शेष
प्रदीप बिहारी
ऑफिसमे सीमाक पयर पड़ितहि लगलैक जेना सम्पूर्ण कार्यालय महमह भ' उठल होइक। कर्मचारी आ अधिकारी सभ कने साकांक्ष भ’ उठैत छलाह। एतबे नहि, ग्राहक सभ सेहो कने सचेत होइत छल।
सीमा भीतर आयलि आ अपन बानिक अनुसार भूषण बाबू लग जा क’ अपन चेक-बुक पटकि देलकि, ’कने जल्दी पेमेन्ट करबहो।’ आ पुनः एम्हर-ओम्हर तकैत लोक सभक हालचाल पूछ’ लागलि। हालचाल पुछबाक ओकर अपन विधि छैक। बेसी लोककें आंखियेसं हालचाल पुछैत छैक ओ।
सीमाक नजरि सुभाष पर अंटकि गेलैक। ओ भूषण बाबूसं पुछलकि, ’ई नया स्टाफ अयल’ हन कि?’
’हं! दसो दिन नहि होलै हन।’ बजलाह भूषण बाबू, 'से किए? पसिन छओ कि?’
’धौर मर्दाबा।’ बाजलि सीमा, ’सैह हिबलयै। बच्चे हइ।’
ग्राहकमे सं एक गोटें बाजल, ’आब एकटा बहिक्रम भेल जाइ छह सीमा देवी।’
सीमा ओकरा उतारा देलकि, ’धौर मर्दाबा! हे हओ! जेना मरद कहियो नहि बुढाइ हइ, तेना हम पुरूफ कर’ चाहै छियै जे मौगियो कहियो नहि बुढाइ हइ।’
नहूं-नहूं बजबाक हिस्सक नहि छैक सीमा देवीक। सभ सुनलक। किछु गोटे हंसल। किछु चुप रहल।
सुभाषकें अचरज लगलैक। विचित्र माउगि छैक। ओ देखैत रहल। सीमाक काज भूषण बाबू स्वयं उठि क’ क’ देलखिन। ओ कैश काउन्टरक पाछां जा क’ टाका लेलकि आ टाका गनैत सुभाषक टेबुल लग आयलि आ पुछलकि, ’कत’ घर होल’ साहेब।’
सुभाष अपन ग्राम्य जिलाक नाम कहलकै।
’तखन तं अपने मिथिला के होइ छियै।’ भाषा परिमार्जित क’ बजबाक प्रयास कयलकि सीमा।
'अहूं मिथिले के छियै। इहो मिथिले छैक।’
सीमा एकटा गहींर नजरियें सुभाषकें देखलकि आ आगां बढ़ि भूषण बाबूकें कहलकनि, ’ई नवका स्टाफ तं चेहरे स’ बच्चा लगै ह’। मोन स’ त’ पकठोस बुझाइ हइ।’
भूषण बाबूकें विनोद सुझलनि, ’त’ की बूझै छहो? एक दिन जांचि, लियहो। तखने ने बुझबहक जे....।’
’धौर मर्दाबा।’ बजैत सीमा जहिना हनहनाइत आयलि तहिना दनदनाइत चलि गेलि।
सुभाषकें मोन पड़लैक गामक सलहेश नाच आ ओकर गीत- 'चलै छै मलिनियां बेटी, धरती धमकबै छै...।’
सीमा चलि गेलि। पुनः कार्यालयक स्थिति पूर्ववत्। जाधरि सीमा कार्यालय परिसरमे रहैत छैक, कार्यालय दलमलित भेल रहैत छैक।
जलखै बेरमे सुभाष सीमा देवीक मादे पूछने रहय अपन सहकर्मी सभसं। रंजन तुरन्ते उतारा देलकै, ’सीमाकें के नहि जनै हइ?’
