आलेख
अपन हिस्साक काज करैत कथाकार
प्रदीप बिहारी
काल्हि जेठ बालक फोन पर जिज्ञासा कयलनि जे पापा की सभ क' रहल छी? हमरा प्रसन्नता भेल, अचरज सेहो। भेल जे आइ ओ आराममे छथि। कार्यालयी कोनो तनाओ नहि छनि। से एहि दुआरे जे अनदिना हुनकर हालचाल पुछबाक ढंग दोसर रहैत छनि। अनदिना पूछता- नीके छी ने पापा। मोन ठीक अछि ने। दवाइ समय पर लै छी ने। आदि, आदि। मुदा, आइ जखन ई पुछलक जे की सभ क' रहल छी, तं हुलसि गेलहुं। से एहि दुआरे जे हुनका अपन साहित्यिक आ पत्रकारिताक आरंभक दिन मोन पड़ल होयतनि मने, जे वर्तमान नोकरीमे प्राय: पूर्णतः छुटि गेल छैक।
हम पुत्रक खुशीक गौरव बोधमे मग्न भ' गेलहुं। मुदा ओ बेसी काल रह' नहि देलनि। कहलनि- सोचैत छलहुं जे फेर स' पढ़ब-लिखब शुरू करी। नोकरीक व्यस्तता त' रहबे करतै। जेना नोकरीमे अपन हिस्साक काज करैत छी, तहिना साहित्यो फेर स' शुरू करी। पहिने पढ़ी, तकर बाद...।
मुदा, एखनि हम आदरणीय विभूति आनन्दक टटका संग्रह 'कथा '24' मे संकलित कथा सभ पढ़ि रहल छी, जे प्रकाशन-प्रक्रियामे अछि। कथाकार विभूति आनन्द मैथिली कथाक जाहि शिखर पर छथि, ओहिठाम हुनक कथाक भाषा पर गप करब उचित नहि लगैए। कारण, कथा-भाषा'क अपन जे 'स्टाइल' ओ कायम क' लेने छथि, तकर निर्वहन हुनक कथामे होयबे करतनि। 'स्टाइल' जत' छनि, ओत' सं आगुए बढ़तनि। पाछां अयबाक स्थिति अयबाक संभावना स्वीकारल नहि जा सकैछ। कथाक शिल्पक मादे ई बात नहि कहल जा सकैछ। कथाकारक शिल्प बदलैत रहैत छैक आ बदलैत रहक चाही। ई जरुरियो छैक।
रहल गप कथ्यक। तं हिनका सन वरिष्ठ कथाकारसं ई उमेद तं सहजहि रहैत छैक जे कथाक कथ्य टटका होनि, समयोचित होनि आ समाजमे घुलल-मिलल होनि। कथा निष्पक्ष होनि। आन्हरकें आन्हर आ कुईर कें कुईर कहैत होनि।
जेनाकि हिनक कथा-संग्रह 'कथा '23' मे हम हिनक कथाक विकासक ग्राफ पर चर्च कहने रही, हिनक कथा-दृष्टि आ कथाक 'प्लाट'क चयन पर गप कयने रही। मुदा, एखनि हम गप कर' चाहब जे सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक बदलावक संग विभूति भाइ कोना अपन कथाकारकें जोगा क' आ सक्रिय रखने छथि। वैश्विक चबूतरा पर पटकायल सीसा जकां व्यक्ति आ समाज कोना खण्ड-खण्ड भेल अछि। तकर किछु खण्ड अपन चमकी बचयबा लेल कोना उपलायल अछि, किछु खण्ड अपन अस्तित्व लेल कोना संघर्षरत अछि? तं, ताहि लेल एहि संग्रहक कथा सभकें पढ़ब आवश्यक होयत। आ कथा पढ़लाक बाद बुझना जायत जे कथाकार 'नवता'क जबर्दस्त आग्रही छथि। समयकें चिन्हबाक सेहो।
