Wednesday, July 31, 2024

मेनका मल्लिकक काव्यचित्र : रमेश

::समीक्षा::
:: 'मेनका मल्लिकक काव्यचित्र' ::
    ('गेल्ह सभ झाड़ैत अछि पांखि')
                :: रमेश ::

मिथिला समाजक नारी-दशा देखैत,आइ ई स्पष्ट अछि जे 'विद्रोही नारी-काव्य'क आवश्यकता,आइयो समाप्त नहि भs गेल अछि ।

तथापि,मैथिली नारी-काव्य के, विद्रोह-बिन्दु स' आगां बढ़ेबाक आ 'सृजनात्मक मोड़ देबाक' जे कोशिस, नव्यतम नारी कवि सभ कs रहल छथि, ताहि मे शारदा झा,रोमिशा,डा.विभा कुमारी आ दीपा मिश्रक संग,मेनका मल्लिक सेहो सक्रिय छथि। 

ई महिला कविगण,विभारानी,सुस्मिता पाठक,ज्योत्स्ना चंद्रम् आ कामिनीक 'विद्रोह-काव्य' सं फूट आ फराक काव्य-लीक बनबैत,अपन काव्य-यात्रा मे सन्नद्ध होइत छथि। 

ई सभ नव नारी स्वर, 'पूर्ण विद्रोह' क कारणें, नारीक 'असगर जीवन-नियति के पक्ष मे' नहिं रहि,'परिवार' नामक संस्थाक विध्वंस नहिं चाहैत छथि,अपितु 'परिवार कें वैयक्तिक आ सामूहिक न्याय-प्रणाली सं स्नेहक संगम करैत', अपना हिसाबें,अपना तरीका सं संचालन आ संरक्षण के पक्ष मे छथि, जाहि मे सभ सदस्यक स्वतंत्रता आ व्यक्तित्व विकासक उद्देश्य अन्तर्निहित हो! मुदा,से मानवीय न्यूनतम अनुशासनक संग!

नव्यतम नारी-स्वर सब व्यक्ति, परिवार आ समाजक, समाजशास्त्रीय मूल्यांकन सं लs कs व्यवहारशास्त्रीय आ मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन धरि मे लागल अछि, सेहो काव्य-शिल्पीय तीक्ष्णताक रुप मे। परिवार मे रहैत, अपन उचित महत्व आ अस्तित्वक सार्थकता लेल संघर्ष करैत, साहित्य मे सक्रिय रहब,'असाधारण उपलब्धि' थिक!

ताहि धारा मे,ताही  मोड़-बिन्दु सं प्रस्थान करैत,मेनका मल्लिक अपन पहिल काव्य-संग्रह 'गेल्ह सभ झाडै़त अछि पांखि', लs कs अबैत छथि,जाहि मे ओ मैथिली नारी काव्य के परिवार स' बाहरो ल' जा क' जीवन आ जगत स' जोड़बाक कोशिस करैत छथि। मैथिली नारी-काव्यक कथ्य-विस्तारक,हुनकर से कोशिस,निरंतरता के प्राप्त हेबाक चाही।

 हुनके टा कोशिस नहिं,आजुक तिथि मे सक्रिय सब नारी कवि के,अपन निजी जीवन आ पारिवारिक सीमारेखा स' बाहर निकलि,सम्पूर्ण समाजक व्यथा-कथा के, काव्य-स्वर देबाक चाही!आब नारीक निजी जीवनक कथ्य,मैथिली नारी काव्य मे,'रुढ़' भेल जा रहल अछि,'रुढ़ि' बनल जा रहल अछि!

            तीन 'कोला' मे बांटल,मेनका जीक उनचास टा कविताक ई पोथी, डा.नारायणजीक 'भूमिका' 
(एकटा सम्पूर्ण स्त्रीक आहत मनक कविता)क संग आयल अछि, जाहि मे 'स्त्रीक आहत मन'क दुइये -तीनटा कविता अछि। 
मुदा एत' 'एकटा संपूर्ण स्त्री', वस्तुत: 'संपूर्ण नारी कवि' छथि, जिनकर मन 'आहत' सं बेसी, 'सृजनधर्मी तनाव'क उपयोग मे तल्लीन अछि!

