Sunday, July 19, 2026

संस्मरण - उसरल बजारमे बुलैत रा ना सुधाकर


    (रा ना सुधाकर) 

उसरल बजारमे बुलैत रा ना सुधाकर

प्रदीप बिहारी

मैथिलीक लोकप्रिय रचनाकार प्रफुल्ल कुमार 'मौन'क मादे हुनक नेपाल प्रवासक अन्य महत्वपूर्ण काजक अलावे सुनैत रही जे हुनक प्रेरणास्वरूपें तीन टा प्रतिभाशाली रचनाकार नेपालमे लिखब शुरू कयलनि। ओ तीनू छलाह- भुवनेश्वर पाथेय, रा ना सुधाकर आ जीतेन्द्र जीत। ई बात ताहि समयक थिक जाहि समय हम मैथिली-लेखनमे डेगा-डेगी देब' शुरू कयने रही। तें ई तीनू नाम हमर मानसपटल पर छपा गेल छल। 
       एहि तीनू नाममे श्रद्धेय भुवनेश्वर पाथेयसं कहियो भेट नहि भ' सकल, मुदा हुनक कथा सभ पढ़लाक बाद हुनकासं भेट नहि होयबाक कचोट थोड़ेक कम भ' गेल। आदरणीय भाइ रा ना सुधाकर आ जीतेन्द्र जीतसं भेटो भेल आ हिनका दुनू गोटेक रचनासभ सेहो पढ़ैत रहबाक अवसर भेटैत रहल। श्रद्धेय 'मौन' जीसं बरोबरि भेट होइत रहल, से एहि दुआरे जे ओ बेगूसराय बरोबरि आबथि। हुनक पुत्री एत' रहैत छथिन। दोसर, एहि दुआरे जे अपन नाट्य-संस्था 'नवतरंग'क लोक कला सम्बन्धी क्रिया-कलापमे मौन जीक सर्वविध सहयोग आ आशीर्वाद संस्थाकें भेटैत रहल छैक। ओ एहि त्रयी सभक मादे कहैत रहथि, हिनकालोकनिक रचनाक धर्म आ मर्म कहैत रहथि। तें ई तीनू सीनियर हमर आदरणीय रहलाह अछि।
       मिथिला मिहिर जखन 1973 ई मे 'नवतूर' स्तंभ शुरू कयलक, तखन ई लोकनि प्रमुखतासं मिथिला मिहिरमे छपैत रहलाह। ओहिसं पहिनहुं यथास्थान छपथि। तें पढ़बाक अवसर भेटैत रहल।
       आब तं एहि त्रयीमे मात्र जीतेन्द्र जीत बांचल छथि, जे बहुत पहिनहिं साहित्य-लेखनसं विमुख भ गेल छथि। ओ विराटनगर मे रहितो नहि छथि आब। एही वर्ष 2016क जनवरी मे रा ना सुधाकर दिवंगत भ' गेलाह। 
        रा ना सुधाकर अपन नामक कारणे सेहो लेखक वर्गमे आकर्षणक बिन्दु छलाह, काज आ स्वभावक कारणें तं सहजहिं। हम बहुत दिन बाद बुझलहुं जे 'रा ना' माने राम नारायण। हमरालोकनिक सामान्य रूपें बाजबाक जे टोन होइए, तदनुसार 'रा आ ना' कें जोड़ि क' राना उच्चारित सहजहिं भ' जाइत छैक, से हमरो होअए आ बहुतो लोककें होनि। बाद मे जखन 'रा ना'क माने बुझल तं अपने पर हंसी उठल। हाय रे हम! अमरुख कहीं के। 
       एकबेर हुनकासं एहि मादे पुछने रहियनि, तं कहलनि, "अहांक देशसं अंगरेज एखनो नहि गेल-ए। अपन नांगरि लोकक मोनमे गाड़नहि अछि। तें राजकाजसं ल' क' बाजा-भुक्की मे सेहो अंगरेजिए 'एब्रिभिएसन' चलैए। एत' नेपालमे से नहि चलै छै। एत' आफ्नो भाषा आफ्नो देश, प्राणभन्दा प्यारो छ। माने अपन भाषा आ अपन भेष प्राणहुं सं प्रिय अछि।"
        रा ना सुधाकर हमरा कखनहुं 'अहां' तं कखनहुं 'हौ' कहि सम्बोधन करथि। माने हमरासं गप करबाकाल फ्री स्टाइल मे गप करथि, से हमरा नीक लागय। हुनक 'हौ' कहब बेसी नीक।
        हुनकासं धुरझार भेट होयबाक अवसर तं नहि भेटल, मुदा कार्यक्रम आदिमे कहियोकाल भेट होइत रहल। मुदा जखन भेटथि, आत्मीयतासं भरल। घरक लोक सन। पत्राचार धरि होइत रहल, से ताधरि, जाधरि नेपाल-भारतक बीचक हुलाक (पोस्टल) सेवा बन्न नहि भेलैक।  प्राय: दू वा तीन बेर हम हुनका ओहिठाम (रानी, विराटनगर) गेल छी। से जहिया गेलहुं, लागनि जे कत' धरी, कत' उसारी?
      ओहो प्राय: दू बेर बेगूसराय आयल रहथि, से 'सगर राति दीप जरय' केर गोष्ठीमे। गोष्ठीक बाद दू दिनक लेल हम अपना ओहिठाम रोकि लेने रहियनि। मोन पड़ैए, ताहि समय ओ ख्यातिलब्ध कथाकार राजेन्द्र विमल प्रति सम्मान व्यक्त करैत कहने रहथि जे विमल जी हुनका कथाकार बनबामे बड़ सहायक भेल रहथिन।
      बहुत प्रकारक कष्टक अछैतो हुनका चेहराक मुस्की मलिन नहि होनि। छोटछीन फैक्ट्री मे आ तकर बाद तेहने सन प्राइवेट फॉर्मक अल्पवेतन भोगी नोकरिहारा सुधाकर जी अपन मुस्की मलिन नहि कयलनि। गरल रूपी जीवन-संघर्षकें मुस्कियाइत पीबैत रहलाह आ जीबैत रहलाह। 'हर फिक्र को धुएं में उड़ता चला गया...' सन।
      ई बात तय छैक जे एहन लोककें समाज सेहो हतोत्साहित करैत छैक। खाहे लेखक ओ कतबो पैघ किएक ने होथि। से जातिगत समाज आ पेशागत समाज दुनू। एहन लोक जकरा लेल अवसरवादिता पोटासियम साइनाइड सन होइत छैक, आजुक समाज कछेरे मे छोड़ि दैत छैक। साहित्यिक मान-सम्मान आ उचित मूल्यांकनक दृष्टिकोणे रा ना सुधाकरक संग तेहने सन भेलनि। हुनको लेल अवसरवादिता आ लल्लो-चप्पो पोटासियम साइनाइडे सन छलनि, जकरा ओ जीवनपर्यंत नहि चिखलनि।
        रा ना सुधाकर गद्य आ पद्य दुनू विधामे लिखलनि। दुनूमे उत्तम लिखलनि। मैथिली साहित्यक माथ ऊंच करबा योग्य। मुदा, हम हुनका मूलत: कथाकार मानैत छियनि‌। ओना हुनकर कविता आ गीतसभ सेहो चर्चित रहलनि अछि।
        एकबेर विराटनगर मे भेटक क्रममे अपन एक सय गीतक पाण्डुलिपि देखौने रहथि। नाम छलैक- सयपत्री। एक सय गीतक संग्रह। हुनक इच्छा रहनि ने कथा-संग्रहक बाद ई छपनि। मुदा, से इच्छा संगहि गेलनि। आम आदमीक लेल सभ तरहक स्वादक गीतसभ रहैक एहि पाण्डुलिपिमे। किछुक मुखड़ा एखनो मोन पड़ैए- 
        "सुग्गा हमर अहीं छी, मैना हमर अहीं छी।
         सम्पूर्ण जिन्दगी के अएना हमर अहीं छी।।
               #     #      #      #       #
         एक टा दोसर स्वादक गीत-

         "के खुआ देलकौ मेला मे पान बहिना
           ई छौंड़ा सब होइ छै बैमान बहिना..."

          रा ना सुधाकर अपन कथा सभक शीर्षकक कारणें सेहो चर्च/कुचर्च मे रहलाह। जेना, शुद्धतावादी आ परम्परावादी सभकें हुनक कथा 'चोलियामे चोर बसे गोरी', 'चान असोथकित अछि' आ 'खुट्टी पर टांगल ब्रा' नहि पचलनि। भेलनि जे 'दीयरि', 'संधि', 'प्रदक्षिणा' आ 'थकुचल मासुक बुट्टी' आ 'छागर' सन कथाक लेखन एहन-एहन कथा किएक लिखै छथि? आ झट द' फ्रायड मनोविज्ञानसं लिप्त चोला ओढ़ा देल गेलनि सुधाकर जीकें। मुदा, किनसाइत एहि कथासभक आन्तरिक मर्म बुझबाक प्रयास करितथि ओसभ। जे, से...
        रा ना सुधाकर अपन कथासभक परिवेश गामसं अनैत छथि। मिथिलाक कोनो‌ गामसं, जाहि ठामक लोक आ गप, आह्लाद आ वैमनस्यता, प्रेम आ घृणा हुनका मोन-प्राणमे बैसि गेल रहैत छनि। ओत्तहिसं कथा उठबैत छथि। ओ कथा उठबैत छथि जोगबनी-रानी (विराटनगर)क बॉर्डर एरियासं, जत' भूख छै, पटोर आ मारकीनक अद्भुत समावेश (कथा- संधि) छैक‌ आ छैक दाम्पत्यक अस्वीकृति-स्वीकृति आ भारत-नेपालक बीचक मनमोटाओक परिणाम। आ 'संधि' सन कथा लिखैत छथि। 
        ओ अपन कथाक भाषा सभ अनैत छथि अप‌न पात्र आ परिवेशक आत्मासं। हिनक कथा 'प्रदक्षिणा'मे से देखल जा सकैछ। कथानायक बहुतो समयक बाद गाम जाइए आ तखन जे बदलल गाम देखैए, तकर अद्भुत चित्र एहि कथामे छैक। नायक अपन 'स्व' कें तकैत अछि।‌ पूरे गामक परिक्रमाक बादो अपन बहिक्रमक मित्र-बन्धुसं भेट नहि होइत छैक। कथानायकक मन:स्थितिक चित्रण मनोयोगपूर्वक भेल अछि। पाठककें अपने गाम सन घटना लागब कथाकारक सफलता सिद्ध करैत अछि। एहि कथाक भाषा, जकर चर्च हम कयल अछि, एहि वाक्यमे देखल जा सकैछ-
          "मोटरसाइकिल पर ऑफिस जायब आ विधवाक संग लसरघंटी।"
           ई एक टा बानगी देल अछि। 
           कहल गेलैए‌- जे गामसं नहि जुड़ल‌ अछि, ओकरा लग नीक भाषा नहि छैक। सुधाकर जीक रचना सभकें पढ़ैत हुनक गामसं जुड़ल गहिराइ बुझना जाइछ। इहो कहल जाइ छै जे 'जकरा लग अतीत छैक, ओकर वर्तमान महत्वपूर्ण होयतैक।' ई बात सुधाकर जी पर सेहो लागू होइत छनि। हुनको लग गामक अतीत छनि, प्राय: तें ओहो महत्वपूर्ण छथि।
         हिनक ओ कथा जकरा फ्रायड मनोविज्ञानक चिप्पी लगाओल गेल, ओ अछि- 'खुट्टी पर टांगल ब्रा।' ई कथा 1984 ई मे छपल छल। एक टा चोटी लेल नायिका बुचियाकें दोकानदार गंगबा कोना तंग करैत अछि, तकर चित्रण भेल अछि। पहिलुक देल 'ब्रा'क दाम कोना असूल' चाहैत अछि, तकर चित्रण अछि। बुचियाक दयनीयताक गलत फैदा उठबैत अछि गंगबा। मुदा, एहि कथामे बुचियाक प्रतिरोध सोझां अबैत छैक।
        एहि कथामे प्रयुक्त शिल्प देखबा योग्य अछि। वातावरण-निर्माणमे जाहि प्रतीक सभक प्रयोग भेल अछि, से कथाक गुणवत्ताकें स्थापित करैत अछि। जेना-
       'एक दिस बुचिया संग जे भ' रहल छै। दोसर दिस लकड़ीक ठाहीक आवाज- चोली भीतर हैसा...जोर लगा क' हैसा...'
       'छाउरक ढेरी पर एकटा कुत्ता मूइल मैनाकें गिधनि रहल छलैक।'
       बुचियाक प्रतिवाद आ परुषक प्रति आक्रोश एहन भ' जाइत छैक, जकर चित्र कथाक अंतमे रहि तरहें उकेरल गेल अछि- 'भाइयो जखन खुट्टी परक ब्रा छूबै छै तं पुरुष मानसिकताक प्रति आक्रोश बहराइत छै बुचियाक।'
       ई कथा एक टा आर ग्राफ बनबैत अछि। ओ ग्राफ थिक मैथिली कथामे स्त्रीकें चेष्टगर होयबाक ग्राफ। 
       ई कथा पढ़ैत काल ललितक कथा 'कंचनियां' मोन पड़ैत रहल। 'कंचनियां'क एक टा अंश मोन पड़ल, जत' गरीबीसं फिरीसान आ बेमार ओकर माय कहै छै- 'मालिक के धेने रही, बेर छै कुबेर छै।'
      बेजाय तं कंचनियो के लागल रहै, मुदा मायक बेरामी दुआरे चुपचाप समान ल' क' घुरल छलि। मुदा, एहि कथा मे बुचिया एक लोइया थूक फेकि क' घुरै छै। ई बात मैथिली कथा आ स्त्री द्वारा प्रतिवादक बढ़ैत ग्राफकें कहैत छैक। 
       ओना स्त्री-विमर्शक दृष्टिएं देखी तं सुधाकर जीक सभ कथा एहि विमर्शकें नोतैत अछि। हिनक कथा सभक स्त्री मिथिलाक ओ स्त्रीसभ छथि, जे अपन जीवन नहि जीबि सकैत छथि। चूल्हि, चालनि आ चिनवार सं आगांक कोनो सपना हुनकासभक लेल रह' नहि देने रहनि तात्कालिक समाज। आ सैह हिनक कथा सभमे आयल अछि। जस के तस। 
        कथा 'छागर'मे  माय आ पत्नीक बीच पिचाइत पुरुषक प्रतिस्थापन बड़ कौशलपूर्वक कयने छथि। नायिका रूपा सासुक प्रतिकार करै छै। पति ओकरा ओधबाध करैत छै। माय-पत्नीक घिच्चातिरीमे बेटाक असहजता बड़ फड़िच्छ भ' क' एहि कथामे अबैत छैक। कथाक अंत, हिनक आने कतोक कथा जकां प्रतीकात्मक भेल छैक। कथाक अंत बुझू जे कविताक एहि पांतिसं होइत छैक- 'ओकरा मोन पड़ि गेलैक जे हनीफ कसाउ छागर कें खुट्टापर लटकौने छूरा सं बुट्टी काटि-काटि तराजू पर जोखैत रहय। 
        एहि तरहक प्रतीकात्मक अंत सुधाकर जीक कथाक विशेषता छलनि। एहन अंत कथा 'चान असोथकित अछि' मे सेहो देखल जा सकैछ- 'दोसर दिन सभ देखलक जे मनटून के पैर मे सुशील बाबू बला चप्पल झलकि रहल छलनि।'
       कहबाक माने ई जे रा ना सुधाकर अपन कथा सभकें पहिने जीबैत छलाह, तख‌न लिखैत छलाह। आ ई बात हुनका अपन तूरक अग्रणी पीढ़ी मे आ मैथिली कथाक महत्वपूर्ण श्रेणीमे रखने छलनि। मुदा, ई बात तं ओ बुझताह, जे हुनका गहनतासं पढ़ि सकलाह वा सकताह। प्रश्न ई उठैछ जे हमर साहित्यक नब पीढ़ी कोना पढ़त? जाहि भाषामे कोनो लेखकक पुस्तकाकार पहिल कृति हुनक मृत्युसं किछुए पहिने आबय, तखन ओहि लेखककें नब पीढ़ी कोना चिन्हत?
       रा ना सुधाकर जी एहि अवसादमे जीबैत रहलाह आ अपन पोथी सभक प्रकाशनक प्रति उदासीन भ' गेलाह। ई उदासीनता एहू दुआरें छलनि जे स्वयं सक्षम नहि छलाह। अंतिम समयमे 'नेपाल विद्यापति पुरस्कार कोष' द्वारा कथा-संग्रह 'दीयरि' कें 'नेपाल विद्यापति मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार- 2061' देल गेलैक। 
       अंतिम समयक ई पुरस्कार झुनझुने सन लागल होयतनि सुधाकर जीकें। एहन झुनझुना जे अपने कमे बजा सकल होयताह...।
      सुधाकर जीक साहित्य बेसी-सं-बेसी पाठक धरि पहुंचय, तकर खगता छैक। मैथिली भाषा-साहित्य लेल नेपालमे बहुत रास काज भ' रहल छैक, से सरकारी आ गैर सरकारी, दुनू स्तरपर। हुनक साहित्यपर शोध होअय, हुनक रचनासभ छात्र-छात्रा आ आम पाठक धरि पहुंचय। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा हुनक रचनासभक नेपाली अनुवाद कराओल जाय। आदि, आदि।
        तें रा ना सुधाकर जीक साहित्य कें उचित मान-सम्मान आ स्थान हेतु भागिरथक प्रतीक्षा छैक- नेपाल आ भारत, दुनू ठाम।

