Monday, August 26, 2024

मकड़ी (मैथिली कथा - प्रदीप बिहारी) MAKADEE (Maithili Short Story by Pradip Bihari)

मकड़ी



प्रदीप बिहारी


सौंसे बजारमे हल्ला पसरि गेलैक जे एकटा मौगी अयलै-ए। सिलाइ मशीन चलबैत छैक। नव-पुरान कपड़ा सीबैत छैक। बड़ सुन्नरि छैक। एकसरिये छैक। ओकरा संगमे केओ नहि छैक आ ओ ककरो दिस तकितो ने छैक।
दारू आ चाहक दोकान वाली मौगी सभ अपन संसद शुरूह कऽ देने रहैक। भागि कऽ आयल होयतैक। घरबला छोड़ि देने होयतैक। चोरनी होयति। छिनारि होयति।
एकटा दोसर मौगी बजलैक, ‘‘जरूरी छै जे अधलाहे होयतै। नीक लोक नहि भऽ सकै छै। इहो तँ भऽ सकैत छै जे...’’
मुदा सत्तारूढ़ मौगी ई कहि ओकरा चुप कऽ देलकैक जे सतबरती रहितै, तँ दिल कुमारीक घरमे किराया नहि लैतै। दिल कुमारी अपने ने कतेक घाटक पानि पीने अछि। ओकर किरायादार की सैंतलि होयतै?
जे, से। समय बीतऽ लगलैक। सुनीता नवसँ पुरान होमऽ लागलि। दिल कुमारी ओकर व्यवसाय आ जीवनमे अनेरे कोनो हस्तक्षेप नहि करैक।
दिल कुमारीकें ओ ‘काकी’ कहऽ लागलि।
आब किछु स्त्रीगण सेहो ब्लाउज आ साया सियाबऽ या भंगठी कराबऽ आबऽ लगलैक। मुदा, बेसी काज जुअनके छौंडा सभक ओकरा लग आबऽ लगलैक।
ओ अनुभव कयलकि जे ओकरा अयलाक बाद जुआन सभक पेन्ट आ अंगा बेसी फाटऽ लगलैक अछि। सभ ओकरे लग कोनो-ने-कोनो बहन्ने आबि जाइक।
मौगी सभक संसदमे प्रस्ताव पारित भऽ गेलैक। जँ मीठ नहि छैक, तँ चुट्टी किएक सोहरैत छैक?
सुनीताकें अपन खर्चक योग्य आमदनी भऽ जाइक। आर बेसी ओकरा किएक चाही? ओकर के छैक? ने आगू, ने पाछू।
एकटा गहिंकी आयल छलैक। नगरपालिकाक मेहतर। ओ कहलकै सुनीताकें, ‘‘हमरा बेटीक बियाहमे किछु कपड़ा सिअयतै। सीबि देबहक बहिन? तोहर सिलाइ किछु देबह आ किछु उधारी रहि जेतह। अगिला मास देबह।’’
सुनीताकें लगलैक जे जीवनमे पहिल बेर केओ ओकरा बहिन कहलकै-ए। ओ द्रवित भऽ गेलि, ‘‘तोरा बेटीक बियाहमे जतेक कपड़ा सीअयतह, हम एक्कहुटाक पाइ नहि लेबह। जाह! जहिया मोन होअऽ दऽ जइयह।’’
जानि नहि, सुनीताकें ओहि राति की भऽ गेलैक? निन्ने ने होइत छलैक। ओहि गहिंकीक गप्प बेर-बेर मोन पड़ैत छलैक, ‘‘हम तँ जानि-बूझि कऽ फाटल-पुरान लऽ कऽ तोरा लग अबैत छी। तोहर रूप हमरा मोहने जाइत अछि। तों एकटा मरद किएक ने कऽ लेत छह। असगरे कतेक खटबह?’’
सुनीता डाँटि कऽ भगा देने छलि ओहि गाँहककें। ओकरा कपड़ा सेहो घुरा देने छलि।
मुदा, सुनीता बेर-बेर अयनामे अपन मुँह देखैत छलि। साँचे, ओ एखनहुँ सुन्नरि अछि। ओकर बयसे की भेलैक अछि। बड़का घरक बेटी रहैत तँ एखनि बियाहो नहि भेल रहितैक। बीस-एकैस कोनो बयस होइत छैक? ई बयस तँ पोखरिमे चुभकऽ बला होइत छैक...साओनक झूला झूलऽ बला होइत छैक...कोनो राजकुमारक सपना देखऽ बला होइत छैक।मुदा, पुरुषक प्रतापें सुनीताकें एही बयसमे गृहस्थी सम्हारऽ पड़ि रहल छैक।
ओकरा बियहुआ मोन पड़लैक। पहिल बियाह, बियाह सन भेल रहैक। वर अयलैक, बरियात अयलैक। गाजा-बाजा बजलैक। खूब धूम-धामसँ ओकर वियाह कयने रहैक ओकर बाप। माय तँ ओकरा अबोधेमे छोड़ि अनका संग चलि गेल रहैक। तें सभ निमेरा ओकर बाप कयलकै।
ओहि समय सुनीताक बयसे कतेक रहैक? पनरह मे छलि। ई कोनो बियाहक बयस होइत छैक? मुदा, ओकरा बापकें अल्प बयसहिंमे विकसित ओकर देह अबूह लागऽ लगलैक। दोसर आशंका एहि बातक रहैक जे माये जकाँ इहो ने ककरो संग माया-पिरती जोड़ि लिअय आ...। तेसर स्वार्थ प्रायः ई रहैक जे बेटीकें बिदा कऽ देने दारू पीब लेल छुट्टा भऽ जायत। केओ रोकनिहार नहि रहतैक।
आ तें सुनीताकें गरदामी पहिरा देलकैक ओकर बाप।
मुदा, छओ मास नहि बोतलैक कि अनर्थ भऽ गेलैक। सुनीताक सीउथ उज्जर भऽ गेलैक। चूड़ी फुटि गेलैक आ पोते टुटि गेलैक। लोक सभ सरापऽ लगलैक। सालो ने बीतलैक कि बियहुआकें खा गेलि।
सुनीताक चारूकातक संसार सुन्न भऽ गेलैक। कतहु किछु नहि। चारूकात अन्हारे अन्हार। कतहु कानो प्रकाश-पुंज नहि देखाइत छलैक ओकरा।
बियहुआक विरासतमे भेटल रहैक एकटा देशी गाय, जकर सेवा-सुश्रुषा करय। दूध बेचय आ दिन काटय।
मुदा, बयसकें बेसी दिन धरि गाड़ि कऽ तँ नहि राखल जा सकैछ।
