Sunday, August 2, 2026

बाजै छै मिरदंग हो लाल... (मैथिली कथा )

कथा

बाजै छै मिरदंग हो लाल...

प्रदीप बिहारी
        
        कहमा सँ चलि अयलहुँ हे रधिका,
        कहमा कने जाइ हो लाल...
        कवन बाबा दरबज्जा हे रधिका,
        बाजै छै मिरदंग हो लाल...

कलाकार सभ जखने ई गीत उठौलक कि मृदुल जी थिरक' लगलाह। हुनकर थिरकब दू रंगक छलनि। पएर कहारक दुलकी चालि सन, डांड़ आ तकर ऊपर पालकीमे बैसल बरक देह सन।
       घनश्यामकें अचरज भेलनि। पचहत्तरि बरखक मृदुल जीक प्रति मोनेमन नतशिर भेलाह। गजब के बैलेसिंग छनि। दू भावक एक देहसं प्रदर्शन, सेहो नृत्यमे आ संगे-संग। बयस भने ससरि गेल होनि, देहमे किछु सामान्य आ किछु विशेष व्याधि भने पैसि गेल होनि, मुदा कलाकारी ओहिना छनि। छहछह करैत।
        सांझमे जखन मृदुल जी फोन कयने रहथिन जे दुनू प्राणी सात बजेक मोन्हारि सांझमे हुनका ओहिठाम पहुंचि जाथि, तं घनश्यामकें अचरज भेल रहनि। दसे दिन पहिने तं बजौने रहथिन। कहने रहथिन- 'आउ। सभ गोटें संगहि भोजन करब।'
       पचहत्तरि बरखक पूर्ति पर मात्र आप्त लोक सभकें बजौने छलाह। बेसी लोककें बजाएब आब सोचि नहि पबैत छथि। एक समय छलैक...
        घनश्याम पूछि देने छलाह, "से अवसर की छै सर? एतेक जल्दी दोबारा बोलाहटि?"
       "किछु नहि, ओहिना। फेर मोन भेल संगहि भोजन करबाक।"
       "मुदा, भौजीक हाल देखि कोनादन लगैए। अहां स्वयं एत्तेक कष्टमे रहैत छी, ताहिपर ई..."
       बिच्चहिमे मृदुल जी कहलखिन, "से सभ किछु नहि। अहां दुनू गोटें आउ ने। आ, हं। पछिला बेर जकां किछु गिफ्ट-तिफ्ट नहि आनब।" आ फोन राखि देलखिन।
      घनश्याम सोच' लगलाह-
      एक समय छलैक...मृदुल जीक ओहिठाम कलाकार सभक जमघट रहैत छलनि। मात्र शहरे भरिक नहि, जिला भरिक कलाकारकें जखन आ जेना पलखति होइक, आबि जाय मृदुल जीक ओहिठाम। आ मिज्झर भ' जाय रंगकर्मक दुनियामे। मृदुल जी ठीक साढ़े चारि-पांच बजे धरि विद्यालयसं घर घुरि जाथि। आ तकर बाद शुरू भ' जाइक...
       शुरू भ' जाइक रिहर्सल - 'टिकबा जब-जब मंगलियौ रे जटबा...'
       कहियो गपेसप शुरू भ' जाइक। बड़ी काल धरि चलैक। कहियोकाल तं समापनसं पहिनहिं भौजी जलखै तैयार क' बीचमे‌ राखि दैथि।‌ ओना सामान्यत: रिहर्सल वा गपसप समाप्त भेलाक बाद जलखै-चाह चलैक‌ आ ताहि संग थोड़ेक कालक लेल खेरहा शुरू‌ भ' जाइक। मुदा, ई जलखै-चाह सभ दिन चलबे करै। अपना ओहिठाम आयल लोक सभकें बिनु जलखै-चाहक कहियो ने जाय‌ दैथि भौजी। से एक टा समय छलैक...
        आ आब एक टा एहन समय छैक जे भौजीक हाल देखि घनश्यामकें ओ समय मोन पड़ि जाइनि आ ओ कूही होमए लागथि। भौजी आब मूक दर्शक बनल बैसलि रहैत छथि। कोनो प्रतिक्रिया देबामे असमर्थ भौजीक चेहरापर झलकैत दर्द देखल जा सकैत छल।
