Wednesday, July 31, 2024

खैंक (मैथिली कथा) - प्रदीप बिहारी

कथा

खैंक

प्रदीप बिहारी


हड़बड़ाइत ओ पेंसन काउण्टर धरि गेलि आ बाजलि, 'सुबोध बाबू! हमर बाबा के लाइफ सर्टिफिकेट लए लियौक।"
          सुबोध फार्म देखलक। बाजल, "कहां छथिन? हमरा सामनेमे दसखत करबाक चाही ने। अहां के भेलियै हुनकर?"
          "बोललौं जे बाबा के लाइफ सर्टिफिकेट लए लियौक, त' नहि बुझायल। पोती होलियै हुनकर।"
           काउण्टर पर ओहि महिलाक पाछां ठाढ़ एक गोटें बाजल, "हइ । एना किए बोलै छहो? साहेब सुनि नहि सकल होथिन। केतना भीड़ छै, से लक्खा नहि दए रहलो हन? अकेला साहेब, देखै नहि छहो केना औल-बौल होल छथिन।"
           महिलाकें अपन गलतीक आभास भेलै। बाजलि, "सौरी, गलती भए गेलै सर। माफ कए दियौ।"
     ‌     सुबोध महिला दिस ताकलक। प्राय: अठाइस-उनतीस बरखक ओहि महिलाक चेहरा निश्छल बुझयलै। अचरज भेलै जे एना किएक बाजलि? ओ मुस्कियाइत बाजल, "कोनो बात नहि। अहांक की नाम भेल?"
           "रजनी।"
           रजनीक मुखाकृति पर एकबेर फेर सुबोधक नजरि गेलै।‌ ओ बाजल, "ठीके कहलहुं अहां। मुदा कत' छथि दयाल चन्द्र शर्मा जी?"
          रजनी अपराध-बोध सं उबरि नहि चुकल छलि। बाजलि, 'सर जी, ऊ उप्पर नहि आबि सकै‌ छथिन।‌ निच्चां चरिचक्का मे छिकथिन। हुनका बुलल नहि ने होइ छनि।"
         "बेस, तं कने बैसि जाउ। लाइनमे‌ किछु गोटे छथि। हिनका सभक काज झट द' क' दै छियनि, तकर बाद चलै छी।"
         रजनी लाइनसं कात भ' गेलि।‌ मुदा, बैसलि नहि। कातेमे ठाढ़ रहलि। ओकरा लगलै जे बैसि गेने सर जी बिसरि ने जाथि। ओकर नजरि सुबोध दिस छलै। नजरिमे आतुरता छलै- सर जी ....
         कनिए कालमे पांतिक किछु गहि‌कीक काज कयलक बाद शेषकें‌ प्रतीक्षा करबाक बात कहि सुबोध बहरायल। रजनी आगां-आगां आ सुबोध पाछ-पाछां।‌
          "अहांक पिता की करै छथि?" सुबोध पुछलक‌।
           "गामे मे रहब करथिन। खेती-पथारी। जमीनो-जत्था कम्मे बचि गेल रहै। साले-साल खेत बेचैत रहलखिन। आब हुनकर काज हमर भाइ करब करै छै। जमीनो बहुत कम्मे बंचल छै।"
           "अहांक बाबा हुनका पर ध्यान नहि देलखिन की?"
           "बाबा के संतान नहि ने होलनि। हमर दादा के चच्चा होलखिन बाबा। ई बाबा कहांदन बड़े कोसिस कैलखिन, मुदा हमर अप्पन बाबा जत्ती ने दुलार करब करथिन जे दुलारे मे बगदि गेलखिन हमर दादा।"
          "अहां की करै छी?"
          "सब बात एक्के दा पुछि लेबै‌ सर। हम्मे...
          ताबत ओ दुनू कार धरि आबि गेल छल। सुबोध देखलक जे कारक पछिला सीट पर‌ प्राय: छओ फुटक एकटा बूढ़ ओंगठल छलाह। ओ पुछलक, "की  होइए दयाल बाबू? नीके छी ने।"
          "छी त' निक्के। खाली डांड़ स' निच्चा के भाग बेकामक भेल हन। कहुना आदमी के सोंगर स' ठाढ़ होइ जाइ छियै, दिसा-मैदान कए लै छियै।" दयाल बाबू उतारा देलनि।
          फार्म पर दयाल बाबूक दसखत लेलक सुबोध।
हुनकर हाथ थरथराइत छलनि। सुबोध कें बुझ' मे आबि गेलै जे ई दसखत‌ नहि मिलतनि।
          दसखत दिस तकैत सुबोधक असमंयशकें दयाल बाबू बुझलनि। बजलाह, "दसखत नहि मिलैत होत। बैंक‌ के‌ रेकर्ड मे एखुनका दसखत होना चाही ने।"
  ‌‌‌‌‌        "ई काज क' लेबाक चाही छल।" सुबोध बाजल।
         "बेस, अगिला‌ दा जहिया अपने समय देबै, भए जेतै।" रजनी बाजलि।
          सुबोध बिदा होइत बाजल, "बेस, एहि मासक अंत मे जहिया पेंसन पेमेंट हैत, दुनू मासक खातामे जमा भ' जायत। नवम्बरे‌ मे‌ अएबाक चाही ने। बड़ लेट भेल त' दिसम्बर धरि जरूरे। सेहो समय बीति गेल। आब पेमेन्ट ले' किछ थम्ह' पड़त।"
