चूड़ी
प्रदीप बिहारी
बहुत दिनक बाद दास बाबू मोन पड़ल रहथि। मोन पड़ितहिं आंगुर मोबाइल पर हुनकर नम्मर ताक' लागल। नम्मर तं भेटि गेल, मुदा एकटा धुकधुकी रहय जे कत' छथि? कोना छथि? केहन छनि स्वास्थ्य? गप भेला आठ सालसं बेसी भ' गेल अछि।
आठ साल पहिने हम भागलपुरमे पदस्थापित रही। हुनकर मेडिकल बिल हमरा आफिसमे आयल रहनि। ओ फोन कयने रहथि, "बौआ हौ!"
आवाज कने अपरिचित सन लागल रहय, तें हम कने अनभुआर सन उतारा देने रहियनि। तखन सकुचाइत ओ हिन्दीमे पुछने रहथि, "संदीप कुमार बजै छी?"
हम जखन हं कहलियनि तं अपन मूल लयमे आबि गेलाह, "हमरा नहि चिन्हलह? हम दास भैया। कैम्पस ब्रांच बला।"
हमर पूरा स्मृति जगजियार भ' गेल। संगहि रही दुनू गोटें। हमरासं नओ साल जेठ, मुदा गप आ हंसी-ठट्ठा संगतुरिया जकां करथि। स्नेह जेठ भाइ सन करथि। तें हम भैया कहैत रहियनि आ ओ बौआ।
दास भैया बाजि रहल छलाह, "से बुझलहक बौआ! हमरा पता चलल जे तों खगड़िया स' भागलपुर क्षेत्रीय कार्यालय आबि गेलह, त' करेज सूपा नाहित भ' गेल। नीके छह ने?"
हम अपन हालचाल कहलियनि। बालबच्चा द' पुछलनि। पत्नी द' सेहो। हमहूं पुछलियनि। दुनू दिससं पारिवारिक स्थिति अपडेट भेल रहय। ओ बाजल रहथि, "सैह देखहक। अपना सभ एक्के शहर मे एहि क' एत्ते अनभुआर रहियै। नोकरीक बदली आ व्यस्तता जे ने करय। घिर्नी बनौने रहै छै। खैर, आब तइ स' निश्चिंत छिअह।"
"रिटायर भ' गेलियै?" हम पुछलियनि।
"डेढ़ बरख भ' गेलै। आब त' मास्टरनियो रिटायर करथुन। दू साल बाद।"
"भौजी कें मास्टरनी कहब नहि छोड़लियनि। एखनि कोन स्कूल मे छथिन?"
"गामे मे।"
"गाम कहै छियै। अहांक गामो तं शहरे मे अछि।"
"से जे कहक।" दास भैया बजलाह, "एकटा काज रहै। हमर मेडिकल बिल तोरे आफिस मे गेल छह। कने देखियहक। फेरो जाइ के छै मुम्बै।"
"अच्छा। पता करै छी। जल्दीए पठबा देब।" हम बजलहुं, "मुम्बै किए जा रहल छी? घूम'?"
"नहि हौ बौआ! डाक्टर स' देखाब'। हमरा खखहा बीमारी ध' लेने छह ने। मुम्बैए स' इलाज चलै छह ने।"
"डकहा?" हम पुछलहुं।
दास भैया अपन पहिलुके स्वभाव सन हंसलनि। बजलाह, "खखहा नहि बुझलहक? कैंसर हौ। गामघर मे डकहे कहै छै। किछ ठाम पपियहो बीमारी कहै छै।"
हम सन्न रहि गेलहुं। चुप। कने कालक बाद भैये टोकलनि, "की भेलह बौआ! चिन्ता नहि करह। ठीक छियह। बीमारी के काज भेनाइ छै, हमर काज भोगनाइ छै। से मस्ती स' भोगै छियह।" आ पुन: अपन स्वाभाविक हंसी हंसलनि।
दास भैयाकें आश्वस्त करैत हम फोन रखने रही। हठात् दास भैयाक कतोक गप स्मरण होम' लागल। ओ गपसप कर'मे सुराह लोक रहथि। एखनो होयबे करताह। कैंपस ब्रांचक एकटा घटना मोन पड़ि गेल। ताहि समय भौजी कैंपस ब्रांचक कातेमे करीब एक किलोमीटरक दूरी परक मिडिल स्कूल मे रहथिन। दुनू गोटें संगहि स्कूटरसं आबथि। एकदिन भेलैक एहन जे...