हं, कतोक झंझावात, कष्ट, अवसाद भोगैत रहलाक बादो व्यक्ति रा ना सुधाकर बहुत आग्रही लोक छलाह। साहित्ये जकां सत्कार सेहो हुनक मोन-प्राणमे छलनि। से अभावमे रहितो निमाहैत रहलाह। 
       एकबेरक बात मोन पड़ैए। हम अबेर क' जोगबनी बॉर्डर पहुंवल रही। जनवरी मासमे (प्राय: दू वा तीन जनवरी) बेगूसराय सं अपन स्कूटरेसं चलि गेल रही। बॉर्डर बन्न भ' गेल रहैक। जोगबनीक एक्साइज ऑफिस मे एक गोटें परिचित रहथि। ओत्तहि स्कूटर राखि बॉर्डर टपलहुं। कनिये आगां गेलहुं कि भाइ रा ना सुधाकर बुलैत भेटलाह। हमर अयबाक पूर्व जनतब रहनि। देखितहिं बजलाह, "बड़ अबेर भ' गेलह? सोचने रही जे सबेरे अयबह त' दुनू भाइ बैसब आ बड़ीकाल धरि बतिआएब। मुदा आब अबेर भ' गेल। तोहर भोजनो सेरा गेल हेतह।"
        हम कहलियनि, "अबेर भेनहि की? चलू ने आर अबेर धरि बैसब।"
       "मुदा बैसब कोना? घरमे थोड़े किछु राखल रहै छै?चलह..."
       आ मुस्किआइत एक टा बन्न होइत दोकान दिस बढ़ैत बजलाह, "उसरल बजारमे ज' किछु भेटि गेल त' घरेमे बैसब। बच्चासभ‌ सूति रहल हैत।"
       हम हुनक पछोड़ ध' लेने रही।
       'उसरल बजार' हुनका मुहसं बहराएल ई शब्द हमरा मोनमे बैसि गेल। 
      हुनका गेलाक बाद दू बेर जोगबनी बॉर्डर टपलहुं अछि। लागल जे भाइ रा ना सुधाकर हमर प्रतीक्षामे बुलैत होयताह। आ हम चारुकात नजरि खिड़बैत हुनका ताक' लगलहुं। हुनका बिनु तं ई उसरले बजार ने? सोचलहुं, भविष्योमे जं आयब, तं ई बजार उसरले लागत।
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Wednesday, May 20, 2026

लाबादुआ (मैथिली कथा)

कथा

लाबादुआ

प्रदीप बिहारी

पनरह किलोमीटरक बाट पार कयलाक बाद राम पदारथ पाठकक मोन बन्हयलनि। भरोस भेलनि जे मित्रक जन्मदिनक आयोजनमे‌ समय पर उपस्थित भ' सकताह।‌ अगिला दू दिन छुट्टी छनि। तें ओहिदिन आधा दिनक बाद औफिससं बहरा गेल छलाह। साहेबक मूड नीक छलनि मने। तें हुनका छुट्टी द' देलखिन। मुदा, अपन हिस्सकक अनुसारें कहिए देने रहथिन जे औफिसक काज सभ ओरिया क' जाथि। 
       ओ साहेबकें कहने रहथि जे‌ सभ सोझरायले छनि। आनन्द बाबूक फेयरवेल लेल सेहो सभ ब्योंत भ' गेल छनि। अफसोचक बात ई जे फेयरवेलमे ओ नहि‌ रहि‌ सकताह। ताहि पर साहेब कहने रहथिन, "अहांकें रहब आवश्यक छल। अहां औफिस मैनेजर छियै। ई सभ अहींकें देखबाक चाही।"
        "से बूझै छियै सर। संयोगे बुझल जाय जे सविता मैम अपन गाड़ीसं‌ जा रहल छथि। तें हमहूं प्रोग्राम बना लेलहुं। सभ बेर मित्र बजबैए जन्मदिनक आयोजनमे, मुदा जा नहि पबैत छी। एहिबेर सुयोग लागल तें सोचलहुं जे भ' ली।"
        सविता मैडमक नाम सुनि साहेब ल'त भेल छलाह। 
         राम पदारथ सोचैत छलाह। मित्र ओकरा देखितहिं भरि पांज ध' लेतैक आ कहतैक, "आजुक आयोजन तोरा अयने महत्वपूर्ण बनि गेल।"
         सोचैत छलाह राम पदारथ। आब जन्मदिन मनयबाक चलनसारि बढ़लैए। सोशल मीडिया जन्मदिन कें लोकप्रिय बनौलकैए। जकरो ने कहियो सुनथि, तकरो जन्मदिनक फोटो फेसबुक पर देखैत रहैत छथि। पछिला साल गाममे रहथि। गामक एकटा पित्ती बुचकुन पाठककें पुछलनि, "कक्का यौ! फेसबुकसं पहिने जन्मदिन बुझल‌ छल?"
          "बुझल की रहत?" बुचकुन बजलाह, "जे ने करय पोता-पोती सभ। वैह सभ मनबै छै। हमरा तं अंग्रेजी तारीख नहि बुझल अछि, मुदा फेसबुक पर यैह सभ एकटा राखि देलकैए।'
          " माने ई ओरिजनल नहि भेल?"
         "हौ पदारथ! ओरिजनल की आ डुप्लीकेट की? जनमदिन मनाब' मे खर्चे की लगै छै। धिये-पुता सभ केक पठा दैए। बस, सैहटा खर्च। बांकी फोटो-फाटोमे कोनो खर्चे ने। यैह सभ खीचै छै आ बिलहै छै।" हंसैत बजलाह, "केक थोड़े बिलह' पड़ै छै? ओ तं अपने परिवार खयलहुं। बदलामे ओत्ते लोकक लाइक-कमेन्ट भेटै छै। शुभकामनाक प्रभाव तं नीके ने होइत‌ हेतै। हौ, गाममे कोनो नीक काज उपस्थित होइ तखन ने नीक‌ धोती-कुरता  पहिरी। केक काट' लेल नीक जकां तैयार‌ होइ छी। ई सभ नीक लगै छै हौ। तों सभ तं सरकारी नोकरी करै छह। मनबिते हेबह जनमदिन।"
           "नहि, हम नहि मनबै छी। ओना आब बहुत औफिसमे कर्मचारी सभक जन्मदिन मनाओल जाइ छै।"
           "अएं हौ पदारथ! तों कहियो केक काटलह अछि?"
          "नहि। हमरा नहि सोहाइए।"
          "हौ, फेसबुक के कारणे हमरा काट' पड़ैए। मुदा, हम मोमबत्ती पर फूक नहि मारै छी।"
         "से किएक?"
         "जानि नहि किएक? पहिने कहि दै छियै जे बरैत मोमबत्तीक फोटो खीचि क' राखि ले। तकर बाद खाली केक कटैत कालक फोटो खीच। तहिना करै जाइए।"
          "कक्का! ई सभ तं नीक लगैत हैत?"
          "नीक की? तखन, फील गुड होइए हौ, फील गुड।"
           पछिला बर्ख औफिसमे राम पदारथक जन्मदिन मनाओल गेल रहनि। केक तं नहि रहै, औफिसक कर्मचारी सभक समक्ष सेलेब्रेशनक टौफी आ गुलदस्ता दैत साहेब शुभकामना देने रहथिन। अपन सीट पर अयलाह तं एकटा कर्मचारी पूछि देलकनि, "अजुका ओरिजनल अछि कि डुप्लीकेट?"
            राम बहादुरकें अपगरानि भेल रहनि।
            गाड़ी बढ़ि रहल छल। मोबाइलक घंटीसं तंद्रा टुटलनि। हेलो कहितहिं साहेबक स्वर सुनलनि, "अहांकें कथुक होस रहैए कि नहि?"
            "से की भेलैए सर?"
            "की नहि भेलैए?" साहेब बजलाह, "फेयरवेल लेल जलखैक व्यवस्था की भेलै? ई ककरा करबाक छलै। एखन सभ किछु भेलाक बाद जलखै बेरमे कोनो व्यवस्थे नहि। की क' क' गेलियै। खाली अपने काज सुझैए। औफिसक एहन बदनामी आइधरि‌ नहि भेल हेतै।"
            राम पदारथक कंठ सुखि गेलनि। तथापि बजलाह, "सर, असल मे बात रहै जे विजय सर सभ कथू कयलनि। चन्दो वैह असूलि क' रखलनि। हमरा खाली गुलदस्ता मंगाब' कहने छलाह।"
         ‌   "हम कोनो अजय-विजय नहि जानी।" साहेब बजलाह, "विजय जी कें गिफ्ट आनबाक छलनि।‌ बाकी काजसं हुनका कोन मतलब? ई ककर काज छलै?"
           "छलै तं हमरे।" राम पदारथ बजलाह, "गलती भ' गेलै सर।"
           "गलती की माफ कर' योग्य भेल? कम-सं-कम‌ अपन दुनू असिस्टेंट के कहि देने रहितियै, तं एहन बेज्जती नहि‌ होइत। दू-दू टा स्टाफ भेटल अछि। तैयो बेथुत क' दै छियै। रिटायरमेंटक समय ककरा भेटै छै दू-दू टा असिस्टेंटक सुविधा? दोसर औफिसमे रहितहुं, तं...।" साहेबक तामस कम नहि भेल रहनि, "नहि सम्हरैए तं छोड़ि ने दियौ।‌ अहांकें जत्ते देल जाइए ताहिमे तीनटा बेरोजगारकें नोकरी भेटि जेतै। बुजुर्ग बूझि जतेक अहांक आदर करै छी, ततेक अहां..."
         साहेब फोन काटलनि। ठीके, सभ बातकें सुनिश्चित क' क' चलक चाही छल हुनका। राम पदारथक मोन उतरि गेलनि। सविता मैडम पुछलखिन, तं हुनका सभ खेरहा कहलनि। ओ किछु नहि बजलीह। चुप्पे रहलीह। सविता मैडमक चुप्पी सेहो हुनक मोनकें भारी बना देलकनि।
        ओ सोचलनि। सभ नोकरिहाराकें एकदिन रिटायर होयबाक समय अबैत छैक। सभक संग की एहिना होइत हेतै? मोन पड़लनि। पछिलो बेर एकटा भूल भेल रहनि। सोझे- सोझ तं केओ किछु ने कहलकनि, मुदा हुनका बारेमे आपसमे जे संसद चलैत रहैक, से ओ सुनने रहथि।‌ साहेबक चेम्बरेमे संसद चलैत छलैक। एक प्रकारें हुनका सुनयबाक उद्देश्येसं गप चलि रहल छलैक, तें चेम्बरक बाहर स्पष्ट रूपें आवाज अबैत छलैक।
        "छोड़ि दियनु सर। सात मास नोकरी बांचल छनि। लिखितमे किछु थम्हेबनि तं अंत समयमे गंजन भ' जेतनि। कहुना उघि लिअ' सात मास।"
        "तं की हम‌ अपन कैरियरक गंजन कराउ?हिनकर सात मासक नन परफोरमेंस अपना हिस्सामे ल' क'..."
         "जानि नहि, एहन किएक भ' गेलाह। पहिने कहांदन नीक कर्मचारी मे गन्ती रहनि। आब तं किदन भेल जाइ छथि।"
         "हे यौ। एकटा बात बुझियौ। जन्मतिथि मे अबस्से उप्पर-नीचां हेतनि।‌ मानसिक रूपसं‌ रिटायर्डक भावनामे जीबैत हेताह। औफिसियल जन्म तिथिक अनुसार भने साठिक‌ नहि भेलाह अछि मुदा...।"
         "से कहांदन डेढ़ बर्खक अन्तर छनि।"
         "कम्मेक फरक छनि। किछु के तं तीन-चारि, कि ओहू सं बेसीक रहै छै।"
         "हं, ओ जमाना रहै। सुतरि गेलै। आब तं एहन हेरा-फेरी मोश्किल छै।"
         "यौ, ओहू जनामा मे सही जन्मतिथि बला लोक छलाह। सभ हिनके सन नहि..."
         "ताहिमे हिनकर कोन दोष?"
         "बेस, एहिबेर छोड़ि दियनु सर।‌ सभ तरहक लोक के ल' क' चल' पड़ै छै। सात मास बितैत समय नहि लगतै।"
         "समय तं लगबे करतै। सात मास लगतै। ताबत उघैत रहियनु....!"
         राम पदारथकें आर सुनल नहि भेल रहनि। हुनका अपन भाय मोन पड़लखिन। पितियौत। जेठ। वैह सातमा क्लासक बोर्ड परीक्षाक फार्म भरैत काल हिनकर जन्मतिथि लिखौने रहथिन आ आंगनमे गर्वसं‌ कहने रहथिन जे डेढ़-पौने दू बर्ख उमेर कम द' देलियैए। बेसी दिन धरि नोकरी करत। हिनक माय-बाबूकें सेहो विजयक बोध भेल रहनि। 
          तीने मास पहिनेक गप छैक। ओ भैया फोन पर हालचाल पुछलखिन, तं राम पदारथ बजलाह, "लाबादुआ मे अहींक देल जन्मतिथि कें उघि रहल छी। निमाहि रहल छी नोकरी। सही जन्मतिथि लिखायल रहितय तं रिटायर भेल रहितहुं आ एखनुक नोकरीक तनाओ सं मुक्त रहितहुं ।"
         भैया ठठाक' हंसैत कहने रहथिन, "जतबे कम लिखा देलिअ' तत्ते बेसी दिन धरि समय अबूह नहि ने लगतह। रिटायरमेंटक बादक समयक अन्दाज नहि छह, तें एना बजै छह। हौ, तों एसगरे एहन नहि छह। बर्खमे दूटा जन्मदिन मनौनिहार बहुत लोक अछि देश मे। आम लोकक बाते छोड़ह, बहुत रास कवि-लेखक सेहो छथि, जिनकर एक्के बर्ख‌मे दू बेर जन्मदिन होइत छनि- एकटा ओरिजनल आ एकटा सरकारी फाइलक अनुसार। एहिना चलै‌ छै।"
        "मुदा, भैया। हमरा लगैए जे ई ठकब भेलै।"
        "नहि, नहि। से सब किछु ने भेलै। मोनमे ई सभ नहि राखह आ जतबे बांचल छह, इन्ज्वाय करह।"
          मोन भेलनि जे भैयाकें किछु आर कहथि, मुदा संस्कारक सिक्कड़ि किछु बाज' नहि देलकनि। 
         ह्वाट्सेपक मैसेज टोन बजलनि तं मोबाइल खोललनि। पत्नी पुछने रहथिन, "आर कत्तेकाल लागत?"
         "जानि नहि। गाड़ी ड्राइवर चला रहल छै।"
        "एना बतलाइत ढेकी जकां किए बतिआइ छी? औफिसमे कोनो टंटा भेलए कि?"
        "नहि, किछु नहि।"
        पत्नी आगां किछु नहि लिखलखिन। मुदा, ओ राम पदारथक आंगुर दुनू प्राणीक पहिलुक चैट सभ पर चलि गेलनि।
         "आखिर की सोचै छियै बौआ द'? कहिया धरि बेरोजगार रहतै?"
         "हम की सोचबै? सोचतै तं अपने ने। परीक्षा तं ओकरे ने पास कर' पड़तै। हम सुविधे ने देबै। पाइए-कौड़ी देबै ने। जेठका के देलियै, पढ़लक आ जग्गह पकड़ि लेलक। एकरो तं दैते छियै। पढ़बे ने करतै तं...।"
         "अहीं जनै छियै जे नहि पढ़ै छै।"
        "आर नहि तं की? शुरुहेसं आदति छै ओकर। पढ़' बेर मे माथ दुखाय लगै आ अहां बाम ल' क' ठाढ़ भ' जइयै।" 
         "दुर जाउ। ओकरा प्रति अहांक सोचे सोझ नहि अछि। पढ़ै नहि छल तं ओहिना एम ए पास‌ क' गेल। तखन जेठका सनक चन्सगर नहि अछि, से दोसर बात। सभ आंगुर एक्के रंगक नहि ने होइ छै।"
         "तं अहीं कहू। की करी हम?"
         "से हम कहू? अहांक बुद्धि चर' गेल अछि। हमर कहब अहां कहिया मानलहुं? बौआ कहै छल जे अहां के रिटायर केलाक एक मासक बाद ओकर सरकारी नोकरीक बयस बीति जेतै। तखन...?"
         "तखन की ? हम की करबै?"
         "हमर बात सोहाएल जे करितियै। कहने रही जे जनम तिथि मे दू-तीन साल कम' क' दियौ, से तं केबे ने केलियै। राजा हरिश्चन्द्र बनल‌ रही। रहू बनल।"
         राम पदारथ आगां नहि पढ़लनि। ह्वाट्सेपक पेज बदललनि। 
         
