Wednesday, July 29, 2026

जेन जेड (मैथिली कथा)

कथा 
  
जेन जेड

प्रदीप बिहारी

रिक्शा बला एक बेर ऊपरसं निच्चा धरि अपन आंखिक नब्बे डिग्री कोनसं परिमलक चेहरा पर डरीड़ पारलक आ बाजल, "एतनीए दूर त' छै बस स्टैंड। हे देखियौ, एत्तै स' देखाइ छै। चलि ने जाउ। हम अइ थाल-कीच मे नञि जैब।"
         दोसर रिक्शा बला टोकलकै ओकरा, "हे रौ, पहुंचा देबहुन त' की हेतौ? गुड़कौआ अटेची के थाल-कादोमे गुड़केथि‌न?"
         "से, तोहीं पहुंचा ने दहुन। रोडक काते-कात धेने लोक सब जाइ छै कि नै? हम नञि जैब सर। बड़का- बड़का गाड़ी आ बस बला सब त' आर कदबा क'क' घोर-मट्ठा क' देने छै सड़क के। तइपर स' बाइक बला काते-कात एना सटा क' चलै छै, जे कनियो लोक देह छिपत कि गेल खधिया मे। रोडक कात बला खधियो की डबरा स' कम छै?"
        परिमल टीसन परक उद्घोषणा सुनलक, "भागलपुर-जयनगर बला इन्टरसिटी एक्सप्रेस प्लेटफार्म नम्मर एक सं खुजि रहल अछि।"
        एही टेनसं उतरल छल परिमल। सोचने छल, मधुबनिएसं जटही चलि जाय। जयनगर पहुंचैत ई टेन अबेर क' दैत छैक आ ओत' जनकपुर जाइ बला टेन छुटि जाइत छै, तें ई बाट चुनलक। मुदा रिक्शाबलाक गप सुनि मोनमे उपजलै जे घुरि क' टेने पकड़ि लिअय। जे हेतै, देखल जेतै।
       जतेक समय निर्णय लेब'मे लगौलक, ताधरि टेन ससरि गेल। ओ दोसर रिक्शाबलाकें कहलक जे वैह पहुंचा दैक। मुदा ओहो नकारि गेलैक, "हम त' एगो पसिंजर के बाट ताकि रहल छियै। एडभांस बुकिन छै सर। नञि त' पहुंचा दितौं।"
         मुदा वैह एकटा रिक्शाबलाकें तैयार कयलक। ई तेसर रिक्शाबला कने बेसी पाइ मंगलकै। परिमल उचित पाइक चर्च कयलक त' ओ युवक बाजल, "सर यौ! किराया दूरी के नञि होइ छै, परिस्थिति के होइ छै। ज' ओइ कादो के हेंको-हेंको मे रिक्सबा फंसि गेलै त'...? अहूं के सूट-बूट खराप आ हमरा आर के त' घिसा-पिट्टा पड़ले रहै छै, आदतिए छै। एहन मे किरायो कने बेसी नञि मिलतै त' किए जेतै लोक? दोसर दिस के पसिंजर नञि उठा लेतै?"
         किरायाक मोल-मोलाइसं बाज आयल परिमल। टेनमे ओत्तेक थकान नहि भेल रहैक, जतेक रिक्शा तय कर'मे भ' गेलैक। गंतव्य पर ससमय पहुंचबाक तनाव फुट्टे छलैक। तखनहिं रिक्शाबला बाजल,‌ "चलबै त' चलियौ जल्दी। जटही बला बस के टाइम भ' गेल अछि। ज' छुटि गेल त' अगिला डेढ़ घंटाक बाद।"
        ओ छौंड़ा रिक्शाक पैडिल खने सुन्टा आ खने उन्टा चलाब' लागल। मुहसं फेर बहरयलैक,‌ "कोनो सरकार रहौ, अइ रोड के इहे हाल। खोलू धरिया उतरू पार। चैत-बैशाखमे ई हाल छै, त' बूझि लियौ सर साउन-भादो मे की होइत हेतै? चलबै, कि..."
        "रे, रिक्शा रोकबें तखन ने। घूर-बहोर करैत रहबही तं कोना चढ़ब?"
        छौंड़ा खप् द' ब्रेक चापलक आ परिमल अपन रौलिंग बैंग राखि रिक्शा पर चढ़ि गेल। छौंड़ा ब्रेक छोड़लक आ घंटी बजौलक। रिक्शा चललै त' गाब' लागल, "हटि क', हटि क'...रिक्शा चलल अलबेला, कादो‌ मे हेला-हेला...।"

