कथा
उत्तर गान
प्रदीप बिहारी
"आ यार! अरे, तों त' बूढ़ भ' गेलें।
"की कहलही? हम बूढ़ भ' गेलहुं? बूढ़ होअय हमर दुश्मन।
"हमरा तहिना लगलें।
"अप्पन कोहा नहि सुझै छौ? चुक्कीमाली भ' बैसलो ने हेतौ। आ कहै छें हमरा।" अपन पेट हंसोथति सुबोध बाजल, "देखही। दाबि क' रखने छियै। राति भरि चिया सीड पानि मे दै छियै आ भोरे खाली पेट मे ध' दै छियै। पेटो कन्ट्रोल मे आ स्टैमिना सेहो बढ़ल।
दुनू मित्रमे एहिना अभिवादन होइत छै। से, एहूबेर भेलैक । सुबोध ओकरासं पहिने रिटायर भेल अछि। रिटायर भेल रहय तं बाजल रहय, "घोषणा क' दै छियै जे तों कहियो रिटायर नहि हेबही। दुनू गोटे एक्के किलास मे आ हम तोरा स' पहिने रिटायर। बैसबै छियौ इन्क्वायरी।"
"से तोरा बुतें नहि हेतौ।"
"किएक?
"तोरा ठेहुन मे अकिल छौ आ हमरा..."
"माथा मे...यैह ने...?"
दुनूक बीच एहन संवाद बरोबरि होइक।
आ सुबोध मुस्किया दिअय।
सुबोध बाल्यकालहिसं सुकंठ गायक छल। नेनहिसं गीत गयबाक स'ख रहैक। कोनो गामक मंच पर अवसर ताकि लिअय। रहीमक कविता खूब गाबय। हाइ स्कूलमे ओकर छवि गायक सन बनि गेल रहैक। ...मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...खूब तन्मयतासं गाबय। प्राय: मंच पर एकर फरमाइस होइक। एहन भ' गेलै जे ओकर नामे पड़ि गेलै- मैया मोरी।
एक बेर जीबछ बाबू मास्सैब समाज अध्ययनक कक्षामे कहने रहथिन ओकरा, "पढ़ाइयो पर ध्यान दही। एहन नहि जे मेट्रिके मे मैया मोरी करैत रहि जइहें।"
कक्षामे ई बात चुपचाप सूनि लिअय सुबोध। मुदा, मित्र-मंडलीमे बाजय, "तों सब मनो जे हम मैट्रिक पास क' जाइ। मैट्रिक क' जाइ। बस, एतबे चाही हमरा।"
"किएक?"
"मेट्रिक पास क' जेबै त' हमर बियाह भ' जेतै। बाबू कहने छथिन।" निर्दोष सनक उतारा दिअय सुबोध आ सभ हंस' लगैक।
ओ सभ हंसै तं बाजय, "बाबू कहै छथिन जे बेसी पढ़ि क' बाहर चलि जयबें त' के डेबत एत्ते जमीन-जथा?
से, सुबोध एम ए कयलाक बाद बियाह कयलक। एम ए सं पहिने नोकरी भ' गेल रहैक। सिपाही बनि गेल रहय। पवन कहने रहै, "देहे आ दिमागे सन नोकरी भेलौए।
सुबोध दहिना बांहि फुलबैत देखाबय आ बाजय, "तोरा सब जकां कोनो बेसाह के नरमी दाना बला देह छै जे फक् फक् करतै।" आ हिस्सकक अनुसार हंस' लागय।
एम ए कयलाक बाद सुबोध अपन गायनकें मंजने छल। जाहि-जाहि शहरमे बदली होइत गेलै, ताहि-ताहि ठामक रंगमंचसं जुड़य...साहित्यिक संस्था सभसं जुड़य आ अपना लेल स्टेज पर थोड़ेक जगहक जोगाड़ क' लिअए।
गायनक संग ओकरा विभागीय पदोन्नति सेहो होइत गेलै। विभागमे ओकरा कलाकार सन आदर भेटैत गेलैक। पुलिसकर्मी संघक सचिव धरि बनल। जिलामे कोनो नव एस पीक पदस्थापना होइक कि सुबोधक गायनक कार्यक्रमसं हुनक स्वागत होनि। एहुना होइक जे नव एस पी के अएलाक बाद जिलाक कोनो संस्था कार्यक्रम करय, हुनका बजाबय आ अरबधि क' सुबोधक गायनक कार्यक्रम करय। एस पी सं दुनूक परिचयक नीक आरंभ भ' जाइक।
मुदा, ताहि लेल सुबोध प्रयास नहि करय। संस्था सभ स्वयं एकरासं सम्पर्क करैक। एक दिन मित्र कहलकै, "तोरा बुझाइ नहि छौ जे ई संस्था बला सभ एस पी स' सम्पर्क आ सम्बन्ध लेल तोरा माध्यम बनबैत छौ।"
"एकदमे नहि। हम साहेब दुआरे गबै छिऐ? हम कला के जोगबै छी।" सुबोध बाजल रहय, "तों बैंक मे मुंशीगीरी कर। तों की जान' गेलही जे सारेगामा के सा की होइ छै। बुड़िबान नहितन...।"
पवनकें नीक नहि लगलै, "ठीके कहै छै जे हेहरा के कहांदन ने जनमलै गाछ, त' कहलक जे छाहरिए तर छी। रे, यार अइ मे मुंशीगीरी कहां स' एलै? हम मुंशी छी?"