सविता मैडमकें यथायोग्य अभिवादन क' घर दिस गेलाह। घर पहुंचलाक बाद गेट ढकढ़कौलनि तं उजरल-उपटल डीह सनक मुखाकृति लेने‌ छोटका बेटा गेट खोललकनि। गोड़ लगलकनि। 
        बेटाकें देखि क' लगलनि जे ओ ठकाएल छथि। 
         मित्रक ओहिठाम जयबामे समय छलनि। चाहक संग फेसबुक देख' लगलाह। अरे, शंकर रिटायर क' गेल। शंकर हुनक ग्रामीण छनि। हुनकासं बयसमे छोट। रांचीमे रहैत अछि। बधाइ देबा लेल ओ शंकरकें फोन कयलनि। औपचारिकताक बाद ओ पुछलकनि, "अहां कहिया रिटायर हेबै कका? की हेबे ने करबै।" 
         शंकरक बात पर हंसल तं दुनू गोटे रहथि, मुदा ओकर हंसी बेधने रहनि । से, एहन दंश विनोदसं गप कयने बरोबरि होनि। विनोद आ ओ मैट्रिक धरि संगहि रहथि। ओ रिटायर क' गेल। जखन कखनो फोन करैत छनि तं पहिने एतबे पूछैत छनि, "की रे बाउ! रिटायर कहिया करबें? सरकार के छोड़बाक मोन नहि होइ छौ, कि विभाग सं लभ भ' गेलौए?" 
         विनोद एकबेर व्यास नन्दन बाबूक उदाहरण देने रहनि, "व्यास नन्दन बाबू बला हाल नहि ने हेतौ जे पहिने बेटा रिटायर करतौ, तखन तों करबें।" 
         व्यास नन्दन बाबू स्थानीय कम्पनी मे काज करैत छलाह। कम्पनीक स्थापना कालमे ओहिना नोकरी भ' गेलनि। कहांदन हुनकर जन्मतिथिक कोनो कागते ने रहै कम्पनीमे। बेटाक रिटायर भेलाक बाद ताकाहेरी भेलै, तं व्यास नन्दन बाबू कहलखिन जे हमर ओहि घरक बेटा अछि।
         "माने?"
         "हमर पत्नीक पहिलुक पतिक संतान।"
         "तं एकर पिताक नाममे अहांक नाम किएक हेतै?"
         "हेतै ने किए? कोनो स्त्रीक संग एहन हाल होइ छै, तं पिताक नाम ककर होइ छै? जे रखने रहै छै, डेबने रहै छै, तकरे ने।"
         "ओकर बाप एकटा रहै छै, तें बापक नाम लिखाइ छै। मायक नाम‌ फराक भ' सकै छै।"
         "वाह! बाप एक आ माय कतबो, तं सभमे‌ बापक एक्के आ माय एक आ बाप कतबो ताहिमे‌ नहि? ई असमानता भेलै। ई स्त्री पर निर्भर करै छै जे अपन बच्चाक बापक नाम की लिखाएति? जे प्रतिपाल करतै सैह ने बाप कि ओ जे स्त्रीक कोखिमे पाड़ि क' लात मारि भागि गेलै, से?"
         "मुदा अहांक तर्क विभाग नहि मानत।"
         "नहि मानत तं नहि मानय। विभाग बहार करय हमर जनमतिथिक प्रमाण पत्र।" व्यास नन्दन बाबू बजलाह,‌ "औ साहेब! कम्पनी जखन बनलै, तखने सं‌ हम काज करै छी। एहि कंपनी लेल पजेबा आ गिट्टी माथ पर ढोने छी। कयल-धयल पर जय जगरनाथ नहि छी हम। विभाग हमर जनमतिथि बहार करय आ हमरा रिटायर क' दिअय।"
          कम्पनीक अधिकारी सभ बातकें झांपलनि। व्यास नन्दन बाबू सं मेल-पांच क' मेडिकल बोर्ड बैसि क' हुनक जन्मतिथि तय कयलक आ ओ रिटायर भेलाह। व्यास नन्दन बाबू मानि गेलाह। नोकरी कर'मे सकितहु ने छलाह।
          पत्नी आबि क' मोन पाड़लखिन जे कतहु जयबा लेल अयलहुंए, तखन तंद्रा भंग भेलनि। मोन भेलनि जे मित्रक जन्मतिथि ओरिजनल छनि कि प्रमाण-पत्र बला। मुदा, से बुझल नहि छलनि।   
          ओ इथ उथ मे छलाह। पत्नी तैयार छलीह। मुदा, हुनकर मोन जयबा लेल तैयार नहि छलनि। 
          ओ भैयाकें फोन करबा लेल तैयार भेलाह। भैया के कहताह जे अहांक लाबादुआ बला समय हमरा लेल बलाय भेल अछि। एकबेर हमर आजुक स्थितिक कल्पना तं कयने रहितियै।
          मुदा, ओ थम्हि गेलाह।
         भैया कहथिन जे प्रमाण-पत्रे बला सही मान' पड़तह।
          मुदा, मोन से मान' लेल तैयार नहि अछि भैया। 
          भैया फेर कहथिन- मान' तं पड़बे करतह।
          पार्टीमे जयबा लेल पत्नी बेर-बेर अगुता रहल छलीह, मुदा राम पदारथ दुमांगि पर ठाढ़ छलाह।
                     ---------
       पटना/12.01.22/ कोविडक कारणें एकान्तवासक समय।
         
        
           

Monday, February 16, 2026

प्रगति पथपर मैथिली (टिप्पणी)

प्रगति पथपर मैथिली

प्रदीप बिहारी

मैथिलीक प्रगति पथक आकलन करबाक क्रममे पहिने एहि बातक गिरह बान्हब जरूरी जे मैथिली माने मैथिली भाषा टा नहि। मैथिली माने अखण्ड मिथिला, मिथिलाक समाज। समाजक अवधारणाकें मानितहि साहित्य, कला, संस्कृति आदि आदि स्वत: सोझांमे आबि जाइत अछि। आ सांच तं ई जे समाजक बिना कोनो भाषाक अस्तित्वक कामना धरि नहि कयल जा सकैत अछि आ ने कोनो भाषाक बिना समाजक। दुनू एक-दोसराक पूरक अछि। 
       कोनो भाषाक प्रगतिक आधारकें बुझबा लेल जरूरी छैक जे ओहि भाषामे सामाजिक सम्पर्क कतेक भ' रहल छैक, साहित्य, शिक्षा, भाषाक प्रयोग कतेक भ' रहल छैक आ ओ भाषा अपन सांस्कृतिक धरोहरिकें सम्हारैत नव युगीन बोधकें कत' धरि आत्मसात क' रहल अछि।
       मैथिलीक स्थितिमे एहि बिन्दु सभपर विचार करैत एहि बातपर प्रसन्न भेल जा सकैत अछि जे हमर सभक आधार माने अतीत गौरवशाली अछि आ पुरखेक अरजल पर हम सभ एखनो मोंछ पर ताओ द' रहल छी।
       हमर भाषा मैथिली संविधानक आठम अनुसूची मे स्थान पौलकि। एक समय रेडियोक शोभा सेहो बढ़ौलकि। विद्यालय-महाविद्यालयमे चर्चामे रहल (ओना दोसर रूपें एखनो चर्चामे अछि), साहित्य अकादेमीक भाषा बनलि, सरस्वती, ज्ञानपीठ पुरस्कार लेल सेहो चौकठि ओगरलकि, भारतीय भाषा संस्थानमे सेहो एकटा कुर्सी भेटलैक। ई सभ बात हमरा सभकें तोष द' सकैत अछि।
        हमरा सभके तोष द' सकैत अछि जे मैथिली दसकोसी-पंचकोसीसं बहरा क' देश-विदेश गेलीह। ग्लोबलाइजेशनक भार उघैत ग्लोबल भेलीह। फिल्ममे जगह बनौलनि। शहर, महानगर आ परदेशमे जेना-जेना लोक गाम छोड़ि गेलाह, मैथिलीक संस्था बना-बना कहियोकाल मैथिल होयबाक बात मोन पाड़ैत रहलाह।
       संतोष करबा लेल आर बहुत रास बात भ' सकैत अछि। निर्भर एहि बातपर करैछ जे अहां कत्तेमे संतुष्ट भ' पबैत छी। आउ, किछु एहन सत्य पर गप करी जे चिन्ता आ चिन्तन लेल नोतैत अछि।
       मैथिलीक सामाजिक सम्पर्क पर विचार करैत एहि बात पर ध्यान देब आवश्यक जे मैथिली अपन समाजसं कतेक धरि जुड़ि सकल अछि। मुदा ओहिसं पहिने इहो विचारणीय जे मैथिलीक समाज कोन? एहि प्रश्नक पारिभाषिक उतारा तुरंत मोन मे अबैत अछि- कोनो जाति, धर्म आ क्षेत्रक मैथिली भाषी समाज मैथिलीक समाज थिक। मुदा व्यावहारिक दृष्टिएं ई एकटा अनुत्तरित प्रश्न एखनहु बनल अछि । मिथिलाक गाम दुबरायल जाइत अछि। रोजगार लेल पलायन अछि आ ताहि संग सभसं पहिने मैथिली छुटैत छथि।
      कहल जाइत रहल अछि जे मिथिला विद्वानक नगरी अछि। ई मान्यता हमरा सभक माथ ऊंच करैत अछि। हम सभ गर्वसं गबैत छी- 'जत' सुग्गा भखैत अछि पुराण, हुनक गाम देखियह।' शिक्षा आ विद्वताक एहन परम्परा पर गर्व करैत-करैत हम सभ वर्तमानमे ओकर अंशो भरि सम्हारि क' नहि राखि सकलहुं अछि। मिथिलामे वर्तमान शिक्षाक हालति कनियो नुकायल नहि अछि। जखन मिथिलेमे शिक्षाक ई हाल अछि तं मैथिलीमे शिक्षाक मादे कहले ने जा सकैए। मातृभाषाक माध्ययमसं शिक्षाक लेल हम सभ आफन तोड़ने छी, मुदा पढ़निहार छात्र कोना आओत, कत' सं आओत, ताहि पर हमरा सभ चिन्तन नहि क' पाबि रहल छी। हम सभ अपने परिवारक कतेक छात्रकें मैथिली पढ़ौलहुं अछि? कतेक प्रतिशत? एखनि गामो घरक मजदूर वर्गक लोकक कनियो आर्थिक स्थिति नीक होम' लगैत छै तं अपन बच्चा लेल तथाकथित पब्लिक स्कूल तकैए, जत' मातृभाषाक माध्ययमे शिक्षाक कोनो अवधारणे नहि छै।
       ओना इहो बात सांच जे मैथिली लोक किएक पढ़त आ किएक अपन नेनाकें पढ़ाओत? मैथिलीमे रोजगारक कतेक संभावना छैक? प्राध्यापक बनि सकैत छी, मुदा जनसंख्याक संग आनुपातिक दृष्टिकोणसं तकरो कतेक संभावना। पहिने विभिन्न विश्वविद्यालयमे मैथिली पढ़निहारक संख्या संतोषजनक छल, आब तं छात्रक अभावमे कतोक महाविद्यालय मे मैथिली विभाग बन्न अछि। 
        कने साहित्यिक प्रगतिक गप करी। हम सभ कहि तं दैत छियैक जे मैथिली साहित्य देशे कि विदेशियो भाषाक समकक्ष ठाढ़ अछि। एहू उक्तिक पक्षमे मैथिली साहित्यक पुरने पीढ़ीक आधार पर ठाढ़ छी हम सभ। मानल जे एखनुक रचनामे नव विषयवस्तु, नव शिल्पक प्रयोग बढ़ल अछि, मुदा एहि वृद्धि कें संतोषप्रद नहि मानल जा सकैत अछि।
        सोसल मीडियाक एहि युगमे सभसं बेसी साहित्ये प्रभावित भेल अछि। ओहूमे पठनीयता। डिजिटल माध्यम अपना सभ ओहिठाम ठोरे टा पर अछि। 
         पहिने प्रकाशन कठिन छल, तं लेखन गुणवत्ता छल। आब प्रकाशन सहज भेल अछि तं साहित्य लेखन तूर सन भेल अछि। बहरायल आ फाहा बनि उड़ि गेल। पहिने कम-सं-कम हजार प्रति पोथी छपैत छल आ बिकाइतो छल, मुदा आब बेसी-सं-बेसी एक सय प्रति छपाइत अछि। सेहो अधिकांश बिलहले जाइत अछि। पोथीक पीडीएफ-पीडीएफक खेल बेसी होइत अछि। किछु पोथीकें भाग्यशाली मानि सकैत छी, जे बिकाइत अछि। मुदा तेहन पोथीक प्रतिशत एतेक कम अछि जे रेखांकित नहि कयल जाइत अछि। पहिने किछु संस्था सभ पोथी प्रकाशनमे रुचि लैत छलाह, आब लेखक अपना पाइक छपबैत छथि आ बिलहै छथि। एहन हालमे प्रमुख गतिक ग्राफकें कोना नापल जा सकैत अछि?
        चूंकि मैथिली शिक्षाक माध्यम नहि बनि सकल अछि, तें पठनीयताक संकट अछि। नव पीढ़ीक लेल उदासीनताक कारण अछि। 
       मैथिलीक हाल ई अछि जे ई भाषा कलममे जतबे मजगूत अछि, कंठमे ओतबे कमजोर। मैथिली घर-परिवारमे प्रचलित नहि भ' सकलीह अछि।
        फेसबुकक कारणें लेखक बढ़लाह अछि, साहित्यक गुणवत्ता घटल अछि। जाहि प्रकारक उजाहि सम्पादक विहीन फेसबुक नामक पत्रिका पर उठल छैक, मैथिली कलममे सेहो कमजोर होम' लगलीह अछि।
         हं, मैथिलीक प्रयोग रील आ स्टोरी बनयबामे बढ़ल अछि। यू ट्यूब मे बढ़ल अछि। ई भाषाक प्रचार लेल जतबे सहायक अछि, भाषाक संग दुराचार लेल सेहो ओतबे। थोड़ेक सावधानी सं एहि चैनलक सकारात्मक उपयोग क' भाषाक विस्तृतिक प्रयास कयल जा सकैत अछि।
      सरकारी उपेक्षाक विरुद्ध सेहो प्रयास जरूरी। मैथिली भाषाक मुद्दा भोटक मुद्दा बनय। आ, ताहि लेल जरूरी छैक जे मिथिलाक सभ वर्गक लोक एकरा अपन अस्मितासं जोड़ि क' देखथि। एखनहु समय नहि बितलैए। कवि उदय चन्द्र झा 'विनोद'क कविता एखनो प्रासंगिक अछि- किछु नहि बितलैए...
       अंतमे, हम पुन: ओही गप पर जोर देब' चाहब जे पुरखाक बनाओल देबाल पर रंग-रोगन जरूरी, मुदा ओहूसं जरूरी जे अपन देबाल सेहो ठाढ़ कयल जाय। मैथिलीकें कंठ-कंठ धरि पहुंचाएल जाय। 
                   ++++++
मिथिला विभूति पर्व रहिका (मधुबनी) 30 मार्च 2025 विचार गोष्ठीमे पढ़ल गेल।