तीनू कोलाक काव्य-कथ्य कें स्पर्श करितो, भूमिका-लेखकक ध्यान 'समाज खण्ड'क कविता सभ (बहुसंख्य अछि ) पर कम, आ 'स्त्री'- खण्डक कविता, 
वा प्रेम-खण्ड'क कविता सभ पर विशेष केन्द्रित भेल छनि, जखनकि 'समाज' एकटा 'सांगोपांग संपूर्ण ईकाई' थिक आ 'स्त्री' आकि 'प्रेम' फराक-फराक 'पूरक ईकाई' थिक,जे समाजक अस्तित्व-निर्माण सेहो करैत अछि, आ तकरा पूर्ण सेहो करैत अछि।
 मुदा कने थम्हू! 
कनेक मैथिलीक धनीक कविताक पृष्ठभूमियो मे जाय पड़त।

 राजकमल चौधरी अपन 'महावन' नामक कविता मे औसत मैथिल आ भारतीय परिवारक जेहेन संरचनाक व्याख्या केने छलाह, से तकर भयावहता तत्कालीन परिवारक यथार्थ छल ।
 सुकान्त सोम अपन 'बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे' नामधारी कविता मे, व्यक्ति आ परिवारक ताही अन्तर्सम्बन्धक अपन कालखंडीय नवीन जनवादी व्याख्या प्रस्तुत केने छलाह।
 आ 'तकरे छायाभावक मंचधर्मी मनोरंजक कविता', उदयचन्द्र झा 'विनोद', 'तड़िपिब्बा जकां तलमलाइत' सेहो,तकर बाद प्रस्तुत कs, मैथिली आ भारतीय परिवारक सदस्यगणक,परिवारिक जीवन प्रस्तुत केने छलाह।

उदाहरणार्थ लेल गेल उपर्युक्त तीनू कविता आ तीनू कविक द्वारा कयल गेल 'परिवार-व्याख्या', परिवार-चित्रांकन,'परिवार नामक संस्थाक खदकैत कडा़ह सदृश् वर्णन', प्रस्तुत केने अछि ।

मुदा आइ परिवारक स्वरूप बदलल अछि। ओ परिवर्तन कतेक सकारात्मक आ कतेक नकारात्मक भेल अछि, तकरे मूल्यांकन करैत अछि, आजुक नव्यतम नारी कविगणक कविता। 

मुदा सैह टा नहि करैत अछि, आजुक नारी-काव्य!
 निवेदिता झा,दीपा मिश्र,निक्की प्रियदर्शिनी,स्वाती शाकम्भरी,नेहा झा मणि,नन्दनी पाठक,रुचि स्मृतिक संग, उपर्युक्त सभ नामित आ अनामित आजुक नारी कविगण आ मेनका मल्लिक सेहो, परिवार संस्थाक संग सम्पूर्ण समाज, स्त्री आ प्रेम धरि के, व्याप्ति प्रदान करैत छथि, मैथिली नारी-काव्य के रचैत काल।आ से आर बेसी करबाक चाही!

 तें हिनका लोकनिक प्रतिपाद्य, आजुक सम्पूर्ण मैथिल समाज आ परिवारे टा नहि, सम्पूर्ण भारतीय समाजो भs गेल अछि,आ से हेबाको चाही। 

 मेनका मल्लिकक कविता मे सभ सृजित नारी-पात्र, सृजनधर्मी  आ सांस्कृतिक  चेतनाबाली अछि। कारण, आजुक नारी कवि, समाजक सांस्कृतिक प्रदूषण सं व्यथित रहिते छथि आ से मेनका सेहो छथि। स्त्रीक विविध स्वरूप, 'पारम्परिक आ परिवर्तित होइत',
 दुनू प्रकारक आयल अछि,हिनकर कविता मे,से स्वाभाविके अछि!

