Wednesday, July 31, 2024

खैंक (मैथिली कथा) - प्रदीप बिहारी

कथा

खैंक

प्रदीप बिहारी


हड़बड़ाइत ओ पेंसन काउण्टर धरि गेलि आ बाजलि, 'सुबोध बाबू! हमर बाबा के लाइफ सर्टिफिकेट लए लियौक।"
          सुबोध फार्म देखलक। बाजल, "कहां छथिन? हमरा सामनेमे दसखत करबाक चाही ने। अहां के भेलियै हुनकर?"
          "बोललौं जे बाबा के लाइफ सर्टिफिकेट लए लियौक, त' नहि बुझायल। पोती होलियै हुनकर।"
           काउण्टर पर ओहि महिलाक पाछां ठाढ़ एक गोटें बाजल, "हइ । एना किए बोलै छहो? साहेब सुनि नहि सकल होथिन। केतना भीड़ छै, से लक्खा नहि दए रहलो हन? अकेला साहेब, देखै नहि छहो केना औल-बौल होल छथिन।"
           महिलाकें अपन गलतीक आभास भेलै। बाजलि, "सौरी, गलती भए गेलै सर। माफ कए दियौ।"
     ‌     सुबोध महिला दिस ताकलक। प्राय: अठाइस-उनतीस बरखक ओहि महिलाक चेहरा निश्छल बुझयलै। अचरज भेलै जे एना किएक बाजलि? ओ मुस्कियाइत बाजल, "कोनो बात नहि। अहांक की नाम भेल?"
           "रजनी।"
           रजनीक मुखाकृति पर एकबेर फेर सुबोधक नजरि गेलै।‌ ओ बाजल, "ठीके कहलहुं अहां। मुदा कत' छथि दयाल चन्द्र शर्मा जी?"
          रजनी अपराध-बोध सं उबरि नहि चुकल छलि। बाजलि, 'सर जी, ऊ उप्पर नहि आबि सकै‌ छथिन।‌ निच्चां चरिचक्का मे छिकथिन। हुनका बुलल नहि ने होइ छनि।"
         "बेस, तं कने बैसि जाउ। लाइनमे‌ किछु गोटे छथि। हिनका सभक काज झट द' क' दै छियनि, तकर बाद चलै छी।"
         रजनी लाइनसं कात भ' गेलि।‌ मुदा, बैसलि नहि। कातेमे ठाढ़ रहलि। ओकरा लगलै जे बैसि गेने सर जी बिसरि ने जाथि। ओकर नजरि सुबोध दिस छलै। नजरिमे आतुरता छलै- सर जी ....
         कनिए कालमे पांतिक किछु गहि‌कीक काज कयलक बाद शेषकें‌ प्रतीक्षा करबाक बात कहि सुबोध बहरायल। रजनी आगां-आगां आ सुबोध पाछ-पाछां।‌
          "अहांक पिता की करै छथि?" सुबोध पुछलक‌।
           "गामे मे रहब करथिन। खेती-पथारी। जमीनो-जत्था कम्मे बचि गेल रहै। साले-साल खेत बेचैत रहलखिन। आब हुनकर काज हमर भाइ करब करै छै। जमीनो बहुत कम्मे बंचल छै।"
           "अहांक बाबा हुनका पर ध्यान नहि देलखिन की?"
           "बाबा के संतान नहि ने होलनि। हमर दादा के चच्चा होलखिन बाबा। ई बाबा कहांदन बड़े कोसिस कैलखिन, मुदा हमर अप्पन बाबा जत्ती ने दुलार करब करथिन जे दुलारे मे बगदि गेलखिन हमर दादा।"
          "अहां की करै छी?"
          "सब बात एक्के दा पुछि लेबै‌ सर। हम्मे...
          ताबत ओ दुनू कार धरि आबि गेल छल। सुबोध देखलक जे कारक पछिला सीट पर‌ प्राय: छओ फुटक एकटा बूढ़ ओंगठल छलाह। ओ पुछलक, "की  होइए दयाल बाबू? नीके छी ने।"
          "छी त' निक्के। खाली डांड़ स' निच्चा के भाग बेकामक भेल हन। कहुना आदमी के सोंगर स' ठाढ़ होइ जाइ छियै, दिसा-मैदान कए लै छियै।" दयाल बाबू उतारा देलनि।
          फार्म पर दयाल बाबूक दसखत लेलक सुबोध।
हुनकर हाथ थरथराइत छलनि। सुबोध कें बुझ' मे आबि गेलै जे ई दसखत‌ नहि मिलतनि।
          दसखत दिस तकैत सुबोधक असमंयशकें दयाल बाबू बुझलनि। बजलाह, "दसखत नहि मिलैत होत। बैंक‌ के‌ रेकर्ड मे एखुनका दसखत होना चाही ने।"
  ‌‌‌‌‌        "ई काज क' लेबाक चाही छल।" सुबोध बाजल।
         "बेस, अगिला‌ दा जहिया अपने समय देबै, भए जेतै।" रजनी बाजलि।
          सुबोध बिदा होइत बाजल, "बेस, एहि मासक अंत मे जहिया पेंसन पेमेंट हैत, दुनू मासक खातामे जमा भ' जायत। नवम्बरे‌ मे‌ अएबाक चाही ने। बड़ लेट भेल त' दिसम्बर धरि जरूरे। सेहो समय बीति गेल। आब पेमेन्ट ले' किछ थम्ह' पड़त।"
           दयाल बाबू आ रजनीक चेहरा पर असमर्थताक  भाव पसरि गेलै। दयाल बाबू बजलाह, "कम-स'-कम बितलहो महिना बला आइ भेटि जैतै, त'...."
           "मोश्किल अछि।"
           "सर, बात ई छिकै जे..."
           "की?"
      ‌‌‌‌     दयाल बाबू कें बाज' सं पहिने रजनी बाजलि, "बाबा, तोएं चुपहो ने। हम्में बता दै छियनि सर के।"
           सुबोधक मोनमे आशंका पैसि गेलै। रजनी दिस तकैत बाजल, "हिनका बाज' दियनु। पेंसनर ई छथि। टाका हिनका भेटतनि। बजियौ दयाल बाबू।"
          "की बोलू सर। बोलब त' कहबै जे दुखे बतिआइ -ए।"
          "काजक बात बाजू ने।"
          "बेस, मूल बात कहै छी। हम्मर अइ पोती छोड़ि क' कोइ ने छै। अपना संतान नहि होलै। एकरे बाप के सब कथू देलियै। आ उहे फुटबौल जैसन गुड़का देलक। इहे पोती हय, जे सेवा कए रहल हन।‌ एकरो दुख के ओर नहि छै। तें‌ एकरा पर शंका नहि करियौक।'
           सुबोध दयाल बाबूक बात सुनि लेलक, मुदा ओत्तेक ध्यान नहि देलक। ओकरा काउण्टर परक गहिंकी मोन पड़ि रहल छलै। तैयो रजनी दिस तकैत बाजल, "हम हिनका पर शंका किएक करबनि?"
     ‌      "देखियौ सर, हम यू डी सी (अपर डिविजन क्लर्क) स' रिटायर कैने छी। अपने जे रजनी के चुप रहए बोललियै, से हमे बुझि गेलौं।‌ तें बोललौं जे एकरा पर शंका नहि करियौ।"
           "दयाल बाबू, अपने हमरा 'सर' नहि कहू। हमहूं अपने के पोते के उमेर के हैब। अपने आदरणीय छियै। हमर नाम सुबोध अछि।"
           "बेस। घर कतए होल?"
          "अपने जकां हमहूं मिथिले के छियै। मधबन्नी जिला।"
           दयाल बाबू उत्साहित होइत पुछलनि, "कोन गाम यौ? एकदा हम्में बेनीपट्टी ब्लौक मे रहियै।"
     ‌‌ ‌     दयाल बाबू कें बाज' सं‌ पहिने रजनी बाबाक गपक प्रवाहकें रोकलकि। ओकरा बुझल छै जे गपसप मे ओकर बाबा ध' लै छथिन, तं जल्दी छोड़ै नहि छथिन।‌ ओ बाजलि, "सब बात एक्के दिन पुछबहो। सर के देरी होब करै छनि।"
            सुबोध जयबा लेल उद्यत भेल, कि दयाल बाबू बजलाह, "एकटा आर आग्रह सर। हमर पेंसन खाता मे रजनीक नाम जोड़ा सकै‌ छै?"
      ‌‌‌     "नहि, पेंसन खाता मे पति वा पत्नीक नाम जोड़ल जा सकै छै। आन ककरो नहि।"
           "तकर बाद मानि लियौ जे हम्मे मरि गेलियै, त' शेष पाइ बैंंक जप्त कए लेतै?"
           "नहि, जं अहांक पत्नी नहि छथि, तं जिनका अहां चाही, नौमिनी बना सकै छी।"
    ‌ ‌     "तखन रजनिए के बना दियौ। एकरा छोड़ि हमर के हय?"
           "अपने नीक जकां सोचि क' कहि रहल छी?"
           "हं, हमर सिर्फ डांड़ स' निच्चा बेकाम हय। ऊपर एकदम ठीक।" दुनू कान्हकें‌ व्यायाम करबाक मुद्रा मे‌ आगां-पाछां घुमौलनि। अपन दुनू हाथसं दुनू बांहि पर थाप मारलनि, "देखियौ, ई सब एकदम्मे दुरुस्त छिकै। दिमागि आ यादास्त एकदम ठीक। तें पूरे होशमे कहै छी जे रजनिए के हमर नौमिनी बना दियौ। जहां बोलियौ, हम्मे दसखत कए देब।"
   ‌‌‌         "मुदा, पहिने दसखत त' ठीक करू।"
            "ई काज सभ जहिया अपने बोलैबै, हम्मे बाबा के लए के आबि जैब।"
            दयाल बाबूक व्यक्तित्व कने आकर्षित कयलकै सुबोध के। हुनका प्रणाम करैत ओ अपन काउण्टर पर जाय लागल। रजनी कें कहलक, "चलू। एकर पावती ल' लिअ' आ शेष काज लेल फार्म सभ सेहो।"
            "अपने एतना काम कए देलियै हन, से की कम बात छिकै। रसीद लए के हम्मे की करबै।‌ अपने पर पूरा बिसबास छै। बरू फारम सब दए दियौ।"
            रजनीक गपक दही मे सही लगौलनि दयाल बाबू, "सुबोध बाबू! नुनू ठीके बोलि रहल हन।‌ की होतै रसीद? अपने एतना सज्जन बुझाइ छिकियै, से हम्मे अपने के की बोलू? एगो अपने छिकियै, एगो अपने स' पहिने बला छला। कोनो तुलने नहि। अपने गहूम‌ आ ऊ गर्रो।"