Sunday, December 21, 2025

मैथिल संस्कृति : लालित्य आ लोक सरोकार

आलेख

मैथिल संस्कृति: लालित्य और लोक सरोकार

डॉ. महेंद्र नारायण राम
.            (डा. महेन्द्र नारायण राम)

.           (पूनम झा 'सुधा')

(डा महेन्द्र नारायण राम ने मैथिल संस्कृति और मिथिला के लोकसाहित्य, लोकदेवता तथा लोकसरोकार पर विपुल काम किया है। ‌ये मैथिली के महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिनके लेखन‌ में 'आम आदमी' प्रमुखता से आते हैं। एक आयोजन में इनके द्वारा पढ़ा गया उपरोक्त शीर्षक लेख के प्रमुख अंशों को हम 'अंतरंग' के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। मूल मैथिली से इसका हिन्दी अनुवाद पूनम झा 'सुधा' ने किया है।)

मिथिला का भू-भाग बड़ा है। यहाँ का समाज अलग-अलग स्तरों का है। अलग-अलग समाज का प्रभाव होने पर भी यहाँ का व्यवहार, खान-पान, रहन-सहन, विचार और बोलचाल दूसरे लोगों को भी अधिक प्रभावित करता है। कोकटी धोती (धोती का प्रकार, जो सिर्फ मिथिला में पहनी जाती है), सिर पर पाग, पटुआ साग, तिलकोर के पत्ते, मछली-चावल, पान-मखान और अतिथि का आदर आदि लोक-व्यवहार और सरोकार उच्च पदस्थ आसन ग्रहण कराते हैं। श्रेष्ठ संस्कृति के साथ लालित्य चमत्कृत करता है।

वस्तुतः संस्कृति मनुष्य को परिष्कृत और समृद्ध बनाने वाला गुणों के रूप में चिह्नित होती है। यह संवेदनशीलता का काम करते हुए निर्मित होती है। मैथिली भाषा का माधुर्य और मैथिली संस्कृति का लालित्य जगत में प्रसिद्ध है। अनुपम है, मनोरम है, अद्वितीय है। इसके विभिन्न पक्षों का दर्शन निम्नलिखित संस्मरणात्मक बानगी से कराना समीचीन होगा।

मिथिला में जब दामाद आते हैं तो यहाँ की सासू मां सामने नहीं आती हैं; वे अपने झरोखे या दरवाजे के पीछे से देखती हैं कि दामाद के आदर-सत्कार में कोई त्रुटि नहीं हो रही है।

अपने कैरियर के आरंभ में मैं डेकोरेटर एवं पेंटर रहा हूँ। एकबार, मड़बा (मंडप) सजाने के लिए कबिलपुर (दरभंगा) गया था। हमारे यहाँ के डॉक्टर थे- सुरेंद्र लाल दास। वे मुझे अपनी भतीजी की शादी में वहाँ ले गए थे। वहाँ मैंने देखा कि एक पचास-पचपन वर्ष के वृद्ध दामाद को महिलाएँ पाग पहनाकर गाती हुई आँगन में लेकर आ रही थीं। मुझे पता चला कि किसी भी उत्सव पर पुराने दमाद को नये दामाद की तरह सत्कार में कोई कमी नहीं की जाती है।

मेरा ससुराल अवाम (दरभंगा)  है। संयोगवश, दरभंगा महाराज का ससुराल भी उसी गाँव में रहा है।

एक दिन हाथी पर चढ़कर उन्होंने अपने अमला-फमला के साथ गाँव भ्रमण हेतु निकले। रास्ते में कुछ लोग जैसे मुसहरनी आदि टोकरी-कुदाल लेकर खेत से शकरकन्द निकालने जा रहे थे। उन्होंने महाराज को देख लिया। आपस में बातें हुईं और किसी ने पूछ बैठा- यह कौन है? दूसरे ने कहा- यह दरभंगा महाराज हैं।

इस पर उसने कहा- ‘वो महाराज होंगे कहीं के, मगर यहाँ के दामाद हैं। मजाक में किसी ने उन पर टोकरी भर राख फेंक दी। हंगामा हो गया। परंतु महाराज ने कहा-  'इन्हें मेरे पास ले आइए। आज ही और अभी-अभी मुझे लगा कि मैं ससुराल में हूँ।' और महाराज खुश होकर उन्हें उपहारस्वरूप जमीन दी।

हमारे बगल में फुलपरास विधानसभा क्षेत्र है। एक बार माननीय देवेन्द्र प्रसाद यादव के त्यागपत्र देने पर माननीय कर्पूरी ठाकुर ने यहां से चुनाव लड़ा था। विरोधी प्रत्याशी थे रामजयपाल सिंह यादव। फुलपरास यादव बहुल क्षेत्र है। रामजयपाल बाबू जहाँ-तहाँ, जिन-जिन के दरवाजे पर गए, जोड़ी  धोती, सुपाड़ी, चादर, तौलिया से उनका स्वागत-सत्कार किया गया। पर लौटते समय सब कहने लगे, ‘वोट हम कर्पूरी ठाकुर को ही देंगें।’

मैं अपने विवाहोपरांत दो महीने के भीतर ससुराल गया। दरवाजे पर एक 7–8 वर्ष का बच्चा था। उसने मुझसे कुशल-क्षेम पूछा और कहा, ‘कहिए कुशल । गाँव-घर का समाचार ठीक है न, मेहमान?’ मैंने कहा- हाँ। फिर उसने माँ का हाल पूछा। मैं गुस्सा हो गया और थोड़ा आगे बढ़ा। ससुर जी बोले- ‘नहीं-नहीं, आप मत गुस्सा करिए, यह आपके ससुर जी ही लगेंगे। अधिकांश लोग यहाँ आपके ससुर ही होंगे।’

इस तरह, दामाद के सामने सास नहीं आना और सास द्वारा सत्कार में किसी भी तरह की कमी न हो, इसका ध्यान रखा जाना; नए दामाद को भी पुराने दामाद जैसा ही सत्कार मिलना; गाँव के स्त्री-पुरुष द्वारा समान आदर-सत्कार किया जाना; समान जाति के रहते हुए भी सत्कार में कमी नहीं रख, उत्तम व्यक्तित्व के पक्ष में मतदान का निर्णय लिया जाना; बच्चों द्वारा कम उम्र में सम्बन्ध के अनुरूप मजाक करना; समधन को लक्ष्य कर हँसी-ठिठोली करना; यह मिथिला की संस्कृति और लोक-सरोकार का लालित्य नहीं है? यदि नहीं, तो और क्या है?

मैथिली संस्कृति किसी विशेष प्रयत्न का प्रतिफल नहीं है, अपितु यहाँ की आन्तरिक और बाह्य संरचना है एवं तदनुरूप विकसित समस्या तक का समाधान है। वर्गीय समाज में वर्चस्व की संस्कृति के विरुद्ध अपने लिए नये प्रतीक, बिंब, गाथा, गीत और व्यवहारों को अपनाते हुए परिवर्तन का प्रतिबिंब विविध प्रकार के लोगों के सन्दर्भ में दिखाई देता है। यह सब मैथिल लोगों की संस्कृति है। अब भी यह इतना समृद्ध है कि वाचिक सरोकारों में विद्यमान लोककाव्य, लोकगाथा, लोकगीतों, लोकनृत्यों, नाटकों, लोकचित्रों, लोककथाओं, लोकोक्तियों, लोकवचनों एवं लोकपर्वों में मिथिला, मैथिल और मैथिली का लालित्य दर्शन करा रहा है। इसके अंतर्गत विभिन्न युगों का इतिहास, समाज-दर्शन और लोकजीवन का चारित्रिक उत्कर्ष सहज रूप में देखा जा सकता है।

उपरोक्त विभिन्न पक्षों पर दृष्टिपात करने पर स्पष्ट होता है कि मिथिला में मैथिली लोकगाथाएं मध्यकालीन या पूर्व-मध्यकालीन सामाजिक घटनाओं पर आधारित हैं। जागीरदारों एवं सामंतों के सामाजिक सरोकारों के विरुद्ध कई संगठित/असंगठित विद्रोह हुए, जिसे निर्ममतापूर्वक कुचल दिया गया, जिसका प्रभाव जनमानस पर इस कदर पड़ा कि कई लोकनाटक हुए, कई कवियों ने उनके जीवन-संकटों की गाथा को केंद्र में रखकत रचना की, जो आज भी लोगों के गले में प्रवाहमान है। लोरिक, मनियार, दीनाभद्री, सलहेस, शशिया, महराज प्रभृति कई गाथाएँ सामने आईं; इनके गाथा-गायन और लोकपूजन में वर्गीय सीमाएँ टूट गीं।

क्षेत्रीय-जातीय विशिष्टताओं से गुंथे मिथिला के पारंपरिक लोकनृत्यों में मृदंग नृत्य, पखावज नृत्य, धोबिया नृत्य, चमरनटुआ और डम्फा-बाँसुरी, कठघोड़ा नृत्य, पमरिया नृत्य, मयूरा नाच, लोरिक नाच, नटुआ दयाल सिंह, डोमकच, कौआ हकनी, कीर्तनियाँ नाच, पूजा-आरती नृत्य, डमरू नाच, नारदीय नृत्य, भाओ नृत्य, बक्खो नृत्य, झरनी नृत्य, खजन चिड़ैया नृत्य, विद्यापति नाच, कठपुतली नाच, करिया झुमरी नृत्य इत्यादि शामिल हैं। मिथिला जनपदीय की लोक-संस्कृति आत्मीय लालित्य से भरी है।

उसी तरह लोग मानस की अभिव्यक्ति से ओत-प्रोत भित्ति-चित्र और मालाकार, कुंभकार द्वारा विभिन्न रंगों से सज्जित चित्रित वस्तुएँ मांगलिक कार्य-व्यवहार में आती हैं। सिंदूर और पिठार से बनी अरिपन, बड़े-बड़े पत्तों पर बने कोहबर में साँप, बिच्छू, कछुआ, तोता आदि का चित्र प्राकृतिक मौलिक सांस्कृतिक चेतना और चिंतन के रहस्यमय तथ्यों को उजागर करते हैं, जिन्हें देख जर्मन मानवशास्त्री 'मोसर स्मिथ' द्वारा 'टूरजन पेंटिंग शैली' निर्मित किया गया।