किछु गोटें लोभायल रहैक सुनीता पर आ किछु धपायल। मुदा, समय सुनीताकें साकांक्ष बना देने रहैक। ओ भावावेशमे ककरो जालमे फंसऽ बाली नहि छलि।
किछु छौंड़ा सभ तँ हाथ धो कऽ ओकरा पाछाँ पड़ल छल। ओकरा घर पर अयबाक हिम्मति तँ नहि करैक, मुदा साँझ खन कऽ जखन घास आनऽ बाध दिस जाय, तँ छौंड़ा सभ किछु-ने-किछु टोनैत रहैक ओकरा।
जखने काली खोला पार कऽ चाहक दोकान दिस मुड़य कि हेम बहादुर टहंकारसँ गीत उठाबैक, ‘‘मानै ने छौड़ी हमर बतिया...फेरै ने एको बेर अंखिया.....हो ऽऽऽ हो ऽऽऽ।’ आ सुनीताक संगी सभ ओकरा खौंझाबऽ लगैक। एक बेर फेरही नजरि हेमे दिस। छौंड़ा जुआन छै। सुन्नर छै। तरहत्थी पर रखतौ। आर-आर बहुत रास बात सभ कहऽ लगैक, मुदा सुनीता लेल धनि सन।
ओहि दिन सुनीता काली खोला दिस नहि गेलि। सतीघट्टा बगान दिस चलि गेल- एकसरिये। जानि नहि किएक, बाट भरि हेम बहादुर ओकर मानसपटल पर जगजियार होइत रहलैक। आइ ओ छौंड़ा काली खोला लग एकर बाट तकिते रहि जयतैक। मुँहक गीत मुँहेमे रहि जयतैक छौंड़ाक।
सतीघट्टा बगानमे निश्चिन्तसँ घास कटैत छलि सुनीता। कने कालक बाद एकटा गीत सुनाइ पड़लैक- ‘माया को बाड़ी ना पिरती को फूल, संभाली राखऽ है कुसुमे रूमाल...।’
सुनीता चैंकि गेलि। ई तँ हेमेक स्वर छैक। एम्हरो चलि अयलै छौंड़ा। ई तँ दिक् कऽ देलकै। ओ सोचलकि। आइ जे ने झड़ान झाड़ति जे...।
पुनः दोसर मोन कहलकै। छौंड़ा कोनो बेजाय तँ नहि छै। यैह ने कने अहदी छै। एसगरुआ छै छौंड़ा, तें ने जेना-तेना रहैत छै। दोसरति भेटतै, तँ सम्हरि जयतै। ओकरो तँ एकटा पुरुष चाही। दुनू मिलि कऽ कमायत-खटायत। समय बीतैत रहतैक।
मुदा, ओ हेम बहादुरकें बोर्डर पर दू-नम्मरी धंधा नहि करऽ देति। बहुत रास दोसर-तेसर काज छैक। नीको काजसँ पेट भरैत छैक...।
सुनीताक गफ्फा घाससँ भरि गेल छलैक। गफ्फा दुखयलैक तखन अख्यास भेलैक। ओह..। ओ की सोचऽ लागल छलि। धुर जो....। ओ स्वयं मुस्कियाइति छलि। ई की भऽ रहल छै ओकरा?
आ कि तखने हेम बहादुर जुमि गेलैक। बाजल ओ छौंड़ा, ‘‘आखिर कहिया धरि अपन कोमल हाथ सँ हंसुआ धरैत रहबही, सुनीता?’’
सुनीता बाजलि, ‘‘देख हेमे! बरोबरि जे हमरा पछुअबैत रहैत छें, से नीक बात नहि। तोरा मोनमे की छौक? तौं अपन बाट किएक ने बदलैत छें?’’
हेम बहादुर छक्का मारलक, ‘‘हमरो मोनमे वैह बात अछि, जे तोरा मोनमे छौ। हम तोरा चाहैत छियौ। हम तोरा सँ बियाह करऽ चाहैत छी। हम चाहैत छी जे अपन दुनू गोटें...।’’
सुनीता बिच्चहिमे रोकलकि, ‘‘अपन मुँह देखलेहें। इह! हमरा सऽ बियाह करता। तोरा सऽ के बियाह करतौ? जकर सभ साँझ कान्छीक दारूक दोकानमे बीतै छै, तकरा बुतें बहु की डेबल हैतै?’’
मुदा, हेम बहादुर मानऽ बला नहि छल। ओ बाजल, ‘‘हम तऽ सदिखन तोरे मुंह देखैत रहै छियौ, तऽ अपन मुँह की देखियै?’’ कने थम्हैत पुनः बाजल, ‘‘तों जनिते छें जे हमरा माय-बाप केओ नहि अछि। एकटा खोपड़ी अछि, ओहीमे रहैत छी। ओहीमे तोरो राखबौ। राखबौ मुदा माया-पिरतीक संग। आ जहिया हम आ तों एक मोन, एक परान भऽ जायब, तहिया सऽ कान्छीक होटल जायब बन्न भऽ जेतै।’’
सुनीताक देह झुनझुना गेलैक। रोइयाँ ठाढ भऽ गेलैक। करेज धड़कऽ लगलैक आ ठौंठ सुखाय लगलैक।
ओ प्रश्न-दृष्टिएँ हेम बहादुर दिस तकलकि।
‘‘सत्ते कहै छियौ सुनीता।’’
ओ तकैत रहलि।
‘‘एकदम सत्त। जे किरिया खुआ ले।’’
ओ तकिते रहलि।
‘‘विद्यानाश।’’
सुनीताकें हंसी लागि गेलैक। ओ बड़ी जोरसँ हंसलि।
‘‘हँसी किएक लागि गेलौ तोरा?’’
हंसिते बाजलि सुनीता, ‘‘तों पढ़ले-लिखल कतेक छें जे विद्यानाश बला किरिया लगतौ।’’
‘‘विश्वास नहि होउक, तऽ आर दोसर जे किरिया खुआ ले, मुदा...।’’ हेम बहादुर सुनीताक मनःस्थिति बूझि चुकल छल। ओ सुनीताक हाथ पकड़ि लेलक, ‘‘संसारक पैघ सऽ पैघ किरिया खा सकैत छी हम। खुआ ले।’’
सुनीताकें मात्र एतबे बाजल भेलैक, ‘‘आब तकर बेगरता नहि छै।’’
बहुत दूर पच्छिम दिस मेघ हड़हड़ा उठलैक। बिजुली चमकि उठलैक। लगलैक जेना ओतऽ दू गोटा नहि, एक्कहि गोटा ठाढ़ होअय।
हेम बहादुरक बाहुपाशमे सुनीताकें सुखक अनुभूति भेलैक।
मोन्हारि साँझ भऽ गेलैक। दुनू बिदा भेल। सुनीता निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि जे ओ हारलि अछि आ कि जीतलि।

