Tuesday, October 22, 2024

डंड़कस (मैथिली कथा)- मेनका मल्लिक Maithili Short Story by Menaka Mallik

डंड़कस
मेनका मल्लिक

ओहि दिन सौम्याक मोन मयूर नाचि रहल छल । गप एहन रहै जे ओकर छोट भाय आ भाउजक अबैया रहै। सौम्या अपन घर-आंगनकें नीक जकां ओरिया क' राखलकि । ओकर भाय बंगलौरमें नोकरी करैत रहै ।पिछला साल ओकर विवाह भेलै । ओ कहलकै -"नहि -नहि, बागडोगरे आबि क' विवाहक पहिल वर्षगांठ मनायब । तें सौम्याक मोनमे बहुत रास बात अबैत रहै। ओकरा मोन मे पहिने सन भाव उठलैक। छोट भाय तं छैक मुदा ओ छोट भाय लेल जे कनिया ताकलिक से बुझू जेना भाउज नहि, पुतौहु तकने होअय। ।

सौम्या पी.एच .डी. क छात्रा छलि । ओ संगीतमे पी.एच .डी. कs रहल छलि । नृत्यक स'ख ओकरा नेनपनेसं छलैक । ओ सोचैत रहय- एहिबेर भाउज कतबो कहतै तं नहि नाचब । दोसर मोन कहै- नहि, भाउज तं ओकरा नचाइ-ए क' छोड़तै । भाउज ओकर नृत्यक प्रशंसक छैक। तें दू दिन पहिनहि माय कहने रहै, "सौम्या! एहिबेर तोहर नृत्य बढ़िया होमक चाही।" 

सौम्या अपन आलमारी खोललिक। सोचलकि जे संध्याकाल जे पहिरति से निस्तुकी क' लिअए। एहि काजमे ओकरा बड़ समय लगैत छैक। पहिर'मे नहि लगैत छै, तय कर'मे लगैत छै जे की पहिरय? जखने ओ आलमारी खोललक, सभसं पहिने ललका बैग पर नजरि गेलै। बेगक चेन खोलि ओहिमे राखल गहना देखलकि। गहना बहार क' अपन डांड़ मे पहिरलकि। माथ नीचां मुहें झुका क' निहारलकि आ फेर गहना खोलि बेगमे राखि लेलकि। मोने मोन मुस्किआयलि। सौम्याकें अपन नेनपन मोन पड़लैक। नृत्यक स'ख ओकरा चौथे-पचमे कक्षासं रहै ।

सौम्याक पिता दंरभगासं बागडोगरा आयल रहथिन- काज-रोजगार लेल। एतs नोकरी तं नहि भेटलनि, मुदा अपन व्यवसाय शुरू करबाक जोगार लागि गेलनि। ओ व्यवसायमे नीक स्थान बनौलनि । सुखी-संपन्न भेलाह।

सौम्याकें मोने छैक। एकदिन ओ मायक डांड़मे ई डंड़कस देखने रहय। नृत्य करबाकाल ओ जे चुनरी पहरय ताहि पर  डांड़ पर पातर सनक चमकैत मोतीसं गांथल डंड़कस सनक कोनो चीज बान्हि देल जाइ  जे चुनरी ससरै नहि । जखन मायक डांड़मे ओ डंड़कस देखलकि, तं मोनमे अयलैक जे डंड़कस पहीरि लेने ने चुनरी गड़बड़ेतै आ ने साड़िए।  आ ओ बहन्ना करs लागल जे माइए बला डंड़कस पहिरति। नहि देती तं ने नृत्य सीख' जायति आ ने मंचे पर जायति।

पिताक दुलारि धीया सौम्या। पिता ओकरा प्राणसं बेसी मानथिन। हुनका हंसी लगलनि। कहलनि, "नहि बाउ! एखन अहांकें ई नहि अंटत, नमहर होयब तं  बला पहिरब।  एखन चलू, अहांक नापक दोसर कीनि दैत छी । मुदा, ओ जाय लेल तैयार नहि । पिता परबोधैत रहि गेलखिन मुदा  सौम्या अपन जिद पर कायम रहय। बड़ी कालक बाद माय ओ डंड़कस खोलि ओकरा हाथमे दैत बजलीह, "आइ सं ई तोरे भेलौ। नापि ले। अंटतौ तं नहि, एकरा कटा क' तोरा नापक बनबा दै छियौ।"

सौम्या अपना डांड़मे भजारलकि। बाजलि, "नहि, ई नहि कटतै। ई हम्मर भेल। तोरा राख' दै छियौ। हम नमहर हेबै तं साड़ी पर पहिरबै आ नृत्य करबै।"

"हं, तोरे भेलौ। जल्दीसं नमहर भ' जो। तखन पहिर' लगिहें।" माय बजलीह, "एकरा तोरे लेल राखि दै छियौ।"

सौम्या प्रसन्न भ' गेलि। 

पिता सौम्याक मायकें कहलनि, "चलू। अहां अपना लेल दोसर कीनि लिअ।"

मुदा ओ नहि मानलनि। कहलनि जे सौम्या लेल अनामति राखि देब' सं नीक आर कोन बात हेतै?
जखन ओ पहीरि क' नृत्य करत, हमरा लागत जे हमहीं पहिरने छी।

"मुदा, हमरा लगैए जे डंड़कस पहीरि क' ओ कोना नृत्य करत? नृत्यांगना सभ जे पहिरै छै, से दोसर प्रकारक होइ छै। एत्तेक भरिगर नहि होइ छै।" पिता बजलाह।

एखनि ई बात मोन पड़ितहि सौम्या मुस्किया उठल। सांचे, ताहि समय केहन बोध रहै ओकर।‌ नेनपनक ओ अवस्था ओकरा मोनमे गुदगुदी लगबैत रहै।

से सभ मोन पड़ितहिं सौम्याक नजरि देबाल पर टांगल पिताक माला पहिरल फोटो पर पड़लै आ मोन हहरि गेलै। अनचोकें परिवार पर वज्र कसि पड़ल रहै । पिता अपन व्यवसायक काजसं सभगोटेक संग दिल्ली जाइत रहथि। बाटेमे हुनका हृदयाघात भेलनि। जाधरि नजीकक कोनो अस्पताल लs गेलनि ता धरि ....।"

मायक मन:स्थिति पर बड़ीटा आघात भेलनि। सौम्या तकर बादसं मायक सेवामे लागल रहलि। हुनका एहि आघातसं बहरयबामे बहुतो बर्ख लागि गेलनि। ओना ई कहब मोश्किल जे ओ एहि आघातसं पूर्णतः बहरा सकलीह। मुदा, एत्तेक धरि कहल जा सकैत छै जे मोनकें बुझौलनि। करेजकें बान्हलनि। 

छोट भाय पढ़ैत रहलै। सौम्या नमहर भेलि । नृत्य-साधनामे लागल रहलि। संगहि पढ़ितो रहलि। एम ए कयलकि आ प्रेम विवाह कयलकि। ओना ओ चाहैत रहय पी.एच .डी .कयलाक बाद विवाह करी, मुदा से भs नहि सकलै । ओकर ब'र सेहो सैह चाहैत रहै । एकरा दुनूक प्रेमक सुगंधि दुनू परिवारमे पसर' लगलै आ परिवारक लोक सभकें गन्ह लाग' लगलै। बागडोगरा छैके कत्तेटा जगह? परिवारक बाहरो लोक सभ बूझ' लगलै। परिवारक लोकसभ पहिने तं विरोध कयलकै आ जखन बुझयलै जे विरोधक मानि नहि भ' सकतै तं मानि गेल। मुदा,  दबाओ ई जे बियाह क' लिअय। आ, दुनू प्रेमीकें परिवारक बात मान' पड़लैक।

सौम्याक ब'र एकटा प्राइवेट सेक्टरमे काज करैत छथि ।

सौम्या जीवनक रंगमंच पर तीनटा पाट अदा कर' लागलि।

ओ एकटा छात्रा छलि। नृत्य सिखैत छलि। दोसर एकटा पत्नी छलि जे पतिकें ऑफिस पठयबा लेल सभटा तैयारी करैत छलि । तकर बाद दुपहरियामे अपन पी.एच. डी.क थीसिस लिखैत छलि। आ सांझमे समय भेटै तं माय लग जाs क' मायक हालचाल पुछैत छलि। एके कालोनीमे रहने माइक हालचाल पूछब संभव भ' जाइत छलै। माइयोकें तं कतेक रोग भs गेलनि छलनि ।