         मृदुल जी आब शहरक साहित्यिक आ सांस्कृतिक गोष्ठी सभमे प्राय: नहिए जा पबैत छथि। पत्नीकें कखन कोन खगता भ' जयतनि, के जानय? ओ पत्नीक लेल सहायिका तकैत रहैत छथि। परिचयक लोक सभक‌ संग-संग फेसबुकपर एहिलेल विज्ञापन लिखैत रहैत छथि, मुदा वांछित सहायिका एहि छोटछीन शहरमे भेटब बड़ मोश्किल। केओ भेटितो छनि तं बेसी दिन टिकैत नहि छनि। भौजीकें बाथरूम ल' जायब, नहाएब-सोनाएब, खुआएब, केश बान्हब, सोफा वा ओछाएन पर बैसा देब...आदि काज सभ सं अकछि जाइए वा ओतेक पाइमे कोनो एहिसं हल्लुक काज भेटि जाइत छैक, से नहि जानि, मुदा काज छोड़ि दैए। आ मृदुल जी स्वयं लागि जाइत छथि। ओना, एक टा पड़ोसिया छनि, मुदा ओ भोजन बनाब' अबैत छनि। शेष काजमे सहयोग नहि क' पबैत छनि।
      घनश्याम सोचैत छथि। जे भौजी जलखै बना कलाकार सभकें खुअबैत छलीह, चाह पिअबैत छलीह, तिनक हाथ आब अपन मुह धरि नहि पहुंचि पबैत छनि। अपना हाथमे क'र नहि सम्हारि पबैत छथि। बजैत छथि तं शब्द कण्ठमे घुरिया जाइत छनि आ मुहसं वाक्य स्पष्ट नहि भ' पबैत छनि। मुह फुजल सन रहि जाइत छनि। फेर नहूं-नहूं दुनू ठोर सटि पबैत छनि।भौजीक ई स्थिति कचोटैत छनि घनश्यामकें।
        भौजी बेटा लग दिल्ली गेलीह। किछु मास रहि सकलीह आ घुरि अएलीह। मृदुल जीकें‌ सेहो दिल्ली नहि भावनि। अपना शहरक सक्रियता हुनका मुह दुसनि मने।
        बेटा दोसरो बेर दिल्ली बजौलकनि। एहिबेर ओ हिनक व्यक्तिगत पुस्तकालयक महत्वपूर्ण पोथी सभ सेहो मंगौलक। ओकरा लगलैक जे पिताक मोन लागि जयतनि, मुदा से नहि भेलैक। ओ किनसाइत ई नहि बूझि सकल जे पिताक मोन पोथीसं बेसी ओकर मायक  बेरामी आ सुश्रुषामे टांगल रहैत छलनि। ओहो दुनू प्राणी नोकरी कर' जाय, धियापुता स्कूल-कौलेज। घरमे यैह बुढ़बा-बुढ़िया। बस।
        मृदुल जी सोचलनि। एना तं अपनो शहरमे रहैत छथि। तखन महानगरमे कोन सुख? घुरि अएलाह।
        भौजी मुम्बइ गेलीह। छोटका लग। मुदा ओत्तहुसं किछुए मासक बाद घुरि अएलीह।
        मृदुल जी दोसर बेर दिल्ली गेलाह तं मित्रलोकनिकें कहने रहथि जे आब ओत्तहि रहताह। मीनूक मायक (भौजी) सेवा एत' नहि भ' पबैत छनि। मुदा, दोसरो बेर जखन घुरलाह तं कारण केओ नहि बूझि पौलक। हं, बेटाक प्रशंसा कने बेसी कर' लागल रहथि।
       मुम्बइ सं घुरबाक कारण ओ कहथि, "बाइस हजार महिना पर बेटा एक टा सहायिका के बजौलक। कोनो एजेन्सी द्वारा आएल छलै। एक दिन ओकरा देखलियै जे मिनुआ माइ के बाथरूम स' आनि क' पलंग पर स्थिर स' बैसाब' के बदला जोर स' पटकि क' बैसौलकि। तमसयलियै, तं बेटा कहलक जे नहि तमसबियौ एकरापर। एकरा सभ के युनियन बड़ मजगूत होइ छै। छोड़ि देत त' आन केओ नहि आएत। हम सोचलहुं, एहन मे त' ई जाने ल' लेतै। आ, ज' एत्तहु हमरे कर' पड़त, त' एत' किए रहब? अपने शहर मे किए ने रहब, कमसं कम इष्ट-मित्र सभ तं छथि।"
       आ मृदुल जी ओत्तहुसं घुरि अएलाह।
       आब एतहि अपना घरमे रहैत छथि। निचां मे अपने रहैत छथि आ ऊपरमे दू टा किरायादार छनि। दुनूसं नीक सम्बन्ध छनि। एक टाक बच्चा बरोबरि हिनका लग अबैत रहैत छनि। ओकरा फ्रेंड कहै छथि। ओकरा बजा-बजा क' बेसी वस्तु बांटि-चुटि क' खाइत रहैत छथि।
       किरायादार सभ सहयोग करैत छनि मृदुल जीकें। जन्मदिनक आयोजनमे घनश्याम मृदुल जीक फ्रेंडक माय, माने लवलीकें पूरी छानैत देखने छलाह। हुनका घरक सहायिका ओरिआओन मे लागलि आ लवली पूरी छानैत।
         लवली एक टा सरकारी विद्यालयमे कम्प्यूटर पढ़बैत छथि। फूर्तिगर बुझाएल रहथिन घनश्यामकें।

