आलेख
बौआइत मोनकें सम पर अनैत मीठा पान
प्रदीप बिहारी
अप्रतिम कथाकार विभूति आनन्दक नव कथा-संग्रह 'कथा '23' प्रकाशमे आयल अछि। लगले ई कहि दी जे विभूति आनन्द अपन कथा-संग्रह सभक नाम सेहो सिरीजमे राख' लगलाह अछि। जेना, एहि पोथीसं पहिने 'कथा '21' आ 'कथा '22' नामक पोथी आबि चुकल छनि। स्पष्ट छैक जे जाहि बर्खक शीर्षक छैक, ताहि बर्खमे लिखल कथा सभक संग्रह थिक। आरंभमे हमरा ई नाम नीक नहि लागल रहय। मुदा, बादमे नीक लाग' लागल। से एहि दुआरें जे सम्बन्धित बर्खमे कथाकारक कथा सभक ट्रेंड बुझबामे सहज होइत छैक। कथाकारक वैचारिक ग्राफ समयक संग कोना आगां बढ़ैत अछि वा पाछां घुसकैत अछि, सेहो बुझल जा सकैत अछि। बदलैत सामाजिक, सांस्कृतिक आ राजनीतिक अवस्थाक प्रभावकें कथाकार कोना देखैत छथि? ओकर दबावकें कोना स्वीकारैत छथि? तखन कथा-संग्रहक नामकरणक पाछां आदरणीय विभूति भाइक उद्देश्य आ दृष्टि स्पष्ट भेल। आ एही क्रममे हिनक पोथी 'कथा '23' पाठक लोकनिक सोझां छनि।
कथा लिखबाक जेहन मति, गति आ अवगति विभूति भाइकें छनि ताहिसं हुनक समकालीन सभकें ईर्ष्या होइत हेतनि आ अनुज रचनाकार सभकें सेहन्ता। आ ताहि दृष्टिएं हिनक कथाक पोथी भविष्यमे 'कथा '24, 25, 26, 27....क नामे अवश्य औतनि।
एहन शीर्षक कथाकारकें अपन प्रतिबद्धता मोन पाड़ैत रहैत छैक, आत्मानुशासन मोन पाड़ैत रहैत छैक जे प्रतिवर्ष एकटा संग्रह योग्य नव कथा लिखबाक अछि। ई संकल्प कथाकारकें सक्रिय आ उर्जस्वित बना क' रखने रहैछ। हमरा सभक लेल ई प्रसन्नताक बात अछि जे आदरणीय विभूति आनन्द शारीरिक अस्वस्थताक बादो मानसिक रूपसं एतेक स्वस्थ छथि जे प्रतिवर्ष एतेक कथा लिखि लैत छथि।
दू हजार तइस मे ओ बारह टा कथा लिखलनि। सोझे देखी तं प्रत्येक मास एक टा कथा। बारह मास, बारह कथा। मुदा नहि, मासे-मासक हिसाबसं नहि लिखलनि। आ, कथा एना लिखलो नहि जा सकैछ। कथा लिखब दवाइक खोराक नहि होइत छैक, जे नियमित समयपर नहि लेने नीक जकां फैदा नहि करत।
कथा लिखबाक एकटा मूड बनैत छैक, विषय वा घटना कखनो क्लिक क' जाइत छैक, स्पार्क क' जाइत छैक, बिजलौका जकां चमकि उठैत छैक, तखन कथाकारकें लिखबाक प्रवेग बनैत छनि आ लिखाइत अछि कथा। जं एहि 'क्लिक', 'स्पार्क' आ बिजलौका कें तत्क्षण नहि पकड़लनि कथाकार, तं ओ द्रुत गतिएं ससरि जाइत छैक। सिनेमाक भाषामे जकरा 'फेड आउट' कहैत छैक, विषय वा घटनाक सैह भ' जाइत छैक। कतबो