दुनू दाम्पत्य बन्हनमे बन्हा गेल। टोल-पड़ोसमे फदका होमऽ लगलैक। नहूँ-नहूँ सभ किछु सामान्य भऽ गेलैक।
बियाहक बादो सुनीता अपन घर आ गायक सेवा नहि छोड़िलकि। हेम बहादुर अपन खोपड़ी अपन संगी दीपक सुब्बाक हाथें बेचि देलकैक।
दुनू कमाय-खाय लागल आ रहऽ लागल। घास काटऽ लेल सुनीता नहि, हेेम बहादुर जाइक।
समय पर समयक पथार लागऽ लगलैक।
मुदा, बहुत दिन धरि एहि तरहें नहि रहि सकल ओ सभ। हेम बहादुरक बहसल मोन छान-पगहा तोड़ऽ लगलैक। ओकर लुतुक अकास चढ़ऽ लगलैक। सुनीता अपनामे कमी ताकऽ लागलि। आखिर ओकर हेमे पुनः किएक बहकि रहल छैक।
हेम बहादुर दारू पीबि कऽ आबऽ लागल आ सभ राति कऽ दूनू प्राणीमे झगड़ा होमऽ लगलैक।
दरुपीबा पुरुष सुनीताकें किन्नहुँ पसिन नहि छलैक।
नहूं-नहूं हेम बहादुरक आन-आन बानि सभ सेहो सुनीताकें बुझबामे अयलैक। ओ हेम बहादुरकें समझाबऽ-बुझाबऽ लागलि, मुदा ओकर सभ प्रयास व्यर्थ भऽ गेलैक।
स्थिति एतऽ धरि पहुँचि गेलैक जे हेम बहादुर आठ-आठ दिन घरसँ बाहर रहऽ लागल। ओकरा लेल सुनीतासँ बेसी महत्वपूर्ण भऽ गेल छलैक कान्छी दोकानक दारू....तिनपतिया.....पपलू....फलास...।
सुनीता सभ किछु सहैत रहलि।
सुनीताकें सभसँ बेसी दुःख ओहि दिन भेल रहैक जहिया ओकर गाय बिका गेलैक। हेम बहादुर दुखित होमऽ लागल रहय। ओकरे दवाइ-बीरो लेल सुनीताकें गाय बेचऽ पड़लैक।
सुनीताक गाय दीपक सुब्बा कीनने छलैक। हेम बहादुरक दोस।
एतेक दिन सभ किछु बर्दासि कयलकि सुनीता। मुदा ओहिदिन हेम बहादुर साफे कहि देने रहैक, ‘‘आब तोरा सऽ मोन ओंगठि गेल।’’ ई गप्प सुनीताकें सहरजमीन पर आनि देलकैक। ओकरा पराजय-बोध भेलैक। लगलैक जे ओकरा जीवनमे हारिये-हारि छैक।
गाय बेचलाक बाद जे टाका भेटलैक, ताहिसँ थोड़ेक हेम बहादुरक दवाइ लेल खर्च कयलकि आ एकटा सेकेन्ड हैण्ड सिलाइ मशीन कीनलकि। वैह सिलाइ मशीन ओकरा जीवनक आबलम्ब भऽ गेल रहैक।
हेम बहादुर अपन बानि नहि छोड़ि सकल। ओकर रोग बढ़िते गेलैक। आब ओ घर आयब सेहो बन्न कऽ देने रहय। दीपक सुब्बा कहने रहैक सुनीताकें, ‘‘भौजी! दोसक रोग ठीक होमऽ बला नहि छौक। सम्पूर्ण विश्व एहि रोगक इलाज लेल अपस्याँत अछि। हम-तों की छी?’’
अन्ततः हेम बहादुरक जीवन-लीला समाप्त भऽ गेलैक। मेचीक कातमे मुइल पड़ल देखलकै लोक सभ। सुनीताकें कहलकै। ओ पाथर भऽ गेलि। देखहु लेल नहि गेलि हेम बहादुरक लहासकें।
हेम बहादुरक सेवामे ओ स्वयंकें एहि तरहे समर्पित कऽ देने छलि जे ओकरा इहो सोह नहि रहलैक जे मज्जर कहिया टिकुला भऽ गेलैक। सुनीताक हाथ-पयर भारी होमऽ लगलैक। अन्न-पानिसँ अरुचि होमऽ लागल रहैक। देह पीयर भेल जाइत छलैक। आदि आदि। आइ जखन हेम बहादुर नहि छैक, जखन ओकरा सोह भऽ रहल छैक जे ओ माय बनऽ बाली अछि।
दीपक सुब्बाक अबरजात बढ़ि गेलैक। मुदा, सुनीता ओकरा अपन उद्देश्यमे सफल नहि होमऽ देलकि।
सातम मासमे सुनीताके बच्चा भेलक। बेटा रहैक। मुदा छौंड़ा बंचलैक नहि। जनमि कऽ मरि गेलैक। दीपक दवाइ-बीरो करौने रहैक ओकर।
सुनीताक देहमे सक्क लागऽ लगलैक। ओ मशीन चलाबऽ लागलि छलि। दीपक आबैक। घंटाक घंटा बैसैक आ प्रणय निवेदन कऽ चलि जाइक।
सुनीताक मोन कोनादन करऽ लगलैक। लगैक जेना कोनो आवामे जड़ल जाइत होअय...अथाह पानिमे डूबल जाइत होअय...कोनो सड़ल-गन्हायल डबरामे उबडुब करैत होअय।
सभ पुरुषक आकृतिमे हेमबहादुरक छवि देखय सुनीता आ ओकर मोन तुरुछि जाइक।
ओ सोचलकि। दीपक सुब्बा घर-परिवार बला लोक अछि। ओकरा मात्र सुनीताक घर आ देह सऽ मतलब छै। ओ सुनीताक भऽ कऽ नहि रहि सकैछ।
ओ नियारलकि। आब बेसी दिन धरि अपन चेतनाकें ठाकि कऽ नहि राखि सकैछ। ओकरा की चाही? ओकरा नहि चाही सिन्नुर आ ने कोनो इलबाइस। ओकरा किछु नहि चाही। मात्र जीबाक लेल चाही पाँच हाथ वस्त्र आ पाँच कऽर अन्न। से ओ मशीन चला कऽ उगाहि लेति। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नहि चाही। ई घर नहि चाही। ई घर ओकरा काटि कऽ खा जयतैक। एत' भरि घर हेमे बहादुर देखाइत छै ओकरा।
आ एक दिन सुनीता अपन मशीन आ मोटा-चोटा उठौलकि आ आबि गेलि बजार। दिल कुमारीक घरमे किरायामे रहऽ लागलि।