सुबोध बिदा भेल। रजनी ओकर पाछां-पाछां छलि। ओ टोकलकि, "बाबा त' दोसरे बात बोलला। असल बात.."
           सुबोधक पयर अनचोके थम्हि गेलै।‌ पाछां घुरल, "की?"
          "इहे जे आइ एक्को महिना के पेमेंट नहि हेतै त' चरिचक्का के किरायो नहि होइ पैतै?"
      ‌‌‌    "माने?"
         "हम्मे आर सोचलियै जे रूपा मिलिए जेतै, तें गाम मे बेबस्था नहि केलियै।" रजनीक माथ झुकि गेलैक।
          "देखियौ! हम नियमक अनुसारे कहलहुं-ए। जं संभव होइतै, त' अबस्से पेमेंट क' दितहुं।"
    ‌‌‌      "से, अपने के बात पर भरोस छै सर।"
         "कत्ते पाइ लैए कार बला?"
          "चारि सौ रूपा?"
          "से किए? दुओ किलोमीटर दूर नहि अछि अहांक गाम। तखन?"
         "पहिने पेंसन लेबए अबियै, त' भीड़ होब करै आ समय लागि जाइ। तें देरी होइ जाइ। से सब जोड़ि लै। बेसी नहि लै छै। हम्मे आर गाम मे नहि ने रहै छियै।"
          "तं कत' रहै छी?"
          "से सब कोनो दोसर दिन बताएब।‌ एखन अपने जइयौक। हम्मे आर बहुत समय लए लेलौं। फारम दोसर दिन आबि कए ल' लेब। हमरो लेट होइ रहलैहन।‌ एखन चलबै त' समय पर क्लिनिक पहुंचि जेबै।"
            रजनी घुरि गेलि। मुदा, सुबोध‌ टोकि देलकै, "मुदा, कार के किराया कोना‌ देबै?"
           "जा क' देखबै जे कोन बेबस्था होइ छै।"
          सुबोध अपन पर्स बहार क' चारि टा नमरी बहार करैत बाजल, "जं बेजाय नहि मानी, तं ई राखि लिअ'। पेंसन लेब' आयब तं घुरा‌ देब।"
          रजनी असमंयश मे ठाढ़ि रहलि।
   ‌‌‌‌‌      सुबोध बाजल,‌ "सोचू नहि, हम कर्ज द' रहल छी। हमरा घुरा देब। राखू। हमरा लेट भ' रहल अछि।"
    ‌      रजनी टाका लैत बाजलि, "सर, अइ मदति के हम मोन राखब। एखने बाबा के बोलबै हम्मे।"
          जानि नहि, रजनीक बोल सुबोध सुनि सकल कि नहि। ओ अपन काउण्टर दिस विदा भ' गेल रहय।

सुबोधकें दयाल बाबू नीक लगलखिन। रजनीक निश्छलता सेहो प्रभावित कयलकै। दयाल बाबूक बारेमे बूझि गेल, मुदा रजनी? ओकरा बारेमे बस एतबे बुझि सकल जे कोनो क्लिनिकमे काज करैए। मोन भेलै जे डेरा गेलाक बाद पत्नीकें आजुक बात कहत। कहत जे ओ दयाल बाबूकें चारि सय टाकासं मदति कयलक। रिफंडेबुल।
             संध्याकाल भेबो कयलै ओहिना। फ्रेश भेलाक बाद पत्नीक खेरहा कहलक। जाहि प्रशंसाक लोभें ओ पत्नीकें कहलक, से उन्टा पड़ि गेलै। पत्नी पुछलकि, "बूढ़ा के मदति केलियै, की मौगी के? अहां त' दानवीर कर्ण बनि गेलहुं।"
             "अहां दोसर रूपें सोचलियै एहि बात के। एना नहि सोचियौ।"
             "हम बेजाय नहि सोचलहुं। अहां लग एहन बहुत लोक आबि सकैए। सभ के देबै जेबी सं?"
              "अरे, हम पैंच देलियैए। जहिया पेंसन भेटतै, घुरा देत। ई बुझियौ जे पेंसन लेब' हमरे लग आओत, हम काटि लेबै।"
             "एकटा बात पुछू?"
             "पुछू ने।'
             "जं ओहि बुढ़बाक संग ओकर पोती नहि रहितै, त' दितियै?"
             "केहन गप करै छी?"
             "ठीके करै छी। जे भेल से भेल। नोकरी करै छी, नोकरी करू। लहना लगायब बन्द करू। सेठ-साहुकार नहि छी अहां।"
            सुबोधक मोनमे एकटा किछु गड़ि गेलै। पत्नीक गपक कोनो उतारा नहि देलक।

ओकरा मोनमे जे गड़लै, तकर बिसबिस्सी ओहि मासक अंत धरि रहलै।
          रजनी अपन क्लिनिकक फोन नम्मर देने रहै। कहने रहै जे पेंसन खातामे जमा भेलाक बाद फोन क' दिअय। फोन रिसेप्सन पर रहै छै। कहतै तं बजा देतै। मोन होइ जे फोन करय। मुदा, अनेरो ओकरा फोन करब नीक नहि लगलै।
             खातामे पेंसन जमा भेलाक बाद सुबोध रजनीकें फोनसं जनतब देने रहय। आ प्राते भेने रजनी अयलै। सुबोधक काउण्टर पर ठाढ़ भ' प्रणाम सर कयलकै। सुबोध ओकरा देखितहिं थथमथाएल। रजनी ओकर असमंयश बुझलकि। बाजलि, "अपने फ्री भ' जैयौ। ताबत हम्मे बैसै छी।"
            "बाबा अयलाह-ए?"
            "नहि।"
            "किएक?"
            "अपने फ्री होइयौक ने, त' कहै छी।"
            रजनी ग्राहक बला कुर्सी पर बैसि गेलि।

सुबोधक काउण्टर खाली भेलाक बाद रजनी सुबोधक सोझां ठाढ भेलि। बाजलि, "हम्मे सोचलियै से पेमिंट स' पहिने बला कागजी काज आर कराए लियै। तखन बाबा के नानियनि। नहि त' बहुत समय लागि जाइ छै।"
           "एत' निचैनसं फार्म नहि भरि पायब। चलू कैंटिन रूममे।'
           रजनी सुबोधक पछोड़ धयलकि। लंचक समय भ' गेल रहै, तें किछु स्टाफ सेहो ओत' छल।
           फार्म सभ भरि क' तैयार कयलाक बाद रजनीकें दैत सुबोध बाजल, " काल्हि वा जहिया सुविधा होअय, एहि फार्म सभक संग बाबाकें नेने अयबनि।"
            "हम्मे सोचै छिकियै जे अपने के उपकार हम्में..." रजनी आगां नहि बाजि सकलि।
            कने थम्हैत एकटा पुरान सन लिफाफ सुबोधकें दैत बाजलि, "ई राखि लियौक।"
            "ई की छै?"
            "लिफाफ छै। पहिने राखियौक‌ ने।'
             सुबोध लिफाफ पकड़लक। रजनी बाजलि, "ओहि दिन गड़ी के किराया बला हय। बहुत खगल समय पर अपने मदति केलियै। बाबा बोललखिन जे सर भगमान बनि क' ठाढ़ होलखु‌न।"
             "एहन बात नहि। एत' सभ आदमिए छै। ई एखन किए घुरौलहुं-ए। पेंसन लितहुं तखन दितहुं।"
            "हम क्लिनिक स' अगाउ मांगलियै त' डाक्टर साहेब दए देलखिन। अचरजे लगलै जे एक्के दा मांगलियै आ ऊ दए देलखिन।"
            "क्लिनिक मे नर्स छियै?"
            "नहि, नर्स सन पढ़ल-लिखल लगै छी हम्मे? हम्मे त' गमार छिकियै।"
            "तखन?"
            "हेल्पर के काज करै छियै।"
            "अहांक पति?"
            "पता नहि, कत्त' छै। हमरा दागि देलकै आ भागि गेलै। एकटा बेटा छै। तीसरा मे पढ़ब करै छै। बोरिंग स्कूल मे दए देने छियैक।"
           "ओह। मुदा, पति जे भागि गेलाह तकर..."
    ‌‌ ‌      "तकर कारण फेर कहियो कहब। अपने के सीट पर खोजब करैत हैत। त' काल्हि अइयै बाबा के लए के?"
            "अबियौ ने। कखन एबै?"
           "दोसरके बेरिया मे ने? तखन अपने फ्री रह। आ हमहूं आधा दिन के छुट्टी लए लेबै।"

