Sunday, September 8, 2024

चन्नन कराय लियौक जजमान (मैथिली कथा) - प्रदीप बिहारी Maithili short story by Pradip Bihari

कथा 

चन्नन कराय लियौक जजमान

.   (फोटो : गूगल सं साभार)

प्रदीप बिहारी

गंगामे पहिल डूब देलाक बाद मूड़ी हिलौलक। मने कान मे पानि ने पैसि गेल‌क होइक। मूड़ी हिला क' हटयबाक प्रयास कयलक। माथक नमहर-नमहर केश सेहो दुनू दिस फहरयलै, मुदा ओना नहि जेना शैम्पू लगयलाक बाद फहराइत छैक। जतबे फहरयलैक, संतोष भेलैक विवेककें।
        तखने एकटा स्वर सुनाइ पड़लैक, "कम-स'-कम तीन डूब दियौक जजमान।"
        विवेककें अचरज भेलैक।  पानिए सं एकबेर उपरका घाटक चबूतरा दिस तकलक। गणेश पण्डा रहथि। पहिने ओ हुनके यजमान छल। बेटा सभ भिन्न भेलनि तं विवेकक गाम गणेश झाक जेठजनक हिस्सामे पड़ि गेल। मुदा, विवेक आ गणेशक सम्बन्ध वैह, पहिलुके रहि गेलैक। 
         पानिए सं विवेक दुनू क'ल जोड़ि अभिवादन कयलक आ दोसर डूब देलक। गणेश बाबू अभय मुद्रामे हाथ उठौलनि, से देखि नहि सकल विवेक। ओ तेसर डूब देलक आ गमछी जे डांड़मे बन्हायल छलैक आ नीचां सटि गेल छलैक, कें अलगबैत पानि सं बहरायल।
         सिमरिया घाटक पक्की आ सौन्दर्यीकरणक काज चलि रहल छलैक। प्राय: सभ घाटक मुहेंठक ढलाइ भ' गेल छलैक। नीचां खंघरबा लेल सिरहीक पौदान सेहो बनि गेल छलैक। पौदान पर ऊबर-खाबर बला टाइल्स बैसाओल छलैक, जाहिसं स्नान कयनिहारक पयर ससरैक नहि। मुदा, चारि पौदान निचां गेलाक बाद पयर दाबि क' बढ़ाब' पड़ैक, कारण ओहि पौदान सभ पर पांक छलैक। से, प्राय: एहि दुआरें जे गंगा मे बाढ़ि आयल छलैक।
       विवेक पत्नीकें ई जनतब दैत कहलक जे आब ओ स्नान कर' जाथि। ओना घाट पर भीड़ साफे ने छलैक। पहिने जेना लोक पर लोक बुझाइक, तेहन सन किछु ने। से, प्राय: एहू दुआरें जे ओ कोनो विशेष दिन नहि, अनदिना गेल रहय। दोसर, ई जे कने अबेर क' गेल रहय। गंगनहौन सभ अहलभोरे जुटैत अछि। ताहि समय अनदिनो भीड़ रहैत छैक।
       विवेक देह पोछैत कपड़ा बदल' लागल आ पत्नी पौदान दिस खंघरह लगलीह। ओकरा मुहसं बहरयलै- सम्हरि क'। ओ देखलक पत्नी सेहो थाहि-थाहि क' पौदान पर पयर राखि रहल छलीह।
       धारमे एकटा विवाहिता युवती चुभकैत छलि। कनिये कालमे हेल' लागलि। विवेक देखलक, से एहि दुआरें देखलक जे ओकरा पत्नीक चिन्ता छलैक। हुनका हेल' नहि अबैत छनि। पौदान थाहैत बेसी पानिमे ने चलि जाथि। ओ देखलक जे ओहि विवाहिताक जल-क्रीड़ासं ओकर पत्नीक स्नान वाधित होइत छलैक। मोन भेलैक जे पत्नीकें ओकरासं कने दूर भ' क' नहयबा लेल कहय। मुदा से कहलक नहि। लगलै जे ओहि विवाहिताक स्नानक प्राकृतिक प्रवाह वाधित ने भ' जाइक। ओ अपन नजरि धार दिस सं हटा लेलक।
