मनोवैज्ञानिक तत्वों का विकसित होना भी अस्वाभाविक नहीं है। कहीं-कहीं इस विकसित परंपरा को लेकर शर्मनाक भाव-बोध भी उत्पन्न होते हैं। पर दोनों परंपराओं का निर्वहन करना भी अनिवार्य हो जाता है। इस संदर्भ में यहाँ केवल एक दृष्टांत देना आवश्यक है।

मैथिलों में विवाह पूर्व या अन्य अवसर पर उबटन लगाने की प्रथा प्राचीन काल से प्रचलित है। उबटन में मेथी का प्रयोग होता है; वैसे ही हल्दी लगाने की भी प्रथा है। इन दोनों में औषधीय गुण हैं। घर-घर में तुलसी का पौधा मिलता है; बेटी-बहू उसकी जड़ में पानी डालते हैं, शाम में दीप जलाते हैं। बेल का पत्ता शिवजी को चढ़ाते हैं। ये वनस्पतियाँ औषधीय एवं पर्यावरणीय महत्व की वस्तुएँ हैं, जिनका उपयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। इनके प्रयोग का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी स्वास्थ्य पर प्रभाव होता है। साथ ही, इनसे संदर्भित गीत पारंपरिक ज्ञान के स्रोत हैं; ये मैथिली संस्कृति में रुढ़ हो गए हैं। पर ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव से ये प्रथाएँ भी लुप्त हो रही हैं। बाजार में रंग-विरंगे क्रीम और लोशन आने से नानी-दादी मेथी क्यों पीसेंगी? वर-वधू को विवाह पूर्व उबटन क्यों लगाया जाएगा? अब तो उबटन के 'फ्लेवर' आने लगे हैं।

बच्चे समाज के भविष्य हैं। हमारी संस्कृति में लोरी, अंग मलेस (मालिश), झुलुआ, रूठे बच्चों को मनाना, खान-पान और खेल-गीत, ये सारी कार्य-सम्पादन दादी-नानी द्वारा किया जाने वाला सांस्कृतिक ज्ञान था। पर अब इस पर बाजारवादी प्रभाव पड़ा है, जिसके कारण हम उन पारंपरिक चीज़ों से दूर हो रहे हैं । जैसे 'ईल सन, कील सन, धोबियाक पाट सन, कुम्हराक चाक सन...' (मालिश करते वक्त बच्चों को सुनाने जाने वाले पद) इत्यादि। परंपरागत गान-गीतों की जगह आधुनिक, बाजार से संचालित गीत हर जगह आ गए हैं।

बच्चों का दुलार-प्यार करने के लिए, रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए, दादी-नानी गाया करती थीं-

     “अटकन मटकन दहिया चटकन,
      केरा कूश महागर जागर,
       पुरनिक पत्ता हिलै डोलै,
       माघ मास करैला फरै
       तै पर सबहिक ना की?
       आमुन गोटी जामुन गोटी
        तेतरी सोहाग गोटी
        लैह पुत्ता डाभर
        करय लेल कामर
       बांस काटे ठांय-ठांय
       नदी गुंगुआय
       कमल फूल दुनू अलगल जाय
       सिंगही लेबह कि मुंगरी?

ऐसे माध्यमों से बच्चों को बहुत सारा ज्ञान मिलता था। जैसे तालाब में कमल के पत्ते का तैरते रहना, पानी में कमल के फूलों का तैरना, बांस काटने से आनेवाली आवाज जैसी प्राकृतिक बातों को गीत-गाना के माध्यम से परिचित कराया जाता था, पर अब बाजार के प्रभाव से परिवर्तित गीत दिखाई दे रहे हैं-

      “अटकन मटकन हार्लिक्स चटकन,
       लेमनचूस महागर जागर,
       बिजली पंखा नाचे गोल,
       पाँच वर्ष पे जनमत फूले
       ताहि पर सबहक ना की?
       पटनाक गोटी दिल्लीक गोटी
       मिनिस्ट्रीक सोहाग गोटी
       लैह पुत्ता डिप्लोमा
       देखह सिनेमा
       प्रेस छापय धांय-धांय
       रेडियो गुंगुआय
       मानव सभ्यता अलगल जाय
       एटम लेबह कि पौड़की?

इस तरह के बोल आधुनिकता की ओर इशारा करते हैं।

श्रम संस्कृति की उपज है लगनी, जांता चलाना, ढेकी से धान कुटना, ओखली और मूसल से चिउरा कुटना आदि। ऐसे कार्यों के लिए मिथिला‌ में अवसरपरक गीत हैं। जैसे जांता चलाते समय गाये जाने वाला गीत  'जंतसार' कहलाता है। पर अब जांता का स्थान मिक्सी ने ले लिया; ओखली और मूसर का स्थान मिल ने ले लिया है। बटगबनी का स्थान 'डी जे' ने लिया है। श्रम-शक्ति गीत विलुप्त हो गये हैं।

गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक 'विवाह-संस्कार" महत्वपूर्ण है। हमारे यहाँ घर-देखना, सिद्धांत, फलदान, छेका, देवी पूजन, मटकोर, अठोंगर, मड़बा घुमाना (इस क्रिया में वर को कन्या के भाई द्वारा गले में गमछा लगा कर मंडप के चारों ओर तीन बार घुमाया जाता है), आशीर्वाद देना, सातगाँठ बांधना, सप्तपदी, कोहबर बनाना, मड़वा बनाना, मंडप-पूजा, कन्या निरीक्षण, सिंदूरदान, हल्दी-दौर, द्वार-छेकना, बारात निकलना, बारात अभिनन्दन, बरात भोजन, कन्या विदाई आदि कई रीति-रिवाज़ों का पालन किया जाता है। इन सभी रस्मों का अपना विशिष्ट महत्व है, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है।

बारात और समधी के भोजन के समय गीत सुनाने की परम्परा भी मिथिला में है। इन गीतों में विनोद के साथ-साथ गालियों की बहुलता भी होती है, जिसे 'डहकन' कहा जाता है। कुछ बानगी देखी जा सकती है-

       सुनू समधी सरकार
       हम छी गरीबक आधार
       जे छथि भात लेने ठाढ़
       ओ छथि मैया के भतार।

(समधी जी सुनिये, हमलोग गरीब के आधार हैं, जो भात लेकर खड़े हैं, वह आपकी मां के भर्तार यानि पति हैं।)

         समधिन के बाड़ी मे उपजल आलू
         समधिन के ल' गेल जनकपुर के भालू

(समधन की बाड़ी में आलू उपजा और समधन को जनकपुर का भालू ले गया)

          पाहुन गारि नहि दै छी, हंसी करै छी
          हमर कका कुमार, अहांक काकी मंगै छी...

(दामाद जी! गाली नहीं दे रही हूँ, पूछ रही हूँ । मेरे काका जी कुंवारे हैं, उनके लिए आपकी काकी मांग रही हूँ । इसी तरह हरेक सम्बन्ध के लिए पद जोड़े जाते हैं।)

मिथिला में दामाद को साले, सालियां, सरहज आदि कदम-कदम पर हास-परिहास के साथ गालियां सुननी पड़ती हैं। हास-परिहास करने वाले सम्बन्ध में गांव के कोई भी हो सकते हैं। मनोरंजन के साथ उल्लास से भरी यह संस्कृति मैथिलत्व की पहचान है।

घर पर मेहमानों का स्वागत, रिश्तेदारों का आगमन, बेटे-बेटी के विवाह में तैयारी आदि में पूरा गाँव योगदान देता है। विवाह समारोह में उमंग, उल्लास, हँसी, गीत-संगीत, ससुराल-पक्ष और मायका-पक्ष के बीच हल्की नोक-झोंक, बच्चों की चहल-पहल ये सब वातावरण को खुशियों से भर देते हैं। यह पारिवारिक और सामूहिक सहयोग समाज की मजबूती और आपसी प्रेम का परिचायक है।

मिथिला में विवाह से पूर्व गोत्र-मूल देखकर ही शादी तय की जाती है। यहाँ दहेज-प्रथा को सामाजिक कुरीति माना गया है; बावजूद इसके अब यह प्रथा सामाजिक रीतियों से जुड़ी हुई है।

मिथिला का 'झरनी गीत' जो मुसलमान के ताजिया निकालने के समय गाया जाता है। यह गीत मिथिला में मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दु जाति के लोग भी गाते हैं और ताजिया में सम्मिलित होते हैं। आपसी प्रेम और सौहार्द्र का यह अनूठा संगम मिथिला की सांस्कृतिक पहचान भी है। हिन्दू और मुस्लिम मैथिल सांस्कृतिक लालित्य मिथिला को चमत्कृत करता है। पर, वैश्वीकरण की आंधी ने इसे भी विस्मृत करने लगी है।

मिथिलांचल की घरेलू गीत परंपरा, कजरी, झूमर आदि, सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। अमान, तलमा, भंगरा, हरगीला, उखवा, समार आदि जैसे हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित गीत मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को और भी उज्ज्वल बनाते हैं। विवाह अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों में दोनों समाजों की परंपराओं का सम्मिश्रण दिखता है; यही दर्शाता है कि मिथिला की संस्कृति सामंजस्य, प्रेम और सहअस्तित्व की प्रतीक है।

नीचे दिए गए गीत में भी मुस्लिम और मैथिल संस्कृति का रंग एक साथ झलकता है। गीत में महरम, कंगना, शाखा, मांग, श्रृंगार सभी का उल्लेख मिलता है, जो इसकी सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है। गीत का रूप देखा जा सकता है-

        हाय हाय कोने रंग मुंगिया, कोने रंग मोतिया
        कोने रंग ननदो, तोरे भैया हाय।
        हाय हाय लाले रंग मुंगिया, सबूज रंग मोतिया
        गोरे रंग भौजो, मोरे भैया हाय।

(इस गीत में ननद-भाभी के बीच संवाद है। भाभी पूछती है- किस रंग का मूंगा है, किस रंग का मोती है और किस रंग के तुम्हारे भैया हैं? तो ननद जवाब देती है- लाल रंग का मूंगा है, सबूज (हरा) रंग का मोती है और गोरे रंग के मेरे भैया हैं।)

हिन्दू-मैथिल संस्कृति हो या मुस्लिम-मैथिल संस्कृति, दोनों की लालित्य परंपराएँ हमें जोड़ने का काम करती हैं।
                        
मैथिल लोकनाट्य किसी न किसी प्रकार से हमेशा पर्व से जुड़ा रहा है। इसी बहाने सामाजिक विशेषता और विसंगति उजागर होती है। धार्मिक आस्था से जुड़े रहने के कारण जीवन्त और कालजयी होता है। इसका एक उदाहरण 'जट-जटिन' लिया जा सकता है, जो अकाल पड़ने पर इन्द्र देवता से बारिस के लिए गुहारस्वरूप किया जाता है। इस लोकनाट्य में नव दम्पत्ति के उपालंभ ऋंगार, वियोग और फिर संयोग की भावना दिखाया गया है। इसमें कृषक वर्ग के आधारभूत सुविधा पाने का संघर्ष भी है। 

मैथिल संस्कृति के लालित्य की विशेषता यह है कि किसी भी प्रतीकात्मक झलक को महज सतही स्थान न देकर एक बौद्धिक-सांस्कृतिक प्रतिनिधि रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए हर चीज पर विस्तार से विमर्श करने की आवश्यकता पड़ती है ताकि समय और सेवा के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक लालित्य समेटा जा सके। यदि विस्तार से लिखा जाए तो कितना कुछ होगा, पर यहाँ सीमित प्रयास ही किया गया है।

 मिथिला का सांस्कृतिक विकास विभिन्न स्तरों पर प्रवासी मैथिलों के माध्यम से भारत के विभिन्न प्रांतों में नए आयाम के साथ मिथिला-मैथिली की परिचिति दे रहा है। इस संदर्भ के कुछ बिन्दु यहां उल्लेखनीय है-

1. प्रवासी मैथिलों के द्वारा विद्यापति पर्व-महोत्सव, मिथिला विभूति पर्व-महोत्सव एवं मीडिया के विभिन्न माध्यमों से मिथिला के सम्पूर्ण सांस्कृतिक जानकारियों का विस्तार हो रहा है। इसी माध्यम से मिथिला की गरिमा, ज्ञान, दर्शन, संस्कृति और संस्कार की परिचिति वैश्विक स्तर पर हो रही है।

2. पाग (सिरो परिधान) मिथिला की परिचिति है। इसकी अलग संस्कृति और मिठा है। धोती, पाग और चादर के विशिष्टता की परिचिति भी वैश्विक स्तर पर हुई है।

3. 'पग पग पोखरि माछ मखान' (कदम-कदन पर तालाब, मछली और मखान) की महत्त पूरे विश्व ने जाना है।

4. विश्व के विभिन्न स्थलों पर तुलसी पूजन तथा छठ-पूजा का विधिपूर्वक आयोजन हो रहा है।

5. मिथिला का प्रसिद्ध लोकचित्र 'मिथिला पेंटिंग/मधुबनी पेंटिंग अब बौद्धिक स्तर पर पूरे विश्व में स्थापित हो गया है।

6. साढ़े नौ सौ बीघे में फैली मिथिला के लोक देवता राजा सलहेस की फुलबाड़ी, जो अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य के लिए उल्लेखनीय है, जो ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सम्पदा के रूप में वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि पा चुकी है। यहां लगने वाला वार्षिक मेला को अन्तर्राष्ट्रीय मेला का स्थान प्राप्त हो चुका है।

7. अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा-पूजन के अवसर पर मिथिला से साजे गये हजारो प्रकार के भार (उपहार)-संस्कृति भी वैश्विक स्तर पर चर्चे का विषय है।