दयाल चन्द्र शर्माक प्राय: सभ काज भ' गेलनि। रजनीक नाम हुनक खातामे नामिनीक रूपमे चढ़ि गेलै। तकर रसीद सेहो मिलि गेलै। एकठाम बात अंटकि गेलै रहै। दयाल बाबू भने कहथुन जे डांड़सं ऊपर एकदम ठीक अछि, मुदा हाथ खूबे कांपनि। नव जे दसखत लेल गेलनि से एकरंगाह नहि भ' पाबनि। जतेक बेर करथिन, ततेक रंगक होनि। अंतरो थोड़-बहुतक नहि। तखन एक्केटा उपाय। ओ औंठा छाप लगाबथि।
             औंठा छापक नाम पर दयाल बाबू तैयार नहि होथि, "सुबोध बाबू! कहलौं ने जे हम्मे यू डी सी स' रिटायर छी। पढ़ल-लिखल छी। हम्मे जे मसौदा लिखि दियै, से हाकिमक बापो के मजाल नहि रहै जे ओहि मे कत्तौ कलम लगैबितैक। से, हम औंठा छाप लगा क' कोना घोषित करू जे निरक्षर छी। दिन-समैया खराप होइ गैलै, तें..."
    ‌‌        "अपने एक रंग के दसखत नहि क' पबै छियै, त' कोन उपाय? जत्ते बेर अयबै, दसखत नहि मिलत त' अहीं परेशान हेबै ने। तंग हेती रजनी जी। जाबत हम छी, मानि लिअ' जे सुविधा भेटि जायत। हमरा बाद दोसर जं एहन सुविधा दै बला नहि आयल त'....?"
          "से त' अइबे ने करतै। अपने जैसन ने पहिले अइलै आ ने बादो मे औतै। बाबा! औंठा छाप लगौने तोएं मुरुख थोड़े होइ जेबहो? तोहें जे छिकहो से त' पूरा इलाका जनै छह। जै मे सुभिस्ता हेतै, सेहे ने ठीक।"
    ‌‌ ‌       "लेकिन औंठा छाप लगैने चेक नहि ने मिलतै। तखन त' महिने-महिना आबए पड़तै।"
           "तकर व्यवस्था भए जेतै।"
           "की?"
           "भए जेतै ने।"
            आ एत्तेक निस्तुकीक बाद दयाल बाबू औंठा छाप लगौलनि।
             व्यवस्था एहन भेलै जे सुबोध प्रत्येक मास हुनका ओत' जायत आ अपना सामने मे हुनकर औंठा छाप लेत। टाका रजनी ल' जायति। ई व्यवस्था दयाल बाबूकें नीक लगलनि।
             सुबोध प्रत्येक मास रजनीक डेरा पर जा क' ई काज करय, तखन दयाल बाबू कें पेन्सनक भुगतान भेटनि। दयाल बाबू आ रजनी एकरा बड़का उपकार बुझय।
             एही क्रममे सुबोधकें अवसर भेटलै जे रजनीक बारेमे बुझय। ओ बुझलक जे रजनीक ब'र दोसर बियाह क' लेलकै। ताहिमे एकर भाइक विशेष हाथ छलै।
             "कोनो भाइ चाहतै जे ओकर बहिनोइ ओकरा बहिन कें छोड़ि दोसर बियाह क' लै।"
            "आर चाहौ कि नहि, हमरे भाइ चाहलकै। असल बात ई रहै जे बाबा के पूरा धन हमर दादा अपना नामे लिखाय लेलखिन। बाबा के बचलै मात्र पेंसन। हमरा एक्के गो भाइ। बाबा के सम्पत्तियो लए लेलकै आ घर मे राखैयो नहि चाहलकै। हम्मे बाबा के पच्छ लेलियै, त' हमरा दुनू के घर स' निकालि देलकै। हम्मे डाक्टर साहेब के सर्भेन्ट रूम मे बाबा के लए आनलियै। हमर भाइ चाहै-  ने हम्मे आर गाम मे रहियै, ने हिस्सा मांगियै। बैला देलकै।"
           एही क्रममे सुबोध के बुझना गेलै जे रजनीक ब'र जे एकर भाइये चढ़ा-बढ़ा देलकै-
           "हमरा साईं के हमर भाइये बोललकै जे डाक्टरे स' फंसल छै हमर बहिन। एक-दू दा हमर साईं के भ्रम सच्चे नाहित लगलै। होलै एहन जे क्लिनिक स' सब चलि जाइ तखनो डाक्टर साहेब हमरा रोकने रहथिन। इहे बात आर हमरा साईं के बरदास नहि होलै। दोसर बात ई जे..."
           "की?"
           "हमर बियाह होल रहै - पकड़ौआ। केतना ने पर-पंचैती के बाद हमरा राखलकै। राखितै की? कोनो काम-रोजगार नहिए सन करब करै। हम्में ई काज धरलियै। बस, लाट साहेबी करए लगलै। पाकिट खर्चा हमर भाइ दै। दारुओ-तारू के चसक लागि गेलै। आ बाद मे एगो मौगी के लए के भागि गेलै। लोक आर बोलब करै छै जे भगाबैओ के बेबस्था हमर भाइए कैलकै।"
            "किएक? अहां के भाइक प्रति किछु झूठ नहि ने केओ कहि देलक?"
            "सर, अपने होलियै सुद्धा लोक। हम्मे सब बात बूझि गेलियैक। भाइ ओकरा बैलाए देलकै। हम्मे होलियै अकेला जनिजाति। ताहू पर बूढ़ विकलांग बाबा। के जेतै हिस्सा मांगए?"
            "ओ..."
           "आब अपने बोलियै जे हम्मे बाबा के देखियै कि...."

सुबोधकें मोन पड़लै। जहिया पहिल बेर रजनीक डेरा पर गेल रहय, तं कोनादन लागल रहै। डाक्टरक मकानक गैरेज दिस एसबेस्टसक पलानी खसा क' बनाओल कोठरी। भीतरे-भीतर एकटा ओसार सन घेराएल, ताहिमे दयाल बाबूक खाट। कोठरीमे रजनीक चौकी। भानसक इंतिजाम सेहो ओही‌मे। हं, डाक्टरक बहरिया बाथरूम एकर पलानी दिस‌ रहै, जे एकरा कोठरी संग अटैच भ' गेलै।
           ओहि दिन दयाल बाबूसं गपसप भेलै। चाह पीलक आ घुरि आयल।
            आयबे-जायबक क्रममे सुबोधकें बुझना गेलै जे रजनी के क्लिनिकक अलावे डेरामे सेहो काज कर' पड़ैत छै। मेम साहेब कखनो बजा क' किछु अढ़ा दैत छथिन। अढ़ाएब अपन अधिकार बुझथि मेम साहेब। रजनीकें रह' लेल घर देने छथिन। हुनका मोन होइ छनि त' क्लिनिकमे फोन क' दै छथिन जे रजनी दाइ के घर पठाउ । एहि दुनू ठामक काज पूरा कयलाक बाद‌ अपना घरक काज आ बाबाक सेवा।
  ‌‌‌         सुबोधकें रजनीक प्रति निष्ठा उपज' लगलै...एकटा विशेष भाव जनम' लगलै। ओ निर्णय नहि क' पाबय जे ओ कोन भाव छै? कोन भाव छै जे बेर-बेर रजनी ओकरा‌ सोझांमे जगजियार भ' जाइ छै। आ सैह निस्तुकी करबा लेल कोनो मास बिच्चहुमे ओ दयाल बाबूसं भेंटक बहन्ने रजनीक डेरा पर चलि जाय।
          एकदिन भेलै एना जे लाइन कटल रहै। रजनीक घरमे डिबिया जरैत रहै। सुबोध पहुंचल। केबाड़ खोलबाक आ बन्न करबाक क्रममे डिबिया मझा गेलै। प्राय: दुनू अकबका गेल। रजनी सलाइ ताक' लेल थाहैत-थाहैत बाबाक कोठरी दिस जाय लागलि। आ कि तखने दयाल बाबू पुछलनि-
           "नुनू गे! डिबिया किए मिझा गेलौ?"
           "सर अयलखिन हन। केबाड़ी खोलए आ बन्द करए मे डिबिया बुति गेलै। हे भेटि गेलै सलाइ।"
          डिबिया बारलाक बाद दुनू एक-दोसराक कपार पर पसेनाक बुन्न देखलक आ कने काल देखैत रहल।
           "लालटेमे ने किए बारि लेलें नुनू?" दयाल बाबूक स्वर सुनि दुनू साकांक्ष भेल।
           "तोरा नहि ने बुझल ह'। मटिया तेल मिलै हइ सौर्टकट मे। एन्नी लाइन कराबर काटब करै छै। तें डिबिया बारै छियै जे मटिया तेल कम लगतै।"
         

सुबोध रजनीक संग दुख-सुख बतिआय लागल छल। रजनीक संघर्ष ओकरा प्रभावित करै। ओ रजनीसं पुछलक, "अहां एत्तेक काज करै छी। मोन नहि होइए जे कखनो किछु समय अपनो लेल बहार करी। अपनो लेल जीबी।"
            "मोन केकरा ने करै छै सर? मगर, हमर चिनवार, चौकठि आ अंगना इहे छिकै। ई रूम, क्लिनिक आ डाक्टर साहेब के डेरा।‌ बस...इहे दुनिया छै हमर।"
            "मुदा एमहर सं बाहरो दुनिया होइ छै, जत' भने कनिए काल लेल होइ, लोक मात्र अपना लेल जीब' चाहैए। अपन एकान्तमे चैनसं रह' चाहैए‌।"
           "सर, अपने पत्थर पर दुब्भी उगाबए चाहै छियै?"
            "नहि, हमरा मोन‌ मे जे आयल, से कहलहुं। आ  पाथर पर दूभि उगयबाक बात सोचल नहि जा सकैए?"
             "से ने किए?"