"आर नहि त' की? तोरा विभागमे लिखा-पढ़ी के काज होइ छौ। पहिने अइ काज कर' बला के मुंशिए ने कहै! तों आब बेसी पढ़ि-लिखि क' गेल छें, त' मानि लेबौ जे रिफाइंड छें। मुदा छें त'..."
कि बिच्चेमे टोकि देलकै पवन, "तोरा एतबे बूझ' अएतौ। असल मे, पी टी करैत काल तोरा सभ के जत्तेक ने पयर पटक' पड़ै छौ जे दिमागे पर जड़ब पड़ै छौ आ दिमाग भोथ भ' जाइ छौ। बुझल छौ ने, तड़बा के चोटक असरि सोझे दिमाग पर पड़ै छै।"
एहने-एहने गप करैत दुनू मित्र अपन-अपन वर्तमान बयस बिसरि चुकल छल। पवनक पत्नी चाह आनि क' देलखिन तं वर्तमानक गप शुरू भेलै।
"कनिया कत' छथुन?"
"गया मे। छोटकी बचिया लग। तोहर बला भाग नहि ने छै यार। प्राय: चालीस साल नोकरी मे बिता देलही, कनिया संगे रहलखुन।"
"तं तोरा के मना केने रहौ जे नहि राखहुन।"
"रहलनि तं ओहो। मुदा, आब बाल-बच्चाक सेवामे लागल रहै छथि।"
"बूढ़ाक सोह नहि?"
"फेर बूढ़ बाजल।" सुबोध हरकल, "रे, बेटी नहि ने छौ। तों की जान' गेलही? छोटकी के नोकरी भेलैए।ओकर बच्चा छोट छै। मेहमानक पोस्टिंग दोसरे ठाम छनि। की करतीह बेचारी?"
"ओ, से त' जरूरिए छौ। फेर एत' गाममे?"
"प्रमोदक परिवार छै ने। भावहु छथि। भतीजा अछि, पुतौहु छथि, पोता-पोती अछि। चलै छै। ओना हमहूं बाहरे-बाहर रहै छी। बहुत दिन पर गाम एलहुंए।"
"गाम मे मोन लगै छौ?"
"अहंs। गाम मे लोक नहि छै। गपो कर' लेल नहि भेटैए। एत्तहु सभ अपने मे व्यस्त। हमरा त' टोल पर स' बेसी नीक बाध मे लगैए। गाछ-बिरिछ आ हरियरी मोहैए। तें मार्निंग वाक मे ओम्हरे जाइ छी आ बड़ीकाल धरि बुलैत रहै छी। ओम्हरे हिया जुड़ाइए।"
"से, पछिला बेर हम आयल रही तं नहि छलें।"
सुबोधकें पछिला बेर पवन फोन कयने रहै, से मोन पड़लै। बाजल, "तखन जेठकी बेटी लग रही। छोटकीक छुट्टी रहै। ओ मेहमान लग गेल आ हम दुनू प्राणी जेठकी लग चलि गेलहुं।"
"एखनि रहबें ने गाम मे?"