           दयाल बाबू आ रजनीक चेहरा पर असमर्थताक  भाव पसरि गेलै। दयाल बाबू बजलाह, "कम-स'-कम बितलहो महिना बला आइ भेटि जैतै, त'...."
           "मोश्किल अछि।"
           "सर, बात ई छिकै जे..."
           "की?"
      ‌‌‌‌     दयाल बाबू कें बाज' सं पहिने रजनी बाजलि, "बाबा, तोएं चुपहो ने। हम्में बता दै छियनि सर के।"
           सुबोधक मोनमे आशंका पैसि गेलै। रजनी दिस तकैत बाजल, "हिनका बाज' दियनु। पेंसनर ई छथि। टाका हिनका भेटतनि। बजियौ दयाल बाबू।"
          "की बोलू सर। बोलब त' कहबै जे दुखे बतिआइ -ए।"
          "काजक बात बाजू ने।"
          "बेस, मूल बात कहै छी। हम्मर अइ पोती छोड़ि क' कोइ ने छै। अपना संतान नहि होलै। एकरे बाप के सब कथू देलियै। आ उहे फुटबौल जैसन गुड़का देलक। इहे पोती हय, जे सेवा कए रहल हन।‌ एकरो दुख के ओर नहि छै। तें‌ एकरा पर शंका नहि करियौक।'
           सुबोध दयाल बाबूक बात सुनि लेलक, मुदा ओत्तेक ध्यान नहि देलक। ओकरा काउण्टर परक गहिंकी मोन पड़ि रहल छलै। तैयो रजनी दिस तकैत बाजल, "हम हिनका पर शंका किएक करबनि?"
     ‌      "देखियौ सर, हम यू डी सी (अपर डिविजन क्लर्क) स' रिटायर कैने छी। अपने जे रजनी के चुप रहए बोललियै, से हमे बुझि गेलौं।‌ तें बोललौं जे एकरा पर शंका नहि करियौ।"
           "दयाल बाबू, अपने हमरा 'सर' नहि कहू। हमहूं अपने के पोते के उमेर के हैब। अपने आदरणीय छियै। हमर नाम सुबोध अछि।"
           "बेस। घर कतए होल?"
          "अपने जकां हमहूं मिथिले के छियै। मधबन्नी जिला।"
           दयाल बाबू उत्साहित होइत पुछलनि, "कोन गाम यौ? एकदा हम्में बेनीपट्टी ब्लौक मे रहियै।"
     ‌‌ ‌     दयाल बाबू कें बाज' सं‌ पहिने रजनी बाबाक गपक प्रवाहकें रोकलकि। ओकरा बुझल छै जे गपसप मे ओकर बाबा ध' लै छथिन, तं जल्दी छोड़ै नहि छथिन।‌ ओ बाजलि, "सब बात एक्के दिन पुछबहो। सर के देरी होब करै छनि।"
            सुबोध जयबा लेल उद्यत भेल, कि दयाल बाबू बजलाह, "एकटा आर आग्रह सर। हमर पेंसन खाता मे रजनीक नाम जोड़ा सकै‌ छै?"
      ‌‌‌     "नहि, पेंसन खाता मे पति वा पत्नीक नाम जोड़ल जा सकै छै। आन ककरो नहि।"
           "तकर बाद मानि लियौ जे हम्मे मरि गेलियै, त' शेष पाइ बैंंक जप्त कए लेतै?"
           "नहि, जं अहांक पत्नी नहि छथि, तं जिनका अहां चाही, नौमिनी बना सकै छी।"
    ‌ ‌     "तखन रजनिए के बना दियौ। एकरा छोड़ि हमर के हय?"
           "अपने नीक जकां सोचि क' कहि रहल छी?"
           "हं, हमर सिर्फ डांड़ स' निच्चा बेकाम हय। ऊपर एकदम ठीक।" दुनू कान्हकें‌ व्यायाम करबाक मुद्रा मे‌ आगां-पाछां घुमौलनि। अपन दुनू हाथसं दुनू बांहि पर थाप मारलनि, "देखियौ, ई सब एकदम्मे दुरुस्त छिकै। दिमागि आ यादास्त एकदम ठीक। तें पूरे होशमे कहै छी जे रजनिए के हमर नौमिनी बना दियौ। जहां बोलियौ, हम्मे दसखत कए देब।"
   ‌‌‌         "मुदा, पहिने दसखत त' ठीक करू।"
            "ई काज सभ जहिया अपने बोलैबै, हम्मे बाबा के लए के आबि जैब।"
            दयाल बाबूक व्यक्तित्व कने आकर्षित कयलकै सुबोध के। हुनका प्रणाम करैत ओ अपन काउण्टर पर जाय लागल। रजनी कें कहलक, "चलू। एकर पावती ल' लिअ' आ शेष काज लेल फार्म सभ सेहो।"
            "अपने एतना काम कए देलियै हन, से की कम बात छिकै। रसीद लए के हम्मे की करबै।‌ अपने पर पूरा बिसबास छै। बरू फारम सब दए दियौ।"
            रजनीक गपक दही मे सही लगौलनि दयाल बाबू, "सुबोध बाबू! नुनू ठीके बोलि रहल हन।‌ की होतै रसीद? अपने एतना सज्जन बुझाइ छिकियै, से हम्मे अपने के की बोलू? एगो अपने छिकियै, एगो अपने स' पहिने बला छला। कोनो तुलने नहि। अपने गहूम‌ आ ऊ गर्रो।"