स्मरण करू, सहजहिं घुरि क' नहि अबैत छैक। चूँकि एहि पोथीमे संग्रहित कथा सभमे ओकर लेखनक तिथि देल छैक, तें हम एक टा डाटा देब' चाहैत छी। दू हजार तइसक मार्चमे तीन टा कथा लिखलनि, अप्रैलमे दू टा, अगस्तमे एक टा, सितम्बरमे दू टा, अक्टूबरमे तीन टा आ दिसम्बरमे एक टा। एहिसं हिनक विषय वा घटनाकें आत्मसात करबाक आ कथा लिखबाक आवृत्ति कें बुझल जा सकैत अछि।
एहि बारहो कथाक कथाभूमि आ विषय फराक-फराक छैक। एखनुक समयमे प्रेम आ अस्तित्व एकटा आवश्यक तत्व भ' गेल छैक। जखन प्रेम बचतैक, तखने बचतैक संवेदना, जकर खगता व्यक्ति आ समाज लेल बहुत बेसी छैक। एहि विषय सभकें एहि बारहो कथामे कुशलतापूर्वक राखल गेल छैक।
पोथीक पहिल कथा 'हैप्पी फगुआ' स्वप्न कथा थिक। अपन मृत पत्नीक संग वार्तालापक शिल्पमे लिखल एहि कथामे नायकक विधुर एकाकी जीवन आ तज्जन्य असुविधा आ असुरक्षाक बात कहल गेल छैक। कथाक कैनवास नमहर छैक, जाहिमे दुनू प्राणीक पूर्व जीवन, वर्तमान जीवन, यथा- बेटा-पुतौहु, मित्र-बन्धु, सम्बन्धी, सर-समाजक चर्च छैक। हिनका सभसं बहुत कम सम्पर्क रहि गेलाक कारणें नायकक एकाकी जीवनक संदर्भ बेर-बेर अबैत छैक। नायिका (मृत पत्नी) कहैत छैक जे ओ तं आत्मा मात्र अछि, मात्र भाव। ओ नायकक लेल संवेदना प्रकट करैत छैक, मुदा कहैत छैक जे ओ दुख वा सुखसं प्रभावित नहि होइछ। कथाक अंत पत्नीकें 'हैप्पी फगुआ' कहि नायक अपन मोनकें मनबैत अछि। माने, 'दिल को बहलाने का गालिब ये खयाल अच्छा है...।' ई कथा पूर्णतः 'संवाद' शिल्पमे लिखल छैक आ पाठक लग गप्पक विभिन्न संदर्भक चित्र सफलतापूर्वक उभरैत छैक आ जगजियार होइत छैक। ओना ई कही जे संवाद शिल्पमे कथा लिखबाक महारथ छनि विभूति आनन्दकें। हिनक कथा 'काठ' पूर्णतः संवाद शिल्पमे लिखल मैथिलीक प्रायः पहिल कथा छनि।
सोशल मीडिया आ डिजिटलाइजेशनक प्रभावें समाजमे भेल परिवर्तनक कथा विभूति आनन्द खूब लिखलनि अछि। एहू संग्रहमे छनि। एकर प्रभावें लोक सभमे, विशेषत: युवक आ युवती सभमे जे चेतनाक संचार भेलैक अछि, तकरो बानगी एहि संग्रहक कथा सभमे छैक। ओ सभ, खास क' युवती सभ प्रेम लेल, अपन अधिकार लेल, अपन 'स्व' लेल, अपन कैरियर लेल खुजि क' बाज' लागलि अछि, ई बात कथाकारकें नीक लगैत छनि। प्राय: तें एहि बातकें प्रमुखतासं उठबैत छथि कथाकार आ एहन चेतनशील युवती सभक संग एहि संग्रहक कथा सभमे ठाढ़ देखाइत छथि।