"देखही, जाबत धरि ई सर्वे राखय। बड़ लोचा छै यार।" सुबोघ बाजल।
"हमहूं त' अही मे फंसल छी। जाबत नोकरी रहय, अइ सब बारे मे नहि सोचलिऐ आ आब...।"
"एहन ने झमेला छै, जे खून-खुनामय भ' जेतै। देखही, हमरा सभ के बहुत जमीन रहै । चारि गाम मे मौजा सेहो रहै। सभ बिकाइत गेलै। हमर पितियौत बहिन सभक बियाह समिलाते बला जमीन बेचि-बेचि भेलै। हम दुनू भाइ पढ़ते रहियै। जखन बाबू आ कक्का भिन्न भेलखिन त' पंच सभ बाबू द' कक्का के कहलकै जे एकर बच्चा सभ लेल समिलातक जमीन नहि बिकलै, तें एकरा एक बिगहा छोटांश दहक। छोट भाइ छह। तों राम आ ई लछुमन। कक्का मानि गेलखिन। पहिने बेसी मुहजमानिए होइ। भ' गेलै। आइ पचास बरस स' हमरा दुनू भाइ के कब्जा छै। आ आब खतिहानक अनुसारे ऊ फरीक ओहिमे हिस्सा लेल आफन तोड़ने छै। षडयंत्र रचने छलै।"
पवन चुपचाप सुनैत छल। ओकरो पितियौत कहने छै जे ओकरा सभक पनरह धूरक एकटा खाता मे पड़ोसियाक दुमहला छै। एकर की हेतै? ककरो बुझल नहि जे एहि बीचमे पुरखा सभ कत' बदलेन कयलनि आ ककरा ओहिना देलनि-लेलनि। ओ सभ भैयारी निमाहलनि आ संतान सभकें एहि सर्वेक डाटा पाण्डव-कौरव बनाब' पर बिर्त्त छै। ओ सुबोधकें पुछलक, "त' सलटलौ?"
"अहं। बात मुदा दबल छै। हमहूं दुनू भाइ दाखिल-खारिज कराब' मे लागल छी। हमरा प्रमोद फोन कयलक। दुनू प्राणी धनबाद मे रही। जेठका लग। भागल-भागल एलौं। दुनू पितियौत के कहलियै- हम दरोगा के पद स' रिटायर केने छी। छक्का-पंजा मे एसपियो दरोगा सन नहि होइ छै। बड़का दिमाग आ पोस्ट बला भले भ' जाउ। तोरा बता दै छियह जे लाइसेंसी रिवाल्वर रखने छी। किएक? जान-माल के सुरक्षा लेल ने। अइ एक बिघबा पर फेर नजरि उठेबहक त' परमोदो के परिबार के बाहर पठा देबै, बेटा सभ बाहरे रहै छै, कनियो बाहरे आ ठोकि देब' दुन्नू के। लैत रहियह। हमरे पर ने केश हेतै। बरू रहब जहले मे। लेकिन बाप-पित्ती के देल तोरा दुनू के भोग' नहि देब'।"
सुबोधक दोसरे रूप देखलक पवन। बाजल, "एक्के बेर एना नहि बजबाक चाही।"
"नहि बजितियै त' कने-मने उमकैत। आब दुनू भाइ के हगनी-पदनी बन्द छै। बेटा सभ नोकरिहारा छै। पढ़ल-लिखल छै। समझा क' थाकि गेलै जे बाबाक देल पर हक नहि जमाबहक, मुदा एकरा-दुनू भाइ के उमकी उठल रहै। लगलै नितीश जी दिआइए देलखिन।"
पवन विषय बदलब उचित बुझलक, "छोटका बेटा कत' छौ?"