रिक्शासं उतरि बसमे बैसबा धरि सात-आठ डेग चल' पड़लैक, मुदा एतबेमे ओकर पैंटक निचला कोर आ जुत्ता मे 'कादो पेंटिंग' बनि गेलैक। सोचलक, सूखि जेतै तं झाड़ि लेत। ओना झाड़ियो लेत तं लेभरा जयबे करतै। पूरा नहि झड़तैक।
         ओकरा जुत्ताक सोह सेहो भेलैक। बाटमे कतहु पौलिश कर'बला नहि भेटलैक तं संगीतक कार्यक्रममे केहन लगतैक? दोसर मोन कहलकै जे ककरा पलखति छै, जे जुत्ते दिस तकतै? मुदा नहि, तकनिहारकें किछुओ नजरि आबि सकैत छै।‌ जुत्ता नजरि औतैक, तं पैंटो नजरि औतैक। तखन दोसरे प्रश्न मोनमे उठतैक लोककें। एहि चैत-बैशाखमे कादो कोना लागि गेलनि? सोझे आयोजने स्थलपर जयबाक छैक, तें बदलबाक पलखति भेटतैक कि नहि, से के जानय? जुत्ता कोना बदलत? एक्कहि सेट छै। 'कादो पेंटिंग' पर कागत वा लत्ता चलाएत, तं...। नहि, से नहि करत।
          बसमे बैसलाक बादेसं ई बात मोनमे उफन' लगलैक। ओ कतोक बेर जनकपुर गेल अछि। मुदा एहिबेर ओकर उत्साह फराके छलैक। पोतीक बियाहमे उपस्थित होम' जा रहल छल। पोती माने भातिजक बेटी। बियाह प्रात भेने छैक। आइ 'हल्दी, मेहदी आ संगीत'क कार्यक्रम छैक। कुमरम तीन दिन पहिने भ' गेलैक। परिमलकें सोझे 'विवाह-भवन' माने 'मिथिला वैंक्वेट' पहुंचबाक छलैक।
         ओना ओ भातिजकें कहने छल जे एक टा मित्र ओहिठाम चलि जाएत आ काल्हि भोरे विवाह भवन पहुंचत। दोसर बात ई जे 'संगीत' कार्यक्रममे ओ की करत? ओ बेसुराह लोक अछि। गीत गयबाक तं बाते फुट्ट, ओकरा गीत सुनहु ने अबैत छैक।
        मुदा भातिज नहि मानने रहैक, "रहबा लेल वैंक्वेटक लगे मे होटल बुक छै। मित्रसं भेट करबाक अछि त' काल्हि दिनमे क' लेब। आ, संगीत किए ने सुनब। अबियौ ने कका, अहां 'संगीत'क अपना ओहिठामक कार्यक्रम देखि लेबै त' आइकाल्हिक बियाह बला संगीतक जे छवि अछि, से बदलि जाएत।"
          "से एहन कोन विशेषता छैक?"
          "से कहि नहि सकै छी। सिक्रेट छै। नवनीत पूरा प्लान कयने अछि। ओ कहलक जे सिक्रेट छै। जखन होम' लगतै तखने दर्शककें बुझयतनि। आ, सभ भाय-बहिन ओकर दहीमे सही लगौने छै, तें हमरो नहि बुझल अछि। मुदा एक टा बात छै..."
         "की?"
         "पूरा कार्यक्रम अपन भाषा आ संस्कृतिक अनुशासनकें नहि तोड़त। बोर नहि हैब। सोझे एत्तहि आबि जाउ।"
          नवनीत ओकर पौत्र छैक। युवा छैक। पौप-रैपक अनघोलक समयक छैक, मुदा ताहिसं फराक सोचैत छैक, से बात परिमलकें नीक लगलैक। ओकर कौतूहल बढ़ल रहैक।
          करीब पैंतालस मिनटक बाद बस जेहन बाटपर गुड़क' लागल, से परिमलकें लगलैक जे ओ कोनो 'लटाइ'मे लपेटल जा रहल होअय। सोचलक, कते निश्चिन्त अछि बस बला। गंतव्यपर ससमय पहुंचबाक कोनो हड़बड़ी नहि छलैक। बीस-पचीस बरख पहिलुक स्थिति मोन पड़लैक। ताहि समयक तुलनामे सभ क्षेत्रमे परिवर्तन भेलैए। समयक संग खूब बदललै। बस पर चढ़निहार कौलेज आ कोचिंगक छात्रा सभक संख्या देखि छगुन्ता लगलैक ओकरा। नीक सेहो लगलैक।सुदूरक गाम सभसं ई छात्रा सभ शहर अबैए आ घुरैए। एकर बादो परिवहन बला सभक मानसिकता नहि बदलि सकलैक। ई बात परिमलक मोनमे कतहु कचकि जाइक।
          थोड़ेक कालक बाद बस पातर होम' लगलैक। गुमारमे बसात एक दिससं आबि दोसर दिस जाय लगलैक, तं बचल यात्री सभक मन सेहो हल्लुक भेलैक।
          एक टा तिमुहानपर बस रुकि गेलैक। कंडक्टर कहलकै जे जटही जाइ बला उतरू। बस जयनगर जाएत। परिमलकें कोनादन लगलैक। ओ कंडक्टरकें कहलक, "मुदा तों भाड़ा जटही धरिक लेलह, बस पर लिखने छह जे जटही जायत आ सैह कहियो क' बैसेलह। तखन?"
         "से जटही नञि पहुचैब तब न! लिखलपर नञि जैयौ सर। उतरि क' देखियौ, जनेगरो लिखल छै। ओनाहियो अइ देश मे लिखल जाइ छै बहुत किछ। लेकिन जत्ते लिखल जाइ छै, तत्ते होइ छै?" कंडक्टर उतारा देलकै।