किछु मासक बाद मासक बिच्चेमे रजनी आयलि। किछु टाका बहार करबाक रहै। सुबोध एकटा परिवर्तन देखलक। ओहिदिन रजनीक सिऊंथमे सिन्नुर नहि रहैक। सुबोध एहि मादे पुछलक तं बाजलि, "जखन साइंए ज'र मे नहि रहलै, त' सिन्नुर किए ओगरतै हमर सीथ?"
           बाजि तं गेलि रजनी, मुदा ओकर संवादक भितरिया जे पीड़ाक अनुभूति रहै, से सुबोध लग साफ-साफ झलकि गेलै।

रजनीक घरमे एकटा अज्ञात महिलाकें देखि सुबोध कोठरीमे पैसबा काल थोड़े इथ-उथ मे पैसि गेल। मुदा, ओ महिला एकर असमंयश कें तोड़लकि। सुबोधक स्वागत करैत बाजलि, "आबियौ सुबोध सर‌।"
         "एम्हरे चौकिए पर अबियौक।"
         महिला दिस तकैत पुछलक सुबोध, "अपने?"
          "हम रजनी के पड़ोसी होलियै। स्वास्थ्य विभागमे अधिकारी छिकियै।  अपने दुनू के बारे मे हमरा सब कथू बुझल हय। रजनी अपने के बड़ प्रशंसा करब करै हय। नीक बात।"
           ताबते दयाल बाबू हाक देलनि, "नुनू गे, दवाइ नानलहो?"
           रजनीकें मोन पड़लै। बाजलि, "अपने आर गप करियौ। हमे क्लिनिक स' बाबा के दवाइ  लेने आबै छी।"
           रजनी कोठरीसं बहरा गेलि।
           "सुबोध बाबू! एगो गप हम्में अपने स' बतिआय चाहै रहियै।"
            "बाजू।'
           " रजनी के त' देखिते छियै जे कत्ती मोसीबत मे छिकै।"
           "जी। मेहनतिओ तेहने छथि।"
           "मुदा एत्ती के बादो एकर भविष्य निश्वित नहि छै। घरबला छोड़ियो देने छै। बेटा के बन' मे बड़ देरी छै। केना चलतै एकर पहाड़ नाहित जिनगी?"
            सुबोध चुप।
            "अपने एकरा लेल बहुत कयलियै। एकटा आर काज कए देबै त' एकर जिनगी बनि जेतै।"
             सुबोधक मोनमे एकटा डर पैसि गेलै। पहिले भेंटमे ई महिला एहि तरहें की कह' चाहैए? की बूझैए हमरा दुनू के? भ्रममे तं ने अछि?
            "बोललियै नहि।"
            "बाजू ने हम की क' सकै छियनि? हमरा बुतें जे नियमानुसार संभव होइ छनि से सहयोग करिते छियनि।"
             "कहू त', बूढ़ा ज' मरि जेथिन त' पेंसनो बन्द भए जेतै।'
             "जी।"
             "ऐसन उपाय नहि होइ सकै छै जे बूढ़ा बला फैमिली पेंसन रजनी के भेट सकै।"
            "नहि, हमरा तेहन कोनो उपाय नहि बुझाइए।"
            "मुदा हमरा लग उपाय अछि। अहां बैंकक काज सम्हारि दियौ। जिनगी बनि जेतै एकर।"
           "नियम सं बाहरक कोनो काज नहि क' सकै छी हम।"
    ‌‌‌‌       "हम नियमक भीतरे के बात बोलै छी।"
           "जं बूढ़ाक संग रजनीक कोर्ट मैरेज करा देल जाय तं..."
             सुबोधकें लगलै जे स'री धिपा क' केओ कानमे ध' देने होइक।
            "समाजमे त' दादा-पोतिए रहतै, मुदा सरकारी अभिलेखमे पति-पत्नी। बूढ़ाक बाद फैमिली पेंसन एकरा भेटैए ने लगतै।"
             सुबोधक तामस सुनग' लागल रहै।
              महिला बाजि रहल छलि, "एमहर सरकारी काज हम सम्हारि लेबै। बैंकक काज अहां सम्हारि दियौक।"
              सुबोध आब बरक' लागल छल।
             "कत्ती दिन स' ई बात हमरा मन मे छै। रजनिया के कहियै जे अपने स' भेंट करा दिअय। मुदा, अपने अबियै, से सूचने ने दिअय। आइ अपने के आब' के सूचना भेल त' अपने स' पहिने दरबर मारने आबि गेलौं। ओना कानून स' त' भैए जेतै, मुदा हम चाहै छियै जे चुपचुप भ' जाइ। समाजक लोक के, बुझिते छियै- कत्ती ने हाथ, पैर, कान आ मुह होब करै छै।"
            सुबोध के रहल नहि गेलै। एकटा तीव्र गतिए कोठरीसं बहार भेल, स्कूटर स्टार्ट कयलक आ गति पकड़ि लेलक। मोन कोनादन कर' लगलै। सोचलक, एहि प्रस्ताव लेल रजनी तैयार अछि? ओना होअय वा नहि, ओ रजनीक ई रूप नहि देख' चाहैए। स्कूटरक हैंडिल तलमलाए लगलै। ठाढ़ क' देखलक। टायरमे कांटी गड़ि गेल रहै।
            सुबोधकें घरमे नहि देखि रजनी बाजलि, "काकी, अपने के मना कयने रहियनि जे ई बात सर के नहि बोलबै। लेकिन नहि मानलियै अपने। एकदा फेर खतम होइ गेलै। जिनगी मे पहिले दा एगो नीक लोक राह देखबए बला हमरा मिलल रहथिन,‌ तिनको..."
            सुबोधक पयर रजनीक डेरा दिस नहि घुरलै।
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बेगूसराय / 01.02.2024
प्रकाशित - समदिया मिथिला (दैनिक) 10 फरवरी 2024
कथा-संग्रह "इएह हमर संसार" मे संग्रहित।
    