        तखने एकटा स्वर सुनलक, "अइयौक ने! साथे लहयबै।"
        स्वर ओही युवतीक रहैक। ओ विवेकक कातेमे बैसल अपन पतिके धारमे ठाढ़ भ' बजौने छलि। ओकर पति कात-करोट दिस देखलक। तखने एकटा महिला ओकरा कहलकै, "जाहो नुनू! अपना आर के हियां कहब करै छै जे ब'र-कनिया ज'रे गंगा लहाइ छै त' सात जलम ज'रे रहै छै। जाहो।"
        कहनिहारि अबस्से युवकक माय छलीह, से विवेक बुझलक। युवक धार दिस बढ़ल। विवाहिताक मुस्की जेना गंगाक पेटीसं नमहर भ' गेल रहैक।
        विवेककें मोन पड़लै। एकबेर ओहो दुनू प्राणी संगहि गंगामे डूब देने रहय। ताहि समय कतहु पक्की घाट नहि छलैक। माटिए-माटि। धसने-धसना। धार मे पयर देलाक बाद एखनिसं बेसी सतर्क रह' पड़ैक। कखन डांड़ भरि, कखन छाती भरि आ कखन अथाह पानि, तकर कोनो थाहे नहि रहै। कतहु-कतहु मात्र ठेहुने भरि पानि सेहो। दियाबातीक प्रात रहैक। विवेक अपन स्कूटर घाटक ऊपरेमे लगौलक। गमछि लपेटि पैंट खोललक आ स्कूटरक कुंजी राखलक। पैंटकें झोराक त'रमे राखलक। तकर बाद पत्नीक नूआ सभ छलनि। ओ पत्नीकें पहिने नहयबालेल कहलक। ओ नहयबालेल तैयार भेलीह, मुदा जयबाकाल यैह संगे नहाइबला बात मोन पड़लनि। विवेककें कहलनि। ओकरो मोन भेलैक। मुदा, समान के ओगरतै? तखने कातमे बैसलि एकटा बूढ़ी कहलकै जे ओ कपड़ा देखैत रहतै। विवेक अपन सर्ट आ गंजी खोलि झोरा पर राखि पत्नीक हाथ पकड़ि धारमे पैसल। बेसी भीड़ नहि छलै। पातर छल लोकक उपस्थिति। 
        दुनू प्राणी जखन नहा क' बहराएल तं ले बलैया! ने बूढ़ी, ने विवेकक सर्ट। टाका सर्टक उपरका जेबीमे छलै। दुनू चारूकात तकलक, मुदा बूढ़ी नदारद। ओ पैंट बहार कयलक आ भीजल कपड़ा बदल' कने दूर सहटि गेल। मुदा, पत्नी चिचियलखिन जे कपड़ा चोरि भ' गेलनि। लोक सभ जुटि गेल। दू-तीनटा युवक विवेककें घेरि लेलकै। ओ सभ ओहि झोरासं ओकरा पैंट बहार करैत देखने छल। उन्टे विवेक फंसि रहल छल कि पत्नी बचौलखिन। छातीमे मुक्का मारैत बिदा भेल। रच्छ जे पैंटक जेबीमे स्कूटरक कुंजी छलैक, टाका-पाइ धरि एको टा नहि। पड़ायल सिमरियासं। तकर बाद पत्नीकें कहलक, "एक्के जनम नीक जकां संग रही हम सभ, सैह बहुत। सात जन्मक लोभ नहि करी।"
         ई घटना विवेककें गंगा-स्नान करबा काल मोन पड़ि जाइत छैक।
    ‌‌‌‌     पत्नी टोकलखिन तं तंद्रा भंग भेलै। ओ अपन बड़का तौलिया दैत बाजल रहथि, "कने अ'ढ़ करू ने। पुरुख सभक नजरि दोसर दिस जाइते ने छै। कोनो बयसक महिला होउक, आंखिक डिम्हा ठमकि जाइ छै। देखियौ ने डेंगी पर बैसल तीनू छौंड़ा के। अपनो बौआ स' कम उमेरक छै, आ नजरि..."