          "हौ, तों जुआन-जहान छह। तोहूं एहिना करबहक, जेना हम सभ जुआन रही तं होइ, तं चलतै?"
          "चलतै नञि सर, चलै छै। दौगै छै। बेसी नञि कहब हम। चलू, अपने के गड़ी पर बैसा दै छी।" खलासी के हाक दैत कहलकै, "कत' गेलही रे अटेरना! सर के समान ल' क' टेम्पू लग आ।"
           परिमल देखलक जे अटेरन नीचांमे ककरोसं बतिआइत छल। बाटोमे अखियासने रहय जे अटेरन कंडक्टरके नहि टेरैत छल। एत' की टेरतै? अपन समान लेलक आ नीचां उतरल। कंडक्टर एक टा टेम्पू दिस संकेत करैत कहलकै, "अइ पर बैठि जैयौ।"
           "एहिपर कोना जा सकबै हौ? भरल छै।"
          "केना नञि जा सकबै? भरल छै, तें ने तुरन्ते चलि देतै। दोसरका भरोसे रहबै, त' जा ऊ भरतै आ जटही पहुंचतै, बोडर बन्द भ' जायत। जैयौ। रे चंचलवा! सर के समान ऊपर मे बान्हि दही आ अगाड़ीमे बैसा दहुन। आ ले, किराया ल' जो। सर स' नञि मंगियहुन।"
          चंचल नापि-नापि क' डेग उठबैत आयल। दुनूक हाथ मिललैक। कंडक्टर अपन बसक गेट लग जा क' बाजल- "ह-हप..."
         चंचल रौलिंग बैग उठौलक, टेम्पूक ऊपरमे राखलक आ परिमलकें आगां बैस' कहलकै। परिमल बाजल, "बान्हबहक नहि?"
         "नञि खसतै सर। चक्का के छेद मे फंसा देने छियै‌‌‌।"
         परिमल आगांमे बैसल। लगलै जे आब खुजतै। मुदा चंचल कतहु चलि गेल। ओकरा लगलैक जे आब कोनठाम बैसौतैक पैसेंजरकें।
         तखने एक टा आर टेम्पू अयलैक। आ ओही संग चंचल सेहो आयल। बाजल, "जटही बला सब अइ पर बैसियौ।"
          परिमलकें तामस उठलैक, "अएं हौ! तों सभ यात्रीकें समान बुझै छहक? ई कोन बात भेलै?"
         "से त' बस के कंडक्टर बोलैत आ ऊ चलि गेल। हम त' दोसर दिस जेबै। सब पसिंजर ओतै के छै। खाली अहीं जेबै जटही। बैसियौ ने अइ पर।"
          परिमल के बड़ी जोर तामस उठलैक। मोन भेलैक जे...मुदा नहि। क्षणहि ओकरा मोनमे उपजलैक- नहि, आब तेहन समय नहि रहलैक। तें ओ मात्र एतबे बाजल, "तोरा जयबाक नहि रह', तं बैसेलह किएक?"
        "त' की बस के कंडक्टर स' झगड़ा कर' छोड़ि दितौं। चच्चा! होइत त' किछ नञि, बसक टाइम फयल क' जैतै।"
         "ओकरा बारेमे बड़ सोचै छहक। के हेतह?"
         "कंडक्डर हमर चच्चा छै। ओकर बात नञि मानितियै?"
        ताधरि दोसर टेम्पू बला परिमलक समान अपन टेम्पूक पछिला दुनू सीटक बीचमे ठाढ़ क' देलकै। चंचलकें जानि नहि, कत'सं फूर्ति आबि गेलै। ओ अपन टेम्पू दौगा लेलक।
        परिमलक प्रतीक्षा शुरू। ई भरतै तखने चलतै। टेम्पूबला कहैक, "हे, वैह अइलै जनेगर (जयनगर) स' बस। ओकरे पसिंजर स' भरि जेतै।" मुदा परिमलकें कतहु देखयबे ने करैक। ओ कने आगां बढ़ि क' देखय आ पुछय, "कहां अबै छै हौ?"
         टेम्पूबला कहै, "हे, उहे। देखियौ ने। अहां के किए ने देखाइए? अबै त' छै।"
          मुदा, बस किएक औतैक? कोनो दिससं नहि अबैक। समय ससरल जाइक।
         परिमल अपन मित्रकें मैसेंजरपर फोन लगौलक। सोचलक, जं ओ बाइक ल' क' आबि जाइक तं...। कहुना चलि जायत। मित्र किनसाइत ओहि जगहक नाम पुछलकै। ओ टेम्पूबलासं पुछलक, "ई कोन जगह छै हौ?"
         "उमगांव।"
          मुदा, मित्रकें अएबाक सुयोग किनसाइत नहि लगलैक। भातिजकें फोन नहि कर' चाहैत छल। बियाह-दानक घर छै, कतोक काज होयतैक।
         परिमल देखलक जे किछु टेम्पू आ ई-रिक्शा सभ अबैक, मुदा ओकरा लेल नहि बिलमै। तखने एक टा पिक-अप वैनकें देखलक। ओकरा अपन नोकरी बला समय मन पड़लैक। डेली पसिंजरीमे जहिया टेन छुटि जाइक तं सड़कपर पिक-अप वैन सभसं लिफ्ट लिअय।   एहि तरहक वाहनसं लिफ्ट लेबाक सांकेतिक भाषा होइत छैक आ से परिमल सीखि लेने छल। तकरे प्रयोग कयलक। कने आगां जा क' ओ वैन रोकि देलकै। परिमल अपन समान उठौलक आ समानक संग स्वयंकें ड्राइवरक कातमे घोकचल स्थानपर सेट कयलक।