से एहि संग्रहक पहिल कथा 'कोखि'मे भेटत जे ओकर नायिका धीया-पुताकें नमहर भेलाक बाद अपना लेल रोजगार शुरू करैए। रोजगार टाका-पाइ लेल टा नहि, ताहि लेल कमौआ पति छथिने, समय काट' लेल, जीवनक अनुभव लेबा लेल सेहो शुरू करैए। आ एकदिन एहन अबैत छैक जे ओकर ब'र ओकरासं पाकेट खर्च लेल खुदरा पाइ मंगैत छैक। पति कें खुदरा पाइ दैत कालक नायिकाक गौरव बोध देखितहि बनैत छैक। कथामे ओकर प्रतिस्थापन सेहो बेजोड़ ढंग सं भेलैक अछि। नायिकाक अनुभवक मनोवैज्ञानिक प्रस्फुटन सेहो कथामे आयल छैक, तकरा पकड़ि सकबाक अपेक्षा वरीय कथाकारसं पाठकक होइत छैक आ ताहि मामिलामे पाठक निराश नहि भेल अछि।
हम 'नवता'क गप कयलहुं। ओकरा एहि तरहें बुझल जा सकैत अछि आ अपनेसभ बुझितहुं होयब जे समाज आ संस्कृतिक संदर्भमे ई एकटा बौद्धिक आन्दोलन सेहो छैक, जाहिमे परम्परागत विचार, सामाजिक बनौट आ धार्मिक अवधारणा सभसं फराक एकटा नव दृष्टिक प्रस्तुति होइत छैक। नव विचार, लोकक आत्म अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत परिचिति आ स्वतंत्र विचार केन्द्रमे रहैत छैक।
वैश्वीकरण आ डिजिटलाइजेशनक बाद एहि 'नवता'क अवधारणाक बिस्फोट समाजमे कोन प्रकारें भेलैक अछि, तकरा कुशलतापूर्वक कथाकार एहि संग्रहक कथा सभमे पकड़लनि अछि। ओकर सकारात्मक आ नकारात्मक, दुनू स्थिति आ प्रभावकें उकेरलनि अछि। समाज कें सावधान कयलनि अछि आ आत्म-सम्मानक संग व्यक्तिगत स्वतंत्रताक रक्षाक लेल अपन पात्रक संग ठाढ़ सेहो भेलाह अछि। एहि संदर्भमे एकटा कथा 'उनटन' देखल जा सकैत अछि।
'उनटन' कथामे कथाकार बड़का साहस देखौलनि अछि। व्यक्तिगत आत्म-सम्मान आ स्वतंत्र अस्तित्वक कुप्रभावक प्राय: अन्तिम नियताप्तिक रूपमे एहि कथामे सहोदर आ सहोदराक आत्मीय आ दैहिक सम्बन्धकें देखाएल गेल छैक। कोटामे तैयारी कर' गेल दुनू भाय-बहिन जखन दू-तीन बर्ख घर नहि घुरैत छैक आ माय फोन क' बेटीकें कहैत छैक जे ओ सभ आब ओकर बियाह क' देब' चाहैत छथि। बेटी कोनो स्पष्ट जवाब नहि दैत छैक। तखन ओ भायक समाचार पुछैत छैक। मुदा ताहि समय एकटा बच्चाकें कानबाक स्वर सुनाइत छैक। माय ओहि स्वरक मादे पुछैत छैक, तं बेटा कहैत छैक- 'तोहर पोता कनैत छौ।'
'उनटन' कथासं कोनो संवेदनशील लोकक दिमाग झनझना सकैत छैक। मुदा, एकर कथानक सत्य छैक। आधुनिकता आ स्वतंत्रताक चकमकीमे जीबैत आजुक समाजमे सम्बन्धकें बुकनी-बुकनी करैत कतोक एहन घटना सभ भ' रहल छैक, जे बरोबरि सुनबा-पढ़बामे अबैत अछि। एहन-एहन घटना आब एत्तेक ने संख्यामे होम' लागल छैक जे सामान्य रूपें लोकक संवेदनाकें भोथ क' रहल छैक। एहि यथार्थ कें कथाक विषय बना क' समाजकें चेतयबाक अपन दायित्वक निर्वाह कयलनि अछि कथाकार।
विभूति आनन्दक कथा सभक एकटा महत्वपूर्ण उपांग बनि गेल अछि - मोबाइल। से, प्राय: एहि दुआरे जे मोबाइल एखनि समाजेक महत्वपूर्ण उपांग बनि गेल अछि आ ओहो समाजेक लोक छथि, समाजेक कथा लिखैत छथि। तें अपने सभ देखब से हिनक कथामे मोबाइलक विभिन्न ढंगे उपयोग भेल अछि। आब हिनक बेसी संवाद-कथामे संवादक माध्यम मोबाइल चैटिंग होइए।