दुनू गोटें घरसं बहरयलाह। भौजी किछु बिसरि गेल रहथिन से दलान परसं घुरि क' आंगन गेलीह। भैयाकें बुझयलनि जे भौजी स्कूटर पर बैसि गेलखिन अछि। ओ विदा भ' गेलाह आ अपन धुनमे बतियाइत रहलाह। हुनका लगलनि जे भौजी गपक उतारा द' रहल छथिन। चर्याक अनुसार स्कूलक गेट पर भैया स्कूटर रोकलनि। भौजीकें उतर' धरि ठाढ़ रहलाह आ फेर बिदा भ' गेलाह। ताहि समय भैया कैश जमा काउण्टर पर काज करथि, तें समय पर अपन काउण्टर पर उपस्थित भ' जयबाक दबाव रहनि।
एम्हर भौजी आंगनसं बहरयलीह तं भैयाकें जाइत देखलनि। हाको देलखिन। मुदा, भैया तं अपन धुनमे...। के सुनैए? फोनक सुविधा ताहि समय नहि रहनि, तें कोनो संवाद नहि भेलनि।
प्राय: डेढ़ बजे भौजीक स्कूलक हेड मास्टरनी शाखामे अयलीह तं भैयाकें पुछलनि, "दास बाबू! मीना मैडम आइ छुट्टी मे छथिन? खबरियो ने केलखिन!"
भैयाक आंगुरमे किछु नोट फंसले रहि गेलनि। कनेकाल अवाक् रहलाह। हेड मास्टरनी फेर बजलीह, "अपनेओ आबै घड़ी कहि देने रहितियै त'...।"
तखन भैया बजलाह, "की कहितहुं? ओ त' स्कूल आयल छथि। हमहीं स्कूलक गेट पर उतारलियनिहें। स्कूल मे नहि छथिन?"
"रहितथिन त' हम झूठ कहितहुं!"
"तखन कत' गेलखिन? हम त' स्कूले पर उतारलियनिहें।"
"से अपने ने जनबै।"
भैया बेहाल। ओ उठलाह आ अपन काउण्टरमे ताला मारलनि। हमरा लग अयलाह आ कहलनि जे ककरो हुनका जगह पर बैसा दियैक। ओ भौजीकें ताक' जयताह।
भैया पसेने तर भ' गेल छलाह। कंठ सुखाय लगलनि। आन्तरिक व्यवस्था क' जखन हुनका भौजीकें ताक' विदा कयने रही तं कहलनि, "बौआ हौ! हमरा बुतें स्कूटर नहि चलतह। हमर करेज कंपैए।"
फेर एकगोटेकें भैयाक संग कयल गेल। सांझ धरि मूल बातक जनतब भेलैक जे भौजी कोना छुटि गेल छलीह। कहांदन तामसे भौजी किछु बाकी नहि रखलनि भैयाक।
घरमे धियापुता सभ एहन गलती फेर नजि होइक, तकर उपाय ताकलक। भौजीकें कहलक जे स्कूटर पर बैसलाक बाद ओ भैयाक कान्ह पर हाथ रखने रहथि, जाहिसं हुनका भौजीक उपस्थितिक आभास होइत रहतनि। मुदा, एहि लेल दुनू गोटेमे केओ तैयार नहि छलाह। भौजी कहलखिन जे ससुर-भैंसुर स' भरल गाममे ओ बरक कान्ह पर हाथ ध' नहि बैसतीह। गाम स' बहरयलाक बादो चिन्ह जानक लोक सभ त' भेटिते रहै छै। भैया कहलखिन जे भौजीक हाथ हुनक कान्ह पर रहने स्कूटर चलाएल नहि होयतनि। गुदगुदी लगतनि आ दुनू कोनो खत्तामे पड़ल रहताह। अंतत: जहिना जाथि, सैह रहलनि। भैया मुदा साकांक्ष रह' लगलाह।
ई बात शाखामे किछु दिन धरि ब्रेकिंग न्यूज बनल रहल। किछु सिनियर सभ एहि बातकें ल' क' विनोद सेहो करथि, मुदा भैया लेल धनि सन। ओ पहिने सन हंसैत-बजैत रहलाह। 'हर फिक्र को धुएं मे उड़ाता चला गया...' सन।
से दास भैया कैंसरसं पीड़ित छथि, ई बात हमरा मोनकें हौंड़' लागल। शीघ्रे हुनक काज करा क' पठा देलियनि। आ तकर बादसं हुनक मेडिकल बिल आबनि तं जल्दीए स्वीकृत करबा क' भुगतान करबा दियनि। आर की सकैत रहियनि? तकर बाद मेडिकल बिलक मादे ओहो निश्चिंत भ' गेलाह मने। सोचने होयताह- बौआ अछिए, त' परवाहे की?
फोनक आयब-जायब कम होइत-होइत बन्न भ' गेल।
व्यस्तता फेर हमरा दुनूक बीच पांच सालक खाधि खुनि देलक। दास भैयाक खबरि केओ नहि दिअय तं आशंका होअय। कोना हेताह? हेताहो कि नहि? से मोन पड़ितहिं फोन लगा देलियनि।
जखने कहलियनि जे अहांक बौआ बजैत छी कि वैह चिरपरिचित हंसीक संग बजलाह, "नम्बर सेभ केने छियह बौआ। कत' छहक? आब त' रिटायर भेल हेबहक।"
हम हं कहलियनि तं पुछलनि, "कतेक बरखक टारगेट राखने छह?"