         विवेक देखलक। ई समस्या तं महिला सभक संग सिमरियामे सभ दिनसं रहलैए। ओ देखलक, ओहि विवाहिता कें। ओ चुक्कीमाली बैसि क' बड़ मोश्किल सं अपन वस्त्र बदलि रहलि छलि। सासु मदति क' रहल छलै। एकटा आर युवती सेहो तहिना लाजे कठौत भेल एहि काजकें सम्पन्न क' रहल छलीह। हुनका चेहरा पर स्त्री होयबाक अपराध छलनि, मने। विवेक पत्नीकें कहलक, "अहां कोनो पहिल बेर गंगा-स्नान क' रहल छी? एहिबेर एकदिस घाटक ऊंचाइ अ'ढ़ कयने अछि ने।"
       ओ अपन दुनू हाथसं तौलियाकें तानि पत्नीकें कपड़ा बदलबा लेल अ'ढ़ कयने छल। ओकरा कोम्हरो ताकल नहि होइ।
      पत्नी कपड़ा पखारि ऊपर आयलो ने छलि कि पितरिया फुलडाली लेने एकटा युवक सोझांमे ठाढ़ भ' गेलनि, "तिल-चाउर लियौक जजमानी। फूलो छिकै। लहैला के बाद तिल-अच्छत-फूल आ दरब चढै छिकनि गंगा माइ के।"
        विवेक ओकरा भगौलक, "हम्मे बराबर आयब करै छिकिऐ। ओने जाहो।"
        पानि मे डूब द' क' पाइ बिछैत छौंड़ा सभसं एकटा बाजल, "हे रै! लोकल छिकथिन ई आर। दरभंगिया आर के देखहिन ने। हे, ओइ घाट दिसन।"
        दुनू प्राणी चबूतरा पर आयल, तं एकटा दोसर पहुंचलै। ओकर पितरिया फुलडालीमे चानन-सिन्नुर छलैक आ हाथ मे पितरिया मोहर, जकरा कपार पर साटि देने लिखा जाइक- जय गंगे। विवेक किछु गोटेक कपार पर देखने रहय। ओ एकरा दुनूकें चानन करयबा लेल आ कपार पर मोहर ठोकयबा लेल जिद कर' लगलै, "दू जन के मात्र बीसे रूपा दछिना। कराए लियौक ने! जजमान छिकियै, हमरो आर के हक बनब करै छै।"
        अठारह-उनैस बर्खक ओहि युवककें कहलक, "युवक छहो। कतना पढ़लहो? पढ़हो आ दोसर काम देखहो।"
        "ई काम खराब लगै हय जजमान। हम्में नै करबै, कोई-न-कोई त' करबे करतै। काम कोनो छोट नै होब करै छै।"
        "ठीके छै। छोड़ह। "
        आ कि तखने गणेश बाबू टोकलखिन, "चन्नन कराय लियौक विवेक बाबू! अपने पोता छै। छोटका के बेटा। आब त' सब करबै छै। एक त' चन्नन स' मथा ठण्ढा रहब करै छै, दोसर परमाणो ने जे गांग लहाय ले अयलियैहन।"
          "ठीक छै पण्डा जी! करा लेबै। मुदा कने काल बाद।" विवेक दस टाका बहार क' ओहि छौंड़ाक हाथमे दैत बाजल। 
         गणेश बाबू पोता कें कहलनि, "अखन जो। थोड़े काल बाद अपने हियां अइहें। उहें रहथिन।" पुन: विवेककें कहलनि, "एकर चन्नन मे एगो खूबी छिकै।"
         "की?"