सुबोध बिदा भेल। रजनी ओकर पाछां-पाछां छलि। ओ टोकलकि, "बाबा त' दोसरे बात बोलला। असल बात.."
           सुबोधक पयर अनचोके थम्हि गेलै।‌ पाछां घुरल, "की?"
          "इहे जे आइ एक्को महिना के पेमेंट नहि हेतै त' चरिचक्का के किरायो नहि होइ पैतै?"
      ‌‌‌    "माने?"
         "हम्मे आर सोचलियै जे रूपा मिलिए जेतै, तें गाम मे बेबस्था नहि केलियै।" रजनीक माथ झुकि गेलैक।
          "देखियौ! हम नियमक अनुसारे कहलहुं-ए। जं संभव होइतै, त' अबस्से पेमेंट क' दितहुं।"
    ‌‌‌      "से, अपने के बात पर भरोस छै सर।"
         "कत्ते पाइ लैए कार बला?"
          "चारि सौ रूपा?"
          "से किए? दुओ किलोमीटर दूर नहि अछि अहांक गाम। तखन?"
         "पहिने पेंसन लेबए अबियै, त' भीड़ होब करै आ समय लागि जाइ। तें देरी होइ जाइ। से सब जोड़ि लै। बेसी नहि लै छै। हम्मे आर गाम मे नहि ने रहै छियै।"
          "तं कत' रहै छी?"
          "से सब कोनो दोसर दिन बताएब।‌ एखन अपने जइयौक। हम्मे आर बहुत समय लए लेलौं। फारम दोसर दिन आबि कए ल' लेब। हमरो लेट होइ रहलैहन।‌ एखन चलबै त' समय पर क्लिनिक पहुंचि जेबै।"
            रजनी घुरि गेलि। मुदा, सुबोध‌ टोकि देलकै, "मुदा, कार के किराया कोना‌ देबै?"
           "जा क' देखबै जे कोन बेबस्था होइ छै।"
          सुबोध अपन पर्स बहार क' चारि टा नमरी बहार करैत बाजल, "जं बेजाय नहि मानी, तं ई राखि लिअ'। पेंसन लेब' आयब तं घुरा‌ देब।"
          रजनी असमंयश मे ठाढ़ि रहलि।
   ‌‌‌‌‌      सुबोध बाजल,‌ "सोचू नहि, हम कर्ज द' रहल छी। हमरा घुरा देब। राखू। हमरा लेट भ' रहल अछि।"
    ‌      रजनी टाका लैत बाजलि, "सर, अइ मदति के हम मोन राखब। एखने बाबा के बोलबै हम्मे।"
          जानि नहि, रजनीक बोल सुबोध सुनि सकल कि नहि। ओ अपन काउण्टर दिस विदा भ' गेल रहय।