दिलकुमारी केबाड़ पीटलकै, तखन तंद्रा भंग भेलैक सुनीताक। ओ हड़बड़ायलि। उठलि। राति भरि जागबाक उझकी रहैक। अंगैठी-मोड़ कयलकि। मोन भेलैक जे आइ काज नहि करय। दिन भरि आरामे करय।
मुदा से भऽ नहि सकलैक। नगरपालिकाक मेहतर अपन बेटीक बियाह वला कपड़ा आ नाप सभ दऽ गेलैक। संगहि एकटा समाद सेहो कहने रहैक, ‘‘बहिन गे! प्रधान पंच तोरा बजलकौ-ए। आइये दू बजे। आॅफिसमे।’’
सुनीता अचरजमे पड़ि गेल। प्रधान पंच ओकरा किएक बजौतैक? ओकरासँ कोनो अपराध तँ ने भऽ गेलैक अछि।
एतऽ अयलाक बाद कतोक आँखिक प्रहार सहलकि अछि सुनीता। बहुतो लोक हुलकी-बुलकी देलकैक। एक दिन दीपक सुब्बा सेहो आयल रहैक, मुदा ओ ओकरो मंँह दुसि देलकि। ओ अपरतीव भऽ कऽ चलि गेल। सुनीता अपन निर्णय पर दृढ अछि। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नहि चाही।
पुनः एकटा प्रश्न ओकरा मोनके हौंड़ि दैक। प्रधान पंच किएक बजौलकै-ए?
ओ कार्यालय पहुँचलि। प्रधान पंचसँ बजयकबा कारण पुछलकि। प्रधान पंच पुछलकैक, ‘‘तों एकसरिये रहैत छें?’’
‘‘हँ।’’
‘‘आर केओ?’’
‘‘केओ नहि।’’
‘‘एकटा काज कऽ सकैत छें?’’
सुनीताकें डर भेलैक। ओ डेरायलि बाजलि, ‘‘कोन काज?’’
‘‘कोनो खराप काज करऽ नहि कहैत छियौक।’’ प्रधान पंच एकटा अबोध बच्चा दिस संकेत करैत बाजल, ‘‘देख! ई अबोध अनाथ छैक। तोरो केओ नहि छौक। एकरा पोस। धर्मो होयतौक। पाछाँ जा कऽ ई बुढ़ारीक सहारा होयतौक। नगरपालिकासँ एकर खर्च सेहो भेटतौक, ‘‘एक सय टाका मास।’’
सुनीता ओहि छौंड़ा दिस तकलकि। देखनुक रहैक छौंड़ा। तीन-चारि बर्खक रहल होयतैक। ओ सकपका गेलि। बाजलि, ‘‘विचारि कऽ कहब।’’
‘‘ककरा सँ?’’
‘‘अपना मोन सऽ....काकी सऽ।’’
ताबत ओ अबोध आबि कऽ सुनीताक आँचर पकड़ि लेलक। सुनीता पुनः ओहि छौंड़ाकें देखलकि। ओकर वात्सल्य उमड़ि गेलैक। ओकर मोन पिघलि कऽ आँखि बाटें बहार होमऽ लगलैक।
क्षणहिं ओ नोर पोछलकि। नहि, ओ एक सय टाकामे एकटा घेध नहि लेति। स्वयंके कोनो सम्बन्धमे नहि बान्हति। कोनो सम्बन्ध नहि...कोनो सरोकार नहि...।
छौंड़ा आँचर पकड़नहिं छल।
दोसर मोन कहलकैक। ई घेघ नहि। कंठी-माला छौक-राम नामा। ई नहि ठकतौक। ई धोखा नहि देतौक। कतहु पड़ा कऽ नहि जयतैक।
सुनीतक मोन सकपक करऽ लगलैक। ओकर करेज जोर-जोरसँ काँपऽ लगलैक। ओ किछु निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि।
लोक सभ देखैत रहलैक। करुणा आ ममताक विचित्र दृश्य उपस्थित भऽ गेलैक।
सुनीताकें लगलैक जेना क्षणहिमे माया, मोह, स्नेह, भूख, प्यास आ ओकर सम्पूर्ण संवेदना जागि उठल होइक। ओकरा सकपंज कऽ लेने होइक। ओकरा हरलै ने फुरलै, ओहि नेना दिस तकलकि आ ओकरा कोरामे उठा कऽ चुम्मा लेबऽ लागलि।
मातृत्वक सजीव मूर्ति बनि गेलि सुनीता।
सुनीता कागज बनौलकि। नगरपालिका दिससँ तीन मासक अग्रिम भेटलैक आ छौड़ाकें लऽ कऽ डेरा आएलि।
सुनीताक निर्णय दिल कुमारीकें सेहो नीक लागल रहैक।
छौंड़ा बौक छलैक। छौंड़ाकें बौक होयब सुनीताकें कने झूस बना देने रहैक। ओ छौड़ाकें बजयबाक प्रयास करऽ लगलि।
ओहि राति सुनीताकें लागल रहैक जेना ओ खूब सुखसँ सुतलि होअय। बौकाकें करेजमे साटि कऽ सुतलि छलि। अपन जनमल नहि भेलैक ताहिसँ की? ओकर मातृत्व सजग भऽ गेलैक। मातृत्वक सम्पूर्णताक बोध भेल रहैक ओहि राति।
छौंड़ा बौके नहि, अखलाह सेहो छलैक। मुदा सुनीताक लेल ओ सोन सन छलैक। आब सुनीता ओकरा अपन संग काज-बट्टम बला काजमे सेहो लगाबऽ लगलैक।
शुरूहमे छौंड़ा बड़ तंग करैक ओकरा। काज दिस बट्टम लगा दैक आ बट्टम दिस काज बना दैक। नहूँ-नहूँ सुनीता ओकरा सीखाबऽ लागलि। छौंड़ा सीखि लेलक।
मुदा छौंड़ाक एकटा बानि एखनो छैके। एखनो ओ सुनीतक करेजेमे सटि कऽ सुतैत अछि। एक हाथ सुनीताक देह पर, दोसर...आ टाँग सुनीताक दुनू टाँगक बीच घोसिया कऽ...निर्विकार भावें सुति रहैक बौका। सुनीताक मातृत्व छिलकि जाइक। ओहो ओकरा पजिया कऽ सुति रहय।
ओना दिल कुमारी एक दिन मना कयने छहैक, ‘‘बौकाक ई आदति नीक नहि छैक। एखनि ने नेना छौक। नेने की? आब तऽ सियान भेल जाइत छौक। ओकर एहि आदतिकें छोड़ायब जरूरी।’’
सुनीता बाजि उठलि, ‘‘काकी। तोरो मोनमे पापे उठैत छौक। धुर जो....।’’