8. विलुप्त होती मैथिली की लिपि 'मिथिलाक्षर' की परिचिति भी वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है।

9. भारत सरकार ने राजा सलहेस को यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सूचीबद्ध करने के लिए अनुशंसा भेजा है।

इस तरह की परिचिति के बावजूद कई ऐसे कार्य हैं जो मैथिल संस्कृति जे चहुदिस विकास के लिए किया जान है। बानगी इस प्रकार है-

1. जिस तीव्र गति से हमने अपनी संस्कृति को वैश्विक स्तर पर परिचिति दिलाने का काम किया है, उसके स्थायित्व के लिए हमें अपने घर-परिवार में अपने बच्चों के साथ मातृभाषा की प्राथमिकता देनी होगी। हम इस काम को भूलते जा रहे हैं।

2. राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत झांकी में मैथिल संस्कृति संदर्भित झांकी के प्रदर्शन का प्रयास हो।

3. वैश्विक स्तर पर 'मिथिलाक्षर' के प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।

4. मैथिली/मिथिला से सम्बन्धित अवसरों पर मिथिला के पारम्परिक पोशाक को धारण कर अपनी नीजता कायम रखें।

5. मैथिली नाटक/सिनेमा के प्रस्तुतीकरण को और भी विस्तारित किया जाना चाहिए।

7. सांस्कृति सम्पदा के विस्तार और संरक्षण के लिए इसे चिह्नित कर संरक्षण का उपाय हो।

8. विभिन्न पर्व/महोत्सव/समारोह के माध्यम से व्यष्टि से समष्टि चेतना के प्रति युवाओं को अपनी संस्कृति के प्रति उत्प्रेरित करना आवश्यक है। इस कश्ती को वे ही आगे ले जा सकते हैं।

 निष्कर्षतः यह गंभीरतापूर्वक समझना और सोचना आवश्यक है कि हम आकाश में जरूर उड़ें, पर डोर धरती पर ही रखें।
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मूल मैथिली से अनूदित : पूनम झा 'सुधा'

Sunday, September 14, 2025

आम आदमीक लsगक कथा (भूमिका)

भूमिका

आम आदमीक लगक कथा
.   (फोटो - केदार कानन)
प्रदीप बिहारी

हमरा हाथमे प्रिय भाइ केदार काननक कथा-संग्रह 'अथ चैम्बर कथा'क पाण्डुलिपि अछि। पाण्डुलिपि भेटितहिं करेज सूप सन भ' गेल। से एहि दुआरें जे ई चिरप्रतीक्षित छल। 

हिनक कथाकारक स्वरूप नव रचनाकार लग प्राय: ओत्तेक जगजियार नहि होयतनि, मुदा पुरान रचनाकार लग कथाकार केदार कानन चिरपरिचित आ लोकप्रिय छथि। हिनक कतोक कथा मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित भ' लोकप्रिय भ' चुकल अछि। एहि संग्रहक आगमन, तें महत्वपूर्ण अछि।

हिनक एहि संग्रहमे प्राय: सतरह गोट कथा अछि जे वर्ष 1979 ई सं 1994 ई.क मध्य लिखल गेल आ प्रकाशित भेल अछि। ई कथा सभ एहि समयावधिमे प्रकाशित मिथिला मिहिर, वैदेही, अनामा, अर्पण आदि पत्रिकामे प्रकाशित भेलनि। पनरह बरखमे संख्यात्मक रूपें ई सतरहटा कथा भने कम लागय, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिकोणें सभ कथा स्तरीय कथाक शर्तकें पूरा करैत अछि। अपन प्रासंगिकता आइयो कायम रखने अछि। 
 
उक्त कालखण्डमे देश भीषण परिवर्तनक स्थिति देखलक। एकरा सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक संकट आ जातीय-धार्मिक तनाओक समय सेहो कहल जा सकैछ। सामाजिक चेतनाक उभार सेहो एहि कालखण्डमे देखल जा सकैछ। एहि पोथीक कथा सभ पढ़ने पाठककें लगतनि जे कथाकार एहि परिवर्तन सभक साक्षी रहलाह अछि आ अपन रचनाधर्मिताकें समाजक संग जोड़ि क' रखलाह अछि। कोनो लेखकक ई प्रयास आ प्रयोग ओकरा सभ दिन लोकप्रिय बनौने रहैत छैक। 

एहि परिवर्तनक प्रभावें सामाजिक परिवेशमे लोकक व्यस्तता बढ़ब शुरुह भेल, रोटीक समस्या, बेकारीक समस्या बढ़ल आ तकर कारणें बढ़ल तनाओ, लूट, अपहरण, शोषण आ घूसखोरी। एहि पोथीक कथा सभमे कथाकार बहुत सूक्ष्मतापूर्वक तात्कालीन समयकें पकड़लनि अछि। बहुत निर्भीकताक संग व्यवस्थाक कुरूपताकें पाठकक समक्ष अनलनि अछि। बिनु कोनो राग-लपेटकें सत्यकें उजागर कयलनि अछि- जेना, जस की तस धर दीनी चदरिया...
 
आ, से हिनक एहि संग्रहक कथा 'नाटक', 'तामस' आ 'आतंक'मे देखल जा सकैत अछि। कथा 'नाटक'मे स्वास्थ्य विभागमे व्याप्त अराजकताकें उजागर कयल गेल अछि। अस्पतालमे भर्ती अपन भाउजिक सुश्रुषामे लागल नायक राजीवकें अस्पतालक दरबान कोना प्रेमपूर्वक अनर्गल टाका लैत छैक, से देखाओल गेल अछि। सोझे नहि मंगैत छै, मंगबा लेल नाटक करैत छैक। भोरुका दरबान रोगीकें नमहर सन सलाम ठोकैत हालचाल पुछैत अछि आ जिज्ञासा करैत अछि जे केहन मोन छनि। तकर बाद बजैत अछि - सब कुछ ठीक हो जेतै‌ चिन्ता के बात नहि हइ। कोठरीसं बहराइत काल राजीवकें संग करैत अछि आ बाहरमे कहैत अछि- 'कोनो बात नहि। डाक्टर सभकें हम कहि देलियै। आब धीरे-धीरे मोन ठीक होइ जेतै। लाब' आब हम चलब। जतरा बना द'।'
 
सहानुभूतिक शब्द कहि 'जतरा बनायब' माने चाह-पान लेल टाका मांगब। दरबान कहैत छैक जे भोरे-भोर चाह ताह नहि पीबै? तहिना दोसरो दरबान पहिले सन सहानुभूति प्रकट करैत चाह आ एकटा सिकरेट लेल मुंह खोलि एकटकही मंगैत छैक। कथा-नायककें चाह-सिकरेट लेल दरबानक नाटक देखि छगुन्ता नहि होइत छनि, ओकर क्षुद्रतापूर्ण व्यवहार पर हंसी लगैत छनि। आ, नाटकक रूपमे स्वास्थ्य विभागक नंगटै देखैत छथि पाठक।

कथा 'तामस'मे रिक्शबला पर उठल नायकक तामसकें बड़ कुशलतापूर्वक प्रस्तुत कयलनि अछि। हमरा जनैत तामसक फराके मनोविज्ञान देखयबाक प्रयास छनि कथाकारक। पहिने ओत्तेक रौद आ गुमारमे रिक्शा नहि भेटब, भेटबो कयने अनर्गल पाइ मांगब नायकक तामसकें बढ़बैत छैक। मुदा ओ तामस अव्यक्त रहैछ। उचित किराया पर रिक्शा भेटलाक बाद नायकक चेहराक विजय-बोध आ पहिलुक रिक्शा बला लग बाटे जाइत काल घुरि क' ओकरा दिस तकबाक मोन बनाएब, मुदा ताकब नहि। एहि दृश्यक संयोजन कथाक क्लाइमेक्समे महत्वपूर्ण बनबैत छैक। अव्यक्त तामसक प्रस्तुतीकरण पाठककें नीक लगतनि।

कथा 'आतंक'क नायक परमाक व्यवहारसं डेरायल ओकर मित्र सभक असमंजसक परिस्थितिक निर्माण नीक जकां एहि कथामे भेल अछि। परमा सन लोक प्राय: गाममे पाओल जाइत अछि, जे बेरोजगारे रहि जाइछ वा अपन विचारधारा समाजकें मनाब' लेल अपस्यांत भ' हारि जाइछ आ ओकर व्यवहार अस्वाभाविक भ' जाइछ, हिंसक भ' जाइछ। आ, समाजक लोक ओकरासं कन्छी काट' लगैछ। मुदा, ओकर मित्र ने ओकरा संग रहि पबैछ आ ने ओकरासं फराके। एहि परिस्थितिकें उकेरैत कथा 'आतंक' पाठककें बान्हि क' राख'मे सफल होइत अछि।

एकटा कथाक चर्च कर' चाहब, ओ थिक 'परती'। ई अभावक कथा थिक, संगहि होस्टलमे रहि क' पढ़ैत एकटा छात्रक संघर्ष-कथा सेहो। घरसं महिनबारी खर्च आब'मे विलम्ब भेने कोनो छात्रक केहन स्थिति भ' सकैछ, तकर अद्भुत चित्रण अछि एहि कथामे। कथाक छोट-छोट तत्व आ क्षणकें बहुत महीनीसं वर्णित कयल गेल अछि। जेबीमे पाइ नहि रहने चाहक दोकान परक स्थिति आ मेसक बकियौता भ' गेने आन-आन छात्र सभकें भोजन क' घुरि गेलाक बाद भोजन कर' जायब। आदि-आदि। कथाक अंतमे ओ नायक एकटा बाट बनबैत अछि अपना लेल। एकटा प्रेसबला बहुत दिनसं प्रूफ देख' कहैत रहैत छलैक, मुदा ओ गछैत नहि छल। आंखिक इलाजक बाद ओकर काज ओ करत, से सोचय। मुदा, नहि। ओकरा बुझयलैक जे आंखि देखयबासं बेसी महत्वपूर्ण प्रूफ पढ़ब थिक। प्रूफ देखलासं ओकरा नियमित पाइ भेटैत रहतैक। ई कथा संवेदनशील लोककें उद्वेलित करैत छैक। 
 
एहने एकटा कथा अछि 'फट्टौन'। एहि कथाक विषय-वस्तु सेहो अभावेक गीत सन अछि। मुदा, एकर प्रस्तुतीकरण गस्सल आ मर्मस्पर्शी अछि।
 
एहि संग्रहक आनो-आन कथा सभ जेना- 'उत्तेजना, अपनैती, एकरसता, सुल्फा, पौडर, आ शीर्षक कथा अथ चैम्बर कथा' आदिमे हमरा सभक चिन्हल-जानल पात्र-चरित्र सेहो देखबामे अबैत अछि, ओकर जीवनानुभूति, संयोग-वियोग आ हंसब-बाजब सेहो अछि। ई पात्र सभ पाठककें अपन कात-करोटक पात्र बुझयतनि आ तें एहि पात्र सभक कारणें पाठक कथा सभसं जुड़ल रहताह। कथा पढ़ने अपने अनुभव करब जे कथाकार आम आदमीक कतेक लगक लोक छथि, आम लोकक दुख-सुख, राग-विराग, हर्ष-पीड़ा, सोहर-समदाउनकें संवेदनाक संग देखैत छथि, गुनैत छथि आ कथाक विषय बनबैत छथि। हिनक कथा सभमे  समसामयिक, वैचारिक आ यथार्थक संदर्भ मुख्य रूपसं देखाइत अछि। मानव मूल्यक ताकाहेरी, समाजक बदलैत स्वरूपक चित्रण आ परिवर्तनजन्य नीक-बेजायसं उपजल मानसिक अन्तर्द्वन्द्वक सटीक प्रस्तुति भेल अछि। केदार भाइक कथा सभमे रेखांकित करबा योग्य इहो बात अछि जे हिनक कथा मूलत: आ विशेषत: सामाजिक पर्यवेक्षण करबाक आ मानवीय तथ्य आ संवेदना धरि पहुँचबाक प्रयास करैत अछि।

एहि संग्रहमे संग्रहित कथा आकारमे सामान्य सन अछि। किछु कथा ओहूसं छोट, मुदा शैल्पिक दृष्टिएं लघुकथा नहि। पूर्ण कथा अछि। एतेक छोट आकारमे कथा लिखब एकटा चैलेंज होइत छैक। जेना- कथामे वर्णनात्मकताक निर्वहन, ओकर परिवेशक निर्माण, दृश्य-बंध, कथा-वस्तुक समुचित प्रसार, भाषा, संवाद, आदि। एकर सभक समायोजन चैलेंज होइत छैक आ ताहिमे कथाकार सफल छथि।

केदार भाइ कथा लिखलनि, कविता लिखैत छथि, अनुवाद खूब करैत छथि, सम्पादन आ प्रकाशन सेहो तहिना। खूबे। ई क्रम आब ततेक भकरार भ' गेल अछि जे कथेतर गद्य आ संस्मरण सेहो ओही गति आ ऊर्जासं लिखि रहल छथि। कार्यक्रम-संयोजन आ व्यवस्थापनक व्यस्तताक संग उक्त काज सभ समान रूपें करैत छथि, जे ककरो लेल सेहन्ताक विषय भ' सकैत अछि। मुदा...