         "गंगोट मिलाएल रहै छै। चन्नन के साथ गंगा माइ के चरण-धूली। असीरबाद बनल रहै छै गांग माइ के।" गणेश बाबू बजलाह, "चलियौक ने घरे पर। चाइयो पीब लेबै। छोटकी कनियानि बढ़िया चाइ बनबै छिकथिन।"
       विवेककें कतहु फंसैत सन बुझयलैक। मुक्त होयबा लेल बाजल, "पण्डा जी! एम्हरे कोनो दोकान पर चाह पीबी ने। अनेरे अहांक जेठजन देखताह, तं फज्झति करताह अहांकें जे हमर जजमानकें अपना‌ हियां लए गेलहो।"
      "ऊ हियां नै छिकै। हियां विश्रामालय खोलए चाहै छै। ओकरे पैरवी ले' पटना गेल छै। गंगा घाट के काया-कल्प भए रहलैहन, त' सब चीज ने रहतै! गणेश बाबू बजलाह, "जजमानी त' छोटकी कनियानि के नै ने देखने छिकथिन। देख लेथिन आ चाइयो पी लेथिन।"
        विवेकक पत्नी सोचलनि। ओहि अठारह-उनैस बरखक युवकक मायकें मुह देखब...माने...? मुदा, तुरन्ते माने बूझि गेलीह।
        विवेक सोचलक। हुनका तं ओहो नहि देखने अछि। ओकरा चाह पिअ' सं पहिनहि क'रू लाग' लगलैक।
       तखने गणेश बाबूकें कोनो यजमान अभरलनि। ओ विवेकसं कने कात भेलाह। विवेकक पत्नी एकटा दोकानमे पैसि गेलीह।‌ सिन्नुरक गद्दी लेलनि, बिन्दी, मकुन्दानाक छोटका पैकेट, बद्धी आदि लेलनि। दाम पुछितहि जेना किछु गड़ि गेल होनि।  बजलीह, "बड़ महग कए देलहक। एखने स' लादि देलहक ।"
         "की करबै? समान बला गाड़ी समय पर आबिए ने पबै छै। कच्ची रोडक हाल देखलियै हन? जहां-तहां खद्धा आ तइ पर स' बरखा। लागब करै छै जे रोड पर कादो के दही पौड़ल छै। हियां तक माल पहुंचेबे ने करै छै। मोटर बला ठेला स' मंगाब' पड़ै छै- दोबर द' क'। उहो आर त' समाने पर बथेतै ने। दोसर बात..."
        " दोसर की बात?" विवेक पुछलक।
       "हियां साल भरि मे कतना ने कतना दा दोकान उठाब' पड़ै छै।"
       "माने?"
       "बाढ़ि बेसी एलै, त' ऊपर दिस।‌ अप्रील-मई-जून मे पानि सुखि जाइ छै त' निच्चा जाइ पड़ै छै।‌ अइ पर के खर्च आर हम अपना घ'र स' नहि ने देबै।"
       "आब तं सौंदर्यीकरण भ' रहल छह?"
      "जखनी होतै तखनी ने। अखन बहुत दिन बाकी छै। दिल्ली दूर जैसन। बाद मे दोकान बनतै आ हमरा आर के भेटतै। पक्का मकान बला दोकान।"
       "वाह।'
       "तखन की दाम कम कए देबहक?"
       "मैडम! अपना देश मे एक दा जे दाम बढ़ि जाइ छै से की घटै छै?"
      ओ दुनू दोकानसं बहराइते रहथि कि गणेश बाबू जुमि गेलाह, "चलियौक।
       "छोड़ि नहि देबै पण्डा जी! एखनि अहांक जजमान आब' के समय अछि।‌"
        "तइ ले' चिन्ता छोड़ि दियौक अपने। बेंति देलियैए छौंड़ा आर के।"
       "एम्हरे कोनो दोकान पर चाह पीबि ली तं की हर्ज? हमरा सभकें हड़बड़ी अछि।"
       "अपनेहो हद्द करब करै छिकिऐ। हमे दुलहिन के मोबाइल कए देलियै हन। ऊ त' अदरख थूरब शुरुओ कए देने होथिन।"
‌‌‌       पण्डा जीक संग दुनू प्राणीकें जाय पड़लैक।
      सिमरियाक नव रूप पर प्रसन्न छलाह गणेश बाबू। सुनबैत जा रहल छलाह, "से बुझलिऐ ने विवेक बाबू। अइ घाट पर जत्ती ने दिक्कत रहै, से आब दूर भए जैतै। सब कथू के व्यवस्था के परावधान भए रहलै हन।"
       "केहन व्यवस्था?"