समय बीतऽ लगलैक। सुनीताक मशीनक चक्का चलऽ लगलैक। बौका काज-बट्टम करऽ लागल।
समयक संग मंहगी बढ़लैक। मजूरी, दरमाहा बढ़लैक। बढ़लैक कपड़ाक सिलाइ। बाट बढ़लैक। पीच रोड बढ़लैक। मोटर गाड़ी बढ़लैक। उड़ीस-मच्छर बढ़ि गेलैक। लबरै-लुचपनी बढ़लैक। दू-नमरी धंधा आकास छूबऽ लगलैक।
घरक किराया बढ़ि गेलैक। सुनीताक दोकान आ सुतबाक कोठरी फराक भऽ गेलैक। नगरपालिकासँ भेटऽ बला टाका बन्न भऽ गेलैक।
दिलकुमारीक बयस बढ़ि गेलैक।
बौका सेहो जुआन होमऽ लागल। सुनीता प्रौढा होमऽ लागलि।
समय बदललैक। राति-दिन मासमे बदलि गेलैक। मास बर्खमे। बर्ख युगमे। पंचायती व्यवस्था बदललैक। प्रधान पंच बदलि गेलैक। मेयर भऽ गेलैक। जनमत संग्रह भेलैक। आम चुनाव भेलैक। प्रजातांत्रिक व्यवस्था भेलैक। संविधान बदललैक।
मुदा, बौकाक बानि नहि बदललैक।
सुनीताकें लगैक जे ओ डोलि ने जाय। ओ बौकाक ओछाओन फराक कऽ देने छलि। मुदा बौका राति-राति भरि जागि कऽ बिता दैक। प्रात भेने जखन काज-बट्टम करैक तँ निसभेर भेल बुझाइक। आँगुरमे सुइया भोंकि लैक। सुनीताक ममता जागि जाइक।
एतेक दिन तँ नहि, मुदा आब बौका सुनीताक गराक घेघ बनि गेल छैक। सुनीता विचित्र उहापोहमे फंसलि छलि। बौका ओकरा गरदनिक ढोल बनि गेल छैक। ने बजौनहिं कल्याण आ ने हटौनहि शान्ति। कतऽ जयतैक छौंड़ा?
माघक पाला पड़ैत छलैक। दोकान बला कोठरीमे बौकाक ओछाओन कऽ देने रहैक सुनीता। मुदा छौंड़ा नहि मानलकैक। अन्ततः सुनीता अपन कोठरी बन्न कऽ लेलकि। बौका दोकान बला कोठरीमे ठिठुरैत रहल।
सुनीताकें सेहो निन्न नहि भेल रहैक। एकटा आशंका जगौने रहैक। बौका सुतलै आ कि जगले छैक?
ओ केबाड़ फोललकि। बौकाकें ठिठुरैत देखि ममता जागि उठलैक। ओकरा पुनः अपने लग बजा लेलकि। बौका गेल आ सुनीता लग अपन बानिक अनुसारें निर्विकार भावें सुति रहल- एकटा हाथ सुनीताक देह पर...दोसर...आ टाँग...। ओ निन्न पड़ि गेल।
ई क्रम पुनः चलऽ लगलैक। एही क्रममे एक राति डोलि गेलि सुनीता। कोन सीमा धरि संयमित रहितय? ओकर संयम टुटि गेलैक। सीमा पार कऽ गेलि। ओकर चेतना मरि गेलैक। ओ घिना गेलि।
मुदा, बौकाक लेल धनि सन। ओकरा ने हर्ष होइक आ ने विषादे।
प्रात भेने सभ किछु सामान्य रहैक। असामान्य मात्र एतबे रहैक जे सुनीता भरि मोन बौकाकें देखि नहि पाबय। ओकरा ग्लानि होइक। मोन होइक जे एहि घिनायल जिनगीसँ मुक्तिये उचित। मुदा बौका? ओकरा बाद बौकाकें के देखतैक?
आ सुनिता किछु नहि कऽ पाबय।
अपन सभटा असमर्थता एक दिन दिल कुमारीकें कहने रहैक सुनीता। दिल कुमारी सभ किछु सुनि लेने छलि आ अन्तमे बड़ निर्दयी भऽ बाजलि छलि, ‘‘जाहि दिन एहि छौंड़ा के जिम्मा लेलही, तहिया नहि बुझलही जे नमहर भऽ कऽ इहो पुरुषे हेतै।’’
आ सुनिता किछु नहि कऽ पाबय।
‘‘मुदा बौकाक कोन दोष छैक, काकी? ओकर कोनो दोष नहि छैक। हमहीं...।’’