’कोन चिड़क नाम छिकै सीमा, से त’ देखबे केलहो।' दोसर सहकर्मी।
'एहीठाम अस्पतालमे काज करै हइ। नर्स हइ।’
'अनुकम्पा बला नोकरी हइ। ओकर घरबला अही कम्पनीमे काज करै। मरि गेलै।’
सीमाक विधवा होयबाक गप्प सुभाषकें आर अचरजपूर्ण लगलैक। सीमाकें देखने कतहुसं नहि लगैत छैक जे ओ विधवा होइक।
'पहिने हेल्परमे नोकरी भेलै। बाद मे नर्सिंग बला ट्रेनिंग केलकै, तं आब नर्स छिकै।’
'से जे होउक, मुदा हइ बड़ मस्त-मस्त...।’
एकटा ठहक्का पड़लैक। सीमाक चर्चा ओहि दिनक जलखै बेरक मूल विषय बनल रहलैक।
सुभाषक जिज्ञासा शान्त भ’ गेलेक।
सीमा मासमे तीन-चारि बेर अबस्से अबैत छैक बैंक। मुदा, कोनो-ने-कोनो बेगरते ल’ क’। अनेरे कहियो नहि देखलकैए सुभाष।
एक दिन शर्माजी पुछलखिन सीमासं, 'अएं हइ सीमा देवी। सब दिन भूषणे बाबू लग बैसै छहक, की बात छै?’’
निधोख भ’ क’ बाजलि सीमा, ’अपन बौडी नहि देखै छहो! फुकना जकां फूलल ह’। तोरा बुते की होत?’
आ कि तखनहिं भूतपूर्व सैनिक रायजी बजलाह, ’आ हम हइ?’
'हं। तों छहो-स्टील बॉडी।’
सुभाष दिस संकेत करैत भूषण बाबू पुछलखिन, 'आ सुभाष?’
'धौर मर्दाबा!’ बजैत सीमा हॉलसं बहार भ’ गेलि।
एक बेर फगुआक छुट्टीसं पहिलुक दिन सीमा आयलि। बड़ भीड़ रहैक। भूषण बाबू ओकर चैक राखि लेलनि आ बजलाह, ’जाह! भीड़ सठि जयतै तखन अबिहो।’
सीमा चलि गेलि।
सीमा पुनः आयलि तखन भीड़ सांचे सठि गेल रहैक। भूषण बाबू ओकरा टाका देलनि। सीमा कने काल बैसलि। सभ अपन-अपन कार्यालयी काजसं निवृत होइत गेल आ तखन शुरू भेलैक फगुआ खेलबाक प्रक्रिया।
सुभाष देखैत छल। सीनियर सभ रंग, पेनक मसि, पैड इंक आदिसं प्रायः त’र क’ देलकै सीमाकें। सीमा सेहो सभकें रंग-अबीर लगौलकि।
भूषण बाबू तं ठाम-कुठाम मे कतेको मोहर छापलनि।
सर्वथा नव कर्मचारी होयबाक कारणें वा अन्य कोनो कारणें सुभाष ओकरा रंग लगाब’ नहि गेल। सुभाषकें नीक नहि लगलैक।
ओम्हरसं निवृत भेलाक बाद एक बाकुट अबीर नेेने सीमा सुभाष लग आयलि। सुभाष मना कयलकै। कागज-पत्तर छैक। लेजर-रजिष्टर छैक।
सुभाष अपन टेबुल छोड़ि बहार भ’ गेल। ओ सीमाकें कहलक, 'एहुना कतहु लोक रंग खेललक-ए। बगय देखै छहक?’
सीमा फगुनायल टोनमे बाजलि, 'जे जिएगा से खेलेगा फागु।’ आ बाकुट भरि अबीर सुभाषकें लगा देलकि।
सीमा बहार होम’ लागलि आ कि रायजी पुछलखिन, 'सुभाषक गाल ऐंठि लेलहो कि?’