मुदा...केदार भाइ कथा लिखब छोड़ि देलनि। ई संग्रह अद्यावधि हुनक लिखल प्राय: सभ कथा सभक संग्रह अछि। एकटा नीक कथाकारक नीक-नीक कथा सभसं साहित्यक पाठक वंचित रहि गेल अछि। एहि पोथीकें पाठकक असीम स्नेह भेटतैक, से विश्वास हमरा सहजहिं अछि। संगहि हमरे नहि, पाठकलोकनिकें सेहो भरोस रहतनि जे केदार भाइक आर नव-नव कथा पढ़बा लेल भेटतनि।

एहि कथा-संग्रहक प्रकाशनक अवसर पर हम आदरणीय केदार भाइकें शुभकामना आ बधाइ दैत छियनि।
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                          बेगूसराय/23/08/2025

नव डेग (भूमिका)

भूमिका 

नव डेग
(कंचना झाक कथा-संग्रह 'नव भोर'क भूमिका)
प्रदीप बिहारी

हमरा हाथमे कंचना झाक कथा संग्रह 'नव भोर'क पाण्डुलिपि पी डी एफ रूपमे अछि। एहि नामसं हमर परिचिति जनकपुरक एकटा साहित्यिक-सांस्कृतिक समारोहमे भेल छल। ओहिठाम ई अनुवादक सत्रक विचार गोष्ठीमे आयल रहथि। संयोगवश ओहि गोष्ठीमे हमहूं रही। तें प्रथम दृष्ट्या हम हिनका अनुवादक बुझलियनि। मंचसं परिचयो यैह देल गेल छल जे ई नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानमे अनुवाद समितिक सदस्य छथि।

हम अपन अनुवाद पत्रिका 'अंतरंग' लेल हिनकासं नेपालीक किछु रचना सभक हिंदी अनुवाद लेल सहयोग लेल आ ओहि रचना सभकें पत्रिकामे प्रकाशितो कयल।

कहियोकाल साहित्यिक गपसप होइत रहैत छल आ ताही क्रममे हमरा हिनक कथाकार रूपसं परिचय भेल, तं मोन आनन्दित भेल। भेल जे नेपालमे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा भरोस आर जागल। जें कि नेपाल हमर आरंभिक कार्यक्षेत्र रहल अछि आ आब सम्बन्ध-क्षेत्रमे‌ सेहो अछि, तें नेपालमे होइत साहित्यिक गतिविधि (मैथिली आ नेपाली) आकर्षित करैत अछि आ तोष दैत अछि। तें हिनक कथा-संग्रहक पी डी एफ पाण्डुलिपि देखि मोन हुलसि गेल।

'नव भोर'मे सतरह टा कथा संग्रहित अछि आ सतरहो विभिन्न भाव-भूमिक कथा अछि। कथाकारक निर्दोष प्रयास अछि। कथा सभ पढ़ने पाठककें लगतनि जे कथाकार एहि बातक ध्यान रखलनि अछि आ प्रयास सेहो कयलनि अछि जे कथामे कोनो पासंग नहि रहि जाइक। संतुलित रहय। बैलेंस्ड।
 
संग्रहक पहिले कथा 'नव भोर' जे पोथीक नाम सेहो अछि, मे समयक संग परिवर्तनक गप क' एकटा सकारात्मक गप राखलनि अछि।  'अनुराधा' नामक उपन्यास, जे पुरस्कृत होइछ, केर पात्र अनुराधाक बहन्ने स्त्री-विमर्शक गप कहैत छथि। दाम्पत्य जखन मात्र औपचारिकता लाग' लगैत छैक, ओहिमे प्रेम आ मित्रता तकनहुं नहि भेटैत छैक, तखन अनुराधा अपना लेल बाट बनबैत अछि। स्त्री-स्वातंत्र्यक बात कहबाक प्रयास कयल गेल अछि।
 
कंचना झा जीक एहि संग्रहक बेसी कथा स्त्री-विमर्शकें नोतैत अछि। मिथिलाक स्त्रीक दशा आ स्त्रीक संग होइत पारम्परित व्यवहारक चित्रण आ ताहि परिस्थितिसं स्त्रीकें बहार क' स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान करबाक बात ई अपन कथा मे करैत छथि। 
 
एकटा कथा अछि- गंतव्य। ई परित्यक्त दम्पतिक कथा अछि जे विवाहक बाद वा ई कही जे सम्बन्ध विच्छेदक पनरह बरखक बाद एक यात्रा क्रममे एक-दोसराकें देखैत अछि। दुनू चाह पीबा लेल जाइत अछि। चाहक दोकान पर बैसल नायिका रश्मिकें अतीत मोन पड़ैत छैक। मोन पड़ैत छैक जे कोना ओकर इच्छाक विरुद्ध विवाह भ' गेल रहैक। आ वर ओकरामे अति आधुनिका तकैत रहल आ तिरस्कृत क' एक दिन केबाड़ बन्न क' बहरा गेल। समयक संग नायिका अपन फराक आ स्वतंत्र जीवनक बाट बनबैत अछि। सफल होइत अछि, प्रतिष्ठा भेटैत छैक। नायक एकबेर ओकरा पुन: संग रहि नव जीवन शुरू करबाक आग्रह करैत छैक, मुदा नायिका तकरा नकारि जाइछ। नायिकाक निर्णय ओकर दृढ़ता कें बतबैत छैक संगहि स्त्रीक वैचारिक उच्चता सेहो देखबैत छैक।

एही क्रममे एकटा कथा 'अंतिम इच्छा' कें सेहो देखल जा सकैत अछि। मरणासन्न पत्नीक अंतिम इच्छा जे ओकर पति ओकरा मुइलाक बाद बियाह क' लिअए आ ताही लेल ओ पतिसं वचन लेब' चाहैत अछि। जीवनक उत्तरार्द्धेमे पति-पत्नीकें एक-दोसराक सभसं बेसी खगता होइत छैक। एक-दोसराक सहयोगी होइत अछि। ओहि समय धियापुता अपन-अपन काज-रोजगारमे लागि जाइछ। पत्नीकें बुझल छैक जे ओ नहि बांचति, तें पतिसं वचन लेब' चाहैत अछि जे ओ ओकरा बाद बियाह क' लिअय। नायिका उदाहरण दैत छैक जे एक गोटें कमे बयसमे विधवा भ' गेलि। तकर बाद ककरोसं बतिएबो करय तं समाज दोसरे उधबा उठा दैक। लांछने लगाब' लगैक। तेहने डर नायिकाकें अपन पतिक मादे सेहो छैक। दोसर बात ओ चाहैत अछि जे ओकर पति ओकरा बाद सुरक्षित आ निष्कलंक जीचन जीबय। पतिक प्रति प्रेमकें सेहो ई बात प्रदर्शित करैछ। कथाक अंतमे ओहि दम्पतिक दुनू संतान मायकें भरोस दैत अछि जे हुनक अंतिम इच्छाक पूर्ति होयतनि।

एहिना हिनक कथा 'सखी' एकटा फराक आयाम प्रस्तुत करैत अछि। ओ ई जे पतिक पूर्व प्रेमिकाक नाम पत्र अछि ई कथा। बियाहक बादो नायिकाक पतिक मोनमे ओकर पूर्व प्रेमिके छैक, तें पत्नी ओकरा लेल वस्तु आ निंघेस सन छैक। नायिका अपन दुख ओहि महिला कें कहैछ। एकठाम चैलेंज सेहो दैछ जे हम अपन पति कें अहां लग पठा दैत छी, जं हिम्मति अछि तं अहां दुनू गोटें रहू। मुदा, व्हाट्स एप आ मैसेंजर पर जेहन-जेहन गपसप करैत छी, से नहि करू। पति आ बच्चा देखत तं की होयत?

कथाक अंत बड़ मार्मिक ढंगे होइत अछि। नायिका ओहि महिला (पतिक प्रेमिका)कें कहैत अछि जे ओ ओकर पतिसं भेंट कर' चाहैत अछि आ पूछ' चाहैत अछि जे ओहो एकरे सन वस्तु बनि क' नहि ने रहि गेल अछि।

आत्मालापक शिल्पमे लिखल कथा अछि 'बैमनमा'। प्रसूतिएमे छोड़ि क' अनचोके पड़ाएल पतिक स्मरणक संग पत्नीक संघर्षक कथा कहल गेल अछि। पचीस बरखक बाद पतिक आयब। पत्नी द्वारा दंडस्वरूप ओकरा अस्वीकार कयल जायब कथाक क्लाइमेक्स बनैत अछि। पतिकें घुरि गेने ई निश्चिन्तताक बोध होयब जे आब दु:स्वप्न सं भेटल, एक प्रकारक मोहभंग छैक। मोनक कोनमे जं कनियो प्रेम रहल हेतैक तं ओकर अवसानक बात अंतमे देखाइत अछि। 

एहि कथाक वर्णनात्मकता पाठककें बान्हबाक प्रयास करैत छैक, मुदा कथाकें जल्दीए अपन क्लाइमेक्स पर चलि गेलाक कारण प्रभाव कने कम भ' जाइत छैक। ई कथा विस्तार मंगैत छैक। 

संयुक्त परिवारक टुटनक एकटा कथा, जे पाठककें चिन्ता आ चिन्तन लेल वाध्य करतनि, ओ अछि- 'अलग चुल्हा'। ओहुना वर्तमान समय आ समाजक संरचनामे 'न्यूक्लियर फैमिली'क चकनसारि पसरि गेल छैक। एकर लाभ-हानि लोक भोगैए, मुदा एखनुक इनारमे एत्तेक ने भांग घोराएक छैक जे मुट्ठी भरि खुशीक लेल ढाकी भरि अवसाद लोककें भारी नहि लगैत छैक। से, पारिवारिक बटवारा सन विषय ल' क' लिखल कथा 'अलग चुल्हा' आम परिवारक कथा बनि सकल अछि। कथा कहैत अछि जे व्यक्तिगत पहिचानक अहंकार केहनो सुगठित परिवारकें खण्ड-खण्ड क' दैत छैक। कथामे बड़ महीनीसं एकटा चिन्ता देखाएल गेल अछि, ओ ई जे रातिसं चुल्हा अलग भेलाक बाद आर सभक नैहरक बर्तन-बासन तं ओकरा सभसं काज लागि जयतैक, मुदा राघोपुरवालीक? हुनक अवस्था बहुत नीक नहि छनि। कमलपुरवाली कनियाक बच्चा सभ छोट छैक, ओकरा बुते भानस-भात कयल कोना होयतैक? ओकर बच्चा भुखले रहु जयतै? आ, खण्डित होइत घरक डरीड़ पर ठाढ़ि घरक मुख्य महिला लक्ष्मीक मोनमे ई चिन्ता उभरैत छैक। ओ नहि चाहैत अछि जे बटवारा होइक, मुदा कथाकार कहैत छथि जे एहिबेर ओकरो हाथसं मामिला बहरा गेल छैक। कथा पठनीय अछि।

एहि संग्रहक आन-आन कथा जेना 'सिनेहक डोर', 'मात्र एकटा गलती', 'भरदुतिया', 'हमर परदेसिया' आदि कथा सभ लोक आ समाजक चिन्ता करैत अछि। अपन सहज अभिव्यक्तिक कारणें पाठकक मोनमे जगह बनयबामे सफल होयबाक गुण एहि कथा सभमे भेटैत अछि।

एकटा बात देखल जे एहि संग्रहक कथा सभमे बहुतो कथाकें समाप्त करबा लेल कथाकार हड़बड़ीमे बुझाइ छथि। कथा सभ अपन बात कहि दैत छैक, मुदा कथाक विस्तारसं जे 'किस्सागोई'क रस बहराइत छैक, से कने कम लगैत छैक। कंचना जीक ई पहिल संग्रह छनि। अगिला संग्रहक कथा सभमे एहि बात पर अबस्से गंभीरतापूर्वक विचार करतीह। ओना पहिल संग्रहक कथा झुझुआन कतहुसं नहि छैक, हिनक भविष्यक कथाकारक मजगूत न्यों छैक।
 
कंचना झाक कथा-भूमि शहर आ महानगर बहुत कम अछि। मिथिलाक गाम बेसी अछि। मिथिलाक बदलैत लोक अछि। चूल्हि-चिनवार अछि। मानवीय संवेदना अछि। दाम्पत्य जीवनक त्रासदी अछि, प्रेम सेहो। स्त्रीक स्वतंत्रता आ आत्मनिर्भरता अछि। हिनक कथा एहन स्त्री, जकरा बाछी जकां गरदामी लगा क' ककरो हाथमे थम्हा देल जाइत छैक, केर संग ठाढ़ भ' एहन प्रचलनक विरोध करैत अछि। कथा सभमे बदलैत समयक अनुसार नव पीढ़ीक उदारता सेहो छैक। माता-पिताक एनवर्सरी मनयबामे व्यस्त धियापुता छैक। माने पुरातन आ अधुनातन मिथिला हिनक कथामे अछि। सुखद ई जे मिथिला अछि, बदलैत मिथिलाक स्वरूप अछि आ मैथिली कथामे मिथिलाक होयब बड़ी टा बात अछि।

कंचना झा जी बहुआयामी प्रतिभाक धनिक थिकीह। हिनक बायोडाटा जे हिनक विभिन्न क्षेत्रक काज सभक झलकी देखबैत अछि, सं साहित्य आ समाजक अपेक्षा हिनकासं सहजहिं बढ़ि जाइत छैक। मैथिली कथाक क्षेत्रमे सेहो पाठक हिनका दिस उमेदक नजरिए तकैत रहताह, कारण अपन पहिले कथा-संग्रहमे ई अपन दृष्टि फड़िच्छ रखने छथि। आगां जतेक बेसी लिखतीह, शिल्प मंजाइत रहतनि। 