"माने?"
"जीबाक टारगेट।"
"एखनि की भेलैए भैया? एखनि त' रिटायरे केलियैए।"
"सैह, सेन्चुरी स' कम नहि। हम एक सय बरस ल' क' चलि रहल छियह। तों हमरा स' छोट छह, तें सवा सय राखह।"
"कने बेसी नहि भ' गेलै भैया?"
हंसैत बजलाह, "अपना स' छोट लेल अपना स' बेसी औरदाक लिलसा राखबे करत ने लोक।"
भैयाक ई दुलार हमरा अभिभूत कयलक। हालचाल पुछलियनि तं कहलनि, "छह मास पर मुम्बै जाइ छियह। खूब खुश रहै छियह। मुम्बै बला डाक्टरो स' चौल क' लै छियै। ओ कहैत रहै छथि- ऐसने हंसते रहिए। त' कहह रिटायरमेंट के बाद की करै छह? बेटा सभ बाहरे हेतह। ओना तोरा नहि अखरैत हेतह। कथा-कविता चलैत हेतह। रूचि त' पहिने स' रहह। तोरा पर गर्व होइए संदीप बौआ।"
हम बिच्चेमे टोकलियनि, "अहां अपन ने कहू।"
ओ बजलाह, "बड़का खेती देखै छह। छोटका इंजीनियर छह। छोटकी पुतौहुओ नोकरी करै छह आ हम दुनू जीव...." फेर जोरसं हंसलाह।
"की?"
"अपने घर पर दोकान छनने छियह। हम कागज-पेन्सिल, टौफी-चाकलेट आ मास्टरनी चूड़ी-बिन्दी-सिन्नुर के..." फेर हंसैत बजलाह, "दोकनदारी नहि कहक, समय काट' लेल बुझहक। रंग-बिरंगक लोक अबैत रहै छै, त' समय नीक जकां कटि जाइत छै। हे लैह, मास्टरनी स' बतिआबह। स्पीकर औन क' देलियहे।"
"से किए? डर होइ छह भैया?"
"नहि हौ बौआ। दियोर-भाउजकें बतियाइत सुनला कत्ते ने बरख भ' गेल, तें..." फेर हंसलाह दास भैया।
भौजीसं गपसप होइत रहल। एही क्रममे पुछलियनि, "भौजी! अहां के चूड़ी पहिराब' अबैए?"
"से आब चूड़ी पहिर' कहां अबै छै महिला सभ। सभ साइज बुझने रहै छै, कीनैए लेल अबै छै। हमरा सभ के समय मे से रहै। हम सभ दोकाने मे पहीरि लियै।"
हमरा चौल सूझल, "भैया के चूड़ी पहिराब' अबै छनि कि नहि? कहियो अहां के पहिरौलनि?"
भौजीसं पहिने भैये बजलाह, "हमरा नहि अबै छह बौआ। आब सोचै छियै जे गहिंकी सभ के पहिरा क' सीखि लियै।" भैया हंसलाह।
भौजी बजलीह, "से हम मना थोड़े करै छियनि। सीख लेथिन त' कोनो गहिंकी नहि घुरतनि। कोन ठेकान कोइ पहिरैओ लेल आबि जाइ।"
फेर समवेत हंसी। फोन एहि निर्णय पर बन्न भेलै जे हमरा सभक भेंट-घांट होइत रहय।
से एकदिन हम भैयाक ओहिठाम पहुंचि गेलहुं। दुनू प्राणी दोकाने पर रहथि। अनुरागें भेलनि जे हमरा कत' राखथि आ उसारथि।
दोकाने पर बैसि गेलहुं। भौजीक दहिना हाथमे बैंडेज रहनि। हाथ मचकि गेल रहनि। दुख भेल।
एकटा युवती आयलि। चूड़ी पसिन कयलकि। कीन' सं पहिने पुछलकि, "हमरा चूड़ी पिन्ह' नञि अबै छै। पिन्हा देथिन?"
भौजी अपन हाथ दिस ताकलनि आ बजलीह, "हमरा बुतें त' नहि हेतह।" भैया दिस संकेत करैत बजलीह, "हिनका स' पहिरबहक?"
युवती बाजलि, "की हेतै त'। इहो त' बबे-ददा दाखिल छथिन।"
भैया ओहि युवतीकें चूड़ी पहिराब' लगलाह। हम मोने-मोन उचारलहुं, "के कहत जे भैयाकें बेटी नहि छनि?
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फोटो : गूगल सं साभार।
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