सुबोधकें दयाल बाबू नीक लगलखिन। रजनीक निश्छलता सेहो प्रभावित कयलकै। दयाल बाबूक बारेमे बूझि गेल, मुदा रजनी? ओकरा बारेमे बस एतबे बुझि सकल जे कोनो क्लिनिकमे काज करैए। मोन भेलै जे डेरा गेलाक बाद पत्नीकें आजुक बात कहत। कहत जे ओ दयाल बाबूकें चारि सय टाकासं मदति कयलक। रिफंडेबुल।
             संध्याकाल भेबो कयलै ओहिना। फ्रेश भेलाक बाद पत्नीक खेरहा कहलक। जाहि प्रशंसाक लोभें ओ पत्नीकें कहलक, से उन्टा पड़ि गेलै। पत्नी पुछलकि, "बूढ़ा के मदति केलियै, की मौगी के? अहां त' दानवीर कर्ण बनि गेलहुं।"
             "अहां दोसर रूपें सोचलियै एहि बात के। एना नहि सोचियौ।"
             "हम बेजाय नहि सोचलहुं। अहां लग एहन बहुत लोक आबि सकैए। सभ के देबै जेबी सं?"
              "अरे, हम पैंच देलियैए। जहिया पेंसन भेटतै, घुरा देत। ई बुझियौ जे पेंसन लेब' हमरे लग आओत, हम काटि लेबै।"
             "एकटा बात पुछू?"
             "पुछू ने।'
             "जं ओहि बुढ़बाक संग ओकर पोती नहि रहितै, त' दितियै?"
             "केहन गप करै छी?"
             "ठीके करै छी। जे भेल से भेल। नोकरी करै छी, नोकरी करू। लहना लगायब बन्द करू। सेठ-साहुकार नहि छी अहां।"
            सुबोधक मोनमे एकटा किछु गड़ि गेलै। पत्नीक गपक कोनो उतारा नहि देलक।

ओकरा मोनमे जे गड़लै, तकर बिसबिस्सी ओहि मासक अंत धरि रहलै।
          रजनी अपन क्लिनिकक फोन नम्मर देने रहै। कहने रहै जे पेंसन खातामे जमा भेलाक बाद फोन क' दिअय। फोन रिसेप्सन पर रहै छै। कहतै तं बजा देतै। मोन होइ जे फोन करय। मुदा, अनेरो ओकरा फोन करब नीक नहि लगलै।
             खातामे पेंसन जमा भेलाक बाद सुबोध रजनीकें फोनसं जनतब देने रहय। आ प्राते भेने रजनी अयलै। सुबोधक काउण्टर पर ठाढ़ भ' प्रणाम सर कयलकै। सुबोध ओकरा देखितहिं थथमथाएल। रजनी ओकर असमंयश बुझलकि। बाजलि, "अपने फ्री भ' जैयौ। ताबत हम्मे बैसै छी।"
            "बाबा अयलाह-ए?"
            "नहि।"
            "किएक?"
            "अपने फ्री होइयौक ने, त' कहै छी।"
            रजनी ग्राहक बला कुर्सी पर बैसि गेलि।