हमरालोकनिक पाबनि-तिहार, सांस्कृतिक परम्पराक रक्षा लेल संघर्षरत एक पीढ़ी आ ओकरा निंघेस कहैत दोसर पीढ़ी (माय आ बेटा-बेटी)क बीचक द्वंद्व सेहो एहि संग्रहक एकटा कथा देखाइत अछि। तिला संक्रांतिमे, तिल बहबा लेल बेटीकें तिल नहि देल जाइछ। से एहि दुआरें जे ओ बेटी अछि, ई बेटाक काज छैक (कथा- गे! तों त' बेटी छें)। एहि चलनसारिक विरोध कथामे एहि तरहें देखल जाइछ जे बुढ़ारीमे बेटिए मायकें काज अबैत छैक, सेवा करैत छैक।
स्त्रीक दशा-दिशामे सुधार आ चेतनाजन्य विकासक लेल कथाकार तैयार देखाइत छथि। तें कतहु प्रेमक बहन्ने, तं कतहु ओकर भूखक बहन्ने। ओकर विभिन्न रूपकें कथामे आनलनि अछि। कथाकार स्त्रीमे भेल एहि परिवर्तन कें मजगूतीसं रेखांकित करैत छथि जे युवती अपन विवाहसं पूर्व लड़कासं गप क' तय कर' चाहैए जे ओ लड़का एकरा लेल उपयुक्त होयतैक वा नहि। आ, ई गप ओ अपन माता-पिता लग राखैए। अपन जीवनक निर्णय अपना हाथमे राखैए। युवक-युवती अपन प्रेम-सम्बन्धके निधोख भ' लोक लग राखैए।
चिट्ठी-युगक अवसान आ एण्ड्रायड-युगक आरंभक सिमान पर ठाढ़ भेल एकटा कथा अछि- 'ऋणानुबंध'। एकटा लड़कीक कथा जे फेसबुक कोन परिस्थिति मे शुरू करैए, आरंभमे डरे अपन फोटो नहि दैए आ नहूं-नहूं मैसेंजर आ व्हाट्स एप पर चैटिंग करैए। कतोक मित्र बनैत छैक, कतोक ओकरा प्रपोज करैत छैक। सभसं कोना कौशलपूर्वक अपन बाट फराक करैत अपन कैरियर बनयबा लेल गंभीर होइए आ विवाहकें वाधा बूझ' लगैए। एहि कथाक सहज प्रवाह एकरा महत्वपूर्ण बनबैत छैक।
मिथिलाक लड़कीक स्वतंत्र अस्तित्वक एकटा आर कथा छैक - 'चाह मे बिस्कुट जेना'। नायिकाक जेठ बहिन, जे बियाहलि छैक, अपना सन गति नहि चाहैत अछि नायिकाक। अल्प बयसक वियाहक दुष्परिणाम भोगैत जेठ बहिन कथाक अंत धरि नायिकाक सम्बल बनैत छैक, मुदा, परिवारक दबावक आगां ओ हारि जाइत अछि। कथा एत' सं आगां बढ़ैत छैक आ क्लाइमेक्स पर एहि तरहें जाइत छैक जे कथानायक 'हम'कें नायिका प्रतिमाक मैसेज अबैत छैक- 'सर, बुझले हैत। मुदा हमहीं अस्वीकार क' देलिऐ।' हम द्वारा कारण पुछने कहैत अछि- 'हमर सपना, जकर अहां सदा समर्थन करैत अएलहुं, ताही लेल।'
एहि कथामे युवती द्वारा स्वीकार/अस्वीकारक निर्णय लेबाक अवगति आ साहस रेखांकित करबा योग्य अछि। कथाकार युवतीक एहि निर्णय आ साहसक संग देखाइत छथि। तें एहि बदलैत समयक एकटा महत्वपूर्ण कथा सेहो बनैत अछि- 'चाह मे बिस्कुट जेना...'