भाय विवाह करs लेल नहि मानै, मुदा ओकरा मनबैत-मनबैत पिछला बर्ख ओकर विवाह करौलकि । सोचलकि, नोकरी कर' लागल, तं अपन परिवार बसाबय‌। मायकें किछु उसास हेतै।

सौम्याकें एहि शहरमे बहुत लोक चिन्हैत छैक। एकटा कुशल नृत्यंगनाक रूपमे ओकरा ई शहर स्नेह दैत छै। ब'रकें सेहो ओकरा पर गर्व छैक । जखन कोनो शो होइत छैक तं सौम्या मायबला डंड़कस  जरुर पहिरै-ए आ जतs जाइए ततs सं नीक क' क' अबैए।  जखन ओ डंड़कस पहिरैए तं ओकरा लगै छै जे माय आ बाबू दूनू ओकरा संग छथिन ।

भाय एलै । भाउज एलै । घरमे रमन-चमन होइत रहलै । आ ओहिदिन ओकर विवाहक पहिल वर्षगांठ रहै । किछु गोटे, मने परिजन-पुरजन नोतल गेल छलाह । कार्यक्रम सन्ध्याकाल रहै । 

ओकर भाय अपन पत्नीसं कहलक, "हम चाहै छी जे आइ अहां देशी लुक मे पार्टीमे रही।"

"देशी लुक माने?"

"माने परम्परागत रूपें पहिरू-ओढू। परम्परागत गहना-गुड़िया पहिरू। आर की?"

"ई की फुरायल अहांकें? तेहन गहना सभ अछि कहां? मम्मी जी अपन बला जे देने रहथि, तकरा सभ के अहीं देहाती कहि बदलि क' डिजाइनर ल' अनलियै। आब कीदन-कहांदन कहै छी। से सभ नहि होयत हमरा बुतें। हम जहिना छी, सैह हमरा नीक लगैए।"

पति कोठरीसं बहरा गेल।

सौम्याक भाय अपन मायसं गप कयलकै । दिन-दुनियाक गप-सप भेलै । एही क्रममे ओ बाजल,  "माय गे! आइ अपन पुतहुकें कोन गिफ्ट देबही ?"

"से तोरा किए कहियौ?"

बेटा बाजल, "अबस्से कोनो गहना लेने हेबही।

माय कहलखिन, "गहना सभ तं देनहि छियौ । आब हमरा लग की अछि? गहना-गुड़ियाक स'ख-सेहन्ता हमरा किएक रहत? आइ ने काल्हि कनिये कें होयतनि, तें द' देलियनि।"

"मुदा, पिंकी कें तों जे गहना देने रही ताहिमे तोहर बला डंड़कस तं नहि रहौ।" बेटा बाजल।

"से तोरा बुझल नहि छौ जे डंड़कस दीदी के देने छियौ।" माय कहलनि।

"मुदा सासुक चीज पुतहुए कें ने हेतै ।"

माय अवाक्। सोचलनि - सभटा बात बेटाकें बुझल छैक जे डंड़कस सौम्याकें देल गेल छैक। ओकर बाबूओकें इच्छा रहनि जे डंड़कस सौम्याकें देल जाइ तथापि एना किएक बजैत अछि? ओ कहलनि, "बाउ रे!  डंड़कस दीदी पहिरैत छौ, ओकरा लेल ओ शगुनिया छै। ओकरा ओ हमरा दुनूक आशीर्वाद मानैत अछि। जतs - जतs ओकर शो होइत छैक, ततs-ततs ओ ओकरा पहिर क' जाइत अछि, से ओकरा बड़ नीक लगैत छैक ।"

बेटा चुप‌ । माय बजलीह, "आ ई जरूरी छै जे सासुक चीज पुतहुएके भेटै? मायक चीज बेटी के नहि?"

बेटा गंभीर भ' गेल, "मुदा, घरक परंपराकें बेटे पुतहु आगू ल' जाइत छैक ने । बाप-पुरखा के चीज-वस्तु बेटे-पुतौहु जोगा क' रखै छै ने।"

मायक मोन भेलनि जे बेटाकें कहथि जे पहिलुका देल गहना सभकें जे कयलक से हुनको बुझल छनि। पुतौहु कहने रहनि। सोनकें बदलि क' टलहा अरजलक। आब...। मुदा, कहलखिन नहि।

मायकें चुप देखि बेटा बाजल, "हमरा विचारे दीदीसं डंड़कस मंगा लेबाक चाही।"

मायकें लगलनि जे पयर तरसं जेना जमीन ससरि गेल होनि। ओ ने धरती पर ठाढ़ छथि ने आकास सं लटकल छथि। कत' छथि से नहि पता चललनि। अपन दर्दकें पीबैत ओ बजलीह, "ई काज नहि हम करब। ओहो तोरे सन संतान अछि हमर। जखन तोरा मोनमे एहन बात छौ, तं चल बजार। एखन समय छैके। हम कनियां लेल एकटा डंड़कस कीनि दैत छियनि ।"

बेटा कहलकनि, "तखन तोहर चीज कोना भेलै?  कहां भेलै तोरा देहक पहिरल निशानी? पाइ तं दीदीयो लग छै, ओहो अपना लेल कीनि सकैत अछि। हमहूं पिंकी लेल कीनि सकैत छलहुं। मुदा ....।"

जखन माय लग कोनो चालि नहि सुतरलै, तं एकटा नव चालि चललक। बाजल "माय गे ! कम सं कम आइयो भरि लेल दीदी सं मांगि ने ले ।"

मायकें लगलनि जेना बांचलो सुल्फी करेजमे भोंकि देलकनि बेटा। बजलीह, "बाउ रे! हमरा आब से साधंस नहि अछि जे ओकरासं हम मांगब । तोहर जेठ बहिन छौ, मुदा हमर बेटीए नहि, जेठका बेटो वैह अछि । ई काज हमरा बुते नहि हेतौ।"

माय झूर-झमान भ' गेल छलीह। कोठरीमे गेलीह आ ओछाओन पर पड़ि रहलीह। मोने-मोन पतिकें उपराग दैत रहलीह जे हमरो अपने संग किएक ने ल' गेलहुं?"

संध्याक कालक कार्यक्रम शुरू होमय बला रहै।  तैयारी चलैत छलै। नोतहारी सभ जुम' लागल छल।

बेटा भीतरिया कोठरीमे पिंकीकें कहैत छल, "हे लिअ, ई पहिरू। देखू एहिमे अहां केहन लगैत छी?"

पिंकी डंड़कस हाथमे लेलनि आ बजलीह, "हम पहिनहि कहने रही जे ई हम नहि पहिरब। अहां दीदीसं कोन मुहें मंगलियनि ई? हे दैव।"

तखने माय कोनो काजसं खोंखी करैत ओहि कोठरीमे गेलीह। बेटा-पुतौहुक स्थिति देखलनि। गप सुननहि रहथि। रहल नहि गेलनि। बजलीह, "मांगि अनलही रौ....?"

"हं... हम दीदीकें कहलियै जे मायक मो‌न छै जे पिंकी पहिरै। दीदी हमरा दs देलकै । दीदी हमरा मानैत छै ने।"

मायकें लगलनि जे ओ ठामे गड़ि जयतीह।

पिंकीकें बुझयलनि जे हुनका हाथमे भरिगर पाथर होनि।

कार्यक्रम शुरू होयबाक रहै। भेलै। सौम्या नहि पहुंचल रहै। अतिथि सभ ओकरे तकैत रहथि।‌ मायकें होनि जे कोन मुहें बेटी लग ठाढ़ होयब।

"सौम्या नहि अयलीह एखनि धरि?"

बेटा बाजल, "दीदी अबिते हेतै।"

सभ देखलक जे सौम्याक ब'र एकसरिए कोठरीमे आबि रहल अछि। 

"अहां असगरे? सौम्या?"