मिथिलाओं में गोदना केवल शरीर का स्थायी अलंकार नहीं था; वह जातिगत परिचिति, बीमारी से बचने का उपाय, विषहर कीड़ा से सुरक्षा, जादुई प्रभाव और पराशक्ति के प्रकोप को अनुकूल करने तथा प्रजनन के प्रतीक के रूप में लोक सरोकार को भी प्रतिष्ठित करना है।

इसी तरह थान एवं गह्वर में गजारोही सलहेस, अश्वरोही ब्रह्म बाबा, व्याघ्ररोही मधुकर बाबा, कलश चौमुख दीप, खिदोदनी, बाँस का डाला, दौरी, सूप, मेघ डम्बर, बेना, फुलडाली, सिकी की पौती, मौनी, चंगेरी पनबट्टा, कुश का आसन, मूज की चटाई, लाहक लहठी, काठक सिन्दूरघोरा, साँप एवं विभिन्न जातियों के हस्तशिल्प, हाथ से बने मूर्ति-शिल्प आदि ये सब वस्तुएँ वास्तव में मैथिल संस्कृति का सौंदर्यबोधी, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आर्थिक चेतना का प्रतीक हैं। लोक-सरोकार और लोक-चिन्तन का प्रतिफल लोककला के रूप में विस्तृत रूप से विद्यमान होना अस्वाभाविक नहीं है।

संस्कृति नदी की तरह प्रवाहमान होती है। वह जल जहाँ-जहाँ बढ़ता है, वहाँ-वहाँ अपना गुण छोड़ता और वहाँ-वहाँ का गुण-अवगुण ग्रहण करता जाता है। इसी तरह मैथिली संस्कृति देश के अन्य प्रांतों, स्थानों होते हुए सम्पूर्ण विश्व में फैल गई है; इसका कारण यह है कि मैथिल अपना शिक्षा-दीक्षा, रोज़ी-रोज़गार हेतु देश-विदेश में प्रवासी रूप में निवास करते हैं। मैथिलों ने कई संस्कृतियों को अपने में समेट लिया और वहाँ अपनी संस्कृति फैला दी। यह लालित्य का विस्तार भी अस्वाभाविक नहीं है। इस विस्तार में परंपरा का टूटना और नई परंपरा का विकास होना स्वाभाविक है; तब भी संस्कृति को राजनीति से प्रभावित कर देना गलत है। इस कृत्य के जड़ में मनोवैज्ञानिक तत्वों का विकसित होना भी अस्वाभाविक नहीं है। कहीं-कहीं इस विकसित परंपरा को लेकर शर्मनाक भाव-बोध भी उत्पन्न होते हैं। पर दोनों परंपराओं का निर्वहन करना भी अनिवार्य हो जाता है। इस संदर्भ में यहाँ केवल एक दृष्टांत देना आवश्यक है।

मैथिलों में विवाह पूर्व या अन्य अवसर पर उबटन लगाने की प्रथा प्राचीन काल से प्रचलित है। उबटन में मेथी का प्रयोग होता है; वैसे ही हल्दी लगाने की भी प्रथा है। इन दोनों में औषधीय गुण हैं। घर-घर में तुलसी का पौधा मिलता है; बेटी-बहू उसकी जड़ में पानी डालते हैं, शाम में दीप जलाते हैं। बेल का पत्ता शिवजी को चढ़ाते हैं। ये वनस्पतियाँ औषधीय एवं पर्यावरणीय महत्व की वस्तुएँ हैं, जिनका उपयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। इनके प्रयोग का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी स्वास्थ्य पर प्रभाव होता है। साथ ही, इनसे संदर्भित गीत पारंपरिक ज्ञान के स्रोत हैं; ये मैथिली संस्कृति में रुढ़ हो गए हैं। पर ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव से ये प्रथाएँ भी लुप्त हो रही हैं। बाजार में रंग-विरंगे क्रीम और लोशन आने से नानी-दादी मेथी क्यों पीसेंगी? वर-वधू को विवाह पूर्व उबटन क्यों लगाया जाएगा? अब तो उबटन के 'फ्लेवर' आने लगे हैं।

बच्चे समाज के भविष्य हैं। हमारी संस्कृति में लोरी, अंग मलेस (मालिश), झुलुआ, रूठे बच्चों को मनाना, खान-पान और खेल-गीत, ये सारी कार्य-सम्पादन दादी-नानी द्वारा किया जाने वाला सांस्कृतिक ज्ञान था। पर अब इस पर बाजारवादी प्रभाव पड़ा है, जिसके कारण हम उन पारंपरिक चीज़ों से दूर हो रहे हैं । जैसे 'ईल सन, कील सन, धोबियाक पाट सन, कुम्हराक चाक सन...' (मालिश करते वक्त बच्चों को सुनाने जाने वाले पद) इत्यादि। परंपरागत गान-गीतों की जगह आधुनिक, बाजार से संचालित गीत हर जगह आ गए हैं।

बच्चों का दुलार-प्यार करने के लिए, रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए, दादी-नानी गाया करती थीं-

     “अटकन मटकन दहिया चटकन,
      केरा कूश महागर जागर,
       पुरनिक पत्ता हिलै डोलै,
       माघ मास करैला फरै
       तै पर सबहिक ना की?
       आमुन गोटी जामुन गोटी
        तेतरी सोहाग गोटी
        लैह पुत्ता डाभर
        करय लेल कामर
       बांस काटे ठांय-ठांय
       नदी गुंगुआय
       कमल फूल दुनू अलगल जाय
       सिंगही लेबह कि मुंगरी?

ऐसे माध्यमों से बच्चों को बहुत सारा ज्ञान मिलता था। जैसे तालाब में कमल के पत्ते का तैरते रहना, पानी में कमल के फूलों का तैरना, बांस काटने से आनेवाली आवाज जैसी प्राकृतिक बातों को गीत-गाना के माध्यम से परिचित कराया जाता था, पर अब बाजार के प्रभाव से परिवर्तित गीत दिखाई दे रहे हैं-

      “अटकन मटकन हार्लिक्स चटकन,
       लेमनचूस महागर जागर,
       बिजली पंखा नाचे गोल,
       पाँच वर्ष पे जनमत फूले
       ताहि पर सबहक ना की?
       पटनाक गोटी दिल्लीक गोटी
       मिनिस्ट्रीक सोहाग गोटी
       लैह पुत्ता डिप्लोमा
       देखह सिनेमा
       प्रेस छापय धांय-धांय
       रेडियो गुंगुआय
       मानव सभ्यता अलगल जाय
       एटम लेबह कि पौड़की?

इस तरह के बोल आधुनिकता की ओर इशारा करते हैं।

श्रम संस्कृति की उपज है लगनी, जांता चलाना, ढेकी से धान कुटना, ओखली और मूसल से चिउरा कुटना आदि। ऐसे कार्यों के लिए मिथिला‌ में अवसरपरक गीत हैं। जैसे जांता चलाते समय गाये जाने वाला गीत  'जंतसार' कहलाता है। पर अब जांता का स्थान मिक्सी ने ले लिया; ओखली और मूसर का स्थान मिल ने ले लिया है। बटगबनी का स्थान 'डी जे' ने लिया है। श्रम-शक्ति गीत विलुप्त हो गये हैं।

गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक 'विवाह-संस्कार" महत्वपूर्ण है। हमारे यहाँ घर-देखना, सिद्धांत, फलदान, छेका, देवी पूजन, मटकोर, अठोंगर, मड़बा घुमाना (इस क्रिया में वर को कन्या के भाई द्वारा गले में गमछा लगा कर मंडप के चारों ओर तीन बार घुमाया जाता है), आशीर्वाद देना, सातगाँठ बांधना, सप्तपदी, कोहबर बनाना, मड़वा बनाना, मंडप-पूजा, कन्या निरीक्षण, सिंदूरदान, हल्दी-दौर, द्वार-छेकना, बारात निकलना, बारात अभिनन्दन, बरात भोजन, कन्या विदाई आदि कई रीति-रिवाज़ों का पालन किया जाता है। इन सभी रस्मों का अपना विशिष्ट महत्व है, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है।

बारात और समधी के भोजन के समय गीत सुनाने की परम्परा भी मिथिला में है। इन गीतों में विनोद के साथ-साथ गालियों की बहुलता भी होती है, जिसे 'डहकन' कहा जाता है। कुछ बानगी देखी जा सकती है-

       सुनू समधी सरकार
       हम छी गरीबक आधार
       जे छथि भात लेने ठाढ़
       ओ छथि मैया के भतार।

(समधी जी सुनिये, हमलोग गरीब के आधार हैं, जो भात लेकर खड़े हैं, वह आपकी मां के भर्तार यानि पति हैं।)

         समधिन के बाड़ी मे उपजल आलू
         समधिन के ल' गेल जनकपुर के भालू

(समधन की बाड़ी में आलू उपजा और समधन को जनकपुर का भालू ले गया)

          पाहुन गारि नहि दै छी, हंसी करै छी
          हमर कका कुमार, अहांक काकी मंगै छी...

(दामाद जी! गाली नहीं दे रही हूँ, पूछ रही हूँ । मेरे काका जी कुंवारे हैं, उनके लिए आपकी काकी मांग रही हूँ । इसी तरह हरेक सम्बन्ध के लिए पद जोड़े जाते हैं।)

मिथिला में दामाद को साले, सालियां, सरहज आदि कदम-कदम पर हास-परिहास के साथ गालियां सुननी पड़ती हैं। हास-परिहास करने वाले सम्बन्ध में गांव के कोई भी हो सकते हैं। मनोरंजन के साथ उल्लास से भरी यह संस्कृति मैथिलत्व की पहचान है।

घर पर मेहमानों का स्वागत, रिश्तेदारों का आगमन, बेटे-बेटी के विवाह में तैयारी आदि में पूरा गाँव योगदान देता है। विवाह समारोह में उमंग, उल्लास, हँसी, गीत-संगीत, ससुराल-पक्ष और मायका-पक्ष के बीच हल्की नोक-झोंक, बच्चों की चहल-पहल ये सब वातावरण को खुशियों से भर देते हैं। यह पारिवारिक और सामूहिक सहयोग समाज की मजबूती और आपसी प्रेम का परिचायक है।

मिथिला में विवाह से पूर्व गोत्र-मूल देखकर ही शादी तय की जाती है। यहाँ दहेज-प्रथा को सामाजिक कुरीति माना गया है; बावजूद इसके अब यह प्रथा सामाजिक रीतियों से जुड़ी हुई है।

मिथिला का 'झरनी गीत' जो मुसलमान के ताजिया निकालने के समय गाया जाता है। यह गीत मिथिला में मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दु जाति के लोग भी गाते हैं और ताजिया में सम्मिलित होते हैं। आपसी प्रेम और सौहार्द्र का यह अनूठा संगम मिथिला की सांस्कृतिक पहचान भी है। हिन्दू और मुस्लिम मैथिल सांस्कृतिक लालित्य मिथिला को चमत्कृत करता है। पर, वैश्वीकरण की आंधी ने इसे भी विस्मृत करने लगी है।

मिथिलांचल की घरेलू गीत परंपरा, कजरी, झूमर आदि, सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। अमान, तलमा, भंगरा, हरगीला, उखवा, समार आदि जैसे हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित गीत मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को और भी उज्ज्वल बनाते हैं। विवाह अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों में दोनों समाजों की परंपराओं का सम्मिश्रण दिखता है; यही दर्शाता है कि मिथिला की संस्कृति सामंजस्य, प्रेम और सहअस्तित्व की प्रतीक है।

नीचे दिए गए गीत में भी मुस्लिम और मैथिल संस्कृति का रंग एक साथ झलकता है। गीत में महरम, कंगना, शाखा, मांग, श्रृंगार सभी का उल्लेख मिलता है, जो इसकी सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है। गीत का रूप देखा जा सकता है-

        हाय हाय कोने रंग मुंगिया, कोने रंग मोतिया
        कोने रंग ननदो, तोरे भैया हाय।
        हाय हाय लाले रंग मुंगिया, सबूज रंग मोतिया
        गोरे रंग भौजो, मोरे भैया हाय।

(इस गीत में ननद-भाभी के बीच संवाद है। भाभी पूछती है- किस रंग का मूंगा है, किस रंग का मोती है और किस रंग के तुम्हारे भैया हैं? तो ननद जवाब देती है- लाल रंग का मूंगा है, सबूज (हरा) रंग का मोती है और गोरे रंग के मेरे भैया हैं।)

हिन्दू-मैथिल संस्कृति हो या मुस्लिम-मैथिल संस्कृति, दोनों की लालित्य परंपराएँ हमें जोड़ने का काम करती हैं।
                        
मैथिल लोकनाट्य किसी न किसी प्रकार से हमेशा पर्व से जुड़ा रहा है। इसी बहाने सामाजिक विशेषता और विसंगति उजागर होती है। धार्मिक आस्था से जुड़े रहने के कारण जीवन्त और कालजयी होता है। इसका एक उदाहरण 'जट-जटिन' लिया जा सकता है, जो अकाल पड़ने पर इन्द्र देवता से बारिस के लिए गुहारस्वरूप किया जाता है। इस लोकनाट्य में नव दम्पत्ति के उपालंभ ऋंगार, वियोग और फिर संयोग की भावना दिखाया गया है। इसमें कृषक वर्ग के आधारभूत सुविधा पाने का संघर्ष भी है। 

मैथिल संस्कृति के लालित्य की विशेषता यह है कि किसी भी प्रतीकात्मक झलक को महज सतही स्थान न देकर एक बौद्धिक-सांस्कृतिक प्रतिनिधि रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए हर चीज पर विस्तार से विमर्श करने की आवश्यकता पड़ती है ताकि समय और सेवा के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक लालित्य समेटा जा सके। यदि विस्तार से लिखा जाए तो कितना कुछ होगा, पर यहाँ सीमित प्रयास ही किया गया है।

 मिथिला का सांस्कृतिक विकास विभिन्न स्तरों पर प्रवासी मैथिलों के माध्यम से भारत के विभिन्न प्रांतों में नए आयाम के साथ मिथिला-मैथिली की परिचिति दे रहा है। इस संदर्भ के कुछ बिन्दु यहां उल्लेखनीय है-

1. प्रवासी मैथिलों के द्वारा विद्यापति पर्व-महोत्सव, मिथिला विभूति पर्व-महोत्सव एवं मीडिया के विभिन्न माध्यमों से मिथिला के सम्पूर्ण सांस्कृतिक जानकारियों का विस्तार हो रहा है। इसी माध्यम से मिथिला की गरिमा, ज्ञान, दर्शन, संस्कृति और संस्कार की परिचिति वैश्विक स्तर पर हो रही है।

2. पाग (सिरो परिधान) मिथिला की परिचिति है। इसकी अलग संस्कृति और मिठा है। धोती, पाग और चादर के विशिष्टता की परिचिति भी वैश्विक स्तर पर हुई है।

3. 'पग पग पोखरि माछ मखान' (कदम-कदन पर तालाब, मछली और मखान) की महत्त पूरे विश्व ने जाना है।