कंचना झा जीक एहि कथा-संग्रह 'नव भोर'कें हम  'नव डेग' मानैत छी। एहि पोथीक प्रकाशन पर हम हिनका शुभकामना आ बधाइ दैत छियनि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे हिनक डेग बढ़ैत रहनि।
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                      बेगूसराय/31 अगस्त 2025

अपन हिस्साक काज करैत कथाकार (मैथिली आलेख)

आलेख

अपन हिस्साक काज करैत कथाकार
प्रदीप बिहारी

काल्हि जेठ बालक फोन पर जिज्ञासा कयलनि जे पापा की सभ क' रहल छी? हमरा प्रसन्नता भेल, अचरज सेहो। भेल जे आइ ओ आराममे छथि। कार्यालयी कोनो तनाओ नहि छनि।‌ से एहि दुआरे जे अनदिना हुनकर हालचाल पुछबाक ढंग दोसर रहैत छनि। अनदिना पूछता- नीके छी ने पापा। मोन ठीक अछि ने। दवाइ समय पर लै छी ने। आदि, आदि। मुदा, आइ जखन ई पुछलक जे की सभ क' रहल छी, तं हुलसि गेलहुं। से एहि दुआरे जे हुनका अपन साहित्यिक आ पत्रकारिताक आरंभक दिन मोन पड़ल होयतनि मने, जे वर्तमान नोकरीमे प्राय: पूर्णतः छुटि गेल छैक।

हम पुत्रक खुशीक गौरव बोधमे मग्न भ' गेलहुं। मुदा ओ बेसी काल रह' नहि देलनि। कहलनि- सोचैत छलहुं जे फेर स' पढ़ब-लिखब शुरू करी। नोकरीक व्यस्तता त' रहबे करतै। जेना नोकरीमे अपन हिस्साक काज करैत छी, तहिना साहित्यो फेर स' शुरू करी। पहिने पढ़ी, तकर बाद...। 

मुदा, एखनि हम आदरणीय विभूति आनन्दक टटका संग्रह 'कथा '24' मे संकलित कथा सभ पढ़ि रहल छी, जे प्रकाशन-प्रक्रियामे अछि। कथाकार विभूति आनन्द मैथिली कथाक जाहि शिखर पर छथि, ओहिठाम हुनक कथाक भाषा पर गप करब उचित नहि लगैए। कारण, कथा-भाषा'क अपन जे 'स्टाइल' ओ कायम क' लेने छथि, तकर निर्वहन हुनक कथामे होयबे करतनि। 'स्टाइल' जत' छनि, ओत' सं आगुए बढ़तनि। पाछां अयबाक स्थिति अयबाक संभावना स्वीकारल नहि जा सकैछ। कथाक शिल्पक मादे ई बात नहि कहल जा सकैछ। कथाकारक शिल्प बदलैत रहैत छैक आ बदलैत रहक चाही। ई जरुरियो छैक।

रहल गप कथ्यक। तं हिनका सन वरिष्ठ कथाकारसं ई उमेद तं सहजहि रहैत छैक जे कथाक कथ्य टटका होनि, समयोचित होनि आ समाजमे घुलल-मिलल होनि। कथा निष्पक्ष होनि। आन्हरकें आन्हर आ कुईर कें कुईर कहैत होनि।

जेनाकि हिनक कथा-संग्रह 'कथा '23' मे हम हिनक कथाक विकासक ग्राफ पर चर्च कहने रही, हिनक कथा-दृष्टि आ कथाक 'प्लाट'क चयन पर गप कयने रही। मुदा, एखनि हम गप कर' चाहब जे सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक बदलावक संग विभूति भाइ कोना अपन कथाकारकें जोगा क' आ सक्रिय रखने छथि। वैश्विक चबूतरा पर पटकायल सीसा जकां व्यक्ति आ समाज कोना खण्ड-खण्ड भेल अछि। तकर किछु खण्ड अपन चमकी बचयबा लेल कोना उपलायल अछि, किछु खण्ड अपन अस्तित्व लेल कोना‌ संघर्षरत अछि? तं, ताहि लेल एहि संग्रहक कथा सभकें पढ़ब आवश्यक‌ होयत। आ कथा पढ़लाक बाद बुझना जायत जे कथाकार 'नवता'क जबर्दस्त आग्रही छथि। समयकें चिन्हबाक सेहो।

से एहि संग्रहक पहिल कथा 'कोखि'मे भेटत जे ओकर नायिका धीया-पुताकें नमहर भेलाक बाद अपना लेल रोजगार शुरू करैए। रोजगार टाका-पाइ लेल टा नहि, ताहि लेल कमौआ पति छथिने, समय काट' लेल, जीवनक अनुभव लेबा लेल सेहो शुरू करैए। आ एकदिन एहन अबैत छैक जे ओकर ब'र ओकरासं पाकेट खर्च लेल खुदरा पाइ मंगैत छैक। पति कें खुदरा पाइ दैत कालक नायिकाक गौरव बोध देखितहि बनैत छैक। कथामे ओकर प्रतिस्थापन सेहो बेजोड़ ढंग सं भेलैक अछि। नायिकाक अनुभवक मनोवैज्ञानिक प्रस्फुटन सेहो कथामे आयल छैक, तकरा पकड़ि सकबाक अपेक्षा वरीय कथाकारसं पाठकक होइत छैक आ ताहि मामिलामे पाठक निराश नहि भेल अछि।

हम 'नवता'क गप कयलहुं। ओकरा‌ एहि तरहें बुझल जा सकैत अछि आ अपनेसभ बुझितहुं होयब जे समाज आ संस्कृतिक संदर्भमे ई एकटा बौद्धिक आन्दोलन सेहो छैक, जाहिमे परम्परागत विचार, सामाजिक बनौट आ धार्मिक अवधारणा सभसं फराक एकटा नव दृष्टिक प्रस्तुति होइत छैक। नव विचार, लोकक आत्म अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत परिचिति आ स्वतंत्र विचार केन्द्रमे रहैत छैक।
 
वैश्वीकरण आ डिजिटलाइजेशनक बाद एहि 'नवता'क अवधारणाक बिस्फोट समाजमे कोन प्रकारें भेलैक अछि, तकरा कुशलतापूर्वक कथाकार एहि संग्रहक कथा सभमे पकड़लनि अछि। ओकर सकारात्मक आ नकारात्मक, दुनू स्थिति आ प्रभावकें उकेरलनि अछि। समाज कें सावधान कयलनि अछि आ आत्म-सम्मानक संग व्यक्तिगत स्वतंत्रताक रक्षाक लेल अपन पात्रक संग ठाढ़ सेहो भेलाह अछि। एहि संदर्भमे एकटा कथा 'उनटन' देखल जा सकैत अछि।

'उनटन' कथामे कथाकार बड़का साहस देखौलनि अछि। व्यक्तिगत आत्म-सम्मान आ स्वतंत्र अस्तित्वक कुप्रभावक प्राय: अन्तिम नियताप्तिक रूपमे एहि कथामे  सहोदर आ सहोदराक आत्मीय आ दैहिक सम्बन्धकें देखाएल गेल छैक। कोटामे तैयारी कर' गेल दुनू भाय-बहिन जखन दू-तीन बर्ख घर नहि घुरैत छैक आ माय फोन क' बेटीकें कहैत छैक जे ओ सभ आब ओकर बियाह क' देब' चाहैत छथि। बेटी कोनो स्पष्ट जवाब नहि दैत छैक। तखन ओ भायक समाचार पुछैत छैक। मुदा ताहि समय एकटा बच्चाकें कानबाक स्वर सुनाइत छैक। माय ओहि स्वरक मादे पुछैत छैक, तं बेटा कहैत छैक- 'तोहर पोता कनैत छौ।'

'उनटन' कथासं कोनो संवेदनशील लोकक दिमाग झनझना सकैत छैक। मुदा, एकर कथानक सत्य छैक। आधुनिकता आ स्वतंत्रताक चकमकीमे जीबैत आजुक समाजमे सम्बन्धकें बुकनी-बुकनी करैत कतोक एहन घटना सभ भ' रहल छैक, जे बरोबरि सुनबा-पढ़बामे अबैत अछि। एहन-एहन घटना आब एत्तेक ने संख्यामे होम' लागल छैक जे सामान्य रूपें लोकक संवेदनाकें भोथ क' रहल छैक। एहि यथार्थ कें कथाक विषय बना क' समाजकें चेतयबाक अपन दायित्वक निर्वाह कयलनि अछि कथाकार।

विभूति आनन्दक कथा सभक एकटा महत्वपूर्ण उपांग बनि गेल अछि - मोबाइल। से, प्राय: एहि दुआरे जे मोबाइल एखनि समाजेक महत्वपूर्ण उपांग बनि गेल अछि आ ओहो समाजेक लोक छथि, समाजेक कथा लिखैत छथि। तें अपने सभ देखब से हिनक कथामे मोबाइलक विभिन्न ढंगे उपयोग भेल अछि। आब हिनक बेसी संवाद-कथामे संवादक माध्यम मोबाइल चैटिंग होइए। 

उपकरण आ ओकर ‌उपयोगक प्रभावसं उपजल एकटा‌ कथा अछि- 'जंगल'। आरंभमे ई कथा प्रेम-कथा जकां शुरू होइए। मुदा, मोबाइल कौल पर दू टा पुरुष पात्रक गपक संग कथा आगां बढ़ितहिं प्रेम सम्बन्धी आजुक युवा पीढ़ीक सोच आ उछृंखलताक सोचक कथा बनि जाइत अछि। प्रेम-कथा नहि, 'रिलेसनशिप-कथा' बनि जाइत अछि। कथा पढ़ने लागत जे आजुक ई युवा वर्ग प्रेममे देह कें प्रमुखतासं देख' लगलैए। संवेदना, आदर आ विश्वासकें कतहु भसिया तं ने देलकैए। बहुलांशक यैह हाल छैक, एहने सोच छैक। पांच साल सं एक-दोसराक संग 'रिलेशन'मे रहैए आ 'रिलेशन ब्रेक' कर'मे वा 'मूव औन' कर'मे पांचो मिनट नहि लगबैए। फेर घंटे-दू घंटाक बाद दोसराक संग 'रिलेशन' भ' जाइत छैक। सेहो एहि सूचनाक संग जे ओकर 'एक्स' छलैक, आब नहि छैक।' 

ई कथा पढ़ैत काल पाठककें लगतनि जे की पढ़ि रहल छी? मुदा नहि, अपने यथार्थ पढ़ि रहल छी। बदलैत समयक सोपान पढ़ि रहल छी, जाहिमे सम्बन्ध मात्र सिरही टा रहि गेलैए। हं, ई कथा पढ़ैत काल कथाकारक मेहनति सेहो नजरि आओत। जाहि बयसक नायक-नायिका सभ कथामे आयल अछि, तकर मनोदशा, भाषा आ सोचमे अपन बयसक उत्तरार्द्ध मे काया-प्रवेश करबामे कतेक मेहनति लागल होयतनि कथाकारक, सेहो नजरि आओत। ओकर सभक भाषा आ आधुनिक 'टर्म' चुनबामे कथाकारक कौशल सेहो नजरि आओत। बहुत 'टर्म' पहिले बेर सुनब, ताहि लेल कथाकारक लेल मुंहमे धन्यवाद सेहो उचरत।

हम जेहन कथा सभक बानगी देने जा रहल छी, ताहि पाठक सभकें लगतनि जे एहि संग्रहमे एहने कथा सभ होयतैक। मुदा नहि। एहि संग्रहमे सभ रंगक आ सभ बयसक लोकक कथा छैक। कारण, समय एकरंगाह नहि होइत छैक। बदलैत रहैत छैक। आ, बदलैत समयके अपन कथाक विषय बनायब विभूति आनन्दक स्वभाव बनि गेल छनि। 

सन् दू हजार चौबीसमे बिहारमे एकटा प्रशासनिक घटना घटलैक - 'सर्वे'। ओना 'सर्वे' कोनो नव घटना नहि छैक, एकटा प्रक्रिया छैक, जे चलैत आबि रहल छैक। मुदा उल्लेखित वर्षक सर्वे किछु विशेष रहैक। तें एहि पर सेहो साहित्यकार लोकनि अपन-अपन कलम उठौलनि। हिनको सर्वे पर केन्द्रित दू टा कथा एहि संग्रहमे भेटत - 'सर्वे भवन्तु सुखमय...' आ 'सर्वे सन्तु निरामया:...'। ई दुनू कथा सरकारी कुव्यवस्था, प्रशासनिक विसंगति आ पारिवारिक-सामाजिक वैमनस्यताकें उजागर करैत अछि, पठनीय आ विचारणीय सेहो अछि।।

तहिना जीवन आ जीबाक प्रति उत्साह आ जीजिविषाक कथा अछि- 'मॉर्निंग फेस'। आ, बियाहक कतोक बरखक बाद कालेजक प्रेमकें मोन पाड़ैत कथा अछि- 'हम गंगा भ' बहि जाइ...'। अद्भुत।

एहि संग्रहमे कथाकार राजनीतिक यथार्थकें सेहो दू टा कथाक माध्यमे पाठकक समक्ष रखलनि अछि। ओ दुनू कथा थिक- ‘वसुधा’ आ ‘स्वप्नभंग’। फराक-फराक विचारधारा बला राजनीतिक दल सभ, जे बाहरसँ जतेक मजगूत, सैद्धांतिक आ उदार नजरि अबैत अछि, से सभ भीतरसँ कतेक कलुषित आ फोकला अछि, ओकर नेता आ कार्यकर्ता सभ व्यक्तिगत स्वार्थक लेल कतेक छद्म करैत अछि, ई बात गंभीरतापूर्वक दुनू कथामे आयल अछि।