"तैयार छलीह। पता नहि की भ' गेलनि? हमरा कहलनि जे अहां जाउ। हमर पयरे ने उठि पाबि रहल अछि।"
                    -----

Monday, September 16, 2024

उत्तर गान (मैथिली कथा)- प्रदीप बिहारी। Maithili Short story by Pradip Bihari

कथा

उत्तर गान

प्रदीप बिहारी

"आ यार! अरे, तों त' बूढ़ भ' गेलें।
       "की कहलही? हम बूढ़ भ' गेलहुं? बूढ़ होअय हमर दुश्मन।
      "हमरा तहिना लगलें।
     "अप्पन कोहा नहि सुझै छौ? चुक्कीमाली भ' बैसलो ने हेतौ। आ कहै छें हमरा।" अपन पेट हंसोथति सुबोध बाजल, "देखही। दाबि क' रखने छियै। राति भरि चिया सीड पानि मे दै छियै आ भोरे खाली पेट मे ध' दै छियै। पेटो कन्ट्रोल मे आ स्टैमिना सेहो बढ़ल।
       दुनू मित्रमे एहिना अभिवादन होइत छै। से, एहूबेर भेलैक । सुबोध ओकरासं पहिने रिटायर भेल अछि। रिटायर भेल रहय तं बाजल रहय,  "घोषणा क' दै छियै जे तों कहियो रिटायर नहि हेबही। दुनू गोटे एक्के किलास मे आ हम तोरा स' पहिने रिटायर। बैसबै छियौ इन्क्वायरी।"
      "से तोरा बुतें नहि हेतौ।"
     "किएक?
     "तोरा ठेहुन मे अकिल छौ आ हमरा..."
     "माथा मे...यैह ने...?"
    दुनूक बीच एहन संवाद बरोबरि होइक। 
        आ सुबोध मुस्किया दिअय। 
        सुबोध बाल्यकालहिसं सुकंठ गायक छल। नेनहिसं गीत गयबाक स'ख रहैक। कोनो गामक मंच पर अवसर ताकि लिअय। रहीमक कविता खूब गाबय। हाइ स्कूलमे ओकर छवि गायक सन बनि गेल रहैक। ...मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...खूब तन्मयतासं गाबय। प्राय: मंच पर एकर फरमाइस होइक। एहन भ' गेलै जे ओकर नामे पड़ि गेलै- मैया मोरी।
        एक बेर जीबछ बाबू मास्सैब समाज अध्ययनक कक्षामे कहने रहथिन ओकरा, "पढ़ाइयो पर ध्यान दही। एहन नहि जे मेट्रिके मे मैया मोरी करैत रहि जइहें।"
        कक्षामे ई बात चुपचाप सूनि लिअय सुबोध। मुदा, मित्र-मंडलीमे बाजय, "तों सब मनो जे हम मैट्रिक पास क' जाइ। मैट्रिक क' जाइ। बस, एतबे चाही हमरा।"
        "किएक?"
        "मेट्रिक पास क' जेबै त' हमर बियाह भ' जेतै। बाबू कहने छथिन।" निर्दोष सनक उतारा दिअय सुबोध आ सभ हंस' लगैक। 
       ओ सभ हंसै तं बाजय, "बाबू कहै छथिन जे बेसी पढ़ि क' बाहर चलि जयबें त' के डेबत एत्ते जमीन-जथा?
       से, सुबोध एम ए कयलाक बाद बियाह कयलक। एम ए सं पहिने नोकरी भ' गेल रहैक। सिपाही बनि गेल रहय। पवन कहने रहै, "देहे आ दिमागे सन नोकरी भेलौए।
       सुबोध दहिना बांहि फुलबैत देखाबय आ बाजय, "तोरा सब जकां कोनो बेसाह के नरमी दाना बला देह छै जे फक् फक् करतै।" आ हिस्सकक अनुसार हंस' लागय।
         एम ए कयलाक बाद सुबोध अपन गायनकें मंजने छल। जाहि-जाहि शहरमे बदली होइत गेलै, ताहि-ताहि ठामक रंगमंचसं जुड़य...साहित्यिक संस्था सभसं जुड़य आ अपना लेल स्टेज पर थोड़ेक जगहक जोगाड़ क' लिअए।
       गायनक संग ओकरा विभागीय पदोन्नति सेहो होइत गेलै। विभागमे ओकरा कलाकार सन आदर भेटैत गेलैक। पुलिसकर्मी संघक सचिव धरि बनल। जिलामे कोनो नव एस पीक पदस्थापना होइक कि सुबोधक गायनक कार्यक्रमसं हुनक स्वागत होनि। एहुना होइक जे नव एस पी के अएलाक बाद जिलाक कोनो संस्था कार्यक्रम करय, हुनका बजाबय आ अरबधि क' सुबोधक गायनक कार्यक्रम करय। एस पी सं दुनूक परिचयक नीक आरंभ भ' जाइक।
       मुदा, ताहि लेल सुबोध प्रयास नहि करय। संस्था सभ स्वयं एकरासं सम्पर्क करैक। एक दिन मित्र कहलकै, "तोरा बुझाइ नहि छौ जे ई संस्था बला सभ एस पी स' सम्पर्क आ सम्बन्ध लेल तोरा माध्यम बनबैत छौ।"
        "एकदमे नहि। हम साहेब दुआरे गबै छिऐ? हम कला के जोगबै छी।" सुबोध बाजल रहय, "तों बैंक मे मुंशीगीरी कर। तों की जान' गेलही जे सारेगामा के सा की होइ छै। बुड़िबान नहितन...।"
       पवनकें नीक नहि लगलै, "ठीके कहै छै जे हेहरा के कहांदन ने जनमलै गाछ, त' कहलक जे छाहरिए तर  छी। रे, यार अइ मे मुंशीगीरी कहां स' एलै? हम मुंशी छी?"
        "आर नहि त' की? तोरा विभागमे लिखा-पढ़ी के काज होइ छौ। पहिने अइ काज कर' बला के मुंशिए ने कहै! तों आब बेसी पढ़ि-लिखि क' गेल छें, त' मानि लेबौ जे रिफाइंड छें। मुदा छें त'..."
      कि बिच्चेमे टोकि देलकै पवन, "तोरा एतबे बूझ' अएतौ। असल मे, पी टी करैत काल तोरा सभ के जत्तेक ने पयर पटक' पड़ै छौ जे दिमागे पर जड़ब पड़ै छौ आ दिमाग भोथ भ' जाइ छौ। बुझल छौ ने, तड़बा के चोटक असरि सोझे दिमाग पर पड़ै छै।"
       एहने-एहने गप करैत दुनू मित्र अपन-अपन वर्तमान बयस बिसरि चुकल छल। पवनक पत्नी चाह आनि क' देलखिन तं वर्तमानक गप शुरू भेलै।
       "कनिया कत' छथुन?"
       "गया मे। छोटकी बचिया लग। तोहर बला भाग नहि ने छै यार। प्राय: चालीस साल नोकरी मे बिता देलही, कनिया संगे रहलखुन।"
       "तं तोरा के मना केने रहौ जे नहि राखहुन।"
      "रहलनि तं ओहो। मुदा, आब बाल-बच्चाक सेवामे लागल रहै छथि।"
      "बूढ़ाक सोह नहि?"
     "फेर बूढ़ बाजल।" सुबोध हरकल, "रे, बेटी नहि ने छौ। तों की जान' गेलही? छोटकी के नोकरी भेलैए।‌ओकर बच्चा छोट छै। मेहमानक पोस्टिंग दोसरे ठाम छनि। की करतीह बेचारी?"
      "ओ, से त' जरूरिए छौ। फेर एत' गाममे?"
      "प्रमोदक परिवार छै ने। भावहु छथि। भतीजा अछि, पुतौहु छथि, पोता-पोती अछि। चलै छै। ओना हमहूं बाहरे-बाहर रहै छी। बहुत दिन पर गाम एलहुंए।"
     "गाम मे मोन लगै छौ?"
    "अहंs। गाम मे लोक नहि छै। गपो कर' लेल नहि भेटैए। एत्तहु सभ अपने मे व्यस्त। हमरा त' टोल पर स' बेसी नीक बाध मे लगैए। गाछ-बिरिछ आ हरियरी मोहैए। तें मार्निंग वाक मे ओम्हरे जाइ छी आ बड़ीकाल धरि बुलैत रहै छी। ओम्हरे हिया जुड़ाइए।"
      "से, पछिला बेर हम आयल रही तं नहि छलें।"