मौगियाह (कथा)- मैथिली : प्रदीप बिहारी


कथा

मौगियाह

प्रदीप बिहारी
तरकारीक दोकान पर पहिने बेर देखने रहियै ओकरा। हमरे पार्श्वमे ठाढ़ भऽ तरकारी किनैत रहय। हमरासँ पहिने पहुँचल रहय, तें पहिने ओकरे भेटैत रहै तरकारी। हम प्रतीक्षारत रही।
       तरकारीक पाइ देबाक कला हमरा आकृष्ट कयलक। ओ उपरका जबीसँ पाइ बाहर कयलक। एक आइटमक भुगतान कयलक आ घुरती पाइ लेलक। पुनः बटुआसँ पाइ बहार कयलक। लुंगीक फाँड़सँ। आइटम सभक भिन्न-भिन्न ढंगसँ भुगतान कयलक।
        हमरा बूझि पड़ल जे अपना गामक हाट पर ठाढ छी।
        हम तरकारी लेब छोड़ि ओकरा निहारऽ लगलहुँ। भुगतान कयलाक बाद दोकान परसँ चलि गेल। हम ओकर चालि देखैत रहलहुँ। देखिते रहलहुँ।
        हमरा किछु भेटि गेल मने। एहने पात्र तकैत छलहुँ। मोन हल्लुक भेल।
        '‘की सब दिअऽ?’’ परिचित तरकारीबला टोकलक। साकांक्ष भेलहुँ।
        ‘‘ओकरा हिबै छलियै?’’ तरकारिएबला पुछलक।
        '‘हँ! देखलहक नहि। कोना माउगि सन गप्प करैत छलै। मुँह, आँखि, हाथ...सभ ओहिना चलैत छलै। चालि सेहो ओहिना। डाँड़ कोना लचकै छलै।’’ हम बजैत रहलहुँ।
        '‘से अपने आइ देखलियै हन। ई बड़गाड़ी मौगियाह हेबे करै।’’ बाजल तरकारीबाला, ‘‘की दू अपने के?’’
        हम तरकारी लेबऽ लगलहुँ। हमर मोन तरकारी लेबऽसँ बेसो ओकरे पर रहय।
        हम तरकारी लेलहुँ। बिदा होमऽ काल तरकारी बलासँ पुछलियै, ‘‘तोरा ओहिठाम बरोबरि अबैत छह?’’
       ‘‘हँ।’’ रहस्यमय मुस्की पसारैत बाजल तरकारीबला, ‘‘कोनो काम हय? बोला दू। एनही घुमब करै होतै बड़गाही।’’
       '‘नहि, छोड़ह।’’ हम मना कयलियै, ‘‘दोसर दिन भेंट करबै। कतऽ रहै छै?’’
        अचरज लगलैक तरकारीबलाकें, ‘‘अपने नञि जनै छिकियै?’’
        ‘‘अहंऽ।’’ 
        ‘'हमे बुझली जे अपने जनै छिकियै आ ओही जग के काम हय।’’ बाजल तरकारीबला, ‘‘इंडियन आयलमे रहै हइ। नाम हइ- मिरदंगी। काल्हि औते। अपने अइथिन, तऽ भेंट करा देबनि।’’
       हम बिदा भऽ गेलहुँ।
       मिरदंगी। ओकर नाम।
       इंडियन आयल।
       एहि शहरमे एकटा देह व्यापार केन्द्र छैक। इंडियन आयलक पेट्रोल पम्पसँ सटले कातमे। तें एहि केन्द्रकें लोक -'इंडियन आयल’ कहैत छैक। किछु गोटे 'पेट्रोल पम्प' सेहो। बेसी लोक ‘इंडियन आयल’ कहैत छैक।
       मिरदंगी माने ओही केन्द्रक टहला।
       राति भरि मिरदंगी हमरा मोनमे ढोल पीटैत रहल। ठीक एहने चरित्र छै प्रस्तावित नाटकमे। निर्देशन हमरे करबाक अछि। दोसर कलाकारकें सीखाबऽ पड़त। ई तँ प्राकृतिके अछि।
       दोसर दिन संस्थाक किछु वरिष्ठ कलाकार आ सहायक निर्देशकसँ मिरदंगीक मादे गप्प कयल। ओ लोकनि पहिने प्रतिवाद कयलनि। किछु प्रश्न ठाढ़ भेलै। ‘इडियन आयल’ मे रहै छै, तँ कोनो-ने-कोनो रोग होयतैक। अन्य कलाकार सभ सेहो प्रभावित भऽ सकैछ। आदि-आदि...।
       अंततः निस्तुकी ई भेलैक जे मिरदंगीक डाक्टरी परीक्षण कराओल जाय। जँ ठीक-ठाक रहल, तँ ओकरा आनल जाय। एकटा आर शर्त रहैक जे मिरदंगीक कोनो दोसर ठेकान कहल जाय- आन कलाकार सभकें।
       मुदा ई सभ मिरदंगी मानय तखन ने।
       मिरदंगी मानलक। मुदा हमरा पानि पिया कऽ। ठेकानक मादे फुसि बाजऽ लेल तैयारे ने रहय। बहुत रास गप्प आ तर्कक छान-पगहासँ मानलक।
       डाक्टरी परीक्षणकें अपन संस्थाक बीध कहि ओकरा लग रखने रही तं ओ गंभीर होइत बाजल रहल, ‘‘बूझि गेली। हमे आर जइ ठाँ रहै छिकियै, ओइ ठाँ के लोक के कोनो...। अपने जे बहन्ना बनबियौ। हमे बुझै छिकियै।’’
       मिरदंगी मानि गेलि। ओ नाटक करत।
       मिरदंगीक डाक्टरी परीक्षण भेलै। पूर्वाभ्यासमे आबऽ लागल।
       ओकर शर्तक अनुसार रिहर्सलक समय बदलऽ पड़ल। साँझक बदला भिनसर नओ बजेसँ।
       रिहर्सल चलऽ लगलैक। संवाद याद करबाक आ बजबाक अभ्यास चलैत रहैक।
       एकदिन, रिहर्सल समाप्त भेलाक बादो ओ बैसले रहय। आर-आर कलाकार सभ चलि गेल रहैक। जयबाकाल हम ओकरा बैसल देखलियै।
       ‘‘की मिरदंगी। आइ एखनि धरि?’’ हम पुछलियै।
       ‘‘अपने सऽ एगो काम रहै।’’ मिरदंगी बाजल।
       ‘‘की?’’
        '‘काम ई रहै जे...एगो काम रहै।’’
       मिरदंगीकें बाजऽ मे असुविधा होइत रहैक।
       ‘‘साफ-साफ बाजऽ ने। संकोच किए करै छह?’’
       ‘‘बात ई हइ जे ऊ कतेक दिन सऽ बोलब करै छलै किताब दऽ।’’
      ‘‘के ऊ?’’
       '‘उहे।’’
       ‘‘के?’’
       ‘‘आर के? हमरे जऽरे जे रहै हइ- मालती।’’
       ‘‘के मालती?’’
       ‘‘हम जहाँ रहै छिकियै, ओतै एगो छौड़ी हइ।’’ बाजल मिरदंगी, ‘‘सुन्दर हइ। सब सऽ सुन्दर! ड्राइवर, खलासी आउर के अपना भीरू बैठैयो ने दै हइ। ओकरा भिरू खाली साहेबे सन लोक आर अबै हइ।’’
       ‘‘हँ तँ की बात छै?’’
       ‘‘ओकरा पढ़ऽ के सऽख हइ। हमे जब इहाँ अयलियै, तऽ हमरा दिस खूब ताकब करै आ एक दिन...।’’
       मिरदंगीक खिस्सा हमरा रुचिगर लागऽ लागल।
       ‘‘हम तऽ पहिने ओकरा सऽ कोनो मतलब नञि रखियै। उहे हमरा पोल्हाबऽ लगलै। बरोबरि अपन हिस्सा सऽ दू-चारि गो रूपा देब करै।’’
       मिरदंगीक बजबाक शिल्प हमरा बेसो नीक लागय। हम ओकरासँ आगाँक खिस्सा पुछैत गेलहुँ। मिरदंगी बजैत रहल।
       ‘‘रूपा देबऽ सऽ मना केलकै ओकरा संगी, तऽ मालती बोललै जे कंजूसी कऽ कऽ की होतै? हमे बलू नीक लगै छिकैय मालती के। अपना संगी के कहलकै जे रूपा घटऽ लगतै तऽ हमरा लेल एगो गहिंकी आर बढ़ा लेतै। एत्ते गोरे भिरू सुतब करै हइ, तऽ एगो आर। की फरक पड़तै?’’
       हमरा कोनादन लगल। हम बुझयलियैक मिरदंगीकें। नीक लोकसँ सम्पर्क भऽ रहल छै। एहि तरहें नहि बाजक चाही।
       मिरदंगी मानि गेल। ओकरा गलतीक आभास भलैक। ओ बाजल, ‘‘मालती के किताब पढ़ऽ के आदति छइ। हमे बजार सऽ किताब लाबि दै छिकियै। आइ बोललै जे अहीं सऽ किताब लाबि देबऽ।’’ पढ़ि कऽ घुरा देत। हमहीं लाइ देब।’’
       ‘‘हमरा कोना चिन्हैत अछि ओ?’’ हम पुछलियैक।
       ‘‘अपने के बारे मे हमहीं बोललियै हन। किरिया खा कऽ बोलै छिकी जे ओकरा छोड़ि आर कोइ ने जनै हइ नाटक के बारे मे।’’ मिरदंगी बाजल, ‘‘मालती सेहो औतै नाटक देखऽ।’’
       हम चुप रहलहुँ।
       ‘‘किताब देबै ने?’’
       हमरा एकटा गपक जिज्ञासा भेल। हम कहलियै, ‘‘किताब देबौ मुदा एकटा गप कहऽ पड़तौ।’
       ‘‘की?’’
       ‘‘तोरा बड़ मानै छौ मालती?’’
       ‘‘बुझाइ हइ तहिना।’’
       ‘‘तों?’’
       ‘‘हमे ई गलती फेरो नञि करऽ चाहै छिकियै।’’ गंभीर होइत बाजल मिरदंगी, ‘‘मुदा आब एगो बात होइ हइ। पहिने मालती गहिंकी भिरू बन्द रहब करै छलै, तऽ हमरा कुच्छो नञि होइ रहय आ आब जे ऊ गहिंगी के लऽ कऽ कोठरी मे जाइ छै आ केबारी बन्द करै छै तखने हमरा मोन मे किछ कचकि जाइ हय।’’
       हम मिरदंगीक बात बुझलहुँ।
       दोसर दिन रिहर्सलमे ओकरा लेल एकटा साहित्यक पोथी नेने आयल रहियै। उपन्यास।
       ई क्रम चलैत रहलैक। प्रत्येक दू दिन पर पोथी घुरि कऽ आबि जाइक। कहाँ दन भरि दिन मालती उपन्यासे पढ़ैत रहैत छैक।
       रिहर्सल चलैत रहैक। संवाद यादि करबाक आ बजबाक अभ्यास पूरा भऽ गेल रहै।    
       कम्पोजिशन शुरू कयने रही। आंगिक अभिनय।
       एकदिन एकटा घटना घटि गेलै।
       नाटकमे एकटा दृश्य रहैक। नायिकाकें प्रेम करबाक अपराधमे ओकर माय भयंकर सजाय दऽ रहल छलैक। अभ्यास होइत रहैक।
       मिरदंगी एक कोनमे बैसल देखैत छल।
       दुनू महिला कलाकार अभ्यास कऽ रहलि छलि।
       अभ्यास होइत रहलैक।  एक...दू...तीन...                            
       आ कि तखनहिं मिरदंगी बिजुली जकाँ अयलैक आ नायिकाक मायक भूमिका कयनिहारिकें गरदनि दबैत चिकरऽ लागलैक, ‘‘तोंए हमरा इन्दू के मारलही हन। हमे जीबय नञि देबौ...।’’
       सभ ‘हाँ-हाँ’ करैत मिरदंगीकें घीचलक। मिरदंगी हकमि रहल छल। ओ वर्तमान आबि गेल छल। माथ झुकि गेल छलैक।
       महिला कलाकारक प्राथमिक उपचार भेलैक। कने कालमे ओहो सामान्य भेलि।