ओ गाड़ी जटहीसं पहिने पिपरौन मोड़पर उतारि देलकैक। ओत्तहु एक टा टेम्पू लागल छलैक। एक टा महिलाक समान ओहिमे छलैक। तीन टा युवक सल्हेस थानक सोझांक ओहि मोड़पर ठाढ़ छल। परिमलक समान ल' टेम्पूक पाछांमे ध' देलकै। ओ बाहरे ठाढ़ रहल। पुछलकै, "कखन चलबहक?"
           ओहि महिला दिस संकेत करैत ड्राइवर कहलकै, "हिनकर लोक सब आबि रहल छनि। हे पांचे मिनट..."
           ओकरा कातमे ठाढ़ एकटा छौंड़ा बाजल, "चालिस मिनट स' पांचे मिनट कहि रहल छै।"
          ड्राइवर ओकरा दबारलक, तं छौंड़ा लंक ल' क' पड़ाएल।"
          परिमलक लेल प्रतीक्षा...। लोक ककरो, जाएत केओ आ प्रतीक्षा परिमलक। ड्राइवरकें जतेक बेर कहैक, ओ एतबे उतारा दैक, "हड़बड़ैयौ नञि सर। आब जाइए के कत्ते दूर अछि? दू-अढ़ाइ किलोमीटर। खुजतै आ पहुंचि जेतै।"
          "बोर्डर बन्न भ' जेतै तखन?"
          "नञि हेतै बन्द। अहां के ओइपार पहुंचा देब, जत' स' जनकपुरक बस भेटै छै।"
          तखने बेरा-बेरी किछु टेम्पू आ ई-रिक्शा अयलैक। ओ रोकबा लेल हाथ देखौलक। नहि रुकलै। ओकरा तामस उठलैक। एक टा छौंड़ा प्लास्टिकक बोरामे खाइबला फोंफी कोंचने छल। बाजल, "एत' किच्छो नञि रुकत।"
          "ई तं रंगदारी भेलै ने!"
         ओ तीनू युवक ई बात सुनलक। ओहिसं एक टा बाजल, "सैह बुझियौ सर।"
          ड्राइवर कहलकै, "अहां के बड़ जल्दी अइ, त' समान लिअ आ आगू बढ़ि जाउ। हे ओइ मोड़ स' आगू।   एम्हर स' जाइबला सब रोकि देत। एम्हर नञि रूकत।"
         "तं तोहीं चलह ने। लटकौने छह।"
         "कहलौं ने हिनकर लोक अबै छनि। यै, फोन लगबियौ ने। कत्ते समय आर लगतै?"
         ओ महिला कानमे मोबाइल सटा क' पहिलुके गप दोहरौलकि, "मात्र पांच मिनट।"
         धैर्यहीन होइत यात्री सभकें संतोष दिअयबा लेल ड्राइवर टेम्पू स्टार्ट कर' लागल, मुदा स्टार्टे ने होइक।
          परिमलक मुंहसं बहार भेलैक, "हे, लैह आब...।"
         ड्राइवरक अथक प्रयाससं जखन टेम्पू स्टार्ट नहि भेलैक, तं ओ तीनू युवक ठेलि-ठालि क' स्टार्ट कयलक।
         उपलब्ध यात्री सभ बैसल। ओहि महिलाक लोक सेहो आबि गेलैक। दू टा महिला, अढ़ाइ बर्खसं चारि बर्ख धरिक पांच टा बेदरा आ सात टा मोटरी। ड्राइवर सभकें टेम्पूमे सैंत' लागल।
        टेम्पू चललै। सावधानी मुद्रामे एक कात बैसि जटही बोर्डर धरि गेल परिमल। जांच लग उतरि ड्राइवरे समान स्कैन करबा देलकै। अपन परिचय पत्र देखबैत आगां बढ़ि पुलियापर ठाढ़ भेल। कनिएकालमे टेम्पू अयलैक। सभ बैसल। जा, ई की? टेम्पू चलबा लेल भेल कि एक टा छौंड़ा चिचिअयलै, जेना बस बलाकें हाक दैत होअय, "हौ डलेबर! रोकहक। हमर मम्मी नञि छै।"
           ड्राइवर माथ धयलक। परिमल कहलक जे पाछां जा क' देखय जे ओ महिला कत' रहि गेलै? ड्राइवर गेल आ कनिएकालमे घुरि आयल। परिमल पुछलकै तं कहलकै, "सौदा कीनै छलै। एम्हर सस्ता मिलै छै ने!"
          "मुदा सुनने रही जे नेपालक नबका सरकार रोक लगा देने छै।"
          "नञि। आब हटा देलकै। जहिया लगेने रहै, तहियो एत' लोक लैए जाइ। इहो जनेना पनरह टा करुआ तेल के बोतल लेलकैए। रखतै कत' से सोचि माथा दुखाइए।" ड्राइवर बाजल।
         परिमलक कातमे बैसलि महिला बाजलि, "तों किए माथा दुखबै छहक। राखि ने लेतै, चलाक छै मौगी।"