      सुबोधकें पछिला बेर पवन फोन कयने रहै, से मोन पड़लै। बाजल, "तखन जेठकी बेटी लग रही। छोटकीक छुट्टी रहै। ओ मेहमान लग गेल आ हम दुनू प्राणी जेठकी लग चलि गेलहुं।"
      "एखनि रहबें ने गाम मे?"
      "देखही, जाबत धरि ई सर्वे राखय। बड़ लोचा छै यार।" सुबोघ बाजल।
      "हमहूं त' अही‌ मे फंसल छी। जाबत नोकरी रहय, अइ सब बारे मे नहि सोचलिऐ आ आब...।"
      "एहन ने झमेला छै, जे खून-खुनामय भ' जेतै। देखही, हमरा सभ के बहुत जमी‌न रहै‌‌‌ । चारि गाम मे मौजा सेहो रहै। सभ बिकाइत गेलै। हमर पितियौत बहिन सभक बियाह समिलाते बला जमीन बेचि-बेचि भेलै। हम दुनू भाइ पढ़ते रहियै। जखन बाबू आ कक्का भिन्न भेलखिन त' पंच सभ  बाबू द' कक्का के कहलकै जे एकर बच्चा सभ लेल समिलातक जमीन नहि बिकलै, तें एकरा एक बिगहा छोटांश दहक। छोट भाइ छह। तों राम आ ई लछुमन। कक्का मानि गेलखिन। पहिने बेसी मुहजमानिए होइ। भ' गेलै। आइ पचास बरस स' हमरा दुनू भाइ के कब्जा छै। आ आब खतिहानक अनुसारे ऊ फरीक ओहिमे हिस्सा लेल आफन तोड़ने छै। षडयंत्र रचने छलै।"
       पवन चुपचाप सुनैत छल। ओकरो पितियौत कहने छै जे ओकरा सभक पनरह धूरक एकटा खाता मे पड़ोसियाक दुमहला छै। एकर की हेतै? ककरो बुझल नहि जे एहि बीचमे पुरखा सभ कत' बदलेन कयलनि आ ककरा ओहिना देलनि-लेलनि। ओ सभ भैयारी निमाहलनि आ संतान सभकें एहि सर्वेक डाटा पाण्डव-कौरव बनाब' पर बिर्त्त छै। ओ सुबोधकें पुछलक, "त' सलटलौ?"
        "अहं। बात मुदा दबल छै। हमहूं दुनू भाइ‌ दाखिल-खारिज कराब' मे लागल‌ छी। हमरा प्रमोद फोन कयलक। दुनू प्राणी धनबाद मे रही। जेठका लग। भागल-भागल एलौं। दुनू पितियौत के कहलियै- हम दरोगा के पद स' रिटायर केने छी। छक्का-पंजा मे एसपियो दरोगा सन नहि होइ छै। बड़का दिमाग आ पोस्ट बला भले भ' जाउ। तोरा बता दै छियह जे लाइसेंसी रिवाल्वर रखने छी। किएक? जान-माल के सुरक्षा लेल ने। अइ एक बिघबा पर फेर नजरि उठेबहक त' परमोदो के परिबार के बाहर पठा देबै, बेटा सभ बाहरे रहै छै, कनियो बाहरे आ ठोकि देब' दुन्नू के। लैत रहियह। हमरे पर ने केश हेतै। बरू रहब जहले मे। लेकिन बाप-पित्ती के देल तोरा दुनू के भोग' नहि देब'।"
         सुबोधक दोसरे रूप देखलक पवन। बाजल, "एक्के बेर एना नहि बजबाक चाही।"
         "नहि बजितियै त' कने-मने उमकैत। आब दुनू भाइ के हगनी-पदनी बन्द छै। बेटा सभ नोकरिहारा छै। पढ़ल-लिखल छै। समझा क' थाकि गेलै जे बाबाक देल पर हक नहि जमाबहक,‌ मुदा एकरा-दुनू भाइ के उमकी उठल रहै।  लगलै नितीश जी दिआइए देलखिन।"
        पवन विषय बदलब उचित बुझलक, "छोटका बेटा कत' छौ?"
       "आब बंगलौर आबि गेल। तोरे बैंक मे पी ओ भेल छल ने। दू साल के बाद छोड़ि देलक। दोसर कम्पनी ज्वाइन केलक-ए। ओत' डेढ़ करोड़ मे घर कीनलक अछि। घरवास मे गेल रही। एत' स' हम सभ आ प्रमोदक परिवार के हवाई जहाज के टिकट काटि क' पठा देलक। दुनू भाइ कहलियै जे निच्चा स' बढ़ल छी, हवाइ जहाज सूट नहि करैए। हम सभ ट्रेने स' आबि जेबौ। मुदा, नहि मानलक। दुनू बहिनो-बहिनोइ के हवाइए जहाज के टिकट कटा क' पठा देने छलै।"
       "वाह! नीक लगैए सुनैत। धियापुता प्रगति करैए, से सुनि करेज सूप सन भ' जाइए।"
       पवन के होइक जे सुबोध अपने सभ कहने जाइ छै, ओकर धिया-पुता द' नहि पूछि रहल छै। मुदा, तखने मोन पड़लै जे सुबोध त' पंजीकार अछि। कत्तहु रहय, गामक प्राय: सभक परिवारक हिसाब-किताब रखने रहैत अछि। आ, मोनो रहैत छै ओकरा।
       पवन ओकर जेठका बेटाक समाचार पुछलक त' सुबोध बाजल, "धनबाद मे अछि। नीक नोकरी छै, पाइ छै। कहलिऐ- कतहु घर कीन ले। मुदा, कहलक - ककरा लेल? गामक घरक उपरका तल पर अपटूडेट गार्डेन बनबा दै छी, स्वीमिंग पुल बनबा दै छी। शहर सन सभ सुविधा उपलब्ध करबा दै छी। अहां आ कका भोग करू।"
       "वाह। मुदा, ओकर परिवार?"
      " कने टा खिस्सा छै यार।"
     "की?"
     "बेगूसराय मे जखन पढ़ै त' ओत्तहि एकटा लड़की के तैयारी करा बैंक पी ओ बना देलकै। बाद मे पता चलल जे दुनू बियाह कर' चाहैए‌।"
      "त' क' किए ने देलही।"
     "लड़कीक पिता हमरा ओहिठाम आयल रहथि। तहिया मोतिहारी मे रही। जलखैक बाद गप चललै त' कहलियनि जे अहां भूमिहार छी आ हम रैजपूत। की अहां ई बियाह कर' चाहब। लड़िकीक पिता के ई बात नहि बुझल रहनि। ओ चुप भ' गेलाह। हम कहलियनि- दुनू गोटाक पहिले संतान अछि। अहां के तीनटा बेटी आर अछि, हमरो एकरा स' छोट तीनटा संतान अछि। भविष्यमे दिक्कत त' नहि हैत? ओ अपन प्रस्ताव घुरा लेलनि।"
        बिच्चहिमे पवन बाजल, "ठीके, तोहर बुद्धि ठेहुन मे घुसकि गेल रहौ। हुनको। ई जाति कोनो मुद्दा भेलै रे।"
       "चुप ने यार। हम त' ई नहि कहलिऐ जे हम कथा नहि करब। जे, से... दुनूक अपन-अपन जाति मे बियाह भ' गेलै। आ आब...!
       "आब की?"
       "दुनू तलाकक केस फाइल कयने अछि।"
      "तोहर बेटा ओहि लड़कीक सम्पर्क मे छौ?"
      "से नहि जानि। बेटा सं पुछै छियै त' कहैए नहि। यार सब किछु छौ, एकटा यैह..."
     "ओकरा दुनू के संतानो...
    "नहि, बेसी दिन संग नहि रहि सकलै।"
    पवन देखलक जे सुबोधक मुहेंठ उदास भ' गेल छलैक।
     सुबोध बाजल, "की करियै? जेठका के सपोर्ट क' रहल छियै। बेटा अछि ने। जल्दी निर्णय भ' जैतै त'..."
     "आब सपोर्टे क' क' की करबही? तोहर सपोर्टक खगते कहां हेतै ओकरा। जहिया रहै, तहिया करबे ने केलही आ चारि टा जिनगी नर्क क' देलही।"
      सुबोध चुप छल। ओकर आंखि गील होम' लागल रहै, से पवन अखियासलक। ओह! एत्ते दिन पर मित्र सं भेंट आ...। पुछलक, "यार! गीत गयला कत्ते दिन भेलौए‌?"
      "मोन नहि अछि। काल्हि प्रमोदक पांच बरखक पोती मोबाइल पर हमरे वीडियो देखबैत कहने छल, " बाबा! एकबेर ई गीत गबहक ने!"
                      #####
फोटो : गूगल सं साभार।