       "सब कथू। एन एच स' नीचा उतरए काल जे मिथला द्वार छिकै ने, ओत्तै स' पक्की सड़क। ओहि ज' पार्किंग होतै। केहनो बड़का लोक रहता, गड़ी ओइजे लगाबए पड़तनि।"
         "से त' एखनो पार्किंग ओत्तहि छै।"
         "नै, नै। ऊ पार्किंग नै छै। ओइ ज' पार्किंग के रूपा लए लै छै।"
         "माने सिमरिया घाट जाइ के टौल टैक्स? मुदा , बड़ लै छै- दू सौ टाका एक चरिचक्का के।"
        गणेश बाबू पार्किंगक पक्षमे बजलाह, "बेसी नै लै छै। पहिने अढ़ाइ सय रहै। लोक आर हल्ला केलकै त' दू सय केलकै हन। एगो बात सोचियौक जजमान! मुर्दा जराब' जे गड़ी जाएब करै छै, से केतना समय लै छै। अच्छा, छोड़यौक। अपने आर जे अपन चरिचकवा स' अएलियैहन तकर टाइम लिमिट नै ने हय। घाट तक आइ गेलियै। केतना सुविधा होल। आब सुविधे के मोल छै ने। अइ तरहे सोचबै त' दू सय रूपा महरग नै बुझायत।"
         विवेकक पत्नी चुपचाप चलि रहल छलीह। टोकलनि, "पण्डा जी, तखन एहि छोटका दोकानदार सभ के त' तरद्दुत भ' जेतै?"
         "नै जजमानी! सब के दोकान अनुसार जग्गह मिलतै। मुदा, एकटा बात करए पड़तै।"
         "की?" विवेक पुछलक।
        "एसटेंडर मेनटेन करए पड़तै। ओतना सुन्दर सड़क बनतै, फुटपाथ पर टाइल्स लगतै, दूरे स' गांग माइ चमकथिन, त' लोको के मेनटेन करए पड़तै ने।"
        विवेक बाजल, "एक टा बात हमर सभ दिन अखरल। बच्चे स' अबै छी‌। स्नानक बाद महिला सभ के कपड़ा बदल' मे जे असुविधा होइ छै, से हमरा कहियो नीक नहि लागल।"
         "से बात त' छिकै। महिले नै, पुरुखो के असुविधा होब करै छै। महिला होइ वा पुरुख, लाज त' लाजे छिकै ने। मानबै त' सब के लाज एक्के रंग। पहिने लोक गाउंओ आर मे पोखरी वा इनार पर नहाइ। चापाक'ल त' बहुत बाद मे अइलै ने। त' हैबिट रहै लोक के। बाथरूम बला त' बड़का लोक होइ ने यजमान! आब त' घरे-घर बाथरूम होइ गेलै। तें एना होब करै छै। ओना अपने के नजरि गंभीर बात पर गेल हन। एकरो बेबस्था होतै।"
         "केहन?" विवेकक पत्नी पुछलनि।
         "अपने आर अजोधिया जी गेलियैहन हाल‌ मे? ओतए सरयू घाट पर‌ महिला आर लेल कपड़ा बदलए बला रूम बनल छै।"
         विवेककें मोन पड़लैक। हालेमे अयोध्या गेल छल। संझुका आरतीक समय सरयू घाट पर महिला सभकें  कपड़ा बदलबा लेल कतोक प्रकोष्ठ बनल देखने रहय। आ, से नीक लागल रहै।
         मुदा, ओहिसं सम्बन्धित एक टा घटना सेहो मोन पड़लै। आरतीक समयमे भीड़ बड़ भ' जाइत छै। आरतीक बाद दुनू प्राणी जाहि ठेला बला लग अपन जुत्ता खोलि क' रखने छल, आयल। एकटा पांच सालक बच्चा चिचिया रहल छल। ओ म'मी-म'मी क' रहल छल। ओकर बाप कोम्हरो स' अयलै, तं पुछलकै, "कहां गया है म'मी?"