उपकरण आ ओकर उपयोगक प्रभावसं उपजल एकटा कथा अछि- 'जंगल'। आरंभमे ई कथा प्रेम-कथा जकां शुरू होइए। मुदा, मोबाइल कौल पर दू टा पुरुष पात्रक गपक संग कथा आगां बढ़ितहिं प्रेम सम्बन्धी आजुक युवा पीढ़ीक सोच आ उछृंखलताक सोचक कथा बनि जाइत अछि। प्रेम-कथा नहि, 'रिलेसनशिप-कथा' बनि जाइत अछि। कथा पढ़ने लागत जे आजुक ई युवा वर्ग प्रेममे देह कें प्रमुखतासं देख' लगलैए। संवेदना, आदर आ विश्वासकें कतहु भसिया तं ने देलकैए। बहुलांशक यैह हाल छैक, एहने सोच छैक। पांच साल सं एक-दोसराक संग 'रिलेशन'मे रहैए आ 'रिलेशन ब्रेक' कर'मे वा 'मूव औन' कर'मे पांचो मिनट नहि लगबैए। फेर घंटे-दू घंटाक बाद दोसराक संग 'रिलेशन' भ' जाइत छैक। सेहो एहि सूचनाक संग जे ओकर 'एक्स' छलैक, आब नहि छैक।'
ई कथा पढ़ैत काल पाठककें लगतनि जे की पढ़ि रहल छी? मुदा नहि, अपने यथार्थ पढ़ि रहल छी। बदलैत समयक सोपान पढ़ि रहल छी, जाहिमे सम्बन्ध मात्र सिरही टा रहि गेलैए। हं, ई कथा पढ़ैत काल कथाकारक मेहनति सेहो नजरि आओत। जाहि बयसक नायक-नायिका सभ कथामे आयल अछि, तकर मनोदशा, भाषा आ सोचमे अपन बयसक उत्तरार्द्ध मे काया-प्रवेश करबामे कतेक मेहनति लागल होयतनि कथाकारक, सेहो नजरि आओत। ओकर सभक भाषा आ आधुनिक 'टर्म' चुनबामे कथाकारक कौशल सेहो नजरि आओत। बहुत 'टर्म' पहिले बेर सुनब, ताहि लेल कथाकारक लेल मुंहमे धन्यवाद सेहो उचरत।
हम जेहन कथा सभक बानगी देने जा रहल छी, ताहि पाठक सभकें लगतनि जे एहि संग्रहमे एहने कथा सभ होयतैक। मुदा नहि। एहि संग्रहमे सभ रंगक आ सभ बयसक लोकक कथा छैक। कारण, समय एकरंगाह नहि होइत छैक। बदलैत रहैत छैक। आ, बदलैत समयके अपन कथाक विषय बनायब विभूति आनन्दक स्वभाव बनि गेल छनि।
सन् दू हजार चौबीसमे बिहारमे एकटा प्रशासनिक घटना घटलैक - 'सर्वे'। ओना 'सर्वे' कोनो नव घटना नहि छैक, एकटा प्रक्रिया छैक, जे चलैत आबि रहल छैक। मुदा उल्लेखित वर्षक सर्वे किछु विशेष रहैक। तें एहि पर सेहो साहित्यकार लोकनि अपन-अपन कलम उठौलनि। हिनको सर्वे पर केन्द्रित दू टा कथा एहि संग्रहमे भेटत - 'सर्वे भवन्तु सुखमय...' आ 'सर्वे सन्तु निरामया:...'। ई दुनू कथा सरकारी कुव्यवस्था, प्रशासनिक विसंगति आ पारिवारिक-सामाजिक वैमनस्यताकें उजागर करैत अछि, पठनीय आ विचारणीय सेहो अछि।।
तहिना जीवन आ जीबाक प्रति उत्साह आ जीजिविषाक कथा अछि- 'मॉर्निंग फेस'। आ, बियाहक कतोक बरखक बाद कालेजक प्रेमकें मोन पाड़ैत कथा अछि- 'हम गंगा भ' बहि जाइ...'। अद्भुत।