Sunday, September 8, 2024

चन्नन कराय लियौक जजमान (मैथिली कथा) - प्रदीप बिहारी Maithili short story by Pradip Bihari

कथा 

चन्नन कराय लियौक जजमान

.   (फोटो : गूगल सं साभार)

प्रदीप बिहारी

गंगामे पहिल डूब देलाक बाद मूड़ी हिलौलक। मने कान मे पानि ने पैसि गेल‌क होइक। मूड़ी हिला क' हटयबाक प्रयास कयलक। माथक नमहर-नमहर केश सेहो दुनू दिस फहरयलै, मुदा ओना नहि जेना शैम्पू लगयलाक बाद फहराइत छैक। जतबे फहरयलैक, संतोष भेलैक विवेककें।
        तखने एकटा स्वर सुनाइ पड़लैक, "कम-स'-कम तीन डूब दियौक जजमान।"
        विवेककें अचरज भेलैक।  पानिए सं एकबेर उपरका घाटक चबूतरा दिस तकलक। गणेश पण्डा रहथि। पहिने ओ हुनके यजमान छल। बेटा सभ भिन्न भेलनि तं विवेकक गाम गणेश झाक जेठजनक हिस्सामे पड़ि गेल। मुदा, विवेक आ गणेशक सम्बन्ध वैह, पहिलुके रहि गेलैक। 
         पानिए सं विवेक दुनू क'ल जोड़ि अभिवादन कयलक आ दोसर डूब देलक। गणेश बाबू अभय मुद्रामे हाथ उठौलनि, से देखि नहि सकल विवेक। ओ तेसर डूब देलक आ गमछी जे डांड़मे बन्हायल छलैक आ नीचां सटि गेल छलैक, कें अलगबैत पानि सं बहरायल।
         सिमरिया घाटक पक्की आ सौन्दर्यीकरणक काज चलि रहल छलैक। प्राय: सभ घाटक मुहेंठक ढलाइ भ' गेल छलैक। नीचां खंघरबा लेल सिरहीक पौदान सेहो बनि गेल छलैक। पौदान पर ऊबर-खाबर बला टाइल्स बैसाओल छलैक, जाहिसं स्नान कयनिहारक पयर ससरैक नहि। मुदा, चारि पौदान निचां गेलाक बाद पयर दाबि क' बढ़ाब' पड़ैक, कारण ओहि पौदान सभ पर पांक छलैक। से, प्राय: एहि दुआरें जे गंगा मे बाढ़ि आयल छलैक।
       विवेक पत्नीकें ई जनतब दैत कहलक जे आब ओ स्नान कर' जाथि। ओना घाट पर भीड़ साफे ने छलैक। पहिने जेना लोक पर लोक बुझाइक, तेहन सन किछु ने। से, प्राय: एहू दुआरें जे ओ कोनो विशेष दिन नहि, अनदिना गेल रहय। दोसर, ई जे कने अबेर क' गेल रहय। गंगनहौन सभ अहलभोरे जुटैत अछि। ताहि समय अनदिनो भीड़ रहैत छैक।
       विवेक देह पोछैत कपड़ा बदल' लागल आ पत्नी पौदान दिस खंघरह लगलीह। ओकरा मुहसं बहरयलै- सम्हरि क'। ओ देखलक पत्नी सेहो थाहि-थाहि क' पौदान पर पयर राखि रहल छलीह।
       धारमे एकटा विवाहिता युवती चुभकैत छलि। कनिये कालमे हेल' लागलि। विवेक देखलक, से एहि दुआरें देखलक जे ओकरा पत्नीक चिन्ता छलैक। हुनका हेल' नहि अबैत छनि। पौदान थाहैत बेसी पानिमे ने चलि जाथि। ओ देखलक जे ओहि विवाहिताक जल-क्रीड़ासं ओकर पत्नीक स्नान वाधित होइत छलैक। मोन भेलैक जे पत्नीकें ओकरासं कने दूर भ' क' नहयबा लेल कहय। मुदा से कहलक नहि। लगलै जे ओहि विवाहिताक स्नानक प्राकृतिक प्रवाह वाधित ने भ' जाइक। ओ अपन नजरि धार दिस सं हटा लेलक।
        तखने एकटा स्वर सुनलक, "अइयौक ने! साथे लहयबै।"
        स्वर ओही युवतीक रहैक। ओ विवेकक कातेमे बैसल अपन पतिके धारमे ठाढ़ भ' बजौने छलि। ओकर पति कात-करोट दिस देखलक। तखने एकटा महिला ओकरा कहलकै, "जाहो नुनू! अपना आर के हियां कहब करै छै जे ब'र-कनिया ज'रे गंगा लहाइ छै त' सात जलम ज'रे रहै छै। जाहो।"
        कहनिहारि अबस्से युवकक माय छलीह, से विवेक बुझलक। युवक धार दिस बढ़ल। विवाहिताक मुस्की जेना गंगाक पेटीसं नमहर भ' गेल रहैक।
        विवेककें मोन पड़लै। एकबेर ओहो दुनू प्राणी संगहि गंगामे डूब देने रहय। ताहि समय कतहु पक्की घाट नहि छलैक। माटिए-माटि। धसने-धसना। धार मे पयर देलाक बाद एखनिसं बेसी सतर्क रह' पड़ैक। कखन डांड़ भरि, कखन छाती भरि आ कखन अथाह पानि, तकर कोनो थाहे नहि रहै। कतहु-कतहु मात्र ठेहुने भरि पानि सेहो। दियाबातीक प्रात रहैक। विवेक अपन स्कूटर घाटक ऊपरेमे लगौलक। गमछि लपेटि पैंट खोललक आ स्कूटरक कुंजी राखलक। पैंटकें झोराक त'रमे राखलक। तकर बाद पत्नीक नूआ सभ छलनि। ओ पत्नीकें पहिने नहयबालेल कहलक। ओ नहयबालेल तैयार भेलीह, मुदा जयबाकाल यैह संगे नहाइबला बात मोन पड़लनि। विवेककें कहलनि। ओकरो मोन भेलैक। मुदा, समान के ओगरतै? तखने कातमे बैसलि एकटा बूढ़ी कहलकै जे ओ कपड़ा देखैत रहतै। विवेक अपन सर्ट आ गंजी खोलि झोरा पर राखि पत्नीक हाथ पकड़ि धारमे पैसल। बेसी भीड़ नहि छलै। पातर छल लोकक उपस्थिति। 
        दुनू प्राणी जखन नहा क' बहराएल तं ले बलैया! ने बूढ़ी, ने विवेकक सर्ट। टाका सर्टक उपरका जेबीमे छलै। दुनू चारूकात तकलक, मुदा बूढ़ी नदारद। ओ पैंट बहार कयलक आ भीजल कपड़ा बदल' कने दूर सहटि गेल। मुदा, पत्नी चिचियलखिन जे कपड़ा चोरि भ' गेलनि। लोक सभ जुटि गेल। दू-तीनटा युवक विवेककें घेरि लेलकै। ओ सभ ओहि झोरासं ओकरा पैंट बहार करैत देखने छल। उन्टे विवेक फंसि रहल छल कि पत्नी बचौलखिन। छातीमे मुक्का मारैत बिदा भेल। रच्छ जे पैंटक जेबीमे स्कूटरक कुंजी छलैक, टाका-पाइ धरि एको टा नहि। पड़ायल सिमरियासं। तकर बाद पत्नीकें कहलक, "एक्के जनम नीक जकां संग रही हम सभ, सैह बहुत। सात जन्मक लोभ नहि करी।"
         ई घटना विवेककें गंगा-स्नान करबा काल मोन पड़ि जाइत छैक।
    ‌‌‌‌     पत्नी टोकलखिन तं तंद्रा भंग भेलै। ओ अपन बड़का तौलिया दैत बाजल रहथि, "कने अ'ढ़ करू ने। पुरुख सभक नजरि दोसर दिस जाइते ने छै। कोनो बयसक महिला होउक, आंखिक डिम्हा ठमकि जाइ छै। देखियौ ने डेंगी पर बैसल तीनू छौंड़ा के। अपनो बौआ स' कम उमेरक छै, आ नजरि..."
         विवेक देखलक। ई समस्या तं महिला सभक संग सिमरियामे सभ दिनसं रहलैए। ओ देखलक, ओहि विवाहिता कें। ओ चुक्कीमाली बैसि क' बड़ मोश्किल सं अपन वस्त्र बदलि रहलि छलि। सासु मदति क' रहल छलै। एकटा आर युवती सेहो तहिना लाजे कठौत भेल एहि काजकें सम्पन्न क' रहल छलीह। हुनका चेहरा पर स्त्री होयबाक अपराध छलनि, मने। विवेक पत्नीकें कहलक, "अहां कोनो पहिल बेर गंगा-स्नान क' रहल छी? एहिबेर एकदिस घाटक ऊंचाइ अ'ढ़ कयने अछि ने।"
       ओ अपन दुनू हाथसं तौलियाकें तानि पत्नीकें कपड़ा बदलबा लेल अ'ढ़ कयने छल। ओकरा कोम्हरो ताकल नहि होइ।
      पत्नी कपड़ा पखारि ऊपर आयलो ने छलि कि पितरिया फुलडाली लेने एकटा युवक सोझांमे ठाढ़ भ' गेलनि, "तिल-चाउर लियौक जजमानी। फूलो छिकै। लहैला के बाद तिल-अच्छत-फूल आ दरब चढै छिकनि गंगा माइ के।"
        विवेक ओकरा भगौलक, "हम्मे बराबर आयब करै छिकिऐ। ओने जाहो।"
        पानि मे डूब द' क' पाइ बिछैत छौंड़ा सभसं एकटा बाजल, "हे रै! लोकल छिकथिन ई आर। दरभंगिया आर के देखहिन ने। हे, ओइ घाट दिसन।"
        दुनू प्राणी चबूतरा पर आयल, तं एकटा दोसर पहुंचलै। ओकर पितरिया फुलडालीमे चानन-सिन्नुर छलैक आ हाथ मे पितरिया मोहर, जकरा कपार पर साटि देने लिखा जाइक- जय गंगे। विवेक किछु गोटेक कपार पर देखने रहय। ओ एकरा दुनूकें चानन करयबा लेल आ कपार पर मोहर ठोकयबा लेल जिद कर' लगलै, "दू जन के मात्र बीसे रूपा दछिना। कराए लियौक ने! जजमान छिकियै, हमरो आर के हक बनब करै छै।"
        अठारह-उनैस बर्खक ओहि युवककें कहलक, "युवक छहो। कतना पढ़लहो? पढ़हो आ दोसर काम देखहो।"