एक दिन साँझ खन बौका बजार दिस बहार भेलैक, से घुरि कऽ नहि अयलैक। चारूकात ताक-हेरीमे लागि गेल सुनीता। रीति बीति गेलैक, मुदा बौका नहि अयलैक।
पाँच दिन बीति गेलैक। सुनीता कात करोटक सभ शहर-बजार आ गाम घर छानि लेलकि, मुदा बौका ने भेटलैक आ ने अयलैक।
सुनीता हारि कऽ बैसि रहलि। ओकर मोन हदमदाय लागल रहैक। देहमे कोनेा सक्के ने लगैक।
दिलकुमारी ओकरा सम्बल देलकैक ओहि दिन। ओ सुनीताक माथ अपन जाँघ पर राखि लेने रहैक आ ओकर केश पर हाथ फेरऽ लगलैक। सुनीताक जीवनमे पहिल बेर मायक छाँह सन लगलैक दिन कुमारीक स्नेहिल हाथ।
कने कालक बाद दिल कुमारी बाजलि, ‘‘उठ! आब बौका नहि औतौ। चल अस्पताल। खसबा दैत छियौ।’’
सुनीता टुकुर-टुकुर दिल कुमारी दिस ताकऽ लागलि। ओ कोनो निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि। दिल कुमारी बाजलि, ‘‘जाधरि मरैत नहि छें, मशीन चलाबहि पड़तौक। लोकक फाटल-पुरान सीबहि पड़तौक।’’

सुनीताक सिलाइ मशीन रखनहुँ चलिते छैक। कपड़ा सीबि लेलाक बाद ओ एकबेर विराट शून्यमे तकैत अछि...तकैत रहैछ, मुदा तखनहिं दिल कुमारी ओकरा तंद्रा भंग कऽ दैछ, ‘‘ला! काज-बट्टम कऽ दैत छियौ।’’

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न्यू कालोनी उलाव (बेगूसराय)/ 25.08.1997

संग्रहित :  कथा-संग्रह 'मकड़ी' ( मार्च 2020)
                कथा-संग्रह 'भरि राति भोर'
हिंदी अनुवाद : साक्षात्कार - 223, जुलाई 1998, अनुवादक- अविनाश
ओड़िया अनुवाद : अनुवादक- पारमिता षडंगी, 'साहित्य दर्पण' (मार्च-मई 2021 ई) मे प्रकाशित।

 

Saturday, August 17, 2024

शेष (मैथिली कथा)- प्रदीप बिहारी

शेष


प्रदीप बिहारी



ऑफिसमे सीमाक पयर पड़ितहि लगलैक जेना सम्पूर्ण कार्यालय महमह भ' उठल होइक। कर्मचारी आ अधिकारी सभ कने साकांक्ष भ’ उठैत छलाह। एतबे नहि, ग्राहक सभ सेहो कने सचेत होइत छल।
सीमा भीतर आयलि आ अपन बानिक अनुसार भूषण बाबू लग जा क’ अपन चेक-बुक पटकि देलकि, ’कने जल्दी पेमेन्ट करबहो।’ आ पुनः एम्हर-ओम्हर तकैत लोक सभक हालचाल पूछ’ लागलि। हालचाल पुछबाक ओकर अपन विधि छैक। बेसी लोककें आंखियेसं हालचाल पुछैत छैक ओ।
सीमाक नजरि सुभाष पर अंटकि गेलैक। ओ भूषण बाबूसं पुछलकि, ’ई नया स्टाफ अयल’ हन कि?’
’हं! दसो दिन नहि होलै हन।’ बजलाह भूषण बाबू, 'से किए? पसिन छओ कि?’
’धौर मर्दाबा।’ बाजलि सीमा, ’सैह हिबलयै। बच्चे हइ।’
ग्राहकमे सं एक गोटें बाजल, ’आब एकटा बहिक्रम भेल जाइ छह सीमा देवी।’
सीमा ओकरा उतारा देलकि, ’धौर मर्दाबा! हे हओ! जेना मरद कहियो नहि बुढाइ हइ, तेना हम पुरूफ कर’ चाहै छियै जे मौगियो कहियो नहि बुढाइ हइ।’
नहूं-नहूं बजबाक हिस्सक नहि छैक सीमा देवीक। सभ सुनलक। किछु गोटे हंसल। किछु चुप रहल।
सुभाषकें अचरज लगलैक। विचित्र माउगि छैक। ओ देखैत रहल। सीमाक काज भूषण बाबू स्वयं उठि क’ क’ देलखिन। ओ कैश काउन्टरक पाछां जा क’ टाका लेलकि आ टाका गनैत सुभाषक टेबुल लग आयलि आ पुछलकि, ’कत’ घर होल’ साहेब।’
सुभाष अपन ग्राम्य जिलाक नाम कहलकै।
’तखन तं अपने मिथिला के होइ छियै।’ भाषा परिमार्जित क’ बजबाक प्रयास कयलकि सीमा।
'अहूं मिथिले के छियै। इहो मिथिले छैक।’