       कलाकार सभ हमरे दोष देबऽ लागल। हमरे कारण ई घटना घटलै। ने हम मिरदगीकें अनितियैक आ ने एहन घटना घटितैक। एहिना स्थितिमे केओ अपन बेटीकें सस्थामे नहि आबऽ दतैक।
      बड़ी कालक बाद सभ एहि गपकें मानलक जे मिरदंगी कोनो-ने-कोनो असामान्य परिस्थितिमे एहन काज कयने होयत।
       सामान्य भेलाक बाद मिरदंगी ओहि महिला कलाकारक पयर छानि लेलक, ‘‘बहिन, हमरा से गल्ती होइ गेलऽ। माफ कऽ दहो। अनबुझमे हमरा सऽ गलती होइ गेलऽ। आब नञि होतऽ एना।’’
       मिरदंगीकें माफ कऽ देल गेलै। रिहर्सल ओहि दिन ओत्तहि समाप्त भऽ गेलैक।
       हम मिरदंगीकें अपना डेरा अनलहुँ। चाह पान भेलकै। स्थिर होइत ओहि घटनाक कारण पुछलियैक।
       ओ बाजल, ‘‘इहाँ सऽ पहिले हमे मुंगेर सरबन बजार मे रहियै। इहाँ तऽ तीन-चारि महिना पहिले अएलियै हन। उहाँ बहुत दिन रहलियै। एगो सऽ परेम होइ गेल रहै। बड़ सुन्नरि रहै। उहो हमरा बड़ मानै। हमरा लेल जान दै लेल तैयार। हमहूँ...।
       ओहिठाम के मलिकिनी सी नम्मर के बदमास रहै मौगी। हमरा दुनू के बारे मे ओकरा पता लगि गेल। बड़गाही हमरा आर के देखय नञि चाहै। कुभेला करय लगलै। ओकरा बेसी-सऽ-बेसी गंहिकी देबय लगलै। कतबो ऊ बोलै जे आब सहाज नञि होइ हय, तैयो...। सोलह-सतरह घंटा रहय पड़ै गहिंकी भिरू। कते सहाज करितै?
       हमे मना करियै ओकरा। ऊ कहब करय हमरा जे अइ जग सऽ भागि जो तऽ उगरास भेटत। मुदा, से होलै नञि।
       हमे उहाँ के छौंड़ी आर के बोललियै जे कम-सँ-कम गहिंकी भिरू जो। छौंड़ियो आर मानलकै। मलिकिनी भिरू बोलब शुरू कऽ देने रहै।
       मलकिनी डँटलकै। आर-आर छौंड़ी सभ चुप्प होइ गेलै। मुदा हमर ऊ नहि मानलकै। ओकरा हमरे बोली के निसाँ लागल रहै। मलिकिनी के हमरे पर शंका  होलै। हमरो मारलक आ ओकरो। ओकरा तऽ बोलै बलू ऐसन ठाम मे फाड़ धिपा कऽ दागि देबौ जे डागदरो जल्दी नञि देखतौ।
       करीब पनरह दिन के बाद हमे आर ठीक होलियै। ओकरा ठीक होइते जोतय लगलै। विदेशी टुरिस्ट सभ आयल रहै। सब के ओकरे भिरू पठबै। हमे एक दिन ओकरो आ मलिकिनियो के बोललियै, ‘‘ई गोरा आर बीमारी लऽ कऽ अबै छइ। मुदा मलिकिनी नञि मानलकै। ओकरा बोललियै तऽ हमरे दोष देलकै। बोलब करै, ‘‘हटा कऽ लऽ जो हमरा। तोरा सऽ बाहर हमे नञि ने छिकियौ।
       जे हमरा शंका छलै, उहे होलै। ऊ मरि गेलै। अखबार मे अपने आर पढ़ने होबै। सरबन बजार के दूगो वेश्या मरलै, जकरा बारे मे पटना के डागदर आर बोललै जे ’एड्स’ से मरलै हन। ओइ मे एगो उहो रहै।’’
       मिरदंगी कानऽ लागल। पुनः किछु कालक बाद स्थिर होइत बाजल, ‘‘हमरा गोस्सा उठि गेलै। हमे उठलौं आ मलिकाइन के गरदनि चापि देलियै। जा लोक आउर अइलै, मौगी अधमरू होइ गेलै। मरि नञि सकलै। लोक आउर बचा लेलकै। हमरा बहुत मारलक आ भगा देलक। नहियो भगाबितै तेयो हमे उहाँ नञि रहितियै।’’ किछु थम्हैत पुनः बाजल मिरदंगी, ‘‘आइ रिहल-सिहल बेरू उहे यादि आइ गेलै, तें...। आब ऐसन गलती नञि होतै।’’
       किछु काल धरि वातावरण शान्त रहल।
       मौन भंग करैत हमहीं पुछलियै, ‘‘मालतीकें बुझल छैक ई सभ?’’
       ‘‘नञि।’’ मिरदंगी बाजल, ‘‘ओकरा ई बात आर नञि छिकै बूझल।’’
       ‘‘तें ओ तोरासँ...।’’
       ‘‘से जे होइ। हमे नञि चाहै छिकियै जे ओकरा सऽ हेम-छेम बढ़बियै। मुदा ऊ कहाँ मानै छै। हमरा पर...।’’ किछु थम्हैत बाजल मिरदंगी, ‘‘असल बात ई हइ जे पढ़ल-लिखल लड़िकी हमरा निम्मन लागब करै हय। मालती पढ़ै-लिखै छै। काबिल छै। तें हमे ओकरा किताब लऽ जा कऽ दै छिकियै। ओ बूझै हय जे हमे ओकरा परेम...।’’
       ‘‘से बात तोरा कहि देबाक चाही। ओकरा अन्हारमे नहि राखक चाही।’’
       ‘‘सोचै तऽ हमहूँ छिकियै, मुदा कहि नञि पाबि रहलियै हन।’’
       हम मिरदंगीक चेहराक भाव पढ़लहुँ। हमरा लागल जेना एकटा नमहर बोझ उतरि गेल होइक ओकरा माथ परसँ।
       रिहर्सल चलैत रहलैक। प्रदर्शनक तिथिक घोषणा भऽ गेल रहैक।
       मिरदंगी रिहसलमे नहि आयल। एक दिन...दू दिन...।
       हमरा चिन्ता भेल। हम तरकारीबला लग गेलहुँ। पुछलियै। तरकारीबाला बाजल, ‘‘के? मौगियाहा? दू दिन पर आइ आयल हन। अपने अही जग रहियै। बोलि कऽ गेल हन।
       मिरदंगीकें ‘मौगियाहा’ कहैत छै, तँ हमरो बेजाय लगैत अछि आब।
       मिरदंगी आयल। हालचाल भेलै। दोसरे समस्या बाजल।
       मालती लग एकटा साहेब अबैत छैक। तीन-चारि बर्ख पहनहि ओकर पत्नी स्वर्गीय भऽ गेलै। ओ बरोबरिक ग्राहक छैक। सप्ताहमे दू दिन तँ अबस्से। एहिठामक मलिकिनीकें ओ ‘लाइसेंस’ लेबऽ कहलकैक।
       मुदा लाइसेंस तँ मात्र मोजराक लेल भेटतैक।    
       मलिकिनीकें नीक लगलैक। सोचलकि- मोजराक लाइसेंस भेटि गेने ओकर बिजनेस आओर बढ़तैक। एखनि जकाँ पुलिसक दमन एत्तेक नहि रहतैक। संभ्रान्त लोक सभकें सेहो कोनो असोकर्य नहि होयतैक।
       ड्राइवर आ खलासी सन ग्राहककें सेहो कोनो उपराग नहि रहतैक। कहयो काल तँ सिपहिया मलिकिनीयोसँ पाइ लैत छैक आ घूरऽकाल गहिंकियोसँ।
       यैह सभ विचार भेल रहैक। मिरदंगी एकर विरोध कयने रहय। मालती सेहो। ई दुनू कहलकै जे संगीत सन पवित्र बात एतऽ नहि होयतैक। जँ होयतैक तँ आन काज नहि होयतैक। मोजराक नाम नहि बिकयतैक। संगीतक अपमान नहि होयतैक। कसि कऽ विरोध कयने रहै दुनू।
       मिरदंगी किताब घुरा देलक आ बाजल, ‘‘हमे आइ मालती के सब बात बोलि देलियै।’’
       ‘‘कोन बात?’’
       ‘‘सरबन बजार बला बात।’’ बाजल मिरदंगी, ‘‘लाइसिंस बला बात के हमे आर जखन खूब विरोध केलियै, तऽ मारय-मारय कऽ दौगल हमरा आर के। मुदा मारलक नञि। किछ काल के बाद मालती बोलल जे बलू हमे ओकरा लऽ कऽ कतौ भागि जइयै। हमे सोचलौं- सरबने बजार बला कांड ने होइ जाइ, तैं हम ओकरा सब बात खुलस्ता बोलि देलियै। बोलि देलियै जे हम तोरा पियार नञि करै छिकियौ।’’
       हम चुप रही। मात्र निहारैत रही मिरदंगीकें।
       ‘‘ओकरा तऽ बुझयलै जेना कोइ अनचोके मे थप्पर मारने होइ।’’ बाजल मिरदंगी, ‘‘अहीं सोचियौ। ई संभव छै जे हम ओकरा लऽ कऽ कहीं इज्जति-परतिष्ठा सऽ रहि सकै छिकियै? दुनू तऽ ओइसने छिकियै- एकटा रंडी, दोसरा भरुआ।’’
       हमरा किछु नहि फुरायल। स्तब्ध रही। अन्तमे, दोसर दिन रिहर्सलमे अयबाक निश्चय कऽ मिरदंगी चलि गेल।
       दोसर दिन समय पर मरंदगी रिहर्सलमे आयल। मोनसँ काज कयलक। जयबाकाल हमरा एकटा कोनमे लऽ जा कऽ कहलक, ‘‘मालती अहाँ सऽ भेंट करऽ चाहै हय।’’
       ‘‘ई कोना संभव छै?’’ हम बजलहुँ।
       ‘‘सेहे तऽ हमहूँ बोललियै ओकरा, तऽ ऊ कहलक जे नाटक दिन अपने कने समय देबै ओकरा। कुछो बतिआइ के छै। ओकरा बड़ सऽख छै हमरा इस्टेज पर देखय के...नाटक देखय के...।’’
       ‘‘बेस। हेतै।’’ हम बजलहुँ, '‘लाइसेंस बला बात के की भेलौ?’’
       मिरदंगी बाजल, ‘‘बात बड़ अगाड़ी बढ़ल जाइ छै। हमे चुपचाप रहै छिकियै, मुदा सहाज नञि होइ हय। मालती के कहलकै जे नाच सीखय पड़तौ। मालती नञि मानलकै, तऽ राति खन लोहाक छड़ लऽ कऽ दुनू तरबामे मारलकै ओकरा। पयर फुलि गेलै हन। तैयो गहिंकी भिरू ठेलिये देलकै।’’
       मिरदंगी घुरि गेल। हम दोसर काजमे लागि गेलहुँ।
       रिहर्सल चलैत रहलै। मिरदंगी अबैत रहल। अभ्यास करैत रहल। जेना-जेना प्रदर्शनक तिथि लऽग आबऽ लगलैक, हमर व्यस्तता बढ़ैत गेल। मिरदंगीसँ कोनो नोक-बेजाय गप नहि भऽ सकल।
       प्रदर्शनसँ तीन दिन पहिने।
       चारि बजे साँझमे चौक पर गेलहुँ। चौक कोनो घटना विशेषक चर्चमे डूबल छल। जिज्ञासा कयलहुँ। तरकारीबला अभरल। पुछलियैक।
       तरकारीबाला बाजल, ‘‘पेट्रोल पम्प के मलिकिनी के मारि देलकै।’’
       "कोन पेट्रोल पम्प?
       "उहे, जकरा बगली मे मौगियाहा रहै हय।"
       हम प्रश्न दृष्टिएँ तकलहुँ, ‘‘केे?’’
       ‘‘आर के? मौगियाहा।’’ बाजल तरकारीबला।
       ‘‘नहि, मिरदंगी नहि मारने होयतैक।’’ हम बजलहुँ।
       ‘‘नञि मालिक।’’ तरकारीबला बाजल, ‘‘पुलिस भिरू अपने कबूल केलकै हन मौगियाहा।’’
                            .....