एहि संग्रहमे कथा-वस्तुक चयनमे एकटा बात देखऽ मे अबैत अछि जे कथाकार विभिन्न आयामक विषयकें अपन कथामे आनलनि अछि। जेना, एकटा कथा अछि- खेल। मैथिल समाजमे खेल एहि प्राथमिकतामे नहि रहल अछि जे अभिभावक अपन नेनाकें ओहिमे कैरियर बनयबा लेल प्रोत्साहित करथि। आब नगरमे रहैत मैथिल एहि दिशामे साकांक्ष भेलाह अछि आ उदार सेहो। मुदा पहिने से विरले देखल जाइत छल। ओना मिथिलामे विभिन्न प्रकारक खेलक प्रचलन रहल अछि, जकर चर्च कथामे भेल अछि। मुदा ओ खेल प्राथमिकतामे विरले रहल अछि। एहना स्थितिमे एहि कथा ‘खेल’क अभिभावक पात्रा सुशांत अपन पुत्रकें ओकर रुचिक अनुसार शतरंजक नेशनल खेलाड़ी बनाबऽ लेल बेटाक संग संघर्षरत अछि, से नीक समाद दैत अछि।

पारम्परिक रूपसं हटि नव प्रयोगक संग जीबाक ढंगमे परिवर्तन आ ओकर जटिलताकें चित्रित करबाक आग्रही कथाकार विभूति आनन्दक एहू पोथीक कथा सभ हिनक कथा-लेखनक दृष्टिबद्धताक बानगी बनि प्रस्तुत भेल अछि।

...आ, एतेक कहैत हमरा फेर पुत्रक गप मोन पड़ैए जे ओ आब फेरसं पोथी पढ़ब शरू करता। हुनकर ई गप हमरा पठनीयताक संकट दिस ल' जाइत अछि। भारतीय आन-आन भाषाक संग मैथिलीमे सेहो ई संकट छैक। मैथिलीमे कने बेसीए। पत्र-पत्रिकाक अभावे छैक। पढ़निहार कत'? आब फेसबुको पर लोक कथा नहिए सन पढ़ैत छथि। तर्जनीक उपयोग 'लाइक' पर क' लैत छथि। माने ई जे कथाकार बुझथि जे हुनक कथा देखल गेलनि। मुदा, ताहि सं की? कथाकार एत्तेक लिखि रहल छथि, से....

एहि आशयक गप सेहो बेटाकें कहलियनि। तं कहलनि- 'अहांक काज लिखब अछि। अपन समयकें लिखि क' समाज लेल अंकित करब। समय औतैक आ पढ़निहार सेहो। जं लिखले नहि रहतै त' की भेटतै ओकरा? दोसर बात ई जे... 

...दोसर बात ई जे...जख‌न ताकल जयतै त' सभक हिस्साक काज ताकल जयतै, 'कूरी' लगाओल जयतै। अहांक लिखले नहि रहत, त' की लागत?'

बेटाक गप हमरा काल्हि बड़‌ नीक लागल छल।

ई गप आइयो नीक लागि रहल अछि आ तें आदरणीय विभूति भाइक विशाल कथा-भंडारकें देखैत बुझाइए जे आब' बला समयमे हिनक साहित्यिक काजक हिस्सामे 'कूड़ी' नहि, 'पथार' लगतनि।

जाहि गतिएं ई लिखि रहल छथि, ओ गति अक्षुण्ण रहनि आ अपन हिस्साक काज एही इमानदारीसं करैत रहथि। शुभकामना।
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बौआइत मोनकें सम पर अनैत मीठा पान (आलेख)

आलेख

बौआइत मोनकें सम पर अनैत मीठा पान
.   (फोटो- वाम दिस विभूति आनन्द, दहिन दिस प्रदीप बिहारी)

प्रदीप बिहारी

अप्रतिम कथाकार विभूति आनन्दक नव कथा-संग्रह 'कथा '23' प्रकाशमे आयल अछि। लगले ई कहि दी जे विभूति आनन्द अपन कथा-संग्रह सभक नाम सेहो सिरीजमे राख' लगलाह अछि। जेना, एहि पोथीसं पहिने 'कथा '21' आ 'कथा '22' नामक पोथी आबि चुकल छनि। स्पष्ट छैक जे जाहि बर्खक शीर्षक छैक, ताहि बर्खमे लिखल कथा सभक संग्रह थिक। आरंभमे हमरा ई नाम नीक नहि लागल रहय। मुदा, बादमे नीक लाग' लागल। से एहि दुआरें जे सम्बन्धित बर्खमे कथाकारक कथा सभक ट्रेंड बुझबामे सहज होइत छैक। कथाकारक वैचारिक ग्राफ समयक संग कोना आगां बढ़ैत अछि वा पाछां घुसकैत अछि, सेहो बुझल जा सकैत अछि। बदलैत सामाजिक, सांस्कृतिक आ राजनीतिक अवस्थाक प्रभावकें कथाकार कोना देखैत छथि? ओकर दबावकें कोना स्वीकारैत छथि? तखन कथा-संग्रहक नामकरणक पाछां आदरणीय विभूति भाइक उद्देश्य आ दृष्टि स्पष्ट भेल। आ एही क्रममे हिनक पोथी 'कथा '23' पाठक लोकनिक सोझां छनि।

कथा लिखबाक जेहन मति, गति आ अवगति विभूति भाइकें छनि ताहिसं हुनक समकालीन सभकें ईर्ष्या होइत हेतनि आ अनुज रचनाकार सभकें सेहन्ता। आ ताहि दृष्टिएं हिनक कथाक पोथी भविष्यमे 'कथा '24, 25, 26, 27....क नामे अवश्य औतनि।

एहन शीर्षक कथाकारकें अपन प्रतिबद्धता मोन पाड़ैत रहैत छैक, आत्मानुशासन मोन पाड़ैत रहैत छैक जे प्रतिवर्ष एकटा संग्रह योग्य नव कथा लिखबाक अछि। ई संकल्प कथाकारकें सक्रिय आ उर्जस्वित बना क' रखने रहैछ। हमरा सभक लेल ई प्रसन्नताक बात अछि जे आदरणीय विभूति आनन्द शारीरिक अस्वस्थताक बादो मानसिक रूपसं एतेक स्वस्थ छथि जे प्रतिवर्ष एतेक कथा लिखि लैत छथि।
 
दू हजार तइस मे ओ बारह टा कथा लिखलनि। सोझे देखी तं प्रत्येक मास एक टा कथा। बारह मास, बारह कथा। मुदा नहि, मासे-मासक हिसाबसं नहि लिखलनि। आ, कथा एना लिखलो नहि जा सकैछ। कथा लिखब दवाइक खोराक नहि होइत छैक, जे नियमित समय‌पर नहि लेने नीक जकां फैदा नहि करत। 

कथा लिखबाक एकटा मूड बनैत छैक, विषय वा घटना कखनो क्लिक क' जाइत छैक, स्पार्क क' जाइत छैक, बिजलौका जकां चमकि उठैत छैक, तखन कथाकारकें लिखबाक प्रवेग बनैत छनि आ लिखाइत अछि कथा। जं एहि 'क्लिक', 'स्पार्क' आ बिजलौका कें तत्क्षण नहि पकड़लनि कथाकार, तं ओ द्रुत गतिएं ससरि जाइत छैक। सिनेमाक भाषामे जकरा 'फेड आउट' कहैत छैक, विषय वा घटनाक सैह भ' जाइत छैक। कतबो स्मरण करू, सहजहिं घुरि क' नहि अबैत छैक। चूँकि एहि पोथीमे संग्रहित कथा सभमे ओकर लेखनक तिथि देल छैक, तें हम एक टा डाटा देब' चाहैत छी। दू हजार तइसक मार्चमे तीन टा कथा लिखलनि, अप्रैलमे दू टा, अगस्तमे एक टा, सितम्बरमे दू टा, अक्टूबरमे तीन टा आ दिसम्बरमे एक टा। एहिसं हिनक विषय वा घटनाकें आत्मसात करबाक आ कथा लिखबाक आवृत्ति कें बुझल जा सकैत अछि।

एहि बारहो कथाक कथाभूमि आ विषय फराक-फराक छैक। एखनुक समयमे प्रेम आ अस्तित्व एकटा आवश्यक तत्व भ' गेल छैक। जखन प्रेम बचतैक, तखने बचतैक संवेदना, जकर खगता व्यक्ति आ समाज लेल बहुत बेसी छैक। एहि विषय सभकें एहि बारहो कथामे कुशलतापूर्वक राखल गेल छैक।

पोथीक पहिल कथा 'हैप्पी फगुआ' स्वप्न कथा थिक। अपन मृत पत्नीक संग वार्तालापक शिल्पमे लिखल एहि कथामे नायकक विधुर एकाकी जीवन आ तज्जन्य असुविधा आ असुरक्षाक बात कहल गेल छैक। कथाक कैनवास नमहर छैक, जाहिमे दुनू प्राणीक पूर्व जीवन, वर्तमान जीवन, यथा-  बेटा-पुतौहु, मित्र-बन्धु, सम्बन्धी, सर-समाजक चर्च छैक। हिनका सभसं बहुत कम सम्पर्क रहि गेलाक कारणें नायकक एकाकी जीवनक संदर्भ बेर-बेर अबैत छैक। नायिका (मृत पत्नी) कहैत छैक जे ओ तं आत्मा मात्र अछि, मात्र भाव। ओ नायकक लेल संवेदना प्रकट करैत छैक, मुदा कहैत छैक जे ओ दुख वा सुखसं प्रभावित नहि होइछ। कथाक अंत पत्नीकें 'हैप्पी फगुआ' कहि नायक अपन मोनकें मनबैत अछि। माने, 'दिल को बहलाने का गालिब ये खयाल अच्छा है...।' ई कथा पूर्णतः 'संवाद' शिल्पमे लिखल छैक आ पाठक लग गप्पक विभिन्न संदर्भक चित्र सफलतापूर्वक उभरैत छैक आ जगजियार होइत छैक। ओना ई कही जे संवाद शिल्पमे कथा लिखबाक महारथ छनि विभूति आनन्दकें। हिनक कथा 'काठ' पूर्णतः संवाद शिल्पमे लिखल मैथिलीक प्रायः पहिल कथा छनि।

सोशल मीडिया आ डिजिटलाइजेशनक प्रभावें समाजमे भेल परिवर्तनक कथा विभूति आनन्द खूब लिखलनि अछि। एहू संग्रहमे छनि। एकर प्रभावें लोक सभमे, विशेषत: युवक आ युवती सभमे जे चेतनाक संचार भेलैक अछि, तकरो बानगी एहि संग्रहक कथा सभमे‌ छैक। ओ सभ, खास क' युवती सभ प्रेम लेल, अपन अधिकार लेल, अपन 'स्व' लेल, अपन कैरियर लेल खुजि क' बाज' लागलि अछि, ई बात कथाकारकें नीक लगैत छनि। प्राय: तें एहि बातकें प्रमुखतासं उठबैत छथि कथाकार आ एहन चेतनशील युवती सभक संग एहि संग्रहक कथा सभमे ठाढ़ देखाइत छथि।

हमरालोकनिक पाबनि-तिहार, सांस्कृतिक परम्पराक रक्षा लेल संघर्षरत एक पीढ़ी आ ओकरा निंघेस कहैत दोसर पीढ़ी (माय आ बेटा-बेटी)क बीचक द्वंद्व सेहो एहि संग्रहक एकटा कथा देखाइत अछि। तिला संक्रांतिमे, तिल बहबा लेल बेटीकें तिल नहि देल जाइछ। से एहि दुआरें जे ओ बेटी अछि, ई बेटाक काज छैक (कथा- गे! तों त' बेटी छें)। एहि चलनसारिक विरोध कथामे एहि तरहें देखल जाइछ जे बुढ़ारीमे बेटिए मायकें काज अबैत छैक, सेवा करैत छैक।

स्त्रीक दशा-दिशामे सुधार आ चेतनाजन्य विकासक लेल कथाकार तैयार देखाइत छथि। तें कतहु प्रेमक बहन्ने, तं कतहु ओकर भूखक बहन्ने। ओकर विभिन्न रूपकें कथामे आनलनि अछि। कथाकार स्त्रीमे भेल एहि परिवर्तन कें मजगूतीसं रेखांकित करैत छथि जे युवती अपन विवाहसं पूर्व लड़कासं गप क' तय कर' चाहैए जे ओ लड़का एकरा लेल उपयुक्त होयतैक वा नहि। आ, ई गप ओ अपन माता-पिता लग राखैए। अपन जीवनक निर्णय अपना हाथमे राखैए। युवक-युवती अपन प्रेम-सम्बन्धके निधोख भ' लोक लग राखैए। 

चिट्ठी-युगक अवसान आ एण्ड्रायड-युगक आरंभक सिमान पर ठाढ़ भेल एकटा कथा अछि- 'ऋणानुबंध'। एकटा लड़कीक कथा जे फेसबुक कोन परिस्थिति मे शुरू करैए, आरंभमे डरे अपन फोटो नहि दैए आ नहूं-नहूं मैसेंजर आ व्हाट्स एप पर चैटिंग करैए। कतोक मित्र बनैत छैक, कतोक ओकरा प्रपोज करैत छैक। सभसं कोना कौशलपूर्वक अपन बाट फराक करैत अपन कैरियर बनयबा लेल गंभीर होइए आ विवाहकें वाधा बूझ' लगैए। एहि कथाक सहज प्रवाह एकरा महत्वपूर्ण बनबैत छैक।

मिथिलाक लड़कीक स्वतंत्र अस्तित्वक एकटा आर कथा छैक - 'चाह मे बिस्कुट जेना'। नायिकाक जेठ बहिन, जे बियाहलि छैक, अपना सन गति नहि चाहैत अछि नायिकाक। अल्प बयसक वियाहक दुष्परिणाम भोगैत जेठ बहिन कथाक अंत धरि नायिकाक सम्बल बनैत छैक, मुदा, परिवारक दबावक आगां ओ हारि जाइत अछि। कथा एत' सं आगां बढ़ैत छैक आ क्लाइमेक्स पर एहि तरहें जाइत छैक जे कथानायक 'हम'कें नायिका प्रतिमाक मैसेज अबैत छैक- 'सर, बुझले हैत। मुदा हमहीं अस्वीकार क' देलिऐ।' हम द्वारा कारण पुछने कहैत अछि- 'हमर सपना, जकर अहां सदा समर्थन करैत अएलहुं, ताही लेल।'

एहि कथामे युवती द्वारा स्वीकार/अस्वीकारक निर्णय लेबाक अवगति आ साहस रेखांकित करबा योग्य अछि। कथाकार युवतीक एहि निर्णय आ साहसक संग देखाइत छथि। तें एहि बदलैत समयक एकटा महत्वपूर्ण कथा सेहो बनैत अछि- 'चाह मे बिस्कुट जेना...'