बारहो कथामे कथाकार दू बेर कलकत्ता जाइत छथि। माने दू टा कथामे कलकत्ता अयलनि अछि। ओना सम्पूर्णता आ कथाक केन्द्रीय भूमिक दृष्टिएं एक्कहिटा कथामे कलकत्ता आयल अछि। ओ कथा अछि- 'सोनागाछी'। एहि कथामे सोनागाछी एकटा प्रतीकक रूपमे अबैत छैक। कथानायककें बाट पर युवक सभक संग 'फ्लर्ट' कयनिहार पर तामस उठैत छैक। कारण, युवती स्वयंकें बचयबाक प्रयास करैत अछि। माने, ओ सोनागाछीमे रहनिहारि सन मनोभावक नहि अछि। अपन कोठरीक खिड़की सं देखैत नायककें होइत छैक जे पुलिस अधिकारी मित्रकें फोन करय। मुदा, कहि नहि पबैछ। कका एकबेर कहै छथिन जे एत' अपन काजसं काज राखी। प्रात भेने अखबार ओहि लड़कीक हत्याक सूचना दैत छैक तं कथानायककें अपराध बोध होइत छैक। ज्ञातव्य जे सोनागाछी कलकत्ताक रेड लाइट एरिया छैक। मुदा, एहि कथामे कथाकारकें विक्टोरिया मेमोरियल पार्कमे सेहो सोनागाछी देखाइत छनि। एतबे नहि, लोकक मोनमे सेहो एक-ने-एक सोनागाछी देखाइत छनि। छोट वा पैघ, विभिन्न ठाम सोनागाछी देखाइत छनि। प्रेममे असफल युवतीक मोनमे सोनागाछी देखाइत छनि...।
वेश्यावृत्तिक कारण आ निवारणक मादे कथाक अंतमे कथाकार लिखैत छथि- 'जोती दा जखन पहिल बेर मुख्यमन्त्री भेल रहथि तं पार्टीक किछु संभ्रांत तरहक व्यक्ति हुनकासं भेंट कयने रहथि, आ सोनागाछीक उन्मूलन लेल आग्रह कयने रहथिन। मुदा जोती दा तर्क देने रहथिन...
...न: न:, सौरभो (कथाक एक पात्र) तं सएह खिस्सा लिखने रहय जे ओतुक्का लड़की कहने रहनि...'
अंतमे कथाकार लिखैत छथि- 'आ हमर माथा सहरी-सहरी भ' क' जेना छिड़िया जाइत अछि। मुदा तैयो सोचैत छी, आइ जं जोती दा रहितथि तं की सोचितथि!...'
मुदा, कथानायकक माथा सहरी-सहरी किएक होइत छनि? ताहि लेल कथामे उपरोक्त कथनसं पहिलुक अंशके देखल जा सकैछ, जाहिमे कहल गेल अछि जे कथानायकक ककाकें नहियो रहने हुनक मित्र रवि दा डेरा पर अबैत रहैत छथिन। आ, जं कदाचित नहियो आबि सकलाह, कानमे काकीक स्वर सुना जाइ छनि- 'हेलो, की मोशाय..' आ, कथानायकक सोच जेना चक्कर मारि खसि पड़ैत छनि।
कथामे उपरोक्त अंश सन नांगट सांच लिखब कथाकारक धैर्य आ तटस्थताक उदाहरण मानल जा सकैए।
पात्रानुकूल भाषाक प्रयोग लेल विभूति आनन्दक विशेषज्ञता मैथिली जगतमे जग जाहिर अछि। मिथिलाक वंचित (शैक्षिक, सांस्कृतिक आ आर्थिक रूपें) लोकक बहुत रास कथा लिखलनि अछि, जाहिमे कथानक आ पात्रक क्षेत्रक अनुसार कथा-भाषाक प्रयोग कयने छथि। ई दुरूह आ गंभीरतापूर्वक कर' योग्य काज होइत छैक। लेखकक लेल एकटा चैलेंज सन होइत छैक। ओहन पात्र द्वारा उच्चारित शब्द, ध्वनि आ लय महत्वपूर्ण होइत छैक, जकरा धयने कथा-वस्तुक संग गतिमयताक उचित निर्वाह कथाकें स्तरीय बनबैत छैक। एहि लेल कथाकारकें अपन रचना-प्रक्रियाक क्रममे कार्यशाला सन मेहनति कर' पड़ैत छैक। हिनक एहन कथा सभकें पढ़ने ई अन्दाज सहजहिं लगाओल जा सकैछ जे ई कतेक मेहनति करैत छथि। कोना एहि गुणकें साधलनि अछि, सेहो बुझबाक इच्छा पाठककें उपजि सकैत छनि। एहू संग्रहक कथा 'जात'मे ऊपर वर्णित शिल्प आ कथाकारक मेहनति देखल जा सकैत अछि।