सुबोधक काउण्टर खाली भेलाक बाद रजनी सुबोधक सोझां ठाढ भेलि। बाजलि, "हम्मे सोचलियै से पेमिंट स' पहिने बला कागजी काज आर कराए लियै। तखन बाबा के नानियनि। नहि त' बहुत समय लागि जाइ छै।"
           "एत' निचैनसं फार्म नहि भरि पायब। चलू कैंटिन रूममे।'
           रजनी सुबोधक पछोड़ धयलकि। लंचक समय भ' गेल रहै, तें किछु स्टाफ सेहो ओत' छल।
           फार्म सभ भरि क' तैयार कयलाक बाद रजनीकें दैत सुबोध बाजल, " काल्हि वा जहिया सुविधा होअय, एहि फार्म सभक संग बाबाकें नेने अयबनि।"
            "हम्मे सोचै छिकियै जे अपने के उपकार हम्में..." रजनी आगां नहि बाजि सकलि।
            कने थम्हैत एकटा पुरान सन लिफाफ सुबोधकें दैत बाजलि, "ई राखि लियौक।"
            "ई की छै?"
            "लिफाफ छै। पहिने राखियौक‌ ने।'
             सुबोध लिफाफ पकड़लक। रजनी बाजलि, "ओहि दिन गड़ी के किराया बला हय। बहुत खगल समय पर अपने मदति केलियै। बाबा बोललखिन जे सर भगमान बनि क' ठाढ़ होलखु‌न।"
             "एहन बात नहि। एत' सभ आदमिए छै। ई एखन किए घुरौलहुं-ए। पेंसन लितहुं तखन दितहुं।"
            "हम क्लिनिक स' अगाउ मांगलियै त' डाक्टर साहेब दए देलखिन। अचरजे लगलै जे एक्के दा मांगलियै आ ऊ दए देलखिन।"
            "क्लिनिक मे नर्स छियै?"
            "नहि, नर्स सन पढ़ल-लिखल लगै छी हम्मे? हम्मे त' गमार छिकियै।"
            "तखन?"
            "हेल्पर के काज करै छियै।"
            "अहांक पति?"
            "पता नहि, कत्त' छै। हमरा दागि देलकै आ भागि गेलै। एकटा बेटा छै। तीसरा मे पढ़ब करै छै। बोरिंग स्कूल मे दए देने छियैक।"
           "ओह। मुदा, पति जे भागि गेलाह तकर..."
    ‌‌ ‌      "तकर कारण फेर कहियो कहब। अपने के सीट पर खोजब करैत हैत। त' काल्हि अइयै बाबा के लए के?"
            "अबियौ ने। कखन एबै?"
           "दोसरके बेरिया मे ने? तखन अपने फ्री रह। आ हमहूं आधा दिन के छुट्टी लए लेबै।"