बारहो कथामे कथाकार दू बेर कलकत्ता जाइत छथि। माने दू टा कथामे कलकत्ता अयलनि अछि। ओना सम्पूर्णता आ कथाक केन्द्रीय भूमिक दृष्टिएं एक्कहिटा कथामे कलकत्ता आयल अछि। ओ कथा अछि- 'सोनागाछी'। एहि कथामे सोनागाछी एकटा प्रतीकक रूपमे अबैत छैक। कथानायककें बाट पर युवक सभक संग 'फ्लर्ट' कयनिहार पर तामस उठैत छैक। कारण, युवती स्वयंकें बचयबाक प्रयास करैत अछि। माने, ओ सोनागाछीमे रहनिहारि सन मनोभावक नहि अछि। अपन कोठरीक खिड़की सं देखैत नायककें होइत छैक जे पुलिस अधिकारी मित्रकें फोन करय। मुदा, कहि नहि पबैछ। कका एकबेर कहै छथिन जे एत' अपन काजसं काज राखी। प्रात भेने अखबार ओहि लड़कीक हत्याक सूचना दैत छैक तं कथानायककें अपराध बोध होइत छैक। ज्ञातव्य जे सोनागाछी कलकत्ताक रेड लाइट एरिया छैक। मुदा, एहि कथामे कथाकारकें विक्टोरिया मेमोरियल पार्कमे सेहो सोनागाछी देखाइत छनि। एतबे नहि, लोकक मोनमे सेहो एक-ने-एक सोनागाछी देखाइत छनि। छोट वा पैघ, विभिन्न ठाम सोनागाछी देखाइत छनि। प्रेममे असफल युवतीक मोनमे सोनागाछी देखाइत छनि...। 

वेश्यावृत्तिक कारण आ निवारणक मादे कथाक अंतमे कथाकार लिखैत छथि- 'जोती दा जखन पहिल बेर मुख्यमन्त्री भेल रहथि तं पार्टीक किछु संभ्रांत तरहक व्यक्ति हुनकासं भेंट कयने रहथि, आ सोनागाछीक उन्मूलन लेल आग्रह कयने रहथिन। मुदा जोती दा तर्क देने रहथिन...

...न: न:, सौरभो (कथाक एक पात्र) तं सएह खिस्सा लिखने रहय जे ओतुक्का लड़की कहने रहनि...'

अंतमे कथाकार लिखैत छथि- 'आ हमर माथा सहरी-सहरी भ' क' जेना छिड़िया जाइत अछि। मुदा तैयो सोचैत छी, आइ जं जोती दा रहितथि तं की सोचितथि!...'

मुदा, कथानायकक माथा सहरी-सहरी किएक होइत छनि? ताहि लेल कथामे उपरोक्त कथनसं पहिलुक अंशके देखल जा सकैछ, जाहिमे कहल गेल अछि जे कथानायकक ककाकें नहियो रहने हुनक मित्र रवि दा डेरा पर अबैत रहैत छथिन। आ, जं कदाचित नहियो आबि सकलाह, कानमे काकीक स्वर सुना जाइ छनि- 'हेलो, की मोशाय..' आ, कथानायकक सोच जेना चक्कर मारि खसि पड़ैत छनि।

कथामे उपरोक्त अंश सन नांगट सांच लिखब कथाकारक धैर्य आ तटस्थताक उदाहरण मानल जा सकैए। 

पात्रानुकूल भाषाक प्रयोग लेल विभूति आनन्दक विशेषज्ञता मैथिली जगतमे जग जाहिर अछि। मिथिलाक  वंचित (शैक्षिक, सांस्कृतिक आ आर्थिक रूपें) लोकक बहुत रास कथा लिखलनि अछि, जाहिमे कथानक आ पात्रक क्षेत्रक अनुसार कथा-भाषाक प्रयोग कयने छथि। ई दुरूह आ गंभीरतापूर्वक कर' योग्य काज होइत छैक। लेखकक लेल एकटा चैलेंज सन होइत छैक। ओहन पात्र द्वारा उच्चारित शब्द, ध्वनि आ लय महत्वपूर्ण होइत छैक, जकरा धयने कथा-वस्तुक संग गतिमयताक उचित निर्वाह कथाकें स्तरीय बनबैत छैक। एहि लेल कथाकारकें अपन रचना-प्रक्रियाक क्रममे कार्यशाला सन मेहनति कर' पड़ैत छैक। हिनक एहन कथा सभकें पढ़ने ई अन्दाज सहजहिं लगाओल जा सकैछ‌ जे ई कतेक मेहनति करैत छथि। कोना एहि गुणकें साधलनि अछि, सेहो बुझबाक इच्छा पाठककें उपजि सकैत छनि। एहू संग्रहक कथा 'जात'मे ऊपर वर्णित शिल्प आ कथाकारक मेहनति देखल जा सकैत अछि।

एहि संग्रहक बहुलांश कथा मे कथाकारक अपन गामक प्रति मोह आ आकर्षण देखबामे अबैत अछि। हिनक बेसी पात्र सभ अपन शेष जीवन अपन-अपन गाममे बिताब' चाहैत अछि। मुदा, से भ' नहि पबैत छैक। कारण, आजुक गाम कतोक प्रकारक स्वार्थ आ राजनीतिसं सकपंज भेल अछि। प्राय: तें कथाकारक नायकक मोनमे कचोट छैक, कखनो मोह देखाइत छैक, तं कखनो मोहभंग सेहो।

ई इथ-उथ एहि संग्रहक अंतिम कथा 'एक खिल्ली मीठा पान' मे देखल जा सकैछ। ई कथा आत्मकथात्मक शिल्पमे लिखल गेल अछि। एहिमे कथानायकक प्राय: पूरा जीवन-वृत छैक। एहि कथामे परिवर्तनकामी नायकक जीवन-संघर्ष छैक। अपन सिद्धान्त सं समझौता नहि करबाक जिद छैक, छात्र-जीवनक जहल-प्रवासक क्रममे राजनीतिक यथार्थ सं आंखि खुजैत छैक। नायक वैभवकें जहलमे बुझना जाइत छैक जे सभ राजनेता देशक लेल नहि, अपन फैदा लेल राजनीति क' रहल अछि, तं मोहभंग होइत छैक। वैभव ओहि बाटसं घुरि अबैत अछि, आ नव बाट धरैत जीवनक चारिम खण्डमे आबि एकसर भ' जाइत अछि। पत्नी नहि छथिन, धियापुता अपनेमे व्यस्त आ एसगरुआ अस्त-व्यस्त वैभव। तें ओ गाम जाय चाहैत अछि, गामेक माटिमे मिलि जाय चाहैत अछि। मुदा, गामो जयबामे अनेक रंगक विघ्न सभक संग लड़' पड़तैक। आब गाम, ओ गाम नहि छलै जे ओ छोड़ि क' गेल छल।

वैभवक औनाइत मोन एहि निर्णय पर थिर होइत छैक जे ओ फेरसं साहित्य-लेखन करत, जकरा विभिन्न कारणें छोड़ि देने छल। ओ सोचैत अछि जे साहित्ये एहन अस्त्र भ' सकैत छैक, जे विरोधक इतिहास-लेखनमे सक्षम होयत। आ तें ओ चौक पर जा क' जिस्ता भरि रुलदार कागत आ दर्जन भरि कलम कीनैत अछि। आ, घुरती काल अपन परिचितक दोकान पर एक खिल्ली मीठा पान खाइत अछि। से, एहि दुआरें जे जहिया ओ अधिक प्रसन्न रहैत छल, तं मीठा पान खाइत छल।

कथाक एहन सकारात्मक समापन क' कथाकार एहि कथामे जीवनक नव बाट तकैत छथि। ओना ई कही जे तकैत नहि छथि, बनबैत छथि। आ, पोथीक ई अंतिम कथा जीवनक उजासक कथा बनि सकल अछि।

ई कथा भने आत्मकथा सन लगैत छैक, मुदा कथाक यथार्थ, ट्रीटमेंट आ आजुक युगबोधक कारणें ई कथा आत्मकथा नहि, जनकथा बनि गेल अछि। 

एहि तरहें कथा '23क पहिल कथा 'स्वप्न कथा' सं शुरू होइत अछि आ अंतिम कथा यथार्थ आ उजासक कथा बनैत अछि, हौसलाक कथा बनैत अछि।

जेना क्रिकेटक खेलाड़ी लेल एकटा टर्म कहल जाइत छैक- 'एखनि हिनकामे बहुत क्रिकेट बाकी छनि'। तहिना विभूति आनन्द लेल कहल जा सकैत अछि जे हिनकामे एखनि बहुत कथा बाकी छनि।