         छौंड़ा कपड़ा बदल' बला प्रकोष्ठ दिस संकेत करैत बाजल, "उसी मे गयी है। बोली सू-सू करके आते हैं। बड़ी देर हो गया, नहीं आयी है।"
        बाप डांटलक बेटा के, "तो हदियाता काहे है। गया है, तो आ जाएगा। म'मी जहां परोछ हुआ कि चिचियाना शुरू कर दिया। चोप्प।"
       आ कि तखने ओहि प्रकोष्ठक गेट खुजलै आ छौंड़ाक माय बुल द' बहरायलि। ओहि महिलाक संग थोड़ेक गन्ह सेहो बसातमे मिज्झर भ' गेलै।

गणेश पण्डा बजैत छलाह, "देखियौ जजमान! पहिने एक टा भोजनालय आ मिष्टान्न भण्डार रहै - विद्यापति भोजनालय व मिष्टान्न भण्डार। जेना-जेना परिवार बढ़लै आ भिन्न होइ गेलै विद्यापति के चारि टुकड़ा कए देलकनि- विद्यापति, न्यू विद्यापति, प्राचीन विद्यापति, अरबाचीन विद्यापति। तहिना मिथला भोजनालय। एकरो किछ टुकड़ा होइ गेल हन, किछ आर होतै। मुदा एक टा बात अखरय बला छिकै।"
        "की?"
       "होटल के नाम विद्यापति, मिथला राखत आ नीचा‌ मे लिखत- आपका स्वागत करता है। सोचियौ, ई आर की मान राखब करै छै विद्यापति आ मिथला के? एक दा हमे बोललियै त' हमरा लुलुआ लेलकै। बोलल जे बबा तोएं अपन काज देखहो। तोरो जजमान आर त' चारि जगह बंटि गेल'। अपन लक्खे ने दै छनि आ दोसरा के परबच्चन देब करै छहो। हम चुप भए गेलौं यजमान।"
       दुनू प्राणी चुपचाप सुनि रहल छल। बुझाइक जे कोनो फांसमे अछि। 
      
गणेश बाबूक घर पर प्लास्टिकक कुर्सी पर बैसल छल दुन प्राणी। गणेश बाबू पुतौहुकें हाक देलनि। हुनक छोटकी पुतौहु अयलीह। गणेश बाबू परिचय करौलनि। विवेकक पत्नी इथउथ मे छलि जे पण्डा जीक पुतौहुक पयर छुबथि कि नहि। मोन नहि मानि रहल छलनि। तखने मोनमे एक टा आर विचार अएलनि। एहि अठारह-उनैस बरखक युवकक माय कें‌ मुहदेखना कते देल जाय? ओ मुक्त होब' चाहैत छलीह। दुनू हाथ जोड़ि अभिवादन कएलनि आ पांच सय टाकाक एक नोट बहार क' मुहदेखना देलनि। विवेकसं पुछलनि जे एक टाका सिक्का छै कि नहि।‌ मुदा, बिच्चहिमे गणेश बाबू बजलाह, "कोनो बात नै जजमानी! आब एक के सिक्का भेटै छै? लोक‌ मानि लै छै।"
        पण्डा जीक पुतौहु एत्तेक काल धरि माथ पर आंचर रखने ठाढ़ि रहलीह। मुहदेखना ल' हाथ झांपलनि। पण्डा जीक मुहसं बहरयलनि,‌"गंगा माइ भरल-पुरल राखथि।"

चाहक संग गपसपमे गणेश बाबू अपडेट कयलखिन, "कहबे केलौं जे जेठका माने अहां के पण्डा विश्रामालय आ होटल-रेस्टुरेन्ट के लाइसेन्स लेल पटना गेल हन। मझिला के बेटा बड़ चंसगर छै। कहब करै छै जे जहिया घाट आर के कायाकल्प होइ जेतै तखन अपन काज के बारे मे बोलत‌। ओकरा परशासन आर स' नीक सम्बन्ध छै‌। संझिलाक बेटा बौडी बिल्डिंग करब करै छै। कहब करै छै जे कब्जा आ पखुरा मे दम नै रहतै त' गांग माइ के आरती के करतै। ऊ गंगा आरती मे सेलेक्सन के तैयारी करब करै छै। बहुतो नवयुवक आर गंगा आरती के तैयारी कए रहलै हन। अखन त' घाटक कायाकल्प के काज चलिए रहलै हन। मुदा,‌ सिमरिया घाट के सब लोक सपना देख रहलै हन आ तरेतर तैयारियो कए रहलै हन।"
        "आ अहांक छोट पुत्र?"