4. विश्व के विभिन्न स्थलों पर तुलसी पूजन तथा छठ-पूजा का विधिपूर्वक आयोजन हो रहा है।

5. मिथिला का प्रसिद्ध लोकचित्र 'मिथिला पेंटिंग/मधुबनी पेंटिंग अब बौद्धिक स्तर पर पूरे विश्व में स्थापित हो गया है।

6. साढ़े नौ सौ बीघे में फैली मिथिला के लोक देवता राजा सलहेस की फुलबाड़ी, जो अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य के लिए उल्लेखनीय है, जो ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सम्पदा के रूप में वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि पा चुकी है। यहां लगने वाला वार्षिक मेला को अन्तर्राष्ट्रीय मेला का स्थान प्राप्त हो चुका है।

7. अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा-पूजन के अवसर पर मिथिला से साजे गये हजारो प्रकार के भार (उपहार)-संस्कृति भी वैश्विक स्तर पर चर्चे का विषय है।

8. विलुप्त होती मैथिली की लिपि 'मिथिलाक्षर' की परिचिति भी वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है।

9. भारत सरकार ने राजा सलहेस को यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सूचीबद्ध करने के लिए अनुशंसा भेजा है।

इस तरह की परिचिति के बावजूद कई ऐसे कार्य हैं जो मैथिल संस्कृति जे चहुदिस विकास के लिए किया जान है। बानगी इस प्रकार है-

1. जिस तीव्र गति से हमने अपनी संस्कृति को वैश्विक स्तर पर परिचिति दिलाने का काम किया है, उसके स्थायित्व के लिए हमें अपने घर-परिवार में अपने बच्चों के साथ मातृभाषा की प्राथमिकता देनी होगी। हम इस काम को भूलते जा रहे हैं।

2. राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत झांकी में मैथिल संस्कृति संदर्भित झांकी के प्रदर्शन का प्रयास हो।

3. वैश्विक स्तर पर 'मिथिलाक्षर' के प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।

4. मैथिली/मिथिला से सम्बन्धित अवसरों पर मिथिला के पारम्परिक पोशाक को धारण कर अपनी नीजता कायम रखें।

5. मैथिली नाटक/सिनेमा के प्रस्तुतीकरण को और भी विस्तारित किया जाना चाहिए।

7. सांस्कृति सम्पदा के विस्तार और संरक्षण के लिए इसे चिह्नित कर संरक्षण का उपाय हो।

8. विभिन्न पर्व/महोत्सव/समारोह के माध्यम से व्यष्टि से समष्टि चेतना के प्रति युवाओं को अपनी संस्कृति के प्रति उत्प्रेरित करना आवश्यक है। इस कश्ती को वे ही आगे ले जा सकते हैं।

 निष्कर्षतः यह गंभीरतापूर्वक समझना और सोचना आवश्यक है कि हम आकाश में जरूर उड़ें, पर डोर धरती पर ही रखें।
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मूल मैथिली से अनूदित : पूनम झा 'सुधा'

Sunday, September 14, 2025

आम आदमीक लsगक कथा (भूमिका)

भूमिका

आम आदमीक लगक कथा
.   (फोटो - केदार कानन)
प्रदीप बिहारी

हमरा हाथमे प्रिय भाइ केदार काननक कथा-संग्रह 'अथ चैम्बर कथा'क पाण्डुलिपि अछि। पाण्डुलिपि भेटितहिं करेज सूप सन भ' गेल। से एहि दुआरें जे ई चिरप्रतीक्षित छल। 

हिनक कथाकारक स्वरूप नव रचनाकार लग प्राय: ओत्तेक जगजियार नहि होयतनि, मुदा पुरान रचनाकार लग कथाकार केदार कानन चिरपरिचित आ लोकप्रिय छथि। हिनक कतोक कथा मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित भ' लोकप्रिय भ' चुकल अछि। एहि संग्रहक आगमन, तें महत्वपूर्ण अछि।

हिनक एहि संग्रहमे प्राय: सतरह गोट कथा अछि जे वर्ष 1979 ई सं 1994 ई.क मध्य लिखल गेल आ प्रकाशित भेल अछि। ई कथा सभ एहि समयावधिमे प्रकाशित मिथिला मिहिर, वैदेही, अनामा, अर्पण आदि पत्रिकामे प्रकाशित भेलनि। पनरह बरखमे संख्यात्मक रूपें ई सतरहटा कथा भने कम लागय, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिकोणें सभ कथा स्तरीय कथाक शर्तकें पूरा करैत अछि। अपन प्रासंगिकता आइयो कायम रखने अछि। 
 
उक्त कालखण्डमे देश भीषण परिवर्तनक स्थिति देखलक। एकरा सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक संकट आ जातीय-धार्मिक तनाओक समय सेहो कहल जा सकैछ। सामाजिक चेतनाक उभार सेहो एहि कालखण्डमे देखल जा सकैछ। एहि पोथीक कथा सभ पढ़ने पाठककें लगतनि जे कथाकार एहि परिवर्तन सभक साक्षी रहलाह अछि आ अपन रचनाधर्मिताकें समाजक संग जोड़ि क' रखलाह अछि। कोनो लेखकक ई प्रयास आ प्रयोग ओकरा सभ दिन लोकप्रिय बनौने रहैत छैक। 

एहि परिवर्तनक प्रभावें सामाजिक परिवेशमे लोकक व्यस्तता बढ़ब शुरुह भेल, रोटीक समस्या, बेकारीक समस्या बढ़ल आ तकर कारणें बढ़ल तनाओ, लूट, अपहरण, शोषण आ घूसखोरी। एहि पोथीक कथा सभमे कथाकार बहुत सूक्ष्मतापूर्वक तात्कालीन समयकें पकड़लनि अछि। बहुत निर्भीकताक संग व्यवस्थाक कुरूपताकें पाठकक समक्ष अनलनि अछि। बिनु कोनो राग-लपेटकें सत्यकें उजागर कयलनि अछि- जेना, जस की तस धर दीनी चदरिया...
 
आ, से हिनक एहि संग्रहक कथा 'नाटक', 'तामस' आ 'आतंक'मे देखल जा सकैत अछि। कथा 'नाटक'मे स्वास्थ्य विभागमे व्याप्त अराजकताकें उजागर कयल गेल अछि। अस्पतालमे भर्ती अपन भाउजिक सुश्रुषामे लागल नायक राजीवकें अस्पतालक दरबान कोना प्रेमपूर्वक अनर्गल टाका लैत छैक, से देखाओल गेल अछि। सोझे नहि मंगैत छै, मंगबा लेल नाटक करैत छैक। भोरुका दरबान रोगीकें नमहर सन सलाम ठोकैत हालचाल पुछैत अछि आ जिज्ञासा करैत अछि जे केहन मोन छनि। तकर बाद बजैत अछि - सब कुछ ठीक हो जेतै‌ चिन्ता के बात नहि हइ। कोठरीसं बहराइत काल राजीवकें संग करैत अछि आ बाहरमे कहैत अछि- 'कोनो बात नहि। डाक्टर सभकें हम कहि देलियै। आब धीरे-धीरे मोन ठीक होइ जेतै। लाब' आब हम चलब। जतरा बना द'।'
 
सहानुभूतिक शब्द कहि 'जतरा बनायब' माने चाह-पान लेल टाका मांगब। दरबान कहैत छैक जे भोरे-भोर चाह ताह नहि पीबै? तहिना दोसरो दरबान पहिले सन सहानुभूति प्रकट करैत चाह आ एकटा सिकरेट लेल मुंह खोलि एकटकही मंगैत छैक। कथा-नायककें चाह-सिकरेट लेल दरबानक नाटक देखि छगुन्ता नहि होइत छनि, ओकर क्षुद्रतापूर्ण व्यवहार पर हंसी लगैत छनि। आ, नाटकक रूपमे स्वास्थ्य विभागक नंगटै देखैत छथि पाठक।

कथा 'तामस'मे रिक्शबला पर उठल नायकक तामसकें बड़ कुशलतापूर्वक प्रस्तुत कयलनि अछि। हमरा जनैत तामसक फराके मनोविज्ञान देखयबाक प्रयास छनि कथाकारक। पहिने ओत्तेक रौद आ गुमारमे रिक्शा नहि भेटब, भेटबो कयने अनर्गल पाइ मांगब नायकक तामसकें बढ़बैत छैक। मुदा ओ तामस अव्यक्त रहैछ। उचित किराया पर रिक्शा भेटलाक बाद नायकक चेहराक विजय-बोध आ पहिलुक रिक्शा बला लग बाटे जाइत काल घुरि क' ओकरा दिस तकबाक मोन बनाएब, मुदा ताकब नहि। एहि दृश्यक संयोजन कथाक क्लाइमेक्समे महत्वपूर्ण बनबैत छैक। अव्यक्त तामसक प्रस्तुतीकरण पाठककें नीक लगतनि।

कथा 'आतंक'क नायक परमाक व्यवहारसं डेरायल ओकर मित्र सभक असमंजसक परिस्थितिक निर्माण नीक जकां एहि कथामे भेल अछि। परमा सन लोक प्राय: गाममे पाओल जाइत अछि, जे बेरोजगारे रहि जाइछ वा अपन विचारधारा समाजकें मनाब' लेल अपस्यांत भ' हारि जाइछ आ ओकर व्यवहार अस्वाभाविक भ' जाइछ, हिंसक भ' जाइछ। आ, समाजक लोक ओकरासं कन्छी काट' लगैछ। मुदा, ओकर मित्र ने ओकरा संग रहि पबैछ आ ने ओकरासं फराके। एहि परिस्थितिकें उकेरैत कथा 'आतंक' पाठककें बान्हि क' राख'मे सफल होइत अछि।

एकटा कथाक चर्च कर' चाहब, ओ थिक 'परती'। ई अभावक कथा थिक, संगहि होस्टलमे रहि क' पढ़ैत एकटा छात्रक संघर्ष-कथा सेहो। घरसं महिनबारी खर्च आब'मे विलम्ब भेने कोनो छात्रक केहन स्थिति भ' सकैछ, तकर अद्भुत चित्रण अछि एहि कथामे। कथाक छोट-छोट तत्व आ क्षणकें बहुत महीनीसं वर्णित कयल गेल अछि। जेबीमे पाइ नहि रहने चाहक दोकान परक स्थिति आ मेसक बकियौता भ' गेने आन-आन छात्र सभकें भोजन क' घुरि गेलाक बाद भोजन कर' जायब। आदि-आदि। कथाक अंतमे ओ नायक एकटा बाट बनबैत अछि अपना लेल। एकटा प्रेसबला बहुत दिनसं प्रूफ देख' कहैत रहैत छलैक, मुदा ओ गछैत नहि छल। आंखिक इलाजक बाद ओकर काज ओ करत, से सोचय। मुदा, नहि। ओकरा बुझयलैक जे आंखि देखयबासं बेसी महत्वपूर्ण प्रूफ पढ़ब थिक। प्रूफ देखलासं ओकरा नियमित पाइ भेटैत रहतैक। ई कथा संवेदनशील लोककें उद्वेलित करैत छैक। 
 
एहने एकटा कथा अछि 'फट्टौन'। एहि कथाक विषय-वस्तु सेहो अभावेक गीत सन अछि। मुदा, एकर प्रस्तुतीकरण गस्सल आ मर्मस्पर्शी अछि।
 
एहि संग्रहक आनो-आन कथा सभ जेना- 'उत्तेजना, अपनैती, एकरसता, सुल्फा, पौडर, आ शीर्षक कथा अथ चैम्बर कथा' आदिमे हमरा सभक चिन्हल-जानल पात्र-चरित्र सेहो देखबामे अबैत अछि, ओकर जीवनानुभूति, संयोग-वियोग आ हंसब-बाजब सेहो अछि। ई पात्र सभ पाठककें अपन कात-करोटक पात्र बुझयतनि आ तें एहि पात्र सभक कारणें पाठक कथा सभसं जुड़ल रहताह। कथा पढ़ने अपने अनुभव करब जे कथाकार आम आदमीक कतेक लगक लोक छथि, आम लोकक दुख-सुख, राग-विराग, हर्ष-पीड़ा, सोहर-समदाउनकें संवेदनाक संग देखैत छथि, गुनैत छथि आ कथाक विषय बनबैत छथि। हिनक कथा सभमे  समसामयिक, वैचारिक आ यथार्थक संदर्भ मुख्य रूपसं देखाइत अछि। मानव मूल्यक ताकाहेरी, समाजक बदलैत स्वरूपक चित्रण आ परिवर्तनजन्य नीक-बेजायसं उपजल मानसिक अन्तर्द्वन्द्वक सटीक प्रस्तुति भेल अछि। केदार भाइक कथा सभमे रेखांकित करबा योग्य इहो बात अछि जे हिनक कथा मूलत: आ विशेषत: सामाजिक पर्यवेक्षण करबाक आ मानवीय तथ्य आ संवेदना धरि पहुँचबाक प्रयास करैत अछि।

एहि संग्रहमे संग्रहित कथा आकारमे सामान्य सन अछि। किछु कथा ओहूसं छोट, मुदा शैल्पिक दृष्टिएं लघुकथा नहि। पूर्ण कथा अछि। एतेक छोट आकारमे कथा लिखब एकटा चैलेंज होइत छैक। जेना- कथामे वर्णनात्मकताक निर्वहन, ओकर परिवेशक निर्माण, दृश्य-बंध, कथा-वस्तुक समुचित प्रसार, भाषा, संवाद, आदि। एकर सभक समायोजन चैलेंज होइत छैक आ ताहिमे कथाकार सफल छथि।

केदार भाइ कथा लिखलनि, कविता लिखैत छथि, अनुवाद खूब करैत छथि, सम्पादन आ प्रकाशन सेहो तहिना। खूबे। ई क्रम आब ततेक भकरार भ' गेल अछि जे कथेतर गद्य आ संस्मरण सेहो ओही गति आ ऊर्जासं लिखि रहल छथि। कार्यक्रम-संयोजन आ व्यवस्थापनक व्यस्तताक संग उक्त काज सभ समान रूपें करैत छथि, जे ककरो लेल सेहन्ताक विषय भ' सकैत अछि। मुदा...