सीमा एकटा गहींर नजरियें सुभाषकें देखलकि आ आगां बढ़ि भूषण बाबूकें कहलकनि, ’ई नवका स्टाफ तं चेहरे स’ बच्चा लगै ह’। मोन स’ त’ पकठोस बुझाइ हइ।’
भूषण बाबूकें विनोद सुझलनि, ’त’ की बूझै छहो? एक दिन जांचि, लियहो। तखने ने बुझबहक जे....।’
’धौर मर्दाबा।’ बजैत सीमा जहिना हनहनाइत आयलि तहिना दनदनाइत चलि गेलि।
सुभाषकें मोन पड़लैक गामक सलहेश नाच आ ओकर गीत- 'चलै छै मलिनियां बेटी, धरती धमकबै छै...।’
सीमा चलि गेलि। पुनः कार्यालयक स्थिति पूर्ववत्। जाधरि सीमा कार्यालय परिसरमे रहैत छैक, कार्यालय दलमलित भेल रहैत छैक।
जलखै बेरमे सुभाष सीमा देवीक मादे पूछने रहय अपन सहकर्मी सभसं। रंजन तुरन्ते उतारा देलकै, ’सीमाकें के नहि जनै हइ?’
’कोन चिड़क नाम छिकै सीमा, से त’ देखबे केलहो।' दोसर सहकर्मी।
'एहीठाम अस्पतालमे काज करै हइ। नर्स हइ।’
'अनुकम्पा बला नोकरी हइ। ओकर घरबला अही कम्पनीमे काज करै। मरि गेलै।’
सीमाक विधवा होयबाक गप्प सुभाषकें आर अचरजपूर्ण लगलैक। सीमाकें देखने कतहुसं नहि लगैत छैक जे ओ विधवा होइक।
'पहिने हेल्परमे नोकरी भेलै। बाद मे नर्सिंग बला ट्रेनिंग केलकै, तं आब नर्स छिकै।’
'से जे होउक, मुदा हइ बड़ मस्त-मस्त...।’
एकटा ठहक्का पड़लैक। सीमाक चर्चा ओहि दिनक जलखै बेरक मूल विषय बनल रहलैक।
सुभाषक जिज्ञासा शान्त भ’ गेलेक।
सीमा मासमे तीन-चारि बेर अबस्से अबैत छैक बैंक। मुदा, कोनो-ने-कोनो बेगरते ल’ क’। अनेरे कहियो नहि देखलकैए सुभाष।
एक दिन शर्माजी पुछलखिन सीमासं, 'अएं हइ सीमा देवी। सब दिन भूषणे बाबू लग बैसै छहक, की बात छै?’’
निधोख भ’ क’ बाजलि सीमा, ’अपन बौडी नहि देखै छहो! फुकना जकां फूलल ह’। तोरा बुते की होत?’
आ कि तखनहिं भूतपूर्व सैनिक रायजी बजलाह, ’आ हम हइ?’
'हं। तों छहो-स्टील बॉडी।’
सुभाष दिस संकेत करैत भूषण बाबू पुछलखिन, 'आ सुभाष?’
'धौर मर्दाबा!’ बजैत सीमा हॉलसं बहार भ’ गेलि।
एक बेर फगुआक छुट्टीसं पहिलुक दिन सीमा आयलि। बड़ भीड़ रहैक। भूषण बाबू ओकर चैक राखि लेलनि आ बजलाह, ’जाह! भीड़ सठि जयतै तखन अबिहो।’
सीमा चलि गेलि।
सीमा पुनः आयलि तखन भीड़ सांचे सठि गेल रहैक। भूषण बाबू ओकरा टाका देलनि। सीमा कने काल बैसलि। सभ अपन-अपन कार्यालयी काजसं निवृत होइत गेल आ तखन शुरू भेलैक फगुआ खेलबाक प्रक्रिया।
सुभाष देखैत छल। सीनियर सभ रंग, पेनक मसि, पैड इंक आदिसं प्रायः त’र क’ देलकै सीमाकें। सीमा सेहो सभकें रंग-अबीर लगौलकि।
भूषण बाबू तं ठाम-कुठाम मे कतेको मोहर छापलनि।
सर्वथा नव कर्मचारी होयबाक कारणें वा अन्य कोनो कारणें सुभाष ओकरा रंग लगाब’ नहि गेल। सुभाषकें नीक नहि लगलैक।
ओम्हरसं निवृत भेलाक बाद एक बाकुट अबीर नेेने सीमा सुभाष लग आयलि। सुभाष मना कयलकै। कागज-पत्तर छैक। लेजर-रजिष्टर छैक।
सुभाष अपन टेबुल छोड़ि बहार भ’ गेल। ओ सीमाकें कहलक, 'एहुना कतहु लोक रंग खेललक-ए। बगय देखै छहक?’
सीमा फगुनायल टोनमे बाजलि, 'जे जिएगा से खेलेगा फागु।’ आ बाकुट भरि अबीर सुभाषकें लगा देलकि।
सीमा बहार होम’ लागलि आ कि रायजी पुछलखिन, 'सुभाषक गाल ऐंठि लेलहो कि?’
'धीर मर्दाबा!’ बजैत सीमा बहार भ’ गेलि।