एहि संग्रहमे कथाकार राजनीतिक यथार्थकें सेहो दू टा कथाक माध्यमे पाठकक समक्ष रखलनि अछि। ओ दुनू कथा थिक- ‘वसुधा’ आ ‘स्वप्नभंग’। फराक-फराक विचारधारा बला राजनीतिक दल सभ, जे बाहरसँ जतेक मजगूत, सैद्धांतिक आ उदार नजरि अबैत अछि, से सभ भीतरसँ कतेक कलुषित आ फोकला अछि, ओकर नेता आ कार्यकर्ता सभ व्यक्तिगत स्वार्थक लेल कतेक छद्म करैत अछि, ई बात गंभीरतापूर्वक दुनू कथामे आयल अछि।
एहि संग्रहमे कथा-वस्तुक चयनमे एकटा बात देखऽ मे अबैत अछि जे कथाकार विभिन्न आयामक विषयकें अपन कथामे आनलनि अछि। जेना, एकटा कथा अछि- खेल। मैथिल समाजमे खेल एहि प्राथमिकतामे नहि रहल अछि जे अभिभावक अपन नेनाकें ओहिमे कैरियर बनयबा लेल प्रोत्साहित करथि। आब नगरमे रहैत मैथिल एहि दिशामे साकांक्ष भेलाह अछि आ उदार सेहो। मुदा पहिने से विरले देखल जाइत छल। ओना मिथिलामे विभिन्न प्रकारक खेलक प्रचलन रहल अछि, जकर चर्च कथामे भेल अछि। मुदा ओ खेल प्राथमिकतामे विरले रहल अछि। एहना स्थितिमे एहि कथा ‘खेल’क अभिभावक पात्रा सुशांत अपन पुत्रकें ओकर रुचिक अनुसार शतरंजक नेशनल खेलाड़ी बनाबऽ लेल बेटाक संग संघर्षरत अछि, से नीक समाद दैत अछि।
पारम्परिक रूपसं हटि नव प्रयोगक संग जीबाक ढंगमे परिवर्तन आ ओकर जटिलताकें चित्रित करबाक आग्रही कथाकार विभूति आनन्दक एहू पोथीक कथा सभ हिनक कथा-लेखनक दृष्टिबद्धताक बानगी बनि प्रस्तुत भेल अछि।
...आ, एतेक कहैत हमरा फेर पुत्रक गप मोन पड़ैए जे ओ आब फेरसं पोथी पढ़ब शरू करता। हुनकर ई गप हमरा पठनीयताक संकट दिस ल' जाइत अछि। भारतीय आन-आन भाषाक संग मैथिलीमे सेहो ई संकट छैक। मैथिलीमे कने बेसीए। पत्र-पत्रिकाक अभावे छैक। पढ़निहार कत'? आब फेसबुको पर लोक कथा नहिए सन पढ़ैत छथि। तर्जनीक उपयोग 'लाइक' पर क' लैत छथि। माने ई जे कथाकार बुझथि जे हुनक कथा देखल गेलनि। मुदा, ताहि सं की? कथाकार एत्तेक लिखि रहल छथि, से....
एहि आशयक गप सेहो बेटाकें कहलियनि। तं कहलनि- 'अहांक काज लिखब अछि। अपन समयकें लिखि क' समाज लेल अंकित करब। समय औतैक आ पढ़निहार सेहो। जं लिखले नहि रहतै त' की भेटतै ओकरा? दोसर बात ई जे...
...दोसर बात ई जे...जखन ताकल जयतै त' सभक हिस्साक काज ताकल जयतै, 'कूरी' लगाओल जयतै। अहांक लिखले नहि रहत, त' की लागत?'
बेटाक गप हमरा काल्हि बड़ नीक लागल छल।
ई गप आइयो नीक लागि रहल अछि आ तें आदरणीय विभूति भाइक विशाल कथा-भंडारकें देखैत बुझाइए जे आब' बला समयमे हिनक साहित्यिक काजक हिस्सामे 'कूड़ी' नहि, 'पथार' लगतनि।
जाहि गतिएं ई लिखि रहल छथि, ओ गति अक्षुण्ण रहनि आ अपन हिस्साक काज एही इमानदारीसं करैत रहथि। शुभकामना।
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