बच्चाक माता आ पतिक प्रेयसी, दुनू रूप!
 महानगर मे 'मिनी मिथिला' बसबैत 'सोनकाकी' सेहो आ पुरुष मजदूरक समान मजदूरी मंगैत ' गोबिन्दपुरवाली ' सेहो! स्वातंत्र्यक प्रतीक तसलीमा नसरीन सेहो, 'अजन्मी भ्रूणक बयान' सेहो,आ बेटी-ललना सेहो!
 'टीस आ कचोट' तं हिनकर नारी-काव्य के,
भावना-संवेदना-करुणाक चासनीए मे बोरि दैत अछि!

          तहिना 'प्रेम'क विविध आयाम आ रूप,छओ टा  प्रेम-काव्यक संग, आनो 'स्त्री-विषयक आ समाज खण्ड'क कविता मे, आयल अछि।
 दाम्पत्य-प्रेमक संग वात्सलय-प्रेम सेहो, कैक टा कविता मे आयल अछि। हिनकर प्रेम-काव्य 'चाहक चुस्की', ' सुगंध'  आ 'मुस्की'क संग आम जनजीवन मे 'सिंगरहार झहरेबाक आकांक्षी' अछि, जतs एकटा मजदूरिनो अपना कें 'मुमताज' आ अपन घरबला के 'शाहजहाँ' वा घरे के 'ताजमहल' बूझय,इजोरिया मे!

          मेनका मल्लिकक 'समाज' विषयक कविता मे - विषय-वस्तुक विविधता आ समकालीनता,सामान्यो पाठक के देखा पड़ैत अछि । कथ्यक वैविध्य,नीक काव्य-भविष्यक संकेत करैत अछि । 

मिथिलाक प्रति अनन्य प्रेम, गाम आ समाजक प्रति उचित माश्चर्य ,सांस्कृतिक प्रदूषणक चिन्ताक संग व्यक्त होइत, अपन संस्कृतिक प्रति मोह -ममता,पचल आ सृजनधर्मी नारीवाद, संवेदनासिक्त करुण- कथ्यक कविता,परिवार मे आ व्यक्तिक मोन मे व्यक्त होइत सन्तापबला कविता, तीनू खण्ड मे स्थान पओलक अछि । 

ओ एहन मिथिलाक  काव्य-चित्रांकन सेहो केलनि अछि, जाहिमे 'नेना सभ उदास अछि ', 'गाम उदास अछि', ' गाछ -बिरीछ अपन व्यथा कथा ' बखानैत अछि , चिट्ठी आ डाकपीन , मोबाइल आ 'ह्वाट्स एप्प' के नामें, कानैत अछि, 'स्मृति'क 'आगमन ''  'मायक आंगुरक स्पर्श'क 'भावना 'क  'देखैत अछि सपना '।

'हरसट्ठे' गाम मे ओना बहुत किछु नहियों भेटैत, गाम मे अनका प्रति संवेदना तैओ,भेटि जाइत छनि,मेनकाक कवि के! कारण,हिनका अपन नेपाली मिथिला मातृभूमि (नैहर )आ भारतीय मिथिला मातृभूमि  (सासुर) क संग नेपाली मातृभाषा आ मैथिली मातृभाषा (द्वितीय) दुनू सं अपरिमेय प्रेम छनि ।

 हिनका विश्वास छनि जे,प्रवासी के अबिते गाममे, बांसक फुलायब बन्न भs जाएत आ 'गुलाबक  ठाढ़िपर लतरत तिलकोर '। मुदा परिवारक भाषा- संस्कृतिक संस्कार मे होइत क्षरण देखू जे मायक लोरी सुनायब 'उफांटि' पड़ि जाइ छै, जखन बच्चा 'कजरारे - कजरारे' सुनाब' कहै छै ! 
परिवार आ समाजक समकालीन परिस्थितिक काव्यात्मक अभिव्यक्ति, कविता सभ मे भेल अछि ।

 आजुक सम्बन्ध, मधुरक चासनीमे बोरल बिक्खे थिक (गुलदस्ता आ कैक्टस) । तें ग्रामीण युवती द्वारा कयल बलात्कारीक हत्या (स्वतंत्रता दिवस पर ) उचिते कवयित्रीक ऊर्जा बढ़बैत अछि । खेहारैत अतीत आ टूटैत मनोरथक वर्तमान (जीबs नहि अबैछ सपनामे )ककरो परीक खिस्सा कोना सुनाबs देतैक?