से, लवली जख‌न टोकलखिन तं घनश्यामक तंद्रा टुटलनि। ओ अपन पत्नीकें चारूदिस तकलनि। नहि रहथिन।
      लवली टोकलनि, "सर, ल' ने चलियनु दुलहा जी के। दुलहि‌न ओहि कोठरीमे छथिन।"
       तखने कलाकार सभ गीत उठौलक, "हम लाया आजन-बाजन, तुम करो बियाह। सांवर गेरुली... होइ जेतै जटा के बियाह...।
       घनश्याम देखलनि। जाहि कोठरीमे जयमाल होएबाक छलै, ओकर चौकठि दिस मृदुल जी कें लेने कलाकार सभ जा रहल छल। ओ देखलनि जे मृदुल जीक माथ उघारे रहनि। टोकलनि, "थम्है जाइ जाउ। वरक माथ पर पागे नहि छनि।" पुन: मृदुल जीकें कहलनि, "यौ सर। पाग-डोपटा लाउ ने।"
       मृदुल जी अपन दोसर कोठरी दिस गेलाह। पाग आ डोपटा आनलनि। घनश्याम हुनका माथपर पाग रखलनि आ कान्हपर डोपटा। कलाकार सभ गीत उठौलक, "दूल्हे का सेहरा सुहाना लगता है..."
       अंतरा पूरो ने भेल छलैक कि मृदुल जी रोकलनि, "रूकै जाइ जो। अरे, सहवाला कहां गेलै? हौ फ्रेंड..." ओ लवली दिस तकलनि।
       जाबत लवली किछु उतारा दितथि, छौंड़ा आबि गेल।
      घनश्याम भौजीक ठोरपर मुस्की देखलनि आ मोने-मोन प्रफुल्लित भेलाह।
       कोठरीमे भौजीकें कोनहुना ठाढ़ कयने छलि घनश्यामक‌ पत्नी, लवली, मृदुल जीक भगिनी आ तीन-चारि टा आन-आन महिलासभ। ओलोकनि शुरू कयलनि, "पूरब-पछिम सं अइलै सुन्दर दुलहा..."
        मृदुल जी कोठरीमे कलाकार सभक संग पैसलाह। वातावरणमे मिश्रित रस घोरा गेलैक। भिन्न-भिन्न गीत आ भिन्न-भिन्न भास। लगलै जेना आनन्द संगीतक सीमा तोड़ि देने होअय। भौजी एकटक मृदुल जीकें देखि रहल छलीह। सभ प्रफुल्लित छल। मुदा लवलीक चेहरापर करुणा आ गांभीर्य उतराचौड़ी क' रहल छल। एहि स्थितिकें घनश्याम छोड़ि आर केओ नहि अखियासलक। घनश्यामक मोनमे उचरलनि, "लवली सेहो कलाकारे छथि मने।"
         घनश्यामकें मोन पड़लनि। मृदुल जीक हीरक जयन्तीक दिन लवलीसं मृदुल जी परिचय करौने रहथिन-  ई छथि लवली। उपरका तल्लापर रहैत छथि। सरकारी स्कूलमे कम्प्यूटर पढ़बै छथि। हमरो कम्प्यूटर-गुरु छथि।
         आ तखने लवली बाजल रहथि, "नहि, नहि। एना नहि कहियौ सर। हम त' स्वयं अहांसं सीखैत छी। अहां स' जीबाक आ प्रसन्न होयबाक कला सिखैत छी।"
         घनश्यामक तन्द्रा तखन भंग भेलनि, जखन महिलालोकनिक स्वर दिस ध्यान गेलनि। ओ लोकनि शुरू कयने रहथि- 'एलै शुभ के लगनमा, शुभे हे शुभे...।'
         मृदुल जीक हाथमे माला छलनि आ भौजीक हाथमे सेहो कोनहुना माला लटकाओल गेल छल। मृदुल जीक भगिनी बाजि रहल छलि, "मामू! पहिरा दियौक। मामी बड़ीकाल स' ठाढ़ छथिन। हिनका बैसा देबनि। मृदुल जी माला पहिराब' लगलखिन कि भौजी अपन मूड़ी पाछां मुहें करबाक प्रयास कयलनि आ हाथ आगां बढ़ाब' लगलीह। मृदुल जी हुनक मोन बुझलनि आ अपन माथ निहुरा लेलनि।
        जयमाल भेलाक बाद दुनू गोटें कुर्सी पर बैसलाह।  तखन केक काटल गेल। केक पर चक्कू चलैत काल सहवाला गीत उठौलक- 'हम बने तुम बने एक दूजे के लिए...' आ लोक सभ एकबेर आनन्दमे मति गेल।