दयाल चन्द्र शर्माक प्राय: सभ काज भ' गेलनि। रजनीक नाम हुनक खातामे नामिनीक रूपमे चढ़ि गेलै। तकर रसीद सेहो मिलि गेलै। एकठाम बात अंटकि गेलै रहै। दयाल बाबू भने कहथुन जे डांड़सं ऊपर एकदम ठीक अछि, मुदा हाथ खूबे कांपनि। नव जे दसखत लेल गेलनि से एकरंगाह नहि भ' पाबनि। जतेक बेर करथिन, ततेक रंगक होनि। अंतरो थोड़-बहुतक नहि। तखन एक्केटा उपाय। ओ औंठा छाप लगाबथि।
             औंठा छापक नाम पर दयाल बाबू तैयार नहि होथि, "सुबोध बाबू! कहलौं ने जे हम्मे यू डी सी स' रिटायर छी। पढ़ल-लिखल छी। हम्मे जे मसौदा लिखि दियै, से हाकिमक बापो के मजाल नहि रहै जे ओहि मे कत्तौ कलम लगैबितैक। से, हम औंठा छाप लगा क' कोना घोषित करू जे निरक्षर छी। दिन-समैया खराप होइ गैलै, तें..."
    ‌‌        "अपने एक रंग के दसखत नहि क' पबै छियै, त' कोन उपाय? जत्ते बेर अयबै, दसखत नहि मिलत त' अहीं परेशान हेबै ने। तंग हेती रजनी जी। जाबत हम छी, मानि लिअ' जे सुविधा भेटि जायत। हमरा बाद दोसर जं एहन सुविधा दै बला नहि आयल त'....?"
          "से त' अइबे ने करतै। अपने जैसन ने पहिले अइलै आ ने बादो मे औतै। बाबा! औंठा छाप लगौने तोएं मुरुख थोड़े होइ जेबहो? तोहें जे छिकहो से त' पूरा इलाका जनै छह। जै मे सुभिस्ता हेतै, सेहे ने ठीक।"
    ‌‌ ‌       "लेकिन औंठा छाप लगैने चेक नहि ने मिलतै। तखन त' महिने-महिना आबए पड़तै।"
           "तकर व्यवस्था भए जेतै।"
           "की?"
           "भए जेतै ने।"
            आ एत्तेक निस्तुकीक बाद दयाल बाबू औंठा छाप लगौलनि।
             व्यवस्था एहन भेलै जे सुबोध प्रत्येक मास हुनका ओत' जायत आ अपना सामने मे हुनकर औंठा छाप लेत। टाका रजनी ल' जायति। ई व्यवस्था दयाल बाबूकें नीक लगलनि।
             सुबोध प्रत्येक मास रजनीक डेरा पर जा क' ई काज करय, तखन दयाल बाबू कें पेन्सनक भुगतान भेटनि। दयाल बाबू आ रजनी एकरा बड़का उपकार बुझय।
             एही क्रममे सुबोधकें अवसर भेटलै जे रजनीक बारेमे बुझय। ओ बुझलक जे रजनीक ब'र दोसर बियाह क' लेलकै। ताहिमे एकर भाइक विशेष हाथ छलै।
             "कोनो भाइ चाहतै जे ओकर बहिनोइ ओकरा बहिन कें छोड़ि दोसर बियाह क' लै।"
            "आर चाहौ कि नहि, हमरे भाइ चाहलकै। असल बात ई रहै जे बाबा के पूरा धन हमर दादा अपना नामे लिखाय लेलखिन। बाबा के बचलै मात्र पेंसन। हमरा एक्के गो भाइ। बाबा के सम्पत्तियो लए लेलकै आ घर मे राखैयो नहि चाहलकै। हम्मे बाबा के पच्छ लेलियै, त' हमरा दुनू के घर स' निकालि देलकै। हम्मे डाक्टर साहेब के सर्भेन्ट रूम मे बाबा के लए आनलियै। हमर भाइ चाहै-  ने हम्मे आर गाम मे रहियै, ने हिस्सा मांगियै। बैला देलकै।"
           एही क्रममे सुबोध के बुझना गेलै जे रजनीक ब'र जे एकर भाइये चढ़ा-बढ़ा देलकै-
           "हमरा साईं के हमर भाइये बोललकै जे डाक्टरे स' फंसल छै हमर बहिन। एक-दू दा हमर साईं के भ्रम सच्चे नाहित लगलै। होलै एहन जे क्लिनिक स' सब चलि जाइ तखनो डाक्टर साहेब हमरा रोकने रहथिन। इहे बात आर हमरा साईं के बरदास नहि होलै। दोसर बात ई जे..."
           "की?"
           "हमर बियाह होल रहै - पकड़ौआ। केतना ने पर-पंचैती के बाद हमरा राखलकै। राखितै की? कोनो काम-रोजगार नहिए सन करब करै। हम्में ई काज धरलियै। बस, लाट साहेबी करए लगलै। पाकिट खर्चा हमर भाइ दै। दारुओ-तारू के चसक लागि गेलै। आ बाद मे एगो मौगी के लए के भागि गेलै। लोक आर बोलब करै छै जे भगाबैओ के बेबस्था हमर भाइए कैलकै।"
            "किएक? अहां के भाइक प्रति किछु झूठ नहि ने केओ कहि देलक?"
            "सर, अपने होलियै सुद्धा लोक। हम्मे सब बात बूझि गेलियैक। भाइ ओकरा बैलाए देलकै। हम्मे होलियै अकेला जनिजाति। ताहू पर बूढ़ विकलांग बाबा। के जेतै हिस्सा मांगए?"
            "ओ..."
           "आब अपने बोलियै जे हम्मे बाबा के देखियै कि...."