        "ऊ काशी-बनारस गेल हन। बोलल जे ओइ ज' स' घुरि क' अइबै, त' अपन पत्ता खोलबै।"
  ‌‌      विवेक दुनू प्राणीकें मोन पड़लै। अयोध्याक यात्राक्रममे बनारस सेहो गेल छल। विश्वनाथ कौरीडोर बनलाक बाद पहिल बेर गेल छल। मंदिरक चारू दुआरिसं दर्शनार्थी सभक लाइन चौक धरि देखि करेज कांपि गेल रहैक। बाट पर लोके-लोक आ ताहि भीड़मे दोकनदारी करैत तथाकथित पण्डा वा पण्डा-एजेन्ट। पहिने जेना सिनेमा हौल मे ब्लैकसं टिकट बेचनिहार फुसफुसाक' बजैत टिकट बेचैत छल, तेहने एजेन्ट सभ डायरेक्ट माने बिना लाइनक दर्शन करयबाक औफर दैत‌। से, सभठाम। मुदा सिनेमाक टिकट ब्लैक मे उपलब्ध कराब' बला सन फुसफुसाइत नहि छल। स्पष्ट कहैत छल। छओ सय टाका प्रति व्यक्ति। डायरेक्ट दर्शन। एहिमे मोल-मोलाइक संभावना सेहो। विवेक एक टा पण्डासं पुछलक, "एत्तेक भीड़मे कोना ल' जेबै?"
         उतारा भेटलै, "एत' स' हम ल' जैब भी आइ पी गेट तक। ओत' स' पुलिस ल' जायत। एत्ते की हम अपने लेल मंगै छी?"
        "मुदा, सुगम दर्शन के सेहो प्रावधान छै ने?"
        "छै। तीन सय मे छै। मुदा सुगमो बला लाइन देखबै त' ब्लड प्रेसर बढ़ि जायत। हम अति सुगम मार्ग बतेलौं। बाकी मर्जी अहांक।"
        "आ ई सामान्य लोक सभकें कते कालमे दर्शन भ' जाइ छै?"
        "से सामान्य लोक जानय। अपन-अपन भाग्य। लाइन मे लगि जाउ। बुझि जैब। हमरा की पुछै छी? औ बाबू! एते दिन मे अहीं एकटा दर्शनार्थी भेटलहुं जे सामान्य लोक‌ द' पुछलौं। नञि तं के पुछै छै? सभ देखै छै, चलि जाइ छै।" ओ एजेन्ट बाजल रहय।

पण्डा जीक टोकब सं विवेकक तंद्रा भंग भेलैक। पण्डा जी बजलाह, "चुप किए भ' गेलिऐ जजमान? चाइ नीक नै लागल?"
         विवेकक पत्नी पुछलखिन, "छोटका बेटा बनारस सं कहिया घुरताह?"
        "से नै जाइन यजमानी! बोललै जे पूरा ट्रेन्ड भैए क' अइब'।"
        विवेककें लगलै जे सांस फूल' लागल होइ। उठैत बाजल, "चलै छी पण्डा जी।"
        दुनू प्राणी पण्डा जीक घर सं बहरा क' बाट पर आबि गेल। ओकर पत्नीक मोन भेल रहनि जे पण्डो जीक हाथमे किछु थम्हा दैथि, मुदा से नहि कयलनि ओ।
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