        "ई काम खराब लगै हय जजमान। हम्में नै करबै, कोई-न-कोई त' करबे करतै। काम कोनो छोट नै होब करै छै।"
        "ठीके छै। छोड़ह। "
        आ कि तखने गणेश बाबू टोकलखिन, "चन्नन कराय लियौक विवेक बाबू! अपने पोता छै। छोटका के बेटा। आब त' सब करबै छै। एक त' चन्नन स' मथा ठण्ढा रहब करै छै, दोसर परमाणो ने जे गांग लहाय ले अयलियैहन।"
          "ठीक छै पण्डा जी! करा लेबै। मुदा कने काल बाद।" विवेक दस टाका बहार क' ओहि छौंड़ाक हाथमे दैत बाजल। 
         गणेश बाबू पोता कें कहलनि, "अखन जो। थोड़े काल बाद अपने हियां अइहें। उहें रहथिन।" पुन: विवेककें कहलनि, "एकर चन्नन मे एगो खूबी छिकै।"
         "की?"
         "गंगोट मिलाएल रहै छै। चन्नन के साथ गंगा माइ के चरण-धूली। असीरबाद बनल रहै छै गांग माइ के।" गणेश बाबू बजलाह, "चलियौक ने घरे पर। चाइयो पीब लेबै। छोटकी कनियानि बढ़िया चाइ बनबै छिकथिन।"
       विवेककें कतहु फंसैत सन बुझयलैक। मुक्त होयबा लेल बाजल, "पण्डा जी! एम्हरे कोनो दोकान पर चाह पीबी ने। अनेरे अहांक जेठजन देखताह, तं फज्झति करताह अहांकें जे हमर जजमानकें अपना‌ हियां लए गेलहो।"
      "ऊ हियां नै छिकै। हियां विश्रामालय खोलए चाहै छै। ओकरे पैरवी ले' पटना गेल छै। गंगा घाट के काया-कल्प भए रहलैहन, त' सब चीज ने रहतै! गणेश बाबू बजलाह, "जजमानी त' छोटकी कनियानि के नै ने देखने छिकथिन। देख लेथिन आ चाइयो पी लेथिन।"
        विवेकक पत्नी सोचलनि। ओहि अठारह-उनैस बरखक युवकक मायकें मुह देखब...माने...? मुदा, तुरन्ते माने बूझि गेलीह।
        विवेक सोचलक। हुनका तं ओहो नहि देखने अछि। ओकरा चाह पिअ' सं पहिनहि क'रू लाग' लगलैक।
       तखने गणेश बाबूकें कोनो यजमान अभरलनि। ओ विवेकसं कने कात भेलाह। विवेकक पत्नी एकटा दोकानमे पैसि गेलीह।‌ सिन्नुरक गद्दी लेलनि, बिन्दी, मकुन्दानाक छोटका पैकेट, बद्धी आदि लेलनि। दाम पुछितहि जेना किछु गड़ि गेल होनि।  बजलीह, "बड़ महग कए देलहक। एखने स' लादि देलहक ।"
         "की करबै? समान बला गाड़ी समय पर आबिए ने पबै छै। कच्ची रोडक हाल देखलियै हन? जहां-तहां खद्धा आ तइ पर स' बरखा। लागब करै छै जे रोड पर कादो के दही पौड़ल छै। हियां तक माल पहुंचेबे ने करै छै। मोटर बला ठेला स' मंगाब' पड़ै छै- दोबर द' क'। उहो आर त' समाने पर बथेतै ने। दोसर बात..."
        " दोसर की बात?" विवेक पुछलक।
       "हियां साल भरि मे कतना ने कतना दा दोकान उठाब' पड़ै छै।"
       "माने?"
       "बाढ़ि बेसी एलै, त' ऊपर दिस।‌ अप्रील-मई-जून मे पानि सुखि जाइ छै त' निच्चा जाइ पड़ै छै।‌ अइ पर के खर्च आर हम अपना घ'र स' नहि ने देबै।"
       "आब तं सौंदर्यीकरण भ' रहल छह?"
      "जखनी होतै तखनी ने। अखन बहुत दिन बाकी छै। दिल्ली दूर जैसन। बाद मे दोकान बनतै आ हमरा आर के भेटतै। पक्का मकान बला दोकान।"
       "वाह।'
       "तखन की दाम कम कए देबहक?"
       "मैडम! अपना देश मे एक दा जे दाम बढ़ि जाइ छै से की घटै छै?"
      ओ दुनू दोकानसं बहराइते रहथि कि गणेश बाबू जुमि गेलाह, "चलियौक।
       "छोड़ि नहि देबै पण्डा जी! एखनि अहांक जजमान आब' के समय अछि।‌"
        "तइ ले' चिन्ता छोड़ि दियौक अपने। बेंति देलियैए छौंड़ा आर के।"
       "एम्हरे कोनो दोकान पर चाह पीबि ली तं की हर्ज? हमरा सभकें हड़बड़ी अछि।"
       "अपनेहो हद्द करब करै छिकिऐ। हमे दुलहिन के मोबाइल कए देलियै हन। ऊ त' अदरख थूरब शुरुओ कए देने होथिन।"
‌‌‌       पण्डा जीक संग दुनू प्राणीकें जाय पड़लैक।
      सिमरियाक नव रूप पर प्रसन्न छलाह गणेश बाबू। सुनबैत जा रहल छलाह, "से बुझलिऐ ने विवेक बाबू। अइ घाट पर जत्ती ने दिक्कत रहै, से आब दूर भए जैतै। सब कथू के व्यवस्था के परावधान भए रहलै हन।"
       "केहन व्यवस्था?"
       "सब कथू। एन एच स' नीचा उतरए काल जे मिथला द्वार छिकै ने, ओत्तै स' पक्की सड़क। ओहि ज' पार्किंग होतै। केहनो बड़का लोक रहता, गड़ी ओइजे लगाबए पड़तनि।"
         "से त' एखनो पार्किंग ओत्तहि छै।"
         "नै, नै। ऊ पार्किंग नै छै। ओइ ज' पार्किंग के रूपा लए लै छै।"
         "माने सिमरिया घाट जाइ के टौल टैक्स? मुदा , बड़ लै छै- दू सौ टाका एक चरिचक्का के।"
        गणेश बाबू पार्किंगक पक्षमे बजलाह, "बेसी नै लै छै। पहिने अढ़ाइ सय रहै। लोक आर हल्ला केलकै त' दू सय केलकै हन। एगो बात सोचियौक जजमान! मुर्दा जराब' जे गड़ी जाएब करै छै, से केतना समय लै छै। अच्छा, छोड़यौक। अपने आर जे अपन चरिचकवा स' अएलियैहन तकर टाइम लिमिट नै ने हय। घाट तक आइ गेलियै। केतना सुविधा होल। आब सुविधे के मोल छै ने। अइ तरहे सोचबै त' दू सय रूपा महरग नै बुझायत।"
         विवेकक पत्नी चुपचाप चलि रहल छलीह। टोकलनि, "पण्डा जी, तखन एहि छोटका दोकानदार सभ के त' तरद्दुत भ' जेतै?"
         "नै जजमानी! सब के दोकान अनुसार जग्गह मिलतै। मुदा, एकटा बात करए पड़तै।"
         "की?" विवेक पुछलक।
        "एसटेंडर मेनटेन करए पड़तै। ओतना सुन्दर सड़क बनतै, फुटपाथ पर टाइल्स लगतै, दूरे स' गांग माइ चमकथिन, त' लोको के मेनटेन करए पड़तै ने।"
        विवेक बाजल, "एक टा बात हमर सभ दिन अखरल। बच्चे स' अबै छी‌। स्नानक बाद महिला सभ के कपड़ा बदल' मे जे असुविधा होइ छै, से हमरा कहियो नीक नहि लागल।"
         "से बात त' छिकै। महिले नै, पुरुखो के असुविधा होब करै छै। महिला होइ वा पुरुख, लाज त' लाजे छिकै ने। मानबै त' सब के लाज एक्के रंग। पहिने लोक गाउंओ आर मे पोखरी वा इनार पर नहाइ। चापाक'ल त' बहुत बाद मे अइलै ने। त' हैबिट रहै लोक के। बाथरूम बला त' बड़का लोक होइ ने यजमान! आब त' घरे-घर बाथरूम होइ गेलै। तें एना होब करै छै। ओना अपने के नजरि गंभीर बात पर गेल हन। एकरो बेबस्था होतै।"
         "केहन?" विवेकक पत्नी पुछलनि।
         "अपने आर अजोधिया जी गेलियैहन हाल‌ मे? ओतए सरयू घाट पर‌ महिला आर लेल कपड़ा बदलए बला रूम बनल छै।"
         विवेककें मोन पड़लैक। हालेमे अयोध्या गेल छल। संझुका आरतीक समय सरयू घाट पर महिला सभकें  कपड़ा बदलबा लेल कतोक प्रकोष्ठ बनल देखने रहय। आ, से नीक लागल रहै।
         मुदा, ओहिसं सम्बन्धित एक टा घटना सेहो मोन पड़लै। आरतीक समयमे भीड़ बड़ भ' जाइत छै। आरतीक बाद दुनू प्राणी जाहि ठेला बला लग अपन जुत्ता खोलि क' रखने छल, आयल। एकटा पांच सालक बच्चा चिचिया रहल छल। ओ म'मी-म'मी क' रहल छल। ओकर बाप कोम्हरो स' अयलै, तं पुछलकै, "कहां गया है म'मी?"
         छौंड़ा कपड़ा बदल' बला प्रकोष्ठ दिस संकेत करैत बाजल, "उसी मे गयी है। बोली सू-सू करके आते हैं। बड़ी देर हो गया, नहीं आयी है।"
        बाप डांटलक बेटा के, "तो हदियाता काहे है। गया है, तो आ जाएगा। म'मी जहां परोछ हुआ कि चिचियाना शुरू कर दिया। चोप्प।"
       आ कि तखने ओहि प्रकोष्ठक गेट खुजलै आ छौंड़ाक माय बुल द' बहरायलि। ओहि महिलाक संग थोड़ेक गन्ह सेहो बसातमे मिज्झर भ' गेलै।