आगन्तुक सभ भोजन करैत गेलाह आ अपन-अपन घर घुरैत गेलाह। एही क्रममे घनश्यामक पत्नी एक टा कलाकारसं पुछलनि, "मीनू आ छोटी वा बेटे सभ केओ वीडियो कौल नहि कयलकनि। एहन मनोरम दृश्य ओकरो सभ के देखक चाही छलै। ओना एत्तहु सं केओ नहि कयलकै।"
        घनश्याम सुनलनि। उतारा देलनि, "एत'सं के करितै? माय-बाप तं बरे-कनियां...खैर, जे भेलैए आ भ' रहल छै, ताहि आनन्दकें समेटि क' राखू ने।"
        ओ दुनू प्राणी बाहर दिस जाय लगलाह। हुनक नजरि लवलीकें तकैत छलनि। लवली भानसघरमे छलि। ओ भानसघरक चौकठि लग ठाढ़ भ' लवलीकें कहलनि, "चलै छी। बहुत आनन्द भेल। अहांकें देखि बुझयबे ने कयल जे मीनू वा छोटी नहि आएल अछि।"
        लवली बाजलि, "ओहि दिन कहने रही ने जे सर स' हम बहुत सिखैत रहै छी। एतेक कष्टक अछैतो सर छोट-छोट आयोज‌न करैत रहै छथि। बेसी नहि त' हमरे सभ के बजा क' किछु-ने-किछु होइत रहै छै आ आन्टी के प्रसन्न रखबाक प्रयास करैत रहैत छथि। ई गुण कि..."
        ...कि बिच्चहिमे घनश्यामक पत्नी पुछलनि, "अएं यै, अहांक अपन ब'र सं परिचय नहि करौलहुं?"
         सकुचाइत लवली बाजलि, "बड़ लजकोटर छथिन। भीड़-भाड़ नीक नहि लगै छनि। हुनकर पारस पहुंचा देलियनिहें। सरो के सोझां बड़ कम अबै छथिन। धाख करै छथिन।"
        लवलीसं विदा लैत दुनू दम्पति आगां बढ़लाह। बरण्डापर देखलनि जे मृदुल जी भौजीकें भोजन करबैत छलाह। खीरक क'र मुहमे दैत पुछलनि, "केहन लागल आइ के कार्यक्रम?"
       भौजीक स्वर स्पष्ट तं नहि भेलनि, मुदा आंगिक आ सात्विक अभिनयक बले जेना ओ कहि रहल होथि- 'बियाहक पहिल अनुभव सन...'
        घनश्याम अखियासलनि जे तिरपनम विवाहोत्सवक अवसरपर भौजीक चेहरापर पहिल बेर सन मुस्की उभरि अएलनि।
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