लेखन: बेगूसराय/ 30.10.1991 ई. 
 प्रकाशन: पूर्वाचल-3/1992



मेनका मल्लिकक काव्यचित्र : रमेश

::समीक्षा::
:: 'मेनका मल्लिकक काव्यचित्र' ::
    ('गेल्ह सभ झाड़ैत अछि पांखि')
                :: रमेश ::

मिथिला समाजक नारी-दशा देखैत,आइ ई स्पष्ट अछि जे 'विद्रोही नारी-काव्य'क आवश्यकता,आइयो समाप्त नहि भs गेल अछि ।

तथापि,मैथिली नारी-काव्य के, विद्रोह-बिन्दु स' आगां बढ़ेबाक आ 'सृजनात्मक मोड़ देबाक' जे कोशिस, नव्यतम नारी कवि सभ कs रहल छथि, ताहि मे शारदा झा,रोमिशा,डा.विभा कुमारी आ दीपा मिश्रक संग,मेनका मल्लिक सेहो सक्रिय छथि। 

ई महिला कविगण,विभारानी,सुस्मिता पाठक,ज्योत्स्ना चंद्रम् आ कामिनीक 'विद्रोह-काव्य' सं फूट आ फराक काव्य-लीक बनबैत,अपन काव्य-यात्रा मे सन्नद्ध होइत छथि। 

ई सभ नव नारी स्वर, 'पूर्ण विद्रोह' क कारणें, नारीक 'असगर जीवन-नियति के पक्ष मे' नहिं रहि,'परिवार' नामक संस्थाक विध्वंस नहिं चाहैत छथि,अपितु 'परिवार कें वैयक्तिक आ सामूहिक न्याय-प्रणाली सं स्नेहक संगम करैत', अपना हिसाबें,अपना तरीका सं संचालन आ संरक्षण के पक्ष मे छथि, जाहि मे सभ सदस्यक स्वतंत्रता आ व्यक्तित्व विकासक उद्देश्य अन्तर्निहित हो! मुदा,से मानवीय न्यूनतम अनुशासनक संग!

नव्यतम नारी-स्वर सब व्यक्ति, परिवार आ समाजक, समाजशास्त्रीय मूल्यांकन सं लs कs व्यवहारशास्त्रीय आ मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन धरि मे लागल अछि, सेहो काव्य-शिल्पीय तीक्ष्णताक रुप मे। परिवार मे रहैत, अपन उचित महत्व आ अस्तित्वक सार्थकता लेल संघर्ष करैत, साहित्य मे सक्रिय रहब,'असाधारण उपलब्धि' थिक!

ताहि धारा मे,ताही  मोड़-बिन्दु सं प्रस्थान करैत,मेनका मल्लिक अपन पहिल काव्य-संग्रह 'गेल्ह सभ झाडै़त अछि पांखि', लs कs अबैत छथि,जाहि मे ओ मैथिली नारी काव्य के परिवार स' बाहरो ल' जा क' जीवन आ जगत स' जोड़बाक कोशिस करैत छथि। मैथिली नारी-काव्यक कथ्य-विस्तारक,हुनकर से कोशिस,निरंतरता के प्राप्त हेबाक चाही।

 हुनके टा कोशिस नहिं,आजुक तिथि मे सक्रिय सब नारी कवि के,अपन निजी जीवन आ पारिवारिक सीमारेखा स' बाहर निकलि,सम्पूर्ण समाजक व्यथा-कथा के, काव्य-स्वर देबाक चाही!आब नारीक निजी जीवनक कथ्य,मैथिली नारी काव्य मे,'रुढ़' भेल जा रहल अछि,'रुढ़ि' बनल जा रहल अछि!

            तीन 'कोला' मे बांटल,मेनका जीक उनचास टा कविताक ई पोथी, डा.नारायणजीक 'भूमिका' 
(एकटा सम्पूर्ण स्त्रीक आहत मनक कविता)क संग आयल अछि, जाहि मे 'स्त्रीक आहत मन'क दुइये -तीनटा कविता अछि। 
मुदा एत' 'एकटा संपूर्ण स्त्री', वस्तुत: 'संपूर्ण नारी कवि' छथि, जिनकर मन 'आहत' सं बेसी, 'सृजनधर्मी तनाव'क उपयोग मे तल्लीन अछि!

तीनू कोलाक काव्य-कथ्य कें स्पर्श करितो, भूमिका-लेखकक ध्यान 'समाज खण्ड'क कविता सभ (बहुसंख्य अछि ) पर कम, आ 'स्त्री'- खण्डक कविता, 
वा प्रेम-खण्ड'क कविता सभ पर विशेष केन्द्रित भेल छनि, जखनकि 'समाज' एकटा 'सांगोपांग संपूर्ण ईकाई' थिक आ 'स्त्री' आकि 'प्रेम' फराक-फराक 'पूरक ईकाई' थिक,जे समाजक अस्तित्व-निर्माण सेहो करैत अछि, आ तकरा पूर्ण सेहो करैत अछि।
 मुदा कने थम्हू! 
कनेक मैथिलीक धनीक कविताक पृष्ठभूमियो मे जाय पड़त।

 राजकमल चौधरी अपन 'महावन' नामक कविता मे औसत मैथिल आ भारतीय परिवारक जेहेन संरचनाक व्याख्या केने छलाह, से तकर भयावहता तत्कालीन परिवारक यथार्थ छल ।
 सुकान्त सोम अपन 'बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे' नामधारी कविता मे, व्यक्ति आ परिवारक ताही अन्तर्सम्बन्धक अपन कालखंडीय नवीन जनवादी व्याख्या प्रस्तुत केने छलाह।
 आ 'तकरे छायाभावक मंचधर्मी मनोरंजक कविता', उदयचन्द्र झा 'विनोद', 'तड़िपिब्बा जकां तलमलाइत' सेहो,तकर बाद प्रस्तुत कs, मैथिली आ भारतीय परिवारक सदस्यगणक,परिवारिक जीवन प्रस्तुत केने छलाह।

उदाहरणार्थ लेल गेल उपर्युक्त तीनू कविता आ तीनू कविक द्वारा कयल गेल 'परिवार-व्याख्या', परिवार-चित्रांकन,'परिवार नामक संस्थाक खदकैत कडा़ह सदृश् वर्णन', प्रस्तुत केने अछि ।

मुदा आइ परिवारक स्वरूप बदलल अछि। ओ परिवर्तन कतेक सकारात्मक आ कतेक नकारात्मक भेल अछि, तकरे मूल्यांकन करैत अछि, आजुक नव्यतम नारी कविगणक कविता। 

मुदा सैह टा नहि करैत अछि, आजुक नारी-काव्य!
 निवेदिता झा,दीपा मिश्र,निक्की प्रियदर्शिनी,स्वाती शाकम्भरी,नेहा झा मणि,नन्दनी पाठक,रुचि स्मृतिक संग, उपर्युक्त सभ नामित आ अनामित आजुक नारी कविगण आ मेनका मल्लिक सेहो, परिवार संस्थाक संग सम्पूर्ण समाज, स्त्री आ प्रेम धरि के, व्याप्ति प्रदान करैत छथि, मैथिली नारी-काव्य के रचैत काल।आ से आर बेसी करबाक चाही!