जनकपुर जयबा लेल जत' बस भेटै छै, ओहिठाम टेम्पू उतारि देलकैक। परिमलकें जेना जानमे जान अयलैक। मुदा ओत्तहु बस नहि छलैक। ई-रिक्शा बला कहलकै जे बस सभ 'लगन'मे लागल छैक।
        ई-रिक्शापर बैसलाक बाद ओहो शेष पसिंजरकें ताकि रहल छल। परिमलकें पिपरौनक तीनू युवकक गप मोन पड़लैक।
       परिमल ओकरा सभकें कहने छल, "तों सभ पसिंजरकें रिले रेसक खेलाड़ी सभक हाथक 'बैटन' बुझै छहक ने। थम्हबैत रहलहुं एक-दोसराक हाथ। कने सवारीक बारेमे सेहो सोचहक। आब तोहीं सभ सोचबहक ने। जेन जी सभ...।"
        ओहिसं एक टा छौंड़ा बाजल छलैक, "सर, जेन जी नहि, जेन जेड कहियौ। जेन जी ओइ पार छै।"
         "एना किए कहै छहक? दुनू एक्के ने छै। मात्र कह' के फरक छै।"
        "अपने पढ़ल-लिखल छियै। निचैन स' अर्थ लगेबै त' लागि जायत। चढ़ियौ टेम्पू पर।"
         आ परिमल टेम्पू पर चढ़ि गेल।
         ओकरा मोनमे ई बात अबिते रहै कि ई-रिक्शा बला एक टा दम्पति दिस संकेत करैत पुछलकै, "काका, ई दुनू गोटे अहमदाबाद स' अबै छथिन। राम मंदिर लगक धर्मशाला मे जाइ के छनि। अपने के दोसर रूट भ' जेतै। हिनका दुनू के धर्मशाला मे उतारि अपने के सेहो पहुँचा देब। अपने के देरी हैत त' मुरली चौक स' दोसर रिक्शा क' देब। बैसा लियनि?"
          परिमलके ई-रिक्शाबलाक गप नीक लगलैक। ओ स्वस्ति देलक।
          ई-रिक्शा चल' लगलैक। परिमलकें पिपरौन चौक पर सल्हेस थानक सोझां ठाढ़ तीनू युवक आ ओकरा सभक गप फेर मोन पड़ि गेलैक।
                       +++++
(फोटो सौजन्य - चैट जीपीटी)