सुबोधकें मोन पड़लै। जहिया पहिल बेर रजनीक डेरा पर गेल रहय, तं कोनादन लागल रहै। डाक्टरक मकानक गैरेज दिस एसबेस्टसक पलानी खसा क' बनाओल कोठरी। भीतरे-भीतर एकटा ओसार सन घेराएल, ताहिमे दयाल बाबूक खाट। कोठरीमे रजनीक चौकी। भानसक इंतिजाम सेहो ओही‌मे। हं, डाक्टरक बहरिया बाथरूम एकर पलानी दिस‌ रहै, जे एकरा कोठरी संग अटैच भ' गेलै।
           ओहि दिन दयाल बाबूसं गपसप भेलै। चाह पीलक आ घुरि आयल।
            आयबे-जायबक क्रममे सुबोधकें बुझना गेलै जे रजनी के क्लिनिकक अलावे डेरामे सेहो काज कर' पड़ैत छै। मेम साहेब कखनो बजा क' किछु अढ़ा दैत छथिन। अढ़ाएब अपन अधिकार बुझथि मेम साहेब। रजनीकें रह' लेल घर देने छथिन। हुनका मोन होइ छनि त' क्लिनिकमे फोन क' दै छथिन जे रजनी दाइ के घर पठाउ । एहि दुनू ठामक काज पूरा कयलाक बाद‌ अपना घरक काज आ बाबाक सेवा।
  ‌‌‌         सुबोधकें रजनीक प्रति निष्ठा उपज' लगलै...एकटा विशेष भाव जनम' लगलै। ओ निर्णय नहि क' पाबय जे ओ कोन भाव छै? कोन भाव छै जे बेर-बेर रजनी ओकरा‌ सोझांमे जगजियार भ' जाइ छै। आ सैह निस्तुकी करबा लेल कोनो मास बिच्चहुमे ओ दयाल बाबूसं भेंटक बहन्ने रजनीक डेरा पर चलि जाय।
          एकदिन भेलै एना जे लाइन कटल रहै। रजनीक घरमे डिबिया जरैत रहै। सुबोध पहुंचल। केबाड़ खोलबाक आ बन्न करबाक क्रममे डिबिया मझा गेलै। प्राय: दुनू अकबका गेल। रजनी सलाइ ताक' लेल थाहैत-थाहैत बाबाक कोठरी दिस जाय लागलि। आ कि तखने दयाल बाबू पुछलनि-
           "नुनू गे! डिबिया किए मिझा गेलौ?"
           "सर अयलखिन हन। केबाड़ी खोलए आ बन्द करए मे डिबिया बुति गेलै। हे भेटि गेलै सलाइ।"
          डिबिया बारलाक बाद दुनू एक-दोसराक कपार पर पसेनाक बुन्न देखलक आ कने काल देखैत रहल।
           "लालटेमे ने किए बारि लेलें नुनू?" दयाल बाबूक स्वर सुनि दुनू साकांक्ष भेल।
           "तोरा नहि ने बुझल ह'। मटिया तेल मिलै हइ सौर्टकट मे। एन्नी लाइन कराबर काटब करै छै। तें डिबिया बारै छियै जे मटिया तेल कम लगतै।"
         

सुबोध रजनीक संग दुख-सुख बतिआय लागल छल। रजनीक संघर्ष ओकरा प्रभावित करै। ओ रजनीसं पुछलक, "अहां एत्तेक काज करै छी। मोन नहि होइए जे कखनो किछु समय अपनो लेल बहार करी। अपनो लेल जीबी।"
            "मोन केकरा ने करै छै सर? मगर, हमर चिनवार, चौकठि आ अंगना इहे छिकै। ई रूम, क्लिनिक आ डाक्टर साहेब के डेरा।‌ बस...इहे दुनिया छै हमर।"
            "मुदा एमहर सं बाहरो दुनिया होइ छै, जत' भने कनिए काल लेल होइ, लोक मात्र अपना लेल जीब' चाहैए। अपन एकान्तमे चैनसं रह' चाहैए‌।"
           "सर, अपने पत्थर पर दुब्भी उगाबए चाहै छियै?"
            "नहि, हमरा मोन‌ मे जे आयल, से कहलहुं। आ  पाथर पर दूभि उगयबाक बात सोचल नहि जा सकैए?"
             "से ने किए?"

किछु मासक बाद मासक बिच्चेमे रजनी आयलि। किछु टाका बहार करबाक रहै। सुबोध एकटा परिवर्तन देखलक। ओहिदिन रजनीक सिऊंथमे सिन्नुर नहि रहैक। सुबोध एहि मादे पुछलक तं बाजलि, "जखन साइंए ज'र मे नहि रहलै, त' सिन्नुर किए ओगरतै हमर सीथ?"
           बाजि तं गेलि रजनी, मुदा ओकर संवादक भितरिया जे पीड़ाक अनुभूति रहै, से सुबोध लग साफ-साफ झलकि गेलै।