मुदा...केदार भाइ कथा लिखब छोड़ि देलनि। ई संग्रह अद्यावधि हुनक लिखल प्राय: सभ कथा सभक संग्रह अछि। एकटा नीक कथाकारक नीक-नीक कथा सभसं साहित्यक पाठक वंचित रहि गेल अछि। एहि पोथीकें पाठकक असीम स्नेह भेटतैक, से विश्वास हमरा सहजहिं अछि। संगहि हमरे नहि, पाठकलोकनिकें सेहो भरोस रहतनि जे केदार भाइक आर नव-नव कथा पढ़बा लेल भेटतनि।

एहि कथा-संग्रहक प्रकाशनक अवसर पर हम आदरणीय केदार भाइकें शुभकामना आ बधाइ दैत छियनि।
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                          बेगूसराय/23/08/2025

नव डेग (भूमिका)

भूमिका 

नव डेग
(कंचना झाक कथा-संग्रह 'नव भोर'क भूमिका)
प्रदीप बिहारी

हमरा हाथमे कंचना झाक कथा संग्रह 'नव भोर'क पाण्डुलिपि पी डी एफ रूपमे अछि। एहि नामसं हमर परिचिति जनकपुरक एकटा साहित्यिक-सांस्कृतिक समारोहमे भेल छल। ओहिठाम ई अनुवादक सत्रक विचार गोष्ठीमे आयल रहथि। संयोगवश ओहि गोष्ठीमे हमहूं रही। तें प्रथम दृष्ट्या हम हिनका अनुवादक बुझलियनि। मंचसं परिचयो यैह देल गेल छल जे ई नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानमे अनुवाद समितिक सदस्य छथि।

हम अपन अनुवाद पत्रिका 'अंतरंग' लेल हिनकासं नेपालीक किछु रचना सभक हिंदी अनुवाद लेल सहयोग लेल आ ओहि रचना सभकें पत्रिकामे प्रकाशितो कयल।

कहियोकाल साहित्यिक गपसप होइत रहैत छल आ ताही क्रममे हमरा हिनक कथाकार रूपसं परिचय भेल, तं मोन आनन्दित भेल। भेल जे नेपालमे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा भरोस आर जागल। जें कि नेपाल हमर आरंभिक कार्यक्षेत्र रहल अछि आ आब सम्बन्ध-क्षेत्रमे‌ सेहो अछि, तें नेपालमे होइत साहित्यिक गतिविधि (मैथिली आ नेपाली) आकर्षित करैत अछि आ तोष दैत अछि। तें हिनक कथा-संग्रहक पी डी एफ पाण्डुलिपि देखि मोन हुलसि गेल।

'नव भोर'मे सतरह टा कथा संग्रहित अछि आ सतरहो विभिन्न भाव-भूमिक कथा अछि। कथाकारक निर्दोष प्रयास अछि। कथा सभ पढ़ने पाठककें लगतनि जे कथाकार एहि बातक ध्यान रखलनि अछि आ प्रयास सेहो कयलनि अछि जे कथामे कोनो पासंग नहि रहि जाइक। संतुलित रहय। बैलेंस्ड।
 
संग्रहक पहिले कथा 'नव भोर' जे पोथीक नाम सेहो अछि, मे समयक संग परिवर्तनक गप क' एकटा सकारात्मक गप राखलनि अछि।  'अनुराधा' नामक उपन्यास, जे पुरस्कृत होइछ, केर पात्र अनुराधाक बहन्ने स्त्री-विमर्शक गप कहैत छथि। दाम्पत्य जखन मात्र औपचारिकता लाग' लगैत छैक, ओहिमे प्रेम आ मित्रता तकनहुं नहि भेटैत छैक, तखन अनुराधा अपना लेल बाट बनबैत अछि। स्त्री-स्वातंत्र्यक बात कहबाक प्रयास कयल गेल अछि।
 
कंचना झा जीक एहि संग्रहक बेसी कथा स्त्री-विमर्शकें नोतैत अछि। मिथिलाक स्त्रीक दशा आ स्त्रीक संग होइत पारम्परित व्यवहारक चित्रण आ ताहि परिस्थितिसं स्त्रीकें बहार क' स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान करबाक बात ई अपन कथा मे करैत छथि। 
 
एकटा कथा अछि- गंतव्य। ई परित्यक्त दम्पतिक कथा अछि जे विवाहक बाद वा ई कही जे सम्बन्ध विच्छेदक पनरह बरखक बाद एक यात्रा क्रममे एक-दोसराकें देखैत अछि। दुनू चाह पीबा लेल जाइत अछि। चाहक दोकान पर बैसल नायिका रश्मिकें अतीत मोन पड़ैत छैक। मोन पड़ैत छैक जे कोना ओकर इच्छाक विरुद्ध विवाह भ' गेल रहैक। आ वर ओकरामे अति आधुनिका तकैत रहल आ तिरस्कृत क' एक दिन केबाड़ बन्न क' बहरा गेल। समयक संग नायिका अपन फराक आ स्वतंत्र जीवनक बाट बनबैत अछि। सफल होइत अछि, प्रतिष्ठा भेटैत छैक। नायक एकबेर ओकरा पुन: संग रहि नव जीवन शुरू करबाक आग्रह करैत छैक, मुदा नायिका तकरा नकारि जाइछ। नायिकाक निर्णय ओकर दृढ़ता कें बतबैत छैक संगहि स्त्रीक वैचारिक उच्चता सेहो देखबैत छैक।

एही क्रममे एकटा कथा 'अंतिम इच्छा' कें सेहो देखल जा सकैत अछि। मरणासन्न पत्नीक अंतिम इच्छा जे ओकर पति ओकरा मुइलाक बाद बियाह क' लिअए आ ताही लेल ओ पतिसं वचन लेब' चाहैत अछि। जीवनक उत्तरार्द्धेमे पति-पत्नीकें एक-दोसराक सभसं बेसी खगता होइत छैक। एक-दोसराक सहयोगी होइत अछि। ओहि समय धियापुता अपन-अपन काज-रोजगारमे लागि जाइछ। पत्नीकें बुझल छैक जे ओ नहि बांचति, तें पतिसं वचन लेब' चाहैत अछि जे ओ ओकरा बाद बियाह क' लिअय। नायिका उदाहरण दैत छैक जे एक गोटें कमे बयसमे विधवा भ' गेलि। तकर बाद ककरोसं बतिएबो करय तं समाज दोसरे उधबा उठा दैक। लांछने लगाब' लगैक। तेहने डर नायिकाकें अपन पतिक मादे सेहो छैक। दोसर बात ओ चाहैत अछि जे ओकर पति ओकरा बाद सुरक्षित आ निष्कलंक जीचन जीबय। पतिक प्रति प्रेमकें सेहो ई बात प्रदर्शित करैछ। कथाक अंतमे ओहि दम्पतिक दुनू संतान मायकें भरोस दैत अछि जे हुनक अंतिम इच्छाक पूर्ति होयतनि।

एहिना हिनक कथा 'सखी' एकटा फराक आयाम प्रस्तुत करैत अछि। ओ ई जे पतिक पूर्व प्रेमिकाक नाम पत्र अछि ई कथा। बियाहक बादो नायिकाक पतिक मोनमे ओकर पूर्व प्रेमिके छैक, तें पत्नी ओकरा लेल वस्तु आ निंघेस सन छैक। नायिका अपन दुख ओहि महिला कें कहैछ। एकठाम चैलेंज सेहो दैछ जे हम अपन पति कें अहां लग पठा दैत छी, जं हिम्मति अछि तं अहां दुनू गोटें रहू। मुदा, व्हाट्स एप आ मैसेंजर पर जेहन-जेहन गपसप करैत छी, से नहि करू। पति आ बच्चा देखत तं की होयत?

कथाक अंत बड़ मार्मिक ढंगे होइत अछि। नायिका ओहि महिला (पतिक प्रेमिका)कें कहैत अछि जे ओ ओकर पतिसं भेंट कर' चाहैत अछि आ पूछ' चाहैत अछि जे ओहो एकरे सन वस्तु बनि क' नहि ने रहि गेल अछि।

आत्मालापक शिल्पमे लिखल कथा अछि 'बैमनमा'। प्रसूतिएमे छोड़ि क' अनचोके पड़ाएल पतिक स्मरणक संग पत्नीक संघर्षक कथा कहल गेल अछि। पचीस बरखक बाद पतिक आयब। पत्नी द्वारा दंडस्वरूप ओकरा अस्वीकार कयल जायब कथाक क्लाइमेक्स बनैत अछि। पतिकें घुरि गेने ई निश्चिन्तताक बोध होयब जे आब दु:स्वप्न सं भेटल, एक प्रकारक मोहभंग छैक। मोनक कोनमे जं कनियो प्रेम रहल हेतैक तं ओकर अवसानक बात अंतमे देखाइत अछि। 

एहि कथाक वर्णनात्मकता पाठककें बान्हबाक प्रयास करैत छैक, मुदा कथाकें जल्दीए अपन क्लाइमेक्स पर चलि गेलाक कारण प्रभाव कने कम भ' जाइत छैक। ई कथा विस्तार मंगैत छैक। 

संयुक्त परिवारक टुटनक एकटा कथा, जे पाठककें चिन्ता आ चिन्तन लेल वाध्य करतनि, ओ अछि- 'अलग चुल्हा'। ओहुना वर्तमान समय आ समाजक संरचनामे 'न्यूक्लियर फैमिली'क चकनसारि पसरि गेल छैक। एकर लाभ-हानि लोक भोगैए, मुदा एखनुक इनारमे एत्तेक ने भांग घोराएक छैक जे मुट्ठी भरि खुशीक लेल ढाकी भरि अवसाद लोककें भारी नहि लगैत छैक। से, पारिवारिक बटवारा सन विषय ल' क' लिखल कथा 'अलग चुल्हा' आम परिवारक कथा बनि सकल अछि। कथा कहैत अछि जे व्यक्तिगत पहिचानक अहंकार केहनो सुगठित परिवारकें खण्ड-खण्ड क' दैत छैक। कथामे बड़ महीनीसं एकटा चिन्ता देखाएल गेल अछि, ओ ई जे रातिसं चुल्हा अलग भेलाक बाद आर सभक नैहरक बर्तन-बासन तं ओकरा सभसं काज लागि जयतैक, मुदा राघोपुरवालीक? हुनक अवस्था बहुत नीक नहि छनि। कमलपुरवाली कनियाक बच्चा सभ छोट छैक, ओकरा बुते भानस-भात कयल कोना होयतैक? ओकर बच्चा भुखले रहु जयतै? आ, खण्डित होइत घरक डरीड़ पर ठाढ़ि घरक मुख्य महिला लक्ष्मीक मोनमे ई चिन्ता उभरैत छैक। ओ नहि चाहैत अछि जे बटवारा होइक, मुदा कथाकार कहैत छथि जे एहिबेर ओकरो हाथसं मामिला बहरा गेल छैक। कथा पठनीय अछि।

एहि संग्रहक आन-आन कथा जेना 'सिनेहक डोर', 'मात्र एकटा गलती', 'भरदुतिया', 'हमर परदेसिया' आदि कथा सभ लोक आ समाजक चिन्ता करैत अछि। अपन सहज अभिव्यक्तिक कारणें पाठकक मोनमे जगह बनयबामे सफल होयबाक गुण एहि कथा सभमे भेटैत अछि।

एकटा बात देखल जे एहि संग्रहक कथा सभमे बहुतो कथाकें समाप्त करबा लेल कथाकार हड़बड़ीमे बुझाइ छथि। कथा सभ अपन बात कहि दैत छैक, मुदा कथाक विस्तारसं जे 'किस्सागोई'क रस बहराइत छैक, से कने कम लगैत छैक। कंचना जीक ई पहिल संग्रह छनि। अगिला संग्रहक कथा सभमे एहि बात पर अबस्से गंभीरतापूर्वक विचार करतीह। ओना पहिल संग्रहक कथा झुझुआन कतहुसं नहि छैक, हिनक भविष्यक कथाकारक मजगूत न्यों छैक।
 
कंचना झाक कथा-भूमि शहर आ महानगर बहुत कम अछि। मिथिलाक गाम बेसी अछि। मिथिलाक बदलैत लोक अछि। चूल्हि-चिनवार अछि। मानवीय संवेदना अछि। दाम्पत्य जीवनक त्रासदी अछि, प्रेम सेहो। स्त्रीक स्वतंत्रता आ आत्मनिर्भरता अछि। हिनक कथा एहन स्त्री, जकरा बाछी जकां गरदामी लगा क' ककरो हाथमे थम्हा देल जाइत छैक, केर संग ठाढ़ भ' एहन प्रचलनक विरोध करैत अछि। कथा सभमे बदलैत समयक अनुसार नव पीढ़ीक उदारता सेहो छैक। माता-पिताक एनवर्सरी मनयबामे व्यस्त धियापुता छैक। माने पुरातन आ अधुनातन मिथिला हिनक कथामे अछि। सुखद ई जे मिथिला अछि, बदलैत मिथिलाक स्वरूप अछि आ मैथिली कथामे मिथिलाक होयब बड़ी टा बात अछि।

कंचना झा जी बहुआयामी प्रतिभाक धनिक थिकीह। हिनक बायोडाटा जे हिनक विभिन्न क्षेत्रक काज सभक झलकी देखबैत अछि, सं साहित्य आ समाजक अपेक्षा हिनकासं सहजहिं बढ़ि जाइत छैक। मैथिली कथाक क्षेत्रमे सेहो पाठक हिनका दिस उमेदक नजरिए तकैत रहताह, कारण अपन पहिले कथा-संग्रहमे ई अपन दृष्टि फड़िच्छ रखने छथि। आगां जतेक बेसी लिखतीह, शिल्प मंजाइत रहतनि। 

कंचना झा जीक एहि कथा-संग्रह 'नव भोर'कें हम  'नव डेग' मानैत छी। एहि पोथीक प्रकाशन पर हम हिनका शुभकामना आ बधाइ दैत छियनि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे हिनक डेग बढ़ैत रहनि।
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                      बेगूसराय/31 अगस्त 2025

अपन हिस्साक काज करैत कथाकार (मैथिली आलेख)

आलेख

अपन हिस्साक काज करैत कथाकार
प्रदीप बिहारी

काल्हि जेठ बालक फोन पर जिज्ञासा कयलनि जे पापा की सभ क' रहल छी? हमरा प्रसन्नता भेल, अचरज सेहो। भेल जे आइ ओ आराममे छथि। कार्यालयी कोनो तनाओ नहि छनि।‌ से एहि दुआरे जे अनदिना हुनकर हालचाल पुछबाक ढंग दोसर रहैत छनि। अनदिना पूछता- नीके छी ने पापा। मोन ठीक अछि ने। दवाइ समय पर लै छी ने। आदि, आदि। मुदा, आइ जखन ई पुछलक जे की सभ क' रहल छी, तं हुलसि गेलहुं। से एहि दुआरे जे हुनका अपन साहित्यिक आ पत्रकारिताक आरंभक दिन मोन पड़ल होयतनि मने, जे वर्तमान नोकरीमे प्राय: पूर्णतः छुटि गेल छैक।

हम पुत्रक खुशीक गौरव बोधमे मग्न भ' गेलहुं। मुदा ओ बेसी काल रह' नहि देलनि। कहलनि- सोचैत छलहुं जे फेर स' पढ़ब-लिखब शुरू करी। नोकरीक व्यस्तता त' रहबे करतै। जेना नोकरीमे अपन हिस्साक काज करैत छी, तहिना साहित्यो फेर स' शुरू करी। पहिने पढ़ी, तकर बाद...। 