Sunday, July 19, 2026

संस्मरण - उसरल बजारमे बुलैत रा ना सुधाकर


    (रा ना सुधाकर) 

उसरल बजारमे बुलैत रा ना सुधाकर

प्रदीप बिहारी

मैथिलीक लोकप्रिय रचनाकार प्रफुल्ल कुमार 'मौन'क मादे हुनक नेपाल प्रवासक अन्य महत्वपूर्ण काजक अलावे सुनैत रही जे हुनक प्रेरणास्वरूपें तीन टा प्रतिभाशाली रचनाकार नेपालमे लिखब शुरू कयलनि। ओ तीनू छलाह- भुवनेश्वर पाथेय, रा ना सुधाकर आ जीतेन्द्र जीत। ई बात ताहि समयक थिक जाहि समय हम मैथिली-लेखनमे डेगा-डेगी देब' शुरू कयने रही। तें ई तीनू नाम हमर मानसपटल पर छपा गेल छल। 
       एहि तीनू नाममे श्रद्धेय भुवनेश्वर पाथेयसं कहियो भेट नहि भ' सकल, मुदा हुनक कथा सभ पढ़लाक बाद हुनकासं भेट नहि होयबाक कचोट थोड़ेक कम भ' गेल। आदरणीय भाइ रा ना सुधाकर आ जीतेन्द्र जीतसं भेटो भेल आ हिनका दुनू गोटेक रचनासभ सेहो पढ़ैत रहबाक अवसर भेटैत रहल। श्रद्धेय 'मौन' जीसं बरोबरि भेट होइत रहल, से एहि दुआरे जे ओ बेगूसराय बरोबरि आबथि। हुनक पुत्री एत' रहैत छथिन। दोसर, एहि दुआरे जे अपन नाट्य-संस्था 'नवतरंग'क लोक कला सम्बन्धी क्रिया-कलापमे मौन जीक सर्वविध सहयोग आ आशीर्वाद संस्थाकें भेटैत रहल छैक। ओ एहि त्रयी सभक मादे कहैत रहथि, हिनकालोकनिक रचनाक धर्म आ मर्म कहैत रहथि। तें ई तीनू सीनियर हमर आदरणीय रहलाह अछि।
       मिथिला मिहिर जखन 1973 ई मे 'नवतूर' स्तंभ शुरू कयलक, तखन ई लोकनि प्रमुखतासं मिथिला मिहिरमे छपैत रहलाह। ओहिसं पहिनहुं यथास्थान छपथि। तें पढ़बाक अवसर भेटैत रहल।
       आब तं एहि त्रयीमे मात्र जीतेन्द्र जीत बांचल छथि, जे बहुत पहिनहिं साहित्य-लेखनसं विमुख भ' गेल छथि। ओ विराटनगर मे रहितो नहि छथि आब। एही वर्ष 2016क जनवरी मे रा ना सुधाकर दिवंगत भ' गेलाह। 
        रा ना सुधाकर अपन नामक कारणे सेहो लेखक वर्गमे आकर्षणक बिन्दु छलाह, काज आ स्वभावक कारणें तं सहजहिं। हम बहुत दिन बाद बुझलहुं जे 'रा ना' माने राम नारायण। हमरालोकनिक सामान्य रूपें बाजबाक जे टोन होइए, तदनुसार 'रा आ ना' कें जोड़ि क' राना उच्चारित सहजहिं भ' जाइत छैक, से हमरो होअए आ बहुतो लोककें होनि। बाद मे जखन 'रा ना'क माने बुझल तं अपने पर हंसी उठल। हाय रे हम! अमरुख कहीं के। 
       एकबेर हुनकासं एहि मादे पुछने रहियनि, तं कहलनि, "अहांक देशसं अंगरेज एखनो नहि गेल-ए। अपन नांगरि लोकक मोनमे गाड़नहि अछि। तें राजकाजसं ल' क' बाजा-भुक्की मे सेहो अंगरेजिए 'एब्रिभिएसन' चलैए। एत' नेपालमे से नहि चलै छै। एत' आफ्नो भाषा आफ्नो देश, प्राणभन्दा प्यारो छ। माने अपन भाषा आ अपन भेष प्राणहुं सं प्रिय अछि।"
        रा ना सुधाकर हमरा कखनहुं 'अहां' तं कखनहुं 'हौ' कहि सम्बोधन करथि। माने हमरासं गप करबाकाल फ्री स्टाइल मे गप करथि, से हमरा नीक लागय। हुनक 'हौ' कहब बेसी नीक।
        हुनकासं धुरझार भेट होयबाक अवसर तं नहि भेटल, मुदा कार्यक्रम आदिमे कहियोकाल भेट होइत रहल। मुदा जखन भेटथि, आत्मीयतासं भरल। घरक लोक सन। पत्राचार धरि होइत रहल, से ताधरि, जाधरि नेपाल-भारतक बीचक हुलाक (पोस्टल) सेवा बन्न नहि भेलैक।  प्राय: दू वा तीन बेर हम हुनका ओहिठाम (रानी, विराटनगर) गेल छी। से जहिया गेलहुं, लागनि जे कत' धरी, कत' उसारी?
      ओहो प्राय: दू बेर बेगूसराय आयल रहथि, से 'सगर राति दीप जरय' केर गोष्ठीमे। गोष्ठीक बाद दू दिनक लेल हम अपना ओहिठाम रोकि लेने रहियनि। मोन पड़ैए, ताहि समय ओ ख्यातिलब्ध कथाकार राजेन्द्र विमल प्रति सम्मान व्यक्त करैत कहने रहथि जे विमल जी हुनका कथाकार बनबामे बड़ सहायक भेल रहथिन।
      बहुत प्रकारक कष्टक अछैतो हुनका चेहराक मुस्की मलिन नहि होनि। छोटछीन फैक्ट्री मे आ तकर बाद तेहने सन प्राइवेट फॉर्मक अल्पवेतन भोगी नोकरिहारा सुधाकर जी अपन मुस्की मलिन नहि कयलनि। गरल रूपी जीवन-संघर्षकें मुस्कियाइत पीबैत रहलाह आ जीबैत रहलाह। 'हर फिक्र को धुएं में उड़ता चला गया...' सन।
      ई बात तय छैक जे एहन लोककें समाज सेहो हतोत्साहित करैत छैक। खाहे लेखक ओ कतबो पैघ किएक ने होथि। से जातिगत समाज आ पेशागत समाज दुनू। एहन लोककें जकरा लेल अवसरवादिता पोटासियम साइनाइड सन होइत छैक, आजुक समाज कछेरे मे छोड़ि दैत छैक। साहित्यिक मान-सम्मान आ उचित मूल्यांकनक दृष्टिकोणे रा ना सुधाकरक संग तेहने सन भेलनि। हुनको लेल अवसरवादिता आ लल्लो-चप्पो पोटासियम साइनाइडे सन छलनि, जकरा ओ जीवनपर्यंत नहि चिखलनि।
        रा ना सुधाकर गद्य आ पद्य दुनू विधामे लिखलनि। दुनूमे उत्तम लिखलनि। मैथिली साहित्यक माथ ऊंच करबा योग्य। मुदा, हम हुनका मूलत: कथाकार मानैत छियनि‌। ओना हुनकर कविता आ गीतसभ सेहो चर्चित रहलनि अछि।
        एकबेर विराटनगर मे भेटक क्रममे अपन एक सय गीतक पाण्डुलिपि देखौने रहथि। नाम छलैक- सयपत्री। एक सय गीतक संग्रह। हुनक इच्छा रहनि ने कथा-संग्रहक बाद ई छपनि। मुदा, से इच्छा संगहि गेलनि। आम आदमीक लेल सभ तरहक स्वादक गीतसभ रहैक एहि पाण्डुलिपिमे। किछुक मुखड़ा एखनो मोन पड़ैए- 
        "सुग्गा हमर अहीं छी, मैना हमर अहीं छी।
         सम्पूर्ण जिन्दगी के अएना हमर अहीं छी।।
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         एक टा दोसर स्वादक गीत-

         "के खुआ देलकौ मेला मे पान बहिना
           ई छौंड़ा सब होइ छै बैमान बहिना..."