"आब बंगलौर आबि गेल। तोरे बैंक मे पी ओ भेल छल ने। दू साल के बाद छोड़ि देलक। दोसर कम्पनी ज्वाइन केलक-ए। ओत' डेढ़ करोड़ मे घर कीनलक अछि। घरवास मे गेल रही। एत' स' हम सभ आ प्रमोदक परिवार के हवाई जहाज के टिकट काटि क' पठा देलक। दुनू भाइ कहलियै जे निच्चा स' बढ़ल छी, हवाइ जहाज सूट नहि करैए। हम सभ ट्रेने स' आबि जेबौ। मुदा, नहि मानलक। दुनू बहिनो-बहिनोइ के हवाइए जहाज के टिकट कटा क' पठा देने छलै।"
"वाह! नीक लगैए सुनैत। धियापुता प्रगति करैए, से सुनि करेज सूप सन भ' जाइए।"
पवन के होइक जे सुबोध अपने सभ कहने जाइ छै, ओकर धिया-पुता द' नहि पूछि रहल छै। मुदा, तखने मोन पड़लै जे सुबोध त' पंजीकार अछि। कत्तहु रहय, गामक प्राय: सभक परिवारक हिसाब-किताब रखने रहैत अछि। आ, मोनो रहैत छै ओकरा।
पवन ओकर जेठका बेटाक समाचार पुछलक त' सुबोध बाजल, "धनबाद मे अछि। नीक नोकरी छै, पाइ छै। कहलिऐ- कतहु घर कीन ले। मुदा, कहलक - ककरा लेल? गामक घरक उपरका तल पर अपटूडेट गार्डेन बनबा दै छी, स्वीमिंग पुल बनबा दै छी। शहर सन सभ सुविधा उपलब्ध करबा दै छी। अहां आ कका भोग करू।"
"वाह। मुदा, ओकर परिवार?"
" कने टा खिस्सा छै यार।"
"की?"
"बेगूसराय मे जखन पढ़ै त' ओत्तहि एकटा लड़की के तैयारी करा बैंक पी ओ बना देलकै। बाद मे पता चलल जे दुनू बियाह कर' चाहैए।"
"त' क' किए ने देलही।"
"लड़कीक पिता हमरा ओहिठाम आयल रहथि। तहिया मोतिहारी मे रही। जलखैक बाद गप चललै त' कहलियनि जे अहां भूमिहार छी आ हम रैजपूत। की अहां ई बियाह कर' चाहब। लड़िकीक पिता के ई बात नहि बुझल रहनि। ओ चुप भ' गेलाह। हम कहलियनि- दुनू गोटाक पहिले संतान अछि। अहां के तीनटा बेटी आर अछि, हमरो एकरा स' छोट तीनटा संतान अछि। भविष्यमे दिक्कत त' नहि हैत? ओ अपन प्रस्ताव घुरा लेलनि।"
बिच्चहिमे पवन बाजल, "ठीके, तोहर बुद्धि ठेहुन मे घुसकि गेल रहौ। हुनको। ई जाति कोनो मुद्दा भेलै रे।"
"चुप ने यार। हम त' ई नहि कहलिऐ जे हम कथा नहि करब। जे, से... दुनूक अपन-अपन जाति मे बियाह भ' गेलै। आ आब...!
"आब की?"
"दुनू तलाकक केस फाइल कयने अछि।"
"तोहर बेटा ओहि लड़कीक सम्पर्क मे छौ?"
"से नहि जानि। बेटा सं पुछै छियै त' कहैए नहि। यार सब किछु छौ, एकटा यैह..."
"ओकरा दुनू के संतानो...
"नहि, बेसी दिन संग नहि रहि सकलै।"
पवन देखलक जे सुबोधक मुहेंठ उदास भ' गेल छलैक।
सुबोध बाजल, "की करियै? जेठका के सपोर्ट क' रहल छियै। बेटा अछि ने। जल्दी निर्णय भ' जैतै त'..."
"आब सपोर्टे क' क' की करबही? तोहर सपोर्टक खगते कहां हेतै ओकरा। जहिया रहै, तहिया करबे ने केलही आ चारि टा जिनगी नर्क क' देलही।"
सुबोध चुप छल। ओकर आंखि गील होम' लागल रहै, से पवन अखियासलक। ओह! एत्ते दिन पर मित्र सं भेंट आ...। पुछलक, "यार! गीत गयला कत्ते दिन भेलौए?"
"मोन नहि अछि। काल्हि प्रमोदक पांच बरखक पोती मोबाइल पर हमरे वीडियो देखबैत कहने छल, " बाबा! एकबेर ई गीत गबहक ने!"
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फोटो : गूगल सं साभार।
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