आ, एहि पोथीक प्रकाशनक अवसर पर शुभकामना आ बधाइ तं बनिते छनि।

Tuesday, July 15, 2025

चूड़ी (मैथिली कथा) - प्रदीप बिहारी Maithili Short Story by Pradip Bihari

चूड़ी

प्रदीप बिहारी


बहुत दिनक बाद दास बाबू मोन पड़ल‌ रहथि। मोन पड़ितहिं आंगुर मोबाइल पर हुनकर नम्मर ताक' लागल। नम्मर तं भेटि गेल, मुदा एकटा धुकधुकी रहय जे कत' छथि? कोना छथि? केहन छनि स्वास्थ्य? गप भेला आठ सालसं बेसी भ' गेल अछि। 
        आठ साल पहिने हम भागलपुरमे पदस्थापित रही। हुनकर मेडिकल बिल हमरा आफिसमे आयल रहनि। ओ फोन कयने रहथि, "बौआ हौ!"
         आवाज कने अपरिचित सन लागल रहय, तें हम कने अनभुआर सन उतारा देने रहियनि। तखन सकुचाइत ओ हिन्दीमे पुछने रहथि, "संदीप कुमार बजै छी?"
         हम जखन हं कहलियनि तं अपन मूल लयमे आबि गेलाह, "हमरा नहि चिन्हलह? हम दास भैया। कैम्पस ब्रांच बला।"
        हमर पूरा स्मृति जगजियार भ' गेल। संगहि रही दुनू गोटें। हमरासं नओ साल जेठ, मुदा गप आ हंसी-ठट्ठा संगतुरिया जकां करथि। स्नेह जेठ भाइ सन करथि। तें हम भैया कहैत रहियनि आ ओ बौआ।
        दास भैया बाजि रहल छलाह, "से बुझलहक बौआ! हमरा पता चलल जे तों खगड़िया स' भागलपुर क्षेत्रीय कार्यालय आबि गेलह, त' करेज सूपा नाहित भ' गेल। नीके छह ने?"
        हम अपन हालचाल कहलियनि। बालबच्चा द' पुछलनि। पत्नी द' सेहो। हमहूं पुछलियनि। दुनू दिससं पारिवारिक स्थिति अपडेट भेल रहय। ओ बाजल रहथि, "सैह देखहक। अपना सभ एक्के शहर मे एहि क' एत्ते अनभुआर रहियै। नोकरीक बदली आ व्यस्तता जे ने करय। घिर्नी बनौने रहै छै। खैर, आब तइ स' निश्चिंत छिअह।"
         "रिटायर भ' गेलियै?" हम पुछलियनि।
         "डेढ़ बरख भ' गेलै। आब त' मास्टरनियो रिटायर करथुन। दू साल बाद।"
         "भौजी कें मास्टरनी कहब नहि छोड़लियनि। एखनि कोन स्कूल मे छथिन?"
         "गामे मे।"
         "गाम कहै छियै। अहांक गामो तं शहरे मे अछि।"
         "से जे कहक।" दास भैया बजलाह, "एकटा काज रहै। हमर मेडिकल बिल तोरे आफिस मे गेल छह। कने देखियहक। फेरो जाइ के छै मुम्बै।"
        "अच्छा। पता करै छी। जल्दीए पठबा देब।" हम बजलहुं, "मुम्बै किए जा रहल छी? घूम'?"
       "नहि हौ बौआ! डाक्टर स' देखाब'। हमरा खखहा बीमारी ध' लेने छह ने। मुम्बैए स' इलाज चलै छह ने।"
       "डकहा?" हम पुछलहुं।
       दास भैया अपन पहिलुके स्वभाव सन हंसलनि। बजलाह, "खखहा नहि बुझलहक? कैंसर हौ। गामघर मे डकहे कहै छै। किछ ठाम पपियहो बीमारी कहै छै।"
        हम सन्न रहि गेलहुं। चुप। कने कालक बाद भैये टोकलनि, "की भेलह बौआ! चिन्ता नहि करह। ठीक छियह। बीमारी के काज भेनाइ छै, हमर काज भोगनाइ छै। से मस्ती स' भोगै छियह।" आ पुन: अपन स्वाभाविक हंसी हंसलनि।
       दास भैयाकें आश्वस्त करैत हम फोन रखने रही। हठात् दास भैयाक कतोक गप स्मरण होम' लागल। ओ गपसप कर'मे सुराह लोक रहथि। एखनो होयबे करताह। कैंपस ब्रांचक एकटा घटना मोन पड़ि गेल। ताहि समय‌ भौजी कैंपस ब्रांचक कातेमे करीब एक किलोमीटरक‌ दूरी परक मिडिल स्कूल मे रहथिन। दुनू गोटें संगहि स्कूटरसं आबथि। एकदिन भेलैक एहन जे...
      दुनू गोटें घरसं बहरयलाह। भौजी किछु बिसरि गेल रहथिन से दलान परसं घुरि क' आंगन गेलीह। भैयाकें बुझयलनि जे भौजी स्कूटर पर बैसि गेलखिन अछि। ओ विदा भ' गेलाह आ अपन धुनमे बतियाइत रहलाह। हुनका लगलनि जे भौजी गपक उतारा द' रहल छथिन। चर्याक अनुसार स्कूलक गेट पर भैया स्कूटर रोकलनि। भौजीकें उतर' धरि ठाढ़ रहलाह आ फेर बिदा भ' गेलाह। ताहि समय भैया कैश जमा काउण्टर पर काज करथि, तें समय पर अपन काउण्टर पर उपस्थित भ' जयबाक दबाव रहनि। 
      एम्हर भौजी आंगनसं बहरयलीह तं भैयाकें जाइत देखलनि। हाको देलखिन। मुदा, भैया तं अपन धुनमे...। के सुनैए? फोनक सुविधा ताहि समय नहि रहनि, तें कोनो संवाद नहि भेलनि।
       प्राय: डेढ़ बजे भौजीक स्कूलक हेड मास्टरनी शाखामे अयलीह तं भैयाकें पुछलनि, "दास बाबू! मीना मैडम आइ छुट्टी मे छथिन? खबरियो ने केलखिन!"
       भैयाक आंगुरमे किछु नोट फंसले रहि गेलनि। कनेकाल अवाक् रहलाह। हेड मास्टरनी फेर बजलीह, "अपनेओ आबै घड़ी कहि देने रहितियै त'...।"
        तखन भैया बजलाह, "की कहितहुं? ओ त' स्कूल आयल छथि। हमहीं स्कूलक गेट पर उतारलियनिहें। स्कूल मे नहि छथिन?"
         "रहितथिन त' हम झूठ कहितहुं!"
         "तखन कत' गेलखिन? हम त' स्कूले पर उतारलियनिहें।"
         "से अपने ने जनबै।"
         भैया बेहाल। ओ उठलाह आ अपन काउण्टरमे ताला मारलनि। हमरा लग अयलाह आ कहलनि जे ककरो हुनका जगह पर बैसा दियैक। ओ भौजीकें ताक' जयताह।
        भैया पसेने तर भ' गेल छलाह। कंठ सुखाय लगलनि। आन्तरिक व्यवस्था क' जखन हुनका भौजीकें ताक' विदा कयने रही तं कहलनि, "बौआ हौ! हमरा बुतें स्कूटर नहि चलतह। हमर करेज कंपैए।"
        फेर एकगोटेकें भैयाक संग कयल गेल‌। सांझ धरि  मूल बातक जनतब भेलैक जे भौजी कोना छुटि गेल छलीह। कहांदन तामसे भौजी किछु बाकी नहि रखलनि भैयाक।
        घरमे धियापुता सभ एहन गलती फेर नजि होइक, तकर उपाय ताकलक। भौजीकें कहलक जे स्कूटर पर बैसलाक बाद ओ भैयाक कान्ह पर हाथ रखने रहथि, जाहिसं हुनका भौजीक उपस्थितिक आभास होइत रहतनि। मुदा, एहि लेल दुनू गोटेमे केओ तैयार नहि छलाह। भौजी कहलखिन जे ससुर-भैंसुर स' भरल गाममे ओ बरक कान्ह पर हाथ ध' नहि बैसतीह। गाम स' बहरयलाक बादो चिन्ह जानक लोक सभ त' भेटिते रहै छै। भैया कहलखिन जे भौजीक हाथ हुनक कान्ह पर रहने स्कूटर चलाएल नहि होयतनि। गुदगुदी लगतनि आ दुनू कोनो खत्तामे पड़ल रहताह। अंतत: जहिना जाथि, सैह रहलनि। भैया मुदा साकांक्ष रह' लगलाह।
       ई बात शाखामे किछु दिन धरि ब्रेकिंग न्यूज बनल रहल। किछु सिनियर सभ एहि बातकें ल' क' विनोद सेहो करथि, मुदा भैया लेल धनि सन। ओ पहिने सन हंसैत-बजैत रहलाह। 'हर फिक्र को धुएं मे उड़ाता चला गया...' सन।
        से दास भैया कैंसरसं पीड़ित छथि, ई बात हमरा मोनकें हौंड़' लागल। शीघ्रे हुनक काज करा क' पठा देलियनि। आ तकर बादसं हुनक मेडिकल बिल आबनि तं जल्दीए स्वीकृत करबा क' भुगतान करबा दियनि। आर की सकैत रहियनि? तकर बाद मेडिकल बिलक मादे ओहो निश्चिंत भ' गेलाह मने। सोचने होयताह- बौआ अछिए, त' परवाहे की?
      फोनक आयब-जायब कम होइत-होइत बन्न भ' गेल।
     
व्यस्तता फेर हमरा दुनूक बीच पांच सालक खाधि खुनि देलक। दास भैयाक खबरि केओ नहि दिअय तं आशंका होअय। कोना हेताह? हेताहो कि नहि? से मोन पड़ितहिं फोन लगा देलियनि।
       जखने कहलियनि जे अहांक बौआ बजैत छी कि वैह चिरपरिचित हंसीक संग बजलाह, "नम्बर सेभ केने छियह बौआ। कत' छहक? आब त' रिटायर भेल हेबहक।"
        हम हं कहलियनि तं पुछलनि, "कतेक बरखक टारगेट राखने छह?"
       "माने?"
       "जीबाक टारगेट।"
       "एखनि की भेलैए भैया? एखनि त' रिटायरे केलियैए।"
       "सैह, सेन्चुरी स' कम नहि। हम एक सय बरस ल' क' चलि रहल छियह। तों हमरा स' छोट छह, तें सवा सय राखह।"
       "कने बेसी नहि भ' गेलै भैया?"
       हंसैत बजलाह, "अपना स' छोट लेल अपना स' बेसी औरदाक लिलसा राखबे करत ने लोक।"
       भैयाक ई दुलार हमरा अभिभूत कयलक। हालचाल पुछलियनि तं कहलनि, "छह मास पर मुम्बै जाइ छियह। खूब खुश रहै छियह। मुम्बै बला डाक्टरो स' चौल क' लै छियै। ओ कहैत रहै छथि- ऐसने हंसते रहिए। त' कहह रिटायरमेंट के बाद की करै छह? बेटा सभ बाहरे हेतह। ओना तोरा नहि अखरैत हेतह। कथा-कविता चलैत हेतह। रूचि त' पहिने स' रहह। तोरा पर गर्व होइए संदीप बौआ।"
       हम बिच्चेमे टोकलियनि, "अहां अपन ने कहू।"
       ओ बजलाह, "बड़का खेती देखै छह। छोटका इंजीनियर छह। छोटकी पुतौहुओ नोकरी करै छह आ हम दुनू जीव...." फेर जोरसं हंसलाह।
        "की?"
        "अपने घर पर दोकान छनने छियह। हम कागज-पेन्सिल, टौफी-चाकलेट आ मास्टरनी चूड़ी-बिन्दी-सिन्नुर के..." फेर हंसैत बजलाह, "दोकनदारी नहि कहक, समय‌ काट' लेल बुझहक। रंग-बिरंगक लोक अबैत रहै छै, त' समय नीक जकां कटि जाइत छै। हे लैह, मास्टरनी स' बतिआबह। स्पीकर औन क' देलियहे।"
        "से किए? डर होइ छह भैया?"
        "नहि हौ बौआ। दियोर-भाउजकें बतियाइत सुनला कत्ते ने बरख भ' गेल, तें..." फेर हंसलाह दास भैया।
       भौजीसं गपसप होइत रहल। एही क्रममे पुछलियनि, "भौजी! अहां के चूड़ी पहिराब' अबैए?"
        "से आब चूड़ी पहिर' कहां अबै छै महिला सभ। सभ साइज बुझने रहै छै, कीनैए लेल अबै छै। हमरा सभ के समय मे से रहै। हम सभ दोकाने मे पहीरि लियै।"
         हमरा चौल सूझल, "भैया के चूड़ी पहिराब' अबै छनि कि नहि? कहियो अहां के पहिरौलनि?"
        भौजीसं पहिने भैये बजलाह, "हमरा नहि अबै छह बौआ। आब सोचै छियै जे गहिंकी सभ के पहिरा क' सीखि लियै।" भैया हंसलाह।
      भौजी बजलीह, "से हम मना थोड़े करै छियनि। सीख लेथिन त' कोनो गहिंकी नहि घुरतनि। कोन ठेकान कोइ पहिरैओ लेल आबि जाइ।"
       फेर समवेत हंसी। फोन एहि निर्णय पर बन्न भेलै जे हमरा सभक भेंट-घांट होइत रहय।

से एकदिन हम भैयाक ओहिठाम पहुंचि गेलहुं। दुनू प्राणी दोकाने पर रहथि। अनुरागें भेलनि जे हमरा कत' राखथि आ उसारथि। 
        दोकाने पर बैसि गेलहुं। भौजीक दहिना हाथमे बैंडेज रहनि। हाथ मचकि गेल रहनि। दुख भेल।
       एकटा युवती आयलि। चूड़ी पसिन कयलकि। कीन' सं पहिने पुछलकि, "हमरा चूड़ी पिन्ह' नञि अबै छै। पिन्हा देथिन?"
       भौजी अपन हाथ दिस ताकलनि आ बजलीह, "हमरा बुतें त' नहि हेतह।" भैया दिस संकेत करैत बजलीह, "हिनका स' पहिरबहक?"
       युवती बाजलि, "की हेतै त'। इहो त' बबे-ददा दाखिल छथिन।"
       भैया ओहि युवतीकें चूड़ी पहिराब' लगलाह। हम मोने-मोन उचारलहुं, "के कहत जे भैयाकें बेटी नहि‌ छनि?
  ‌‌                         ######
फोटो : गूगल सं साभार।

Tuesday, October 22, 2024

डंड़कस (मैथिली कथा)- मेनका मल्लिक Maithili Short Story by Menaka Mallik

डंड़कस
मेनका मल्लिक

ओहि दिन सौम्याक मोन मयूर नाचि रहल छल । गप एहन रहै जे ओकर छोट भाय आ भाउजक अबैया रहै। सौम्या अपन घर-आंगनकें नीक जकां ओरिया क' राखलकि । ओकर भाय बंगलौरमें नोकरी करैत रहै ।पिछला साल ओकर विवाह भेलै । ओ कहलकै -"नहि -नहि, बागडोगरे आबि क' विवाहक पहिल वर्षगांठ मनायब । तें सौम्याक मोनमे बहुत रास बात अबैत रहै। ओकरा मोन मे पहिने सन भाव उठलैक। छोट भाय तं छैक मुदा ओ छोट भाय लेल जे कनिया ताकलिक से बुझू जेना भाउज नहि, पुतौहु तकने होअय। ।

सौम्या पी.एच .डी. क छात्रा छलि । ओ संगीतमे पी.एच .डी. कs रहल छलि । नृत्यक स'ख ओकरा नेनपनेसं छलैक । ओ सोचैत रहय- एहिबेर भाउज कतबो कहतै तं नहि नाचब । दोसर मोन कहै- नहि, भाउज तं ओकरा नचाइ-ए क' छोड़तै । भाउज ओकर नृत्यक प्रशंसक छैक। तें दू दिन पहिनहि माय कहने रहै, "सौम्या! एहिबेर तोहर नृत्य बढ़िया होमक चाही।" 

सौम्या अपन आलमारी खोललिक। सोचलकि जे संध्याकाल जे पहिरति से निस्तुकी क' लिअए। एहि काजमे ओकरा बड़ समय लगैत छैक। पहिर'मे नहि लगैत छै, तय कर'मे लगैत छै जे की पहिरय? जखने ओ आलमारी खोललक, सभसं पहिने ललका बैग पर नजरि गेलै। बेगक चेन खोलि ओहिमे राखल गहना देखलकि। गहना बहार क' अपन डांड़ मे पहिरलकि। माथ नीचां मुहें झुका क' निहारलकि आ फेर गहना खोलि बेगमे राखि लेलकि। मोने मोन मुस्किआयलि। सौम्याकें अपन नेनपन मोन पड़लैक। नृत्यक स'ख ओकरा चौथे-पचमे कक्षासं रहै ।

सौम्याक पिता दंरभगासं बागडोगरा आयल रहथिन- काज-रोजगार लेल। एतs नोकरी तं नहि भेटलनि, मुदा अपन व्यवसाय शुरू करबाक जोगार लागि गेलनि। ओ व्यवसायमे नीक स्थान बनौलनि । सुखी-संपन्न भेलाह।