मुदा, एखनि हम आदरणीय विभूति आनन्दक टटका संग्रह 'कथा '24' मे संकलित कथा सभ पढ़ि रहल छी, जे प्रकाशन-प्रक्रियामे अछि। कथाकार विभूति आनन्द मैथिली कथाक जाहि शिखर पर छथि, ओहिठाम हुनक कथाक भाषा पर गप करब उचित नहि लगैए। कारण, कथा-भाषा'क अपन जे 'स्टाइल' ओ कायम क' लेने छथि, तकर निर्वहन हुनक कथामे होयबे करतनि। 'स्टाइल' जत' छनि, ओत' सं आगुए बढ़तनि। पाछां अयबाक स्थिति अयबाक संभावना स्वीकारल नहि जा सकैछ। कथाक शिल्पक मादे ई बात नहि कहल जा सकैछ। कथाकारक शिल्प बदलैत रहैत छैक आ बदलैत रहक चाही। ई जरुरियो छैक।

रहल गप कथ्यक। तं हिनका सन वरिष्ठ कथाकारसं ई उमेद तं सहजहि रहैत छैक जे कथाक कथ्य टटका होनि, समयोचित होनि आ समाजमे घुलल-मिलल होनि। कथा निष्पक्ष होनि। आन्हरकें आन्हर आ कुईर कें कुईर कहैत होनि।

जेनाकि हिनक कथा-संग्रह 'कथा '23' मे हम हिनक कथाक विकासक ग्राफ पर चर्च कहने रही, हिनक कथा-दृष्टि आ कथाक 'प्लाट'क चयन पर गप कयने रही। मुदा, एखनि हम गप कर' चाहब जे सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक बदलावक संग विभूति भाइ कोना अपन कथाकारकें जोगा क' आ सक्रिय रखने छथि। वैश्विक चबूतरा पर पटकायल सीसा जकां व्यक्ति आ समाज कोना खण्ड-खण्ड भेल अछि। तकर किछु खण्ड अपन चमकी बचयबा लेल कोना उपलायल अछि, किछु खण्ड अपन अस्तित्व लेल कोना‌ संघर्षरत अछि? तं, ताहि लेल एहि संग्रहक कथा सभकें पढ़ब आवश्यक‌ होयत। आ कथा पढ़लाक बाद बुझना जायत जे कथाकार 'नवता'क जबर्दस्त आग्रही छथि। समयकें चिन्हबाक सेहो।

से एहि संग्रहक पहिल कथा 'कोखि'मे भेटत जे ओकर नायिका धीया-पुताकें नमहर भेलाक बाद अपना लेल रोजगार शुरू करैए। रोजगार टाका-पाइ लेल टा नहि, ताहि लेल कमौआ पति छथिने, समय काट' लेल, जीवनक अनुभव लेबा लेल सेहो शुरू करैए। आ एकदिन एहन अबैत छैक जे ओकर ब'र ओकरासं पाकेट खर्च लेल खुदरा पाइ मंगैत छैक। पति कें खुदरा पाइ दैत कालक नायिकाक गौरव बोध देखितहि बनैत छैक। कथामे ओकर प्रतिस्थापन सेहो बेजोड़ ढंग सं भेलैक अछि। नायिकाक अनुभवक मनोवैज्ञानिक प्रस्फुटन सेहो कथामे आयल छैक, तकरा पकड़ि सकबाक अपेक्षा वरीय कथाकारसं पाठकक होइत छैक आ ताहि मामिलामे पाठक निराश नहि भेल अछि।

हम 'नवता'क गप कयलहुं। ओकरा‌ एहि तरहें बुझल जा सकैत अछि आ अपनेसभ बुझितहुं होयब जे समाज आ संस्कृतिक संदर्भमे ई एकटा बौद्धिक आन्दोलन सेहो छैक, जाहिमे परम्परागत विचार, सामाजिक बनौट आ धार्मिक अवधारणा सभसं फराक एकटा नव दृष्टिक प्रस्तुति होइत छैक। नव विचार, लोकक आत्म अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत परिचिति आ स्वतंत्र विचार केन्द्रमे रहैत छैक।
 
वैश्वीकरण आ डिजिटलाइजेशनक बाद एहि 'नवता'क अवधारणाक बिस्फोट समाजमे कोन प्रकारें भेलैक अछि, तकरा कुशलतापूर्वक कथाकार एहि संग्रहक कथा सभमे पकड़लनि अछि। ओकर सकारात्मक आ नकारात्मक, दुनू स्थिति आ प्रभावकें उकेरलनि अछि। समाज कें सावधान कयलनि अछि आ आत्म-सम्मानक संग व्यक्तिगत स्वतंत्रताक रक्षाक लेल अपन पात्रक संग ठाढ़ सेहो भेलाह अछि। एहि संदर्भमे एकटा कथा 'उनटन' देखल जा सकैत अछि।

'उनटन' कथामे कथाकार बड़का साहस देखौलनि अछि। व्यक्तिगत आत्म-सम्मान आ स्वतंत्र अस्तित्वक कुप्रभावक प्राय: अन्तिम नियताप्तिक रूपमे एहि कथामे  सहोदर आ सहोदराक आत्मीय आ दैहिक सम्बन्धकें देखाएल गेल छैक। कोटामे तैयारी कर' गेल दुनू भाय-बहिन जखन दू-तीन बर्ख घर नहि घुरैत छैक आ माय फोन क' बेटीकें कहैत छैक जे ओ सभ आब ओकर बियाह क' देब' चाहैत छथि। बेटी कोनो स्पष्ट जवाब नहि दैत छैक। तखन ओ भायक समाचार पुछैत छैक। मुदा ताहि समय एकटा बच्चाकें कानबाक स्वर सुनाइत छैक। माय ओहि स्वरक मादे पुछैत छैक, तं बेटा कहैत छैक- 'तोहर पोता कनैत छौ।'

'उनटन' कथासं कोनो संवेदनशील लोकक दिमाग झनझना सकैत छैक। मुदा, एकर कथानक सत्य छैक। आधुनिकता आ स्वतंत्रताक चकमकीमे जीबैत आजुक समाजमे सम्बन्धकें बुकनी-बुकनी करैत कतोक एहन घटना सभ भ' रहल छैक, जे बरोबरि सुनबा-पढ़बामे अबैत अछि। एहन-एहन घटना आब एत्तेक ने संख्यामे होम' लागल छैक जे सामान्य रूपें लोकक संवेदनाकें भोथ क' रहल छैक। एहि यथार्थ कें कथाक विषय बना क' समाजकें चेतयबाक अपन दायित्वक निर्वाह कयलनि अछि कथाकार।

विभूति आनन्दक कथा सभक एकटा महत्वपूर्ण उपांग बनि गेल अछि - मोबाइल। से, प्राय: एहि दुआरे जे मोबाइल एखनि समाजेक महत्वपूर्ण उपांग बनि गेल अछि आ ओहो समाजेक लोक छथि, समाजेक कथा लिखैत छथि। तें अपने सभ देखब से हिनक कथामे मोबाइलक विभिन्न ढंगे उपयोग भेल अछि। आब हिनक बेसी संवाद-कथामे संवादक माध्यम मोबाइल चैटिंग होइए। 

उपकरण आ ओकर ‌उपयोगक प्रभावसं उपजल एकटा‌ कथा अछि- 'जंगल'। आरंभमे ई कथा प्रेम-कथा जकां शुरू होइए। मुदा, मोबाइल कौल पर दू टा पुरुष पात्रक गपक संग कथा आगां बढ़ितहिं प्रेम सम्बन्धी आजुक युवा पीढ़ीक सोच आ उछृंखलताक सोचक कथा बनि जाइत अछि। प्रेम-कथा नहि, 'रिलेसनशिप-कथा' बनि जाइत अछि। कथा पढ़ने लागत जे आजुक ई युवा वर्ग प्रेममे देह कें प्रमुखतासं देख' लगलैए। संवेदना, आदर आ विश्वासकें कतहु भसिया तं ने देलकैए। बहुलांशक यैह हाल छैक, एहने सोच छैक। पांच साल सं एक-दोसराक संग 'रिलेशन'मे रहैए आ 'रिलेशन ब्रेक' कर'मे वा 'मूव औन' कर'मे पांचो मिनट नहि लगबैए। फेर घंटे-दू घंटाक बाद दोसराक संग 'रिलेशन' भ' जाइत छैक। सेहो एहि सूचनाक संग जे ओकर 'एक्स' छलैक, आब नहि छैक।' 

ई कथा पढ़ैत काल पाठककें लगतनि जे की पढ़ि रहल छी? मुदा नहि, अपने यथार्थ पढ़ि रहल छी। बदलैत समयक सोपान पढ़ि रहल छी, जाहिमे सम्बन्ध मात्र सिरही टा रहि गेलैए। हं, ई कथा पढ़ैत काल कथाकारक मेहनति सेहो नजरि आओत। जाहि बयसक नायक-नायिका सभ कथामे आयल अछि, तकर मनोदशा, भाषा आ सोचमे अपन बयसक उत्तरार्द्ध मे काया-प्रवेश करबामे कतेक मेहनति लागल होयतनि कथाकारक, सेहो नजरि आओत। ओकर सभक भाषा आ आधुनिक 'टर्म' चुनबामे कथाकारक कौशल सेहो नजरि आओत। बहुत 'टर्म' पहिले बेर सुनब, ताहि लेल कथाकारक लेल मुंहमे धन्यवाद सेहो उचरत।

हम जेहन कथा सभक बानगी देने जा रहल छी, ताहि पाठक सभकें लगतनि जे एहि संग्रहमे एहने कथा सभ होयतैक। मुदा नहि। एहि संग्रहमे सभ रंगक आ सभ बयसक लोकक कथा छैक। कारण, समय एकरंगाह नहि होइत छैक। बदलैत रहैत छैक। आ, बदलैत समयके अपन कथाक विषय बनायब विभूति आनन्दक स्वभाव बनि गेल छनि। 

सन् दू हजार चौबीसमे बिहारमे एकटा प्रशासनिक घटना घटलैक - 'सर्वे'। ओना 'सर्वे' कोनो नव घटना नहि छैक, एकटा प्रक्रिया छैक, जे चलैत आबि रहल छैक। मुदा उल्लेखित वर्षक सर्वे किछु विशेष रहैक। तें एहि पर सेहो साहित्यकार लोकनि अपन-अपन कलम उठौलनि। हिनको सर्वे पर केन्द्रित दू टा कथा एहि संग्रहमे भेटत - 'सर्वे भवन्तु सुखमय...' आ 'सर्वे सन्तु निरामया:...'। ई दुनू कथा सरकारी कुव्यवस्था, प्रशासनिक विसंगति आ पारिवारिक-सामाजिक वैमनस्यताकें उजागर करैत अछि, पठनीय आ विचारणीय सेहो अछि।।

तहिना जीवन आ जीबाक प्रति उत्साह आ जीजिविषाक कथा अछि- 'मॉर्निंग फेस'। आ, बियाहक कतोक बरखक बाद कालेजक प्रेमकें मोन पाड़ैत कथा अछि- 'हम गंगा भ' बहि जाइ...'। अद्भुत।

एहि संग्रहमे कथाकार राजनीतिक यथार्थकें सेहो दू टा कथाक माध्यमे पाठकक समक्ष रखलनि अछि। ओ दुनू कथा थिक- ‘वसुधा’ आ ‘स्वप्नभंग’। फराक-फराक विचारधारा बला राजनीतिक दल सभ, जे बाहरसँ जतेक मजगूत, सैद्धांतिक आ उदार नजरि अबैत अछि, से सभ भीतरसँ कतेक कलुषित आ फोकला अछि, ओकर नेता आ कार्यकर्ता सभ व्यक्तिगत स्वार्थक लेल कतेक छद्म करैत अछि, ई बात गंभीरतापूर्वक दुनू कथामे आयल अछि।

एहि संग्रहमे कथा-वस्तुक चयनमे एकटा बात देखऽ मे अबैत अछि जे कथाकार विभिन्न आयामक विषयकें अपन कथामे आनलनि अछि। जेना, एकटा कथा अछि- खेल। मैथिल समाजमे खेल एहि प्राथमिकतामे नहि रहल अछि जे अभिभावक अपन नेनाकें ओहिमे कैरियर बनयबा लेल प्रोत्साहित करथि। आब नगरमे रहैत मैथिल एहि दिशामे साकांक्ष भेलाह अछि आ उदार सेहो। मुदा पहिने से विरले देखल जाइत छल। ओना मिथिलामे विभिन्न प्रकारक खेलक प्रचलन रहल अछि, जकर चर्च कथामे भेल अछि। मुदा ओ खेल प्राथमिकतामे विरले रहल अछि। एहना स्थितिमे एहि कथा ‘खेल’क अभिभावक पात्रा सुशांत अपन पुत्रकें ओकर रुचिक अनुसार शतरंजक नेशनल खेलाड़ी बनाबऽ लेल बेटाक संग संघर्षरत अछि, से नीक समाद दैत अछि।

पारम्परिक रूपसं हटि नव प्रयोगक संग जीबाक ढंगमे परिवर्तन आ ओकर जटिलताकें चित्रित करबाक आग्रही कथाकार विभूति आनन्दक एहू पोथीक कथा सभ हिनक कथा-लेखनक दृष्टिबद्धताक बानगी बनि प्रस्तुत भेल अछि।

...आ, एतेक कहैत हमरा फेर पुत्रक गप मोन पड़ैए जे ओ आब फेरसं पोथी पढ़ब शरू करता। हुनकर ई गप हमरा पठनीयताक संकट दिस ल' जाइत अछि। भारतीय आन-आन भाषाक संग मैथिलीमे सेहो ई संकट छैक। मैथिलीमे कने बेसीए। पत्र-पत्रिकाक अभावे छैक। पढ़निहार कत'? आब फेसबुको पर लोक कथा नहिए सन पढ़ैत छथि। तर्जनीक उपयोग 'लाइक' पर क' लैत छथि। माने ई जे कथाकार बुझथि जे हुनक कथा देखल गेलनि। मुदा, ताहि सं की? कथाकार एत्तेक लिखि रहल छथि, से....

एहि आशयक गप सेहो बेटाकें कहलियनि। तं कहलनि- 'अहांक काज लिखब अछि। अपन समयकें लिखि क' समाज लेल अंकित करब। समय औतैक आ पढ़निहार सेहो। जं लिखले नहि रहतै त' की भेटतै ओकरा? दोसर बात ई जे... 

...दोसर बात ई जे...जख‌न ताकल जयतै त' सभक हिस्साक काज ताकल जयतै, 'कूरी' लगाओल जयतै। अहांक लिखले नहि रहत, त' की लागत?'

बेटाक गप हमरा काल्हि बड़‌ नीक लागल छल।

ई गप आइयो नीक लागि रहल अछि आ तें आदरणीय विभूति भाइक विशाल कथा-भंडारकें देखैत बुझाइए जे आब' बला समयमे हिनक साहित्यिक काजक हिस्सामे 'कूड़ी' नहि, 'पथार' लगतनि।

जाहि गतिएं ई लिखि रहल छथि, ओ गति अक्षुण्ण रहनि आ अपन हिस्साक काज एही इमानदारीसं करैत रहथि। शुभकामना।
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