एहि संग्रहक बहुलांश कथा मे कथाकारक अपन गामक प्रति मोह आ आकर्षण देखबामे अबैत अछि। हिनक बेसी पात्र सभ अपन शेष जीवन अपन-अपन गाममे बिताब' चाहैत अछि। मुदा, से भ' नहि पबैत छैक। कारण, आजुक गाम कतोक प्रकारक स्वार्थ आ राजनीतिसं सकपंज भेल अछि। प्राय: तें कथाकारक नायकक मोनमे कचोट छैक, कखनो मोह देखाइत छैक, तं कखनो मोहभंग सेहो।
ई इथ-उथ एहि संग्रहक अंतिम कथा 'एक खिल्ली मीठा पान' मे देखल जा सकैछ। ई कथा आत्मकथात्मक शिल्पमे लिखल गेल अछि। एहिमे कथानायकक प्राय: पूरा जीवन-वृत छैक। एहि कथामे परिवर्तनकामी नायकक जीवन-संघर्ष छैक। अपन सिद्धान्त सं समझौता नहि करबाक जिद छैक, छात्र-जीवनक जहल-प्रवासक क्रममे राजनीतिक यथार्थ सं आंखि खुजैत छैक। नायक वैभवकें जहलमे बुझना जाइत छैक जे सभ राजनेता देशक लेल नहि, अपन फैदा लेल राजनीति क' रहल अछि, तं मोहभंग होइत छैक। वैभव ओहि बाटसं घुरि अबैत अछि, आ नव बाट धरैत जीवनक चारिम खण्डमे आबि एकसर भ' जाइत अछि। पत्नी नहि छथिन, धियापुता अपनेमे व्यस्त आ एसगरुआ अस्त-व्यस्त वैभव। तें ओ गाम जाय चाहैत अछि, गामेक माटिमे मिलि जाय चाहैत अछि। मुदा, गामो जयबामे अनेक रंगक विघ्न सभक संग लड़' पड़तैक। आब गाम, ओ गाम नहि छलै जे ओ छोड़ि क' गेल छल।
वैभवक औनाइत मोन एहि निर्णय पर थिर होइत छैक जे ओ फेरसं साहित्य-लेखन करत, जकरा विभिन्न कारणें छोड़ि देने छल। ओ सोचैत अछि जे साहित्ये एहन अस्त्र भ' सकैत छैक, जे विरोधक इतिहास-लेखनमे सक्षम होयत। आ तें ओ चौक पर जा क' जिस्ता भरि रुलदार कागत आ दर्जन भरि कलम कीनैत अछि। आ, घुरती काल अपन परिचितक दोकान पर एक खिल्ली मीठा पान खाइत अछि। से, एहि दुआरें जे जहिया ओ अधिक प्रसन्न रहैत छल, तं मीठा पान खाइत छल।
कथाक एहन सकारात्मक समापन क' कथाकार एहि कथामे जीवनक नव बाट तकैत छथि। ओना ई कही जे तकैत नहि छथि, बनबैत छथि। आ, पोथीक ई अंतिम कथा जीवनक उजासक कथा बनि सकल अछि।
ई कथा भने आत्मकथा सन लगैत छैक, मुदा कथाक यथार्थ, ट्रीटमेंट आ आजुक युगबोधक कारणें ई कथा आत्मकथा नहि, जनकथा बनि गेल अछि।
एहि तरहें कथा '23क पहिल कथा 'स्वप्न कथा' सं शुरू होइत अछि आ अंतिम कथा यथार्थ आ उजासक कथा बनैत अछि, हौसलाक कथा बनैत अछि।
जेना क्रिकेटक खेलाड़ी लेल एकटा टर्म कहल जाइत छैक- 'एखनि हिनकामे बहुत क्रिकेट बाकी छनि'। तहिना विभूति आनन्द लेल कहल जा सकैत अछि जे हिनकामे एखनि बहुत कथा बाकी छनि।
आ, एहि पोथीक प्रकाशनक अवसर पर शुभकामना आ बधाइ तं बनिते छनि।
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