गणेश पण्डा बजैत छलाह, "देखियौ जजमान! पहिने एक टा भोजनालय आ मिष्टान्न भण्डार रहै - विद्यापति भोजनालय व मिष्टान्न भण्डार। जेना-जेना परिवार बढ़लै आ भिन्न होइ गेलै विद्यापति के चारि टुकड़ा कए देलकनि- विद्यापति, न्यू विद्यापति, प्राचीन विद्यापति, अरबाचीन विद्यापति। तहिना मिथला भोजनालय। एकरो किछ टुकड़ा होइ गेल हन, किछ आर होतै। मुदा एक टा बात अखरय बला छिकै।"
        "की?"
       "होटल के नाम विद्यापति, मिथला राखत आ नीचा‌ मे लिखत- आपका स्वागत करता है। सोचियौ, ई आर की मान राखब करै छै विद्यापति आ मिथला के? एक दा हमे बोललियै त' हमरा लुलुआ लेलकै। बोलल जे बबा तोएं अपन काज देखहो। तोरो जजमान आर त' चारि जगह बंटि गेल'। अपन लक्खे ने दै छनि आ दोसरा के परबच्चन देब करै छहो। हम चुप भए गेलौं यजमान।"
       दुनू प्राणी चुपचाप सुनि रहल छल। बुझाइक जे कोनो फांसमे अछि। 
      
गणेश बाबूक घर पर प्लास्टिकक कुर्सी पर बैसल छल दुन प्राणी। गणेश बाबू पुतौहुकें हाक देलनि। हुनक छोटकी पुतौहु अयलीह। गणेश बाबू परिचय करौलनि। विवेकक पत्नी इथउथ मे छलि जे पण्डा जीक पुतौहुक पयर छुबथि कि नहि। मोन नहि मानि रहल छलनि। तखने मोनमे एक टा आर विचार अएलनि। एहि अठारह-उनैस बरखक युवकक माय कें‌ मुहदेखना कते देल जाय? ओ मुक्त होब' चाहैत छलीह। दुनू हाथ जोड़ि अभिवादन कएलनि आ पांच सय टाकाक एक नोट बहार क' मुहदेखना देलनि। विवेकसं पुछलनि जे एक टाका सिक्का छै कि नहि।‌ मुदा, बिच्चहिमे गणेश बाबू बजलाह, "कोनो बात नै जजमानी! आब एक के सिक्का भेटै छै? लोक‌ मानि लै छै।"
        पण्डा जीक पुतौहु एत्तेक काल धरि माथ पर आंचर रखने ठाढ़ि रहलीह। मुहदेखना ल' हाथ झांपलनि। पण्डा जीक मुहसं बहरयलनि,‌"गंगा माइ भरल-पुरल राखथि।"