 तें हिनका लोकनिक प्रतिपाद्य, आजुक सम्पूर्ण मैथिल समाज आ परिवारे टा नहि, सम्पूर्ण भारतीय समाजो भs गेल अछि,आ से हेबाको चाही। 

 मेनका मल्लिकक कविता मे सभ सृजित नारी-पात्र, सृजनधर्मी  आ सांस्कृतिक  चेतनाबाली अछि। कारण, आजुक नारी कवि, समाजक सांस्कृतिक प्रदूषण सं व्यथित रहिते छथि आ से मेनका सेहो छथि। स्त्रीक विविध स्वरूप, 'पारम्परिक आ परिवर्तित होइत',
 दुनू प्रकारक आयल अछि,हिनकर कविता मे,से स्वाभाविके अछि!

बच्चाक माता आ पतिक प्रेयसी, दुनू रूप!
 महानगर मे 'मिनी मिथिला' बसबैत 'सोनकाकी' सेहो आ पुरुष मजदूरक समान मजदूरी मंगैत ' गोबिन्दपुरवाली ' सेहो! स्वातंत्र्यक प्रतीक तसलीमा नसरीन सेहो, 'अजन्मी भ्रूणक बयान' सेहो,आ बेटी-ललना सेहो!
 'टीस आ कचोट' तं हिनकर नारी-काव्य के,
भावना-संवेदना-करुणाक चासनीए मे बोरि दैत अछि!

          तहिना 'प्रेम'क विविध आयाम आ रूप,छओ टा  प्रेम-काव्यक संग, आनो 'स्त्री-विषयक आ समाज खण्ड'क कविता मे, आयल अछि।
 दाम्पत्य-प्रेमक संग वात्सलय-प्रेम सेहो, कैक टा कविता मे आयल अछि। हिनकर प्रेम-काव्य 'चाहक चुस्की', ' सुगंध'  आ 'मुस्की'क संग आम जनजीवन मे 'सिंगरहार झहरेबाक आकांक्षी' अछि, जतs एकटा मजदूरिनो अपना कें 'मुमताज' आ अपन घरबला के 'शाहजहाँ' वा घरे के 'ताजमहल' बूझय,इजोरिया मे!

          मेनका मल्लिकक 'समाज' विषयक कविता मे - विषय-वस्तुक विविधता आ समकालीनता,सामान्यो पाठक के देखा पड़ैत अछि । कथ्यक वैविध्य,नीक काव्य-भविष्यक संकेत करैत अछि । 

मिथिलाक प्रति अनन्य प्रेम, गाम आ समाजक प्रति उचित माश्चर्य ,सांस्कृतिक प्रदूषणक चिन्ताक संग व्यक्त होइत, अपन संस्कृतिक प्रति मोह -ममता,पचल आ सृजनधर्मी नारीवाद, संवेदनासिक्त करुण- कथ्यक कविता,परिवार मे आ व्यक्तिक मोन मे व्यक्त होइत सन्तापबला कविता, तीनू खण्ड मे स्थान पओलक अछि । 

ओ एहन मिथिलाक  काव्य-चित्रांकन सेहो केलनि अछि, जाहिमे 'नेना सभ उदास अछि ', 'गाम उदास अछि', ' गाछ -बिरीछ अपन व्यथा कथा ' बखानैत अछि , चिट्ठी आ डाकपीन , मोबाइल आ 'ह्वाट्स एप्प' के नामें, कानैत अछि, 'स्मृति'क 'आगमन ''  'मायक आंगुरक स्पर्श'क 'भावना 'क  'देखैत अछि सपना '।

'हरसट्ठे' गाम मे ओना बहुत किछु नहियों भेटैत, गाम मे अनका प्रति संवेदना तैओ,भेटि जाइत छनि,मेनकाक कवि के! कारण,हिनका अपन नेपाली मिथिला मातृभूमि (नैहर )आ भारतीय मिथिला मातृभूमि  (सासुर) क संग नेपाली मातृभाषा आ मैथिली मातृभाषा (द्वितीय) दुनू सं अपरिमेय प्रेम छनि ।

 हिनका विश्वास छनि जे,प्रवासी के अबिते गाममे, बांसक फुलायब बन्न भs जाएत आ 'गुलाबक  ठाढ़िपर लतरत तिलकोर '। मुदा परिवारक भाषा- संस्कृतिक संस्कार मे होइत क्षरण देखू जे मायक लोरी सुनायब 'उफांटि' पड़ि जाइ छै, जखन बच्चा 'कजरारे - कजरारे' सुनाब' कहै छै ! 
परिवार आ समाजक समकालीन परिस्थितिक काव्यात्मक अभिव्यक्ति, कविता सभ मे भेल अछि ।

 आजुक सम्बन्ध, मधुरक चासनीमे बोरल बिक्खे थिक (गुलदस्ता आ कैक्टस) । तें ग्रामीण युवती द्वारा कयल बलात्कारीक हत्या (स्वतंत्रता दिवस पर ) उचिते कवयित्रीक ऊर्जा बढ़बैत अछि । खेहारैत अतीत आ टूटैत मनोरथक वर्तमान (जीबs नहि अबैछ सपनामे )ककरो परीक खिस्सा कोना सुनाबs देतैक?

 तैओ हिनका गाम,'माइये सन सुन्दर' लगैत छनि , जखनकि 'मेक इन इंडिया'क अभियान 'फोंका-मुट्ठी शून्य'  आ फूसि बुझाइत छनि, कारण 'काठ चिरैत बालेस्सर'क आरीक गति तेज होइते, हाथक फुलैत मोट-मोट नस पर पसेना  छहला दैत अछि!

कनियांक लहास उघैत 'दिना मांझी'क प्रति समाजक संवेदनहीनता आ गामक जमीन बेचि महानगरीय फ्लैट किनैत पूतक पिताक 'समदाउन' गायब, भयावह समकालीन यथार्थक करुण कथा थिक । 

मिथिलाक माटिसं पयरक बढ़ैत दूरी 'मौसम कें जबदाह' बनौने जा रहल अछि, तं प्रगतिशील वैचारिकता  'अप - टू - डेट ' भs कs  कैकटा  कविता ( 'बेटी' , गोविन्दपुरवाली ',  'ललना ', ' तसलीमा नसरीनक प्रति ', ' गंगाक कछेर मे ठाढ़ि पुनीता ', 'अजन्मीक बयान ' आदि ) मे आयल अछि । सेहो वैचारिक प्रगतिशीलता, कविता मे आयल अछि।

मुदा, तें की?
हिनकर काव्यलेखन मे अपेक्षित आर श्रमक अभाव, झांपल नहि रहि सकल अछि।

 एकटा  कविता, एक बैसकी मे लिखबाक आ 'फाइनल ' करबाक मन:स्थितिक दवाबक कारणें, कनेक कांच रहि गेल अछि,अनेक कविता एकटा वक्तव्य-प्रधान भs गेल अछि।

सम्पूर्ण कविता मे कविता आ काव्य-तत्त्व नहिं आबि सकल अछि । 
आंशिक काव्य-तत्त्व मात्र, कविताक अन्त मे, कएटा कविता मे आयल अछि । कए टा कविताक प्रारम्भिक बहुलांश,सपाट-बयानीक सीमा धरि,अभिधात्मक भs गेल अछि ।हिनका काव्यतत्व बढ़ेबाक लेल, 'आजुक अभिव्यंजना-कला' पर विशेष ध्यान देबाक चाहियनि।

 'परिवर्तन'क प्राचीन शिल्प त्याज्य, तं नवकविताक स्थापित शिल्प मे, एकशिल्पीय कविता सभ,प्रस्तुत भेल अछि,जे शैल्पिक वैविध्यक मांग करैत अछि ।

 मुदा ताहिसं की ? 
जीवनक उड़ान लेल जखन 'गेल्ह सभ झाडै़त अछि पांखि', त' 'आहत मनक विरुद्ध', प्रेमकविताक सिंगरहार झहरि-झहरि सुगंध पसारबे करत ! 

से सुगं,अगिला संग्रह मे,उपर्युक्त अभाव-अभियोगक निराकरण करैत आओत।
कविता-संग्रह स्वागतेय अछि,जकर काव्य-पांती आ काव्य-टुकड़ी सबहक स्मृति,पाठकक मोन,हृदय आ माथ मे गमगमा त' रहले अछि,माथ के गनगना आ चनचना सेहो रहल अछि!ई हिनका लेल शुभ लक्षण थिक,जे 'वैचारिकता', हिनकर कविता मे,पहिले संग्रह स', 'काव्य-पुटक संग', स्थान पाबि रहल अछि..! 
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