          रा ना सुधाकर अपन कथा सभक शीर्षकक कारणें सेहो चर्च/कुचर्च मे रहलाह। जेना, शुद्धतावादी आ परम्परावादी सभकें हुनक कथा 'चोलियामे चोर बसे गोरी', 'चान असोथकित अछि' आ 'खुट्टी पर टांगल ब्रा' नहि पचलनि। भेलनि जे 'दीयरि', 'संधि', 'प्रदक्षिणा' आ 'थकुचल मासुक बुट्टी' आ 'छागर' सन कथाक लेखन एहन-एहन कथा किएक लिखै छथि? आ झट द' फ्रायड मनोविज्ञानसं लिप्त चोला ओढ़ा देल गेलनि सुधाकर जीकें। मुदा, किनसाइत एहि कथासभक आन्तरिक मर्म बुझबाक प्रयास करितथि ओसभ। जे, से...
        रा ना सुधाकर अपन कथासभक परिवेश गामसं अनैत छथि। मिथिलाक कोनो‌ गामसं, जाहि ठामक लोक आ गप, आह्लाद आ वैमनस्यता, प्रेम आ घृणा हुनका मोन-प्राणमे बैसि गेल रहैत छनि। ओत्तहिसं कथा उठबैत छथि। ओ कथा उठबैत छथि जोगबनी-रानी (विराटनगर)क बॉर्डर एरियासं, जत' भूख छै, पटोर आ मारकीनक अद्भुत समावेश (कथा- संधि) छैक‌ आ छैक दाम्पत्यक अस्वीकृति-स्वीकृति आ भारत-नेपालक बीचक मनमोटाओक परिणाम। आ 'संधि' सन कथा लिखैत छथि। 
        ओ अपन कथाक भाषा सभ अनैत छथि अप‌न पात्र आ परिवेशक आत्मासं। हिनक कथा 'प्रदक्षिणा'मे से देखल जा सकैछ। कथानायक बहुतो समयक बाद गाम जाइए आ तखन जे बदलल गाम देखैए, तकर अद्भुत चित्र एहि कथामे छैक। नायक अपन 'स्व' कें तकैत अछि।‌ पूरे गामक परिक्रमाक बादो अपन बहिक्रमक मित्र-बन्धुसं भेट नहि होइत छैक। कथानायकक मन:स्थितिक चित्रण मनोयोगपूर्वक भेल अछि। पाठककें अपने गाम सन घटना लागब कथाकारक सफलता सिद्ध करैत अछि। एहि कथाक भाषा, जकर चर्च हम कयल अछि, एहि वाक्यमे देखल जा सकैछ-
          "मोटरसाइकिल पर ऑफिस जायब आ विधवाक संग लसरघंटी।"
           ई एक टा बानगी देल अछि। 
           कहल गेलैए‌- जे गामसं नहि जुड़ल‌ अछि, ओकरा लग नीक भाषा नहि छैक। सुधाकर जीक रचना सभकें पढ़ैत हुनक गामसं जुड़ल गहिराइ बुझना जाइछ। इहो कहल जाइ छै जे 'जकरा लग अतीत छैक, ओकर वर्तमान महत्वपूर्ण होयतैक।' ई बात सुधाकर जी पर सेहो लागू होइत छनि। हुनको लग गामक अतीत छनि, प्राय: तें ओहो महत्वपूर्ण छथि।
         हिनक ओ कथा जकरा फ्रायड मनोविज्ञानक चिप्पी लगाओल गेल, ओ अछि- 'खुट्टी पर टांगल ब्रा।' ई कथा 1984 ई मे 'मिथिला मिहिर' मे छपल छल। एक टा चोटी लेल नायिका बुचियाकें दोकानदार गंगबा कोना तंग करैत अछि, तकर चित्रण भेल अछि। पहिलुक देल 'ब्रा'क दाम कोना असूल' चाहैत अछि, तकर चित्रण अछि। बुचियाक दयनीयताक गलत फैदा उठबैत अछि गंगबा। मुदा, एहि कथामे बुचियाक प्रतिरोध सोझां अबैत छैक।
        एहि कथामे प्रयुक्त शिल्प देखबा योग्य अछि। वातावरण-निर्माणमे जाहि प्रतीक सभक प्रयोग भेल अछि, से कथाक गुणवत्ताकें स्थापित करैत अछि। जेना-
       'एक दिस बुचिया संग जे भ' रहल छै। दोसर दिस लकड़ीक ठाहीक आवाज- चोली भीतर हैसा...जोर लगा क' हैसा...'
       'छाउरक ढेरी पर एकटा कुत्ता मूइल मैनाकें गिधनि रहल छलैक।'
       बुचियाक प्रतिवाद आ पुरुषक प्रति आक्रोश एहन भ' जाइत छैक, जकर चित्र कथाक अंतमे रहि तरहें उकेरल गेल अछि- 'भाइयो जखन खुट्टी परक ब्रा छूबै छै तं पुरुष मानसिकताक प्रति आक्रोश बहराइत छै बुचियाक।'
       ई कथा एक टा आर ग्राफ बनबैत अछि। ओ ग्राफ थिक मैथिली कथामे स्त्रीकें चेष्टगर होयबाक ग्राफ। 
       ई कथा पढ़ैत काल ललितक कथा 'कंचनियां' मोन पड़ैत रहल। 'कंचनियां'क एक टा अंश मोन पड़ल, जत' गरीबीसं फिरीसान आ बेमार ओकर माय कहै छै- 'मालिक के धेने रही, बेर छै कुबेर छै।'
      बेजाय तं कंचनियो के लागल रहै, मुदा मायक बेरामी दुआरे चुपचाप समान ल' क' घुरल छलि। मुदा, एहि कथा मे बुचिया एक लोइया थूक फेकि क' घुरै छै। ई बात मैथिली कथा आ स्त्री द्वारा प्रतिवादक बढ़ैत ग्राफकें कहैत छैक। 
       ओना स्त्री-विमर्शक दृष्टिएं देखी तं सुधाकर जीक सभ कथा एहि विमर्शकें नोतैत अछि। हिनक कथा सभक स्त्री मिथिलाक ओ स्त्रीसभ छथि, जे अपन जीवन नहि जीबि सकैत छथि। चूल्हि, चालनि आ चिनवार सं आगांक कोनो सपना हुनकासभक लेल रह' नहि देने रहनि तात्कालिक समाज। आ सैह हिनक कथा सभमे आयल अछि। जस के तस। 
        कथा 'छागर'मे  माय आ पत्नीक बीच पिचाइत पुरुषक प्रतिस्थापन बड़ कौशलपूर्वक कयने छथि। नायिका रूपा सासुक प्रतिकार करै छै। पति ओकरा ओधबाध करैत छै। माय-पत्नीक घिच्चातिरीमे बेटाक असहजता बड़ फड़िच्छ भ' क' एहि कथामे अबैत छैक। कथाक अंत, हिनक आने कतोक कथा जकां प्रतीकात्मक भेल छैक। कथाक अंत बुझू जे कविताक एहि पांतिसं होइत छैक- 'ओकरा मोन पड़ि गेलैक जे हनीफ कसाइ छागर कें खुट्टापर लटकौने छूरा सं बुट्टी काटि-काटि तराजू पर जोखैत रहय। 
        एहि तरहक प्रतीकात्मक अंत सुधाकर जीक कथाक विशेषता छलनि। एहन अंत कथा 'चान असोथकित अछि' मे सेहो देखल जा सकैछ- 'दोसर दिन सभ देखलक जे मनटून के पैर मे सुशील बाबू बला चप्पल झलकि रहल छलनि।'
       कहबाक माने ई जे रा ना सुधाकर अपन कथा सभकें पहिने जीबैत छलाह, तख‌न लिखैत छलाह। आ ई बात हुनका अपन तूरक अग्रणी पीढ़ी मे आ मैथिली कथाक महत्वपूर्ण श्रेणीमे रखने छलनि। मुदा, ई बात तं ओ बुझताह, जे हुनका गहनतासं पढ़ि सकलाह वा सकताह। प्रश्न ई उठैछ जे हमर साहित्यक नब पीढ़ी कोना पढ़त? जाहि भाषामे कोनो लेखकक पुस्तकाकार पहिल कृति हुनक मृत्युसं किछुए पहिने आबय, तखन ओहि लेखककें नब पीढ़ी कोना चिन्हत?
       रा ना सुधाकर जी एहि अवसादमे जीबैत रहलाह आ अपन पोथी सभक प्रकाशनक प्रति उदासीन भ' गेलाह। ई उदासीनता एहू दुआरें छलनि जे स्वयं सक्षम नहि छलाह। अंतिम समयमे 'नेपाल विद्यापति पुरस्कार कोष' द्वारा कथा-संग्रह 'दीयरि' कें 'नेपाल विद्यापति मैथिली पाण्डुलिपि पुरस्कार- 2061' देल गेलैक। 
       अंतिम समयक ई पुरस्कार झुनझुने सन लागल होयतनि सुधाकर जीकें। एहन झुनझुना जे अपने कमे बजा सकल होयताह...।
      सुधाकर जीक साहित्य बेसी-सं-बेसी पाठक धरि पहुंचय, तकर खगता छैक। मैथिली भाषा-साहित्य लेल नेपालमे बहुत रास काज भ' रहल छैक, से सरकारी आ गैर सरकारी, दुनू स्तरपर। हुनक साहित्यपर शोध होअय, हुनक रचनासभ छात्र-छात्रा आ आम पाठक धरि पहुंचय। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा हुनक रचनासभक नेपाली अनुवाद कराओल जाय। आदि, आदि।
        तें रा ना सुधाकर जीक साहित्य कें उचित मान-सम्मान आ स्थान हेतु भागिरथक प्रतीक्षा छैक- नेपाल आ भारत, दुनू ठाम।