 तैओ हिनका गाम,'माइये सन सुन्दर' लगैत छनि , जखनकि 'मेक इन इंडिया'क अभियान 'फोंका-मुट्ठी शून्य'  आ फूसि बुझाइत छनि, कारण 'काठ चिरैत बालेस्सर'क आरीक गति तेज होइते, हाथक फुलैत मोट-मोट नस पर पसेना  छहला दैत अछि!

कनियांक लहास उघैत 'दिना मांझी'क प्रति समाजक संवेदनहीनता आ गामक जमीन बेचि महानगरीय फ्लैट किनैत पूतक पिताक 'समदाउन' गायब, भयावह समकालीन यथार्थक करुण कथा थिक । 

मिथिलाक माटिसं पयरक बढ़ैत दूरी 'मौसम कें जबदाह' बनौने जा रहल अछि, तं प्रगतिशील वैचारिकता  'अप - टू - डेट ' भs कs  कैकटा  कविता ( 'बेटी' , गोविन्दपुरवाली ',  'ललना ', ' तसलीमा नसरीनक प्रति ', ' गंगाक कछेर मे ठाढ़ि पुनीता ', 'अजन्मीक बयान ' आदि ) मे आयल अछि । सेहो वैचारिक प्रगतिशीलता, कविता मे आयल अछि।

मुदा, तें की?
हिनकर काव्यलेखन मे अपेक्षित आर श्रमक अभाव, झांपल नहि रहि सकल अछि।

 एकटा  कविता, एक बैसकी मे लिखबाक आ 'फाइनल ' करबाक मन:स्थितिक दवाबक कारणें, कनेक कांच रहि गेल अछि,अनेक कविता एकटा वक्तव्य-प्रधान भs गेल अछि।

सम्पूर्ण कविता मे कविता आ काव्य-तत्त्व नहिं आबि सकल अछि । 
आंशिक काव्य-तत्त्व मात्र, कविताक अन्त मे, कएटा कविता मे आयल अछि । कए टा कविताक प्रारम्भिक बहुलांश,सपाट-बयानीक सीमा धरि,अभिधात्मक भs गेल अछि ।हिनका काव्यतत्व बढ़ेबाक लेल, 'आजुक अभिव्यंजना-कला' पर विशेष ध्यान देबाक चाहियनि।

 'परिवर्तन'क प्राचीन शिल्प त्याज्य, तं नवकविताक स्थापित शिल्प मे, एकशिल्पीय कविता सभ,प्रस्तुत भेल अछि,जे शैल्पिक वैविध्यक मांग करैत अछि ।

 मुदा ताहिसं की ? 
जीवनक उड़ान लेल जखन 'गेल्ह सभ झाडै़त अछि पांखि', त' 'आहत मनक विरुद्ध', प्रेमकविताक सिंगरहार झहरि-झहरि सुगंध पसारबे करत ! 

से सुगं,अगिला संग्रह मे,उपर्युक्त अभाव-अभियोगक निराकरण करैत आओत।
कविता-संग्रह स्वागतेय अछि,जकर काव्य-पांती आ काव्य-टुकड़ी सबहक स्मृति,पाठकक मोन,हृदय आ माथ मे गमगमा त' रहले अछि,माथ के गनगना आ चनचना सेहो रहल अछि!ई हिनका लेल शुभ लक्षण थिक,जे 'वैचारिकता', हिनकर कविता मे,पहिले संग्रह स', 'काव्य-पुटक संग', स्थान पाबि रहल अछि..! 
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