'धीर मर्दाबा!’ बजैत सीमा बहार भ’ गेलि।
समय बीतैत गेलैक। सीमा ओहिना हनहनाइत आबय आ वातावरणकें दलमलित क’ गनगनाइत चलि जाय।
बर्ख पर बर्खक पथार लागि गेलैक।
सुभाष गृहस्थ भ’ गेल।
मुदा, एकटा स’ख सुभाषकें लगले रहलै। आन-आन कर्मचारी जकां सुभाषक संग सीमा कहियो चौल नहि कयलकै। ओकरा मोन लागल रहलैक जे सीमा ओकर संग चौल करौक।
एही क्रममें एकटा खगता भेलैक सुभाषकें। ओकरा अपन दुनू पुत्रक नामांकन कम्पनी द्वारा प्रायोजित विद्यालयमे करयबाक छलैक। ज्ञातव्य जे एहि विद्यालयमे नामांकन हेतु कम्पनीक कर्मचारी सभक नेना वरीयताक क्रममें पहिल मानल जाइत छैक। बैंकक कर्मचारीक नेना सभक नम्बर सभसं अन्तमे, खाहे ओ कतबो मेधावी किएक ने होअय।
एहि असमानता हेतु ओहि विद्यालयक प्राचार्यसं बहुत रास वाद-विवाद कयने रहय सुभाष। अन्ततः ओकर दुनू पुत्रकें नामांकन हेतु आयोजित प्रतियोगिता परीक्षामे सम्मिलित होयबाक अनुमति भेटलैक। आ ओकर दुनु पुत्र प्रथम अयलैक।
प्राचार्यक अनुसारें सुभाषकें एकटा आर औपचारिकता पूरा करएबाक छलैक। कम्पनीक कोनो कर्मचारीसं प्रमाण-पत्र दिअयबाक छलैक जे दुनू नेना ओकर सम्बन्धी छैक।
सोचय लागल सुभाष। कोन सम्बन्ध देखेतैक? आ ई समस्या भूषण बाबू लग रखने छल। भूषण बाबू झट बाजि उठलाह, 'ई कोनो समस्या नहि भेलैक। ई मात्र औपचारिकता छिकै। एडमिशन भ’ गेलाक बाद कतहु किच्छो नहि। आइए ब्योंत क’ दै दिअ’।’
ओही दिन किछु क्षण बाद सीमा आयलि। भूषण बाबू ओकरा सभ गप कहलनि आ ओ मानि गेलि। तखनहिं आवेदन-पत्र टाइप भेलैक। सीमा दवी दसखत कयलकि।
सुभाषक मोनमे एकटा संशय भेलैक। आवेदनमे सुभाषक पुत्र द्वयक मादे सीमा देवी अंग्रेजीमे घोषणा कयलकि, 'बोथ कैन्डिडेट्स आर माइ ग्रैण्ड सन।’
सुभाष इथ-उथ मे छल आ कि सीमा कहलकै, ’चलहो वेलफेयर विभाग। ओहिजय सार्टिफिकेट बनतह’ आ आवेदन ल’ सीता कम्पनीक प्रशासकीय कार्यालय दिस बिदा भ’ गेलि। सुभाष पछोड़ धयलक। ओकरा लगलैक जे कतहु फंसि रहल अछि।
कल्याण विभागमे कोनो प्रकारक असुविधा नहि भेलैक सुभाषकें। सभ चिन्हल लोक। सभ बुझैत छैक जे ई मात्र एकटा औपचारिकता छैक-खानापुरी।
प्रमाण-पत्र बनि क’ तैयार भ’ गेलैक आ सुभाषक हाथमे आबि गेलैक। तखन कल्याण पदाधिकारी महतो जी पुछलखिन सीमासं, 'अएं हइ! ई तोहर सम्बन्धी कोना भेलखुन? ई तं तोरा जातिक नहि छथुन?’
आ कि सीमा बाजि उठलि, 'धौर साहेब! तोहूं आर कमाल करै छहो। हमर बेटी हिनके संगे लव-मैरिज कने रहै ने। तखन ई दुनू बच्चा हमर नाती नञि होलै? नाती के अंग्रेजीमे गैण्ड सन नहि कहब करै हइ की?’