रजनीक घरमे एकटा अज्ञात महिलाकें देखि सुबोध कोठरीमे पैसबा काल थोड़े इथ-उथ मे पैसि गेल। मुदा, ओ महिला एकर असमंयश कें तोड़लकि। सुबोधक स्वागत करैत बाजलि, "आबियौ सुबोध सर‌।"
         "एम्हरे चौकिए पर अबियौक।"
         महिला दिस तकैत पुछलक सुबोध, "अपने?"
          "हम रजनी के पड़ोसी होलियै। स्वास्थ्य विभागमे अधिकारी छिकियै।  अपने दुनू के बारे मे हमरा सब कथू बुझल हय। रजनी अपने के बड़ प्रशंसा करब करै हय। नीक बात।"
           ताबते दयाल बाबू हाक देलनि, "नुनू गे, दवाइ नानलहो?"
           रजनीकें मोन पड़लै। बाजलि, "अपने आर गप करियौ। हमे क्लिनिक स' बाबा के दवाइ  लेने आबै छी।"
           रजनी कोठरीसं बहरा गेलि।
           "सुबोध बाबू! एगो गप हम्में अपने स' बतिआय चाहै रहियै।"
            "बाजू।'
           " रजनी के त' देखिते छियै जे कत्ती मोसीबत मे छिकै।"
           "जी। मेहनतिओ तेहने छथि।"
           "मुदा एत्ती के बादो एकर भविष्य निश्वित नहि छै। घरबला छोड़ियो देने छै। बेटा के बन' मे बड़ देरी छै। केना चलतै एकर पहाड़ नाहित जिनगी?"
            सुबोध चुप।
            "अपने एकरा लेल बहुत कयलियै। एकटा आर काज कए देबै त' एकर जिनगी बनि जेतै।"
             सुबोधक मोनमे एकटा डर पैसि गेलै। पहिले भेंटमे ई महिला एहि तरहें की कह' चाहैए? की बूझैए हमरा दुनू के? भ्रममे तं ने अछि?
            "बोललियै नहि।"
            "बाजू ने हम की क' सकै छियनि? हमरा बुतें जे नियमानुसार संभव होइ छनि से सहयोग करिते छियनि।"
             "कहू त', बूढ़ा ज' मरि जेथिन त' पेंसनो बन्द भए जेतै।'
             "जी।"
             "ऐसन उपाय नहि होइ सकै छै जे बूढ़ा बला फैमिली पेंसन रजनी के भेट सकै।"
            "नहि, हमरा तेहन कोनो उपाय नहि बुझाइए।"
            "मुदा हमरा लग उपाय अछि। अहां बैंकक काज सम्हारि दियौ। जिनगी बनि जेतै एकर।"
           "नियम सं बाहरक कोनो काज नहि क' सकै छी हम।"
    ‌‌‌‌       "हम नियमक भीतरे के बात बोलै छी।"
           "जं बूढ़ाक संग रजनीक कोर्ट मैरेज करा देल जाय तं..."
             सुबोधकें लगलै जे स'री धिपा क' केओ कानमे ध' देने होइक।
            "समाजमे त' दादा-पोतिए रहतै, मुदा सरकारी अभिलेखमे पति-पत्नी। बूढ़ाक बाद फैमिली पेंसन एकरा भेटैए ने लगतै।"
             सुबोधक तामस सुनग' लागल रहै।
              महिला बाजि रहल छलि, "एमहर सरकारी काज हम सम्हारि लेबै। बैंकक काज अहां सम्हारि दियौक।"
              सुबोध आब बरक' लागल छल।
             "कत्ती दिन स' ई बात हमरा मन मे छै। रजनिया के कहियै जे अपने स' भेंट करा दिअय। मुदा, अपने अबियै, से सूचने ने दिअय। आइ अपने के आब' के सूचना भेल त' अपने स' पहिने दरबर मारने आबि गेलौं। ओना कानून स' त' भैए जेतै, मुदा हम चाहै छियै जे चुपचुप भ' जाइ। समाजक लोक के, बुझिते छियै- कत्ती ने हाथ, पैर, कान आ मुह होब करै छै।"
            सुबोध के रहल नहि गेलै। एकटा तीव्र गतिए कोठरीसं बहार भेल, स्कूटर स्टार्ट कयलक आ गति पकड़ि लेलक। मोन कोनादन कर' लगलै। सोचलक, एहि प्रस्ताव लेल रजनी तैयार अछि? ओना होअय वा नहि, ओ रजनीक ई रूप नहि देख' चाहैए। स्कूटरक हैंडिल तलमलाए लगलै। ठाढ़ क' देखलक। टायरमे कांटी गड़ि गेल रहै।
            सुबोधकें घरमे नहि देखि रजनी बाजलि, "काकी, अपने के मना कयने रहियनि जे ई बात सर के नहि बोलबै। लेकिन नहि मानलियै अपने। एकदा फेर खतम होइ गेलै। जिनगी मे पहिले दा एगो नीक लोक राह देखबए बला हमरा मिलल रहथिन,‌ तिनको..."
            सुबोधक पयर रजनीक डेरा दिस नहि घुरलै।
                            ######
बेगूसराय / 01.02.2024
प्रकाशित - समदिया मिथिला (दैनिक) 10 फरवरी 2024
कथा-संग्रह "इएह हमर संसार" मे संग्रहित।
    

No comments:

Post a Comment