हं, कतोक झंझावात, कष्ट, अवसाद भोगैत रहलाक बादो व्यक्ति रा ना सुधाकर बहुत आग्रही लोक छलाह। साहित्ये जकां सत्कार सेहो हुनक मोन-प्राणमे छलनि। से अभावमे रहितो निमाहैत रहलाह। 
       एकबेरक बात मोन पड़ैए। हम अबेर क' जोगबनी बॉर्डर पहुंवल रही। जनवरी मासमे (प्राय: दू वा तीन जनवरी) बेगूसराय सँ अपन स्कूटरेसं चलि गेल रही। बॉर्डर बन्न भ' गेल रहैक। जोगबनीक एक्साइज ऑफिस मे एक गोटें परिचित रहथि। ओत्तहि स्कूटर राखि बॉर्डर टपलहुं। कनिये आगां गेलहुं कि भाइ रा ना सुधाकर बुलैत भेटलाह। हमर अयबाक पूर्व जनतब रहनि। देखितहिं बजलाह, "बड़ अबेर भ' गेलह? सोचने रही जे सबेरे अयबह त' दुनू भाइ बैसब आ बड़ीकाल धरि बतिआएब। मुदा आब अबेर भ' गेल। तोहर भोजनो सेरा गेल हेतह।"
        हम कहलियनि, "अबेर भेनहि की? चलू ने आर अबेर धरि बैसब।"
       "मुदा बैसब कोना? घरमे थोड़े किछु राखल रहै छै? चलह..."
       आ मुस्किआइत एक टा बन्न होइत दोकान दिस बढ़ैत बजलाह, "उसरल बजारमे ज' किछु भेटि गेल त' घरेमे बैसब। बच्चासभ‌ सूति रहल हैत।"
       हम हुनक पछोड़ ध' लेने रही।
       'उसरल बजार' हुनका मुहसं बहराएल ई शब्द हमरा मोनमे बैसि गेल। 
      हुनका गेलाक बाद दू बेर जोगबनी बॉर्डर टपलहुं अछि। लागल जे भाइ रा ना सुधाकर हमर प्रतीक्षामे बुलैत होयताह। आ हम चारुकात नजरि खिड़बैत हुनका ताक' लगलहुं। हुनका बिनु तं ई उसरले बजार ने? सोचलहुं, भविष्योमे जं आयब, तं ई बजार उसरले लागत।
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