सभकें अचरज लगलैक। सीमाक प्रत्युत्पन्नमतित्व पर सुभाषकें सेहो।
सीमा देवी ओहू कार्यालयकें दलमलित कयने बहार भ’ गेलि।
किछु दिनक बाद सीमा बैंक आयलि। परिसरमे पयर दितहिं सभ पूर्ववत् अपन-अपन हंसी ठट्ठासं ओकर अभिवादन कयलकै, मुदा ओ कोना उतारा नहि देलकि। ओ सोझें सुभाष लग जा क’ बैसलि, 'जल्दीसं हमर काज करा दहो।’
आ ओहिदिनक बाद कर्मचारी सभ सुभाषकें पूछ’ लगलैक जे ओ सीमाकें की पढ़ि क’ खुआ देलकैए जे ओ बदललि जा रहलि अछि।
कम्पनीक कर्मचारी सभक वेतन भुगतानक समय बैंकमे बड़ भीड़ भ’ जाइत छैक। परिसर छोट छैक आ लोक बेसी। लगैत रहैत छैक जे सभ एक्कहि दिन दरमाहा ल’ क’ रहत। मास भरिक प्रतीक्षा रहैत छैक। ओहि भीड़मे एक दिन सीमा आयलि-पिचाइत।
अबितहिं गरजि उठलि, 'अएं हौ भूषण बाबू! तोहर मनेजर कहां छिकथुन? जनाना के लेल अलग बेवस्था करथुन, से कहै नञि छहो। देखहो त’ अइ भीड़मे....। केना लेेतै लोक पेमेन्ट?’ कने थम्हैत बाजलि, 'आ मर्दाबा आउर त’ आर...। हटै लागी बोलला पर त’ आर सटब करै हइ। लगै हइ जेना अपना बहिन-बेटी नहि होइ।’
एतेक बजितहिं ओकर नजरि सुभाष पर पड़लैक। ओ चुप भ’ गेलि आ सुभाष लग आबि क’ बैसि गेलि। पासबुक आ चैक निकालि क’ सुभाषक सोझां रखैत बाजलि, 'देखहो अपनेस’ उठि क’।’
सुभाष चैक भरलक। सीमा दसखत कयलिक आ सुभाष अपन कुर्सी परसं उठले छल आ कि एक गोटें ठट्ठा कयलकै सीमाक संग। सीमा गंभीर होइत नहुएंसं बाजलि, 'चुप रह', दमाद हइ अइ जग।’
ओ व्यक्ति चारूकात नजरि खिड़ाब’ लागल आ सीमादेवीक जमायकें ताक’ लागल। सुभाष, सीमाक काज हेतु दोसर काउन्टर दिस चलि गेल।
ओ व्यक्ति पुछलकै, 'कहां छिक’ दमाद?’
सुभाष दिस संकेत करैत बाजलि सीमा, 'उहे।’
ओहि व्यक्तिकें अचरज भेलैक। पुछलकै, 'से कोना?’
बाजलि सीमा, 'धौर मर्दाबा! कोनो जरूरी छिकै जे सब सम्बन्ध ढोले-पिपही बजा क’ होइ?’
'एकर माने आब तोएं बूढ़ होइ गेलहो।’ बाजल ओ व्यक्ति, 'बड़य कहब करहो जे पुरूफ कर’ चाहै छियै जे मौगियो कहियो नहि बुढाइ हइ।’
बाजलि सीमा, 'धौर मर्दाबा! ऊ आ अइ बातमे अन्तर होइ हइ। तोएं आउर ने त’ सम्बन्ध के इमानदारी बूझै छहो आ ने मरजादा। जहिया बूझ’ लगबहो, तहिया तोहूं आउर बुढ़ारी आ जुआनी के भेद बूझि जेबहो।'
ओ व्यक्ति अपन सन मुंह ल’ क’ ससरि गेल।
सुभाष आयल, चपरासीकें टोकन देलकै आ पाइ आनि देब’ कहि अपन कुर्सी पर बैसि गेल। सोझांमे सीमा बैसलि छलि। सुभाष अपन जेबीसं पान मसल्लाक पुड़िया बहार कयलक आ अपना मुंहमे ढाड़’ लागल। आ कि तखनहिं सीमा देवी ओकर हाथ पकड़ि लेलकि, 'ई कोन बानि छह? ई कतेक खरापी करै हइ, से बूझै छहो। खबरदार! आइन्दा तोरा हाथमे पान मसल्ला देखलियो त’....।’
सभकें अचरज भेलैक। सुभाषकें सेहो।
सीमा देवीक सम्पूर्ण आकृतिसं वात्सल्य टपकैत देखलक सुभाष।
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हिन्दी अनुवाद : स्वयं कथाकार। जनसत्ता (सबरंग) 21 सितम्बर 1997 मे प्रकाशित। 'आर्यावर्त' (दैनिक), 23 मई 1998 ई. मे प्रकाशित।
ओड़िया - अनुवादक- पारमिता षडंगी, 'पर्यवेक्षक' दैनिक, भुवनेश्वर, 18 अगस्त 2024 ई. मे प्रकाशित।
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