समय बीतैत गेलैक। सीमा ओहिना हनहनाइत आबय आ वातावरणकें दलमलित क’ गनगनाइत चलि जाय।
बर्ख पर बर्खक पथार लागि गेलैक।
सुभाष गृहस्थ भ’ गेल।
मुदा, एकटा स’ख सुभाषकें लगले रहलै। आन-आन कर्मचारी जकां सुभाषक संग सीमा कहियो चौल नहि कयलकै। ओकरा मोन लागल रहलैक जे सीमा ओकर संग चौल करौक।
एही क्रममें एकटा खगता भेलैक सुभाषकें। ओकरा अपन दुनू पुत्रक नामांकन कम्पनी द्वारा प्रायोजित विद्यालयमे करयबाक छलैक। ज्ञातव्य जे एहि विद्यालयमे नामांकन हेतु कम्पनीक कर्मचारी सभक नेना वरीयताक क्रममें पहिल मानल जाइत छैक। बैंकक कर्मचारीक नेना सभक नम्बर सभसं अन्तमे, खाहे ओ कतबो मेधावी किएक ने होअय।
एहि असमानता हेतु ओहि विद्यालयक प्राचार्यसं बहुत रास वाद-विवाद कयने रहय सुभाष। अन्ततः ओकर दुनू पुत्रकें नामांकन हेतु आयोजित प्रतियोगिता परीक्षामे सम्मिलित होयबाक अनुमति भेटलैक। आ ओकर दुनु पुत्र प्रथम अयलैक।
प्राचार्यक अनुसारें सुभाषकें एकटा आर औपचारिकता पूरा करएबाक छलैक। कम्पनीक कोनो कर्मचारीसं प्रमाण-पत्र दिअयबाक छलैक जे दुनू नेना ओकर सम्बन्धी छैक।
सोचय लागल सुभाष। कोन सम्बन्ध देखेतैक? आ ई समस्या भूषण बाबू लग रखने छल। भूषण बाबू झट बाजि उठलाह, 'ई कोनो समस्या नहि भेलैक। ई मात्र औपचारिकता छिकै। एडमिशन भ’ गेलाक बाद कतहु किच्छो नहि। आइए ब्योंत क’ दै दिअ’।’
ओही दिन किछु क्षण बाद सीमा आयलि। भूषण बाबू ओकरा सभ गप कहलनि आ ओ मानि गेलि। तखनहिं आवेदन-पत्र टाइप भेलैक। सीमा दवी दसखत कयलकि।
सुभाषक मोनमे एकटा संशय भेलैक। आवेदनमे सुभाषक पुत्र द्वयक मादे सीमा देवी अंग्रेजीमे घोषणा कयलकि, 'बोथ कैन्डिडेट्स आर माइ ग्रैण्ड सन।’
सुभाष इथ-उथ मे छल आ कि सीमा कहलकै, ’चलहो वेलफेयर विभाग। ओहिजय सार्टिफिकेट बनतह’ आ आवेदन ल’ सीता कम्पनीक प्रशासकीय कार्यालय दिस बिदा भ’ गेलि। सुभाष पछोड़ धयलक। ओकरा लगलैक जे कतहु फंसि रहल अछि।
कल्याण विभागमे कोनो प्रकारक असुविधा नहि भेलैक सुभाषकें। सभ चिन्हल लोक। सभ बुझैत छैक जे ई मात्र एकटा औपचारिकता छैक-खानापुरी।
प्रमाण-पत्र बनि क’ तैयार भ’ गेलैक आ सुभाषक हाथमे आबि गेलैक। तखन कल्याण पदाधिकारी महतो जी पुछलखिन सीमासं, 'अएं हइ! ई तोहर सम्बन्धी कोना भेलखुन? ई तं तोरा जातिक नहि छथुन?’
आ कि सीमा बाजि उठलि, 'धौर साहेब! तोहूं आर कमाल करै छहो। हमर बेटी हिनके संगे लव-मैरिज कने रहै ने। तखन ई दुनू बच्चा हमर नाती नञि होलै? नाती के अंग्रेजीमे गैण्ड सन नहि कहब करै हइ की?’
सभकें अचरज लगलैक। सीमाक प्रत्युत्पन्नमतित्व पर सुभाषकें सेहो।
सीमा देवी ओहू कार्यालयकें दलमलित कयने बहार भ’ गेलि।
किछु दिनक बाद सीमा बैंक आयलि। परिसरमे पयर दितहिं सभ पूर्ववत् अपन-अपन हंसी ठट्ठासं ओकर अभिवादन कयलकै, मुदा ओ कोना उतारा नहि देलकि। ओ सोझें सुभाष लग जा क’ बैसलि, 'जल्दीसं हमर काज करा दहो।’
आ ओहिदिनक बाद कर्मचारी सभ सुभाषकें पूछ’ लगलैक जे ओ सीमाकें की पढ़ि क’ खुआ देलकैए जे ओ बदललि जा रहलि अछि।
कम्पनीक कर्मचारी सभक वेतन भुगतानक समय बैंकमे बड़ भीड़ भ’ जाइत छैक। परिसर छोट छैक आ लोक बेसी। लगैत रहैत छैक जे सभ एक्कहि दिन दरमाहा ल’ क’ रहत। मास भरिक प्रतीक्षा रहैत छैक। ओहि भीड़मे एक दिन सीमा आयलि-पिचाइत।
अबितहिं गरजि उठलि, 'अएं हौ भूषण बाबू! तोहर मनेजर कहां छिकथुन? जनाना के लेल अलग बेवस्था करथुन, से कहै नञि छहो। देखहो त’ अइ भीड़मे....। केना लेेतै लोक पेमेन्ट?’ कने थम्हैत बाजलि, 'आ मर्दाबा आउर त’ आर...। हटै लागी बोलला पर त’ आर सटब करै हइ। लगै हइ जेना अपना बहिन-बेटी नहि होइ।’
एतेक बजितहिं ओकर नजरि सुभाष पर पड़लैक। ओ चुप भ’ गेलि आ सुभाष लग आबि क’ बैसि गेलि। पासबुक आ चैक निकालि क’ सुभाषक सोझां रखैत बाजलि, 'देखहो अपनेस’ उठि क’।’
सुभाष चैक भरलक। सीमा दसखत कयलिक आ सुभाष अपन कुर्सी परसं उठले छल आ कि एक गोटें ठट्ठा कयलकै सीमाक संग। सीमा गंभीर होइत नहुएंसं बाजलि, 'चुप रह', दमाद हइ अइ जग।’
ओ व्यक्ति चारूकात नजरि खिड़ाब’ लागल आ सीमादेवीक जमायकें ताक’ लागल। सुभाष, सीमाक काज हेतु दोसर काउन्टर दिस चलि गेल।
ओ व्यक्ति पुछलकै, 'कहां छिक’ दमाद?’
सुभाष दिस संकेत करैत बाजलि सीमा, 'उहे।’
ओहि व्यक्तिकें अचरज भेलैक। पुछलकै, 'से कोना?’
बाजलि सीमा, 'धौर मर्दाबा! कोनो जरूरी छिकै जे सब सम्बन्ध ढोले-पिपही बजा क’ होइ?’
'एकर माने आब तोएं बूढ़ होइ गेलहो।’ बाजल ओ व्यक्ति, 'बड़य कहब करहो जे पुरूफ कर’ चाहै छियै जे मौगियो कहियो नहि बुढाइ हइ।’
बाजलि सीमा, 'धौर मर्दाबा! ऊ आ अइ बातमे अन्तर होइ हइ। तोएं आउर ने त’ सम्बन्ध के इमानदारी बूझै छहो आ ने मरजादा। जहिया बूझ’ लगबहो, तहिया तोहूं आउर बुढ़ारी आ जुआनी के भेद बूझि जेबहो।'
ओ व्यक्ति अपन सन मुंह ल’ क’ ससरि गेल।
सुभाष आयल, चपरासीकें टोकन देलकै आ पाइ आनि देब’ कहि अपन कुर्सी पर बैसि गेल। सोझांमे सीमा बैसलि छलि। सुभाष अपन जेबीसं पान मसल्लाक पुड़िया बहार कयलक आ अपना मुंहमे ढाड़’ लागल। आ कि तखनहिं सीमा देवी ओकर हाथ पकड़ि लेलकि, 'ई कोन बानि छह? ई कतेक खरापी करै हइ, से बूझै छहो। खबरदार! आइन्दा तोरा हाथमे पान मसल्ला देखलियो त’....।’
सभकें अचरज भेलैक। सुभाषकें सेहो।
सीमा देवीक सम्पूर्ण आकृतिसं वात्सल्य टपकैत देखलक सुभाष।

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हिन्दी अनुवाद : स्वयं कथाकार। जनसत्ता (सबरंग) 21 सितम्बर 1997 मे प्रकाशित। 'आर्यावर्त' (दैनिक), 23 मई 1998 ई. मे प्रकाशित।
ओड़िया - अनुवादक- पारमिता षडंगी, 'पर्यवेक्षक' दैनिक, भुवनेश्वर, 18 अगस्त 2024 ई. मे प्रकाशित।