सौम्याकें मोने छैक। एकदिन ओ मायक डांड़मे ई डंड़कस देखने रहय। नृत्य करबाकाल ओ जे चुनरी पहरय ताहि पर  डांड़ पर पातर सनक चमकैत मोतीसं गांथल डंड़कस सनक कोनो चीज बान्हि देल जाइ  जे चुनरी ससरै नहि । जखन मायक डांड़मे ओ डंड़कस देखलकि, तं मोनमे अयलैक जे डंड़कस पहीरि लेने ने चुनरी गड़बड़ेतै आ ने साड़िए।  आ ओ बहन्ना करs लागल जे माइए बला डंड़कस पहिरति। नहि देती तं ने नृत्य सीख' जायति आ ने मंचे पर जायति।

पिताक दुलारि धीया सौम्या। पिता ओकरा प्राणसं बेसी मानथिन। हुनका हंसी लगलनि। कहलनि, "नहि बाउ! एखन अहांकें ई नहि अंटत, नमहर होयब तं  बला पहिरब।  एखन चलू, अहांक नापक दोसर कीनि दैत छी । मुदा, ओ जाय लेल तैयार नहि । पिता परबोधैत रहि गेलखिन मुदा  सौम्या अपन जिद पर कायम रहय। बड़ी कालक बाद माय ओ डंड़कस खोलि ओकरा हाथमे दैत बजलीह, "आइ सं ई तोरे भेलौ। नापि ले। अंटतौ तं नहि, एकरा कटा क' तोरा नापक बनबा दै छियौ।"

सौम्या अपना डांड़मे भजारलकि। बाजलि, "नहि, ई नहि कटतै। ई हम्मर भेल। तोरा राख' दै छियौ। हम नमहर हेबै तं साड़ी पर पहिरबै आ नृत्य करबै।"

"हं, तोरे भेलौ। जल्दीसं नमहर भ' जो। तखन पहिर' लगिहें।" माय बजलीह, "एकरा तोरे लेल राखि दै छियौ।"

सौम्या प्रसन्न भ' गेलि। 

पिता सौम्याक मायकें कहलनि, "चलू। अहां अपना लेल दोसर कीनि लिअ।"

मुदा ओ नहि मानलनि। कहलनि जे सौम्या लेल अनामति राखि देब' सं नीक आर कोन बात हेतै?
जखन ओ पहीरि क' नृत्य करत, हमरा लागत जे हमहीं पहिरने छी।

"मुदा, हमरा लगैए जे डंड़कस पहीरि क' ओ कोना नृत्य करत? नृत्यांगना सभ जे पहिरै छै, से दोसर प्रकारक होइ छै। एत्तेक भरिगर नहि होइ छै।" पिता बजलाह।

एखनि ई बात मोन पड़ितहि सौम्या मुस्किया उठल। सांचे, ताहि समय केहन बोध रहै ओकर।‌ नेनपनक ओ अवस्था ओकरा मोनमे गुदगुदी लगबैत रहै।

से सभ मोन पड़ितहिं सौम्याक नजरि देबाल पर टांगल पिताक माला पहिरल फोटो पर पड़लै आ मोन हहरि गेलै। अनचोकें परिवार पर वज्र कसि पड़ल रहै । पिता अपन व्यवसायक काजसं सभगोटेक संग दिल्ली जाइत रहथि। बाटेमे हुनका हृदयाघात भेलनि। जाधरि नजीकक कोनो अस्पताल लs गेलनि ता धरि ....।"

मायक मन:स्थिति पर बड़ीटा आघात भेलनि। सौम्या तकर बादसं मायक सेवामे लागल रहलि। हुनका एहि आघातसं बहरयबामे बहुतो बर्ख लागि गेलनि। ओना ई कहब मोश्किल जे ओ एहि आघातसं पूर्णतः बहरा सकलीह। मुदा, एत्तेक धरि कहल जा सकैत छै जे मोनकें बुझौलनि। करेजकें बान्हलनि। 

छोट भाय पढ़ैत रहलै। सौम्या नमहर भेलि । नृत्य-साधनामे लागल रहलि। संगहि पढ़ितो रहलि। एम ए कयलकि आ प्रेम विवाह कयलकि। ओना ओ चाहैत रहय पी.एच .डी .कयलाक बाद विवाह करी, मुदा से भs नहि सकलै । ओकर ब'र सेहो सैह चाहैत रहै । एकरा दुनूक प्रेमक सुगंधि दुनू परिवारमे पसर' लगलै आ परिवारक लोक सभकें गन्ह लाग' लगलै। बागडोगरा छैके कत्तेटा जगह? परिवारक बाहरो लोक सभ बूझ' लगलै। परिवारक लोकसभ पहिने तं विरोध कयलकै आ जखन बुझयलै जे विरोधक मानि नहि भ' सकतै तं मानि गेल। मुदा,  दबाओ ई जे बियाह क' लिअय। आ, दुनू प्रेमीकें परिवारक बात मान' पड़लैक।

सौम्याक ब'र एकटा प्राइवेट सेक्टरमे काज करैत छथि ।

सौम्या जीवनक रंगमंच पर तीनटा पाट अदा कर' लागलि।

ओ एकटा छात्रा छलि। नृत्य सिखैत छलि। दोसर एकटा पत्नी छलि जे पतिकें ऑफिस पठयबा लेल सभटा तैयारी करैत छलि । तकर बाद दुपहरियामे अपन पी.एच. डी.क थीसिस लिखैत छलि। आ सांझमे समय भेटै तं माय लग जाs क' मायक हालचाल पुछैत छलि। एके कालोनीमे रहने माइक हालचाल पूछब संभव भ' जाइत छलै। माइयोकें तं कतेक रोग भs गेलनि छलनि ।

भाय विवाह करs लेल नहि मानै, मुदा ओकरा मनबैत-मनबैत पिछला बर्ख ओकर विवाह करौलकि । सोचलकि, नोकरी कर' लागल, तं अपन परिवार बसाबय‌। मायकें किछु उसास हेतै।

सौम्याकें एहि शहरमे बहुत लोक चिन्हैत छैक। एकटा कुशल नृत्यंगनाक रूपमे ओकरा ई शहर स्नेह दैत छै। ब'रकें सेहो ओकरा पर गर्व छैक । जखन कोनो शो होइत छैक तं सौम्या मायबला डंड़कस  जरुर पहिरै-ए आ जतs जाइए ततs सं नीक क' क' अबैए।  जखन ओ डंड़कस पहिरैए तं ओकरा लगै छै जे माय आ बाबू दूनू ओकरा संग छथिन ।

भाय एलै । भाउज एलै । घरमे रमन-चमन होइत रहलै । आ ओहिदिन ओकर विवाहक पहिल वर्षगांठ रहै । किछु गोटे, मने परिजन-पुरजन नोतल गेल छलाह । कार्यक्रम सन्ध्याकाल रहै । 

ओकर भाय अपन पत्नीसं कहलक, "हम चाहै छी जे आइ अहां देशी लुक मे पार्टीमे रही।"

"देशी लुक माने?"

"माने परम्परागत रूपें पहिरू-ओढू। परम्परागत गहना-गुड़िया पहिरू। आर की?"

"ई की फुरायल अहांकें? तेहन गहना सभ अछि कहां? मम्मी जी अपन बला जे देने रहथि, तकरा सभ के अहीं देहाती कहि बदलि क' डिजाइनर ल' अनलियै। आब कीदन-कहांदन कहै छी। से सभ नहि होयत हमरा बुतें। हम जहिना छी, सैह हमरा नीक लगैए।"

पति कोठरीसं बहरा गेल।

सौम्याक भाय अपन मायसं गप कयलकै । दिन-दुनियाक गप-सप भेलै । एही क्रममे ओ बाजल,  "माय गे! आइ अपन पुतहुकें कोन गिफ्ट देबही ?"

"से तोरा किए कहियौ?"

बेटा बाजल, "अबस्से कोनो गहना लेने हेबही।

माय कहलखिन, "गहना सभ तं देनहि छियौ । आब हमरा लग की अछि? गहना-गुड़ियाक स'ख-सेहन्ता हमरा किएक रहत? आइ ने काल्हि कनिये कें होयतनि, तें द' देलियनि।"

"मुदा, पिंकी कें तों जे गहना देने रही ताहिमे तोहर बला डंड़कस तं नहि रहौ।" बेटा बाजल।

"से तोरा बुझल नहि छौ जे डंड़कस दीदी के देने छियौ।" माय कहलनि।

"मुदा सासुक चीज पुतहुए कें ने हेतै ।"

माय अवाक्। सोचलनि - सभटा बात बेटाकें बुझल छैक जे डंड़कस सौम्याकें देल गेल छैक। ओकर बाबूओकें इच्छा रहनि जे डंड़कस सौम्याकें देल जाइ तथापि एना किएक बजैत अछि? ओ कहलनि, "बाउ रे!  डंड़कस दीदी पहिरैत छौ, ओकरा लेल ओ शगुनिया छै। ओकरा ओ हमरा दुनूक आशीर्वाद मानैत अछि। जतs - जतs ओकर शो होइत छैक, ततs-ततs ओ ओकरा पहिर क' जाइत अछि, से ओकरा बड़ नीक लगैत छैक ।"

बेटा चुप‌ । माय बजलीह, "आ ई जरूरी छै जे सासुक चीज पुतहुएके भेटै? मायक चीज बेटी के नहि?"

बेटा गंभीर भ' गेल, "मुदा, घरक परंपराकें बेटे पुतहु आगू ल' जाइत छैक ने । बाप-पुरखा के चीज-वस्तु बेटे-पुतौहु जोगा क' रखै छै ने।"

मायक मोन भेलनि जे बेटाकें कहथि जे पहिलुका देल गहना सभकें जे कयलक से हुनको बुझल छनि। पुतौहु कहने रहनि। सोनकें बदलि क' टलहा अरजलक। आब...। मुदा, कहलखिन नहि।

मायकें चुप देखि बेटा बाजल, "हमरा विचारे दीदीसं डंड़कस मंगा लेबाक चाही।"

मायकें लगलनि जे पयर तरसं जेना जमीन ससरि गेल होनि। ओ ने धरती पर ठाढ़ छथि ने आकास सं लटकल छथि। कत' छथि से नहि पता चललनि। अपन दर्दकें पीबैत ओ बजलीह, "ई काज नहि हम करब। ओहो तोरे सन संतान अछि हमर। जखन तोरा मोनमे एहन बात छौ, तं चल बजार। एखन समय छैके। हम कनियां लेल एकटा डंड़कस कीनि दैत छियनि ।"

बेटा कहलकनि, "तखन तोहर चीज कोना भेलै?  कहां भेलै तोरा देहक पहिरल निशानी? पाइ तं दीदीयो लग छै, ओहो अपना लेल कीनि सकैत अछि। हमहूं पिंकी लेल कीनि सकैत छलहुं। मुदा ....।"

जखन माय लग कोनो चालि नहि सुतरलै, तं एकटा नव चालि चललक। बाजल "माय गे ! कम सं कम आइयो भरि लेल दीदी सं मांगि ने ले ।"

मायकें लगलनि जेना बांचलो सुल्फी करेजमे भोंकि देलकनि बेटा। बजलीह, "बाउ रे! हमरा आब से साधंस नहि अछि जे ओकरासं हम मांगब । तोहर जेठ बहिन छौ, मुदा हमर बेटीए नहि, जेठका बेटो वैह अछि । ई काज हमरा बुते नहि हेतौ।"

माय झूर-झमान भ' गेल छलीह। कोठरीमे गेलीह आ ओछाओन पर पड़ि रहलीह। मोने-मोन पतिकें उपराग दैत रहलीह जे हमरो अपने संग किएक ने ल' गेलहुं?"

संध्याक कालक कार्यक्रम शुरू होमय बला रहै।  तैयारी चलैत छलै। नोतहारी सभ जुम' लागल छल।

बेटा भीतरिया कोठरीमे पिंकीकें कहैत छल, "हे लिअ, ई पहिरू। देखू एहिमे अहां केहन लगैत छी?"

पिंकी डंड़कस हाथमे लेलनि आ बजलीह, "हम पहिनहि कहने रही जे ई हम नहि पहिरब। अहां दीदीसं कोन मुहें मंगलियनि ई? हे दैव।"

तखने माय कोनो काजसं खोंखी करैत ओहि कोठरीमे गेलीह। बेटा-पुतौहुक स्थिति देखलनि। गप सुननहि रहथि। रहल नहि गेलनि। बजलीह, "मांगि अनलही रौ....?"

"हं... हम दीदीकें कहलियै जे मायक मो‌न छै जे पिंकी पहिरै। दीदी हमरा दs देलकै । दीदी हमरा मानैत छै ने।"

मायकें लगलनि जे ओ ठामे गड़ि जयतीह।

पिंकीकें बुझयलनि जे हुनका हाथमे भरिगर पाथर होनि।

कार्यक्रम शुरू होयबाक रहै। भेलै। सौम्या नहि पहुंचल रहै। अतिथि सभ ओकरे तकैत रहथि।‌ मायकें होनि जे कोन मुहें बेटी लग ठाढ़ होयब।

"सौम्या नहि अयलीह एखनि धरि?"

बेटा बाजल, "दीदी अबिते हेतै।"

सभ देखलक जे सौम्याक ब'र एकसरिए कोठरीमे आबि रहल अछि। 

"अहां असगरे? सौम्या?"

"तैयार छलीह। पता नहि की भ' गेलनि? हमरा कहलनि जे अहां जाउ। हमर पयरे ने उठि पाबि रहल अछि।"
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