चाहक संग गपसपमे गणेश बाबू अपडेट कयलखिन, "कहबे केलौं जे जेठका माने अहां के पण्डा विश्रामालय आ होटल-रेस्टुरेन्ट के लाइसेन्स लेल पटना गेल हन। मझिला के बेटा बड़ चंसगर छै। कहब करै छै जे जहिया घाट आर के कायाकल्प होइ जेतै तखन अपन काज के बारे मे बोलत‌। ओकरा परशासन आर स' नीक सम्बन्ध छै‌। संझिलाक बेटा बौडी बिल्डिंग करब करै छै। कहब करै छै जे कब्जा आ पखुरा मे दम नै रहतै त' गांग माइ के आरती के करतै। ऊ गंगा आरती मे सेलेक्सन के तैयारी करब करै छै। बहुतो नवयुवक आर गंगा आरती के तैयारी कए रहलै हन। अखन त' घाटक कायाकल्प के काज चलिए रहलै हन। मुदा,‌ सिमरिया घाट के सब लोक सपना देख रहलै हन आ तरेतर तैयारियो कए रहलै हन।"
        "आ अहांक छोट पुत्र?"
        "ऊ काशी-बनारस गेल हन। बोलल जे ओइ ज' स' घुरि क' अइबै, त' अपन पत्ता खोलबै।"
  ‌‌      विवेक दुनू प्राणीकें मोन पड़लै। अयोध्याक यात्राक्रममे बनारस सेहो गेल छल। विश्वनाथ कौरीडोर बनलाक बाद पहिल बेर गेल छल। मंदिरक चारू दुआरिसं दर्शनार्थी सभक लाइन चौक धरि देखि करेज कांपि गेल रहैक। बाट पर लोके-लोक आ ताहि भीड़मे दोकनदारी करैत तथाकथित पण्डा वा पण्डा-एजेन्ट। पहिने जेना सिनेमा हौल मे ब्लैकसं टिकट बेचनिहार फुसफुसाक' बजैत टिकट बेचैत छल, तेहने एजेन्ट सभ डायरेक्ट माने बिना लाइनक दर्शन करयबाक औफर दैत‌। से, सभठाम। मुदा सिनेमाक टिकट ब्लैक मे उपलब्ध कराब' बला सन फुसफुसाइत नहि छल। स्पष्ट कहैत छल। छओ सय टाका प्रति व्यक्ति। डायरेक्ट दर्शन। एहिमे मोल-मोलाइक संभावना सेहो। विवेक एक टा पण्डासं पुछलक, "एत्तेक भीड़मे कोना ल' जेबै?"
         उतारा भेटलै, "एत' स' हम ल' जैब भी आइ पी गेट तक। ओत' स' पुलिस ल' जायत। एत्ते की हम अपने लेल मंगै छी?"
        "मुदा, सुगम दर्शन के सेहो प्रावधान छै ने?"
        "छै। तीन सय मे छै। मुदा सुगमो बला लाइन देखबै त' ब्लड प्रेसर बढ़ि जायत। हम अति सुगम मार्ग बतेलौं। बाकी मर्जी अहांक।"
        "आ ई सामान्य लोक सभकें कते कालमे दर्शन भ' जाइ छै?"
        "से सामान्य लोक जानय। अपन-अपन भाग्य। लाइन मे लगि जाउ। बुझि जैब। हमरा की पुछै छी? औ बाबू! एते दिन मे अहीं एकटा दर्शनार्थी भेटलहुं जे सामान्य लोक‌ द' पुछलौं। नञि तं के पुछै छै? सभ देखै छै, चलि जाइ छै।" ओ एजेन्ट बाजल रहय।

पण्डा जीक टोकब सं विवेकक तंद्रा भंग भेलैक। पण्डा जी बजलाह, "चुप किए भ' गेलिऐ जजमान? चाइ नीक नै लागल?"
         विवेकक पत्नी पुछलखिन, "छोटका बेटा बनारस सं कहिया घुरताह?"
        "से नै जाइन यजमानी! बोललै जे पूरा ट्रेन्ड भैए क' अइब'।"
        विवेककें लगलै जे सांस फूल' लागल होइ। उठैत बाजल, "चलै छी पण्डा जी।"
        दुनू प्राणी पण्डा जीक घर सं बहरा क' बाट पर आबि गेल। ओकर पत्नीक मोन भेल रहनि जे पण्डो जीक हाथमे किछु थम्हा दैथि, मुदा से नहि कयलनि ओ।
                          #####

Monday, August 26, 2024

मकड़ी (मैथिली कथा - प्रदीप बिहारी) MAKADEE (Maithili Short Story by Pradip Bihari)

मकड़ी



प्रदीप बिहारी


सौंसे बजारमे हल्ला पसरि गेलैक जे एकटा मौगी अयलै-ए। सिलाइ मशीन चलबैत छैक। नव-पुरान कपड़ा सीबैत छैक। बड़ सुन्नरि छैक। एकसरिये छैक। ओकरा संगमे केओ नहि छैक आ ओ ककरो दिस तकितो ने छैक।
दारू आ चाहक दोकान वाली मौगी सभ अपन संसद शुरूह कऽ देने रहैक। भागि कऽ आयल होयतैक। घरबला छोड़ि देने होयतैक। चोरनी होयति। छिनारि होयति।
एकटा दोसर मौगी बजलैक, ‘‘जरूरी छै जे अधलाहे होयतै। नीक लोक नहि भऽ सकै छै। इहो तँ भऽ सकैत छै जे...’’
मुदा सत्तारूढ़ मौगी ई कहि ओकरा चुप कऽ देलकैक जे सतबरती रहितै, तँ दिल कुमारीक घरमे किराया नहि लैतै। दिल कुमारी अपने ने कतेक घाटक पानि पीने अछि। ओकर किरायादार की सैंतलि होयतै?
जे, से। समय बीतऽ लगलैक। सुनीता नवसँ पुरान होमऽ लागलि। दिल कुमारी ओकर व्यवसाय आ जीवनमे अनेरे कोनो हस्तक्षेप नहि करैक।
दिल कुमारीकें ओ ‘काकी’ कहऽ लागलि।
आब किछु स्त्रीगण सेहो ब्लाउज आ साया सियाबऽ या भंगठी कराबऽ आबऽ लगलैक। मुदा, बेसी काज जुअनके छौंडा सभक ओकरा लग आबऽ लगलैक।
ओ अनुभव कयलकि जे ओकरा अयलाक बाद जुआन सभक पेन्ट आ अंगा बेसी फाटऽ लगलैक अछि। सभ ओकरे लग कोनो-ने-कोनो बहन्ने आबि जाइक।
मौगी सभक संसदमे प्रस्ताव पारित भऽ गेलैक। जँ मीठ नहि छैक, तँ चुट्टी किएक सोहरैत छैक?
सुनीताकें अपन खर्चक योग्य आमदनी भऽ जाइक। आर बेसी ओकरा किएक चाही? ओकर के छैक? ने आगू, ने पाछू।
एकटा गहिंकी आयल छलैक। नगरपालिकाक मेहतर। ओ कहलकै सुनीताकें, ‘‘हमरा बेटीक बियाहमे किछु कपड़ा सिअयतै। सीबि देबहक बहिन? तोहर सिलाइ किछु देबह आ किछु उधारी रहि जेतह। अगिला मास देबह।’’
सुनीताकें लगलैक जे जीवनमे पहिल बेर केओ ओकरा बहिन कहलकै-ए। ओ द्रवित भऽ गेलि, ‘‘तोरा बेटीक बियाहमे जतेक कपड़ा सीअयतह, हम एक्कहुटाक पाइ नहि लेबह। जाह! जहिया मोन होअऽ दऽ जइयह।’’
जानि नहि, सुनीताकें ओहि राति की भऽ गेलैक? निन्ने ने होइत छलैक। ओहि गहिंकीक गप्प बेर-बेर मोन पड़ैत छलैक, ‘‘हम तँ जानि-बूझि कऽ फाटल-पुरान लऽ कऽ तोरा लग अबैत छी। तोहर रूप हमरा मोहने जाइत अछि। तों एकटा मरद किएक ने कऽ लेत छह। असगरे कतेक खटबह?’’
सुनीता डाँटि कऽ भगा देने छलि ओहि गाँहककें। ओकरा कपड़ा सेहो घुरा देने छलि।
मुदा, सुनीता बेर-बेर अयनामे अपन मुँह देखैत छलि। साँचे, ओ एखनहुँ सुन्नरि अछि। ओकर बयसे की भेलैक अछि। बड़का घरक बेटी रहैत तँ एखनि बियाहो नहि भेल रहितैक। बीस-एकैस कोनो बयस होइत छैक? ई बयस तँ पोखरिमे चुभकऽ बला होइत छैक...साओनक झूला झूलऽ बला होइत छैक...कोनो राजकुमारक सपना देखऽ बला होइत छैक।मुदा, पुरुषक प्रतापें सुनीताकें एही बयसमे गृहस्थी सम्हारऽ पड़ि रहल छैक।
ओकरा बियहुआ मोन पड़लैक। पहिल बियाह, बियाह सन भेल रहैक। वर अयलैक, बरियात अयलैक। गाजा-बाजा बजलैक। खूब धूम-धामसँ ओकर वियाह कयने रहैक ओकर बाप। माय तँ ओकरा अबोधेमे छोड़ि अनका संग चलि गेल रहैक। तें सभ निमेरा ओकर बाप कयलकै।
ओहि समय सुनीताक बयसे कतेक रहैक? पनरह मे छलि। ई कोनो बियाहक बयस होइत छैक? मुदा, ओकरा बापकें अल्प बयसहिंमे विकसित ओकर देह अबूह लागऽ लगलैक। दोसर आशंका एहि बातक रहैक जे माये जकाँ इहो ने ककरो संग माया-पिरती जोड़ि लिअय आ...। तेसर स्वार्थ प्रायः ई रहैक जे बेटीकें बिदा कऽ देने दारू पीब लेल छुट्टा भऽ जायत। केओ रोकनिहार नहि रहतैक।
आ तें सुनीताकें गरदामी पहिरा देलकैक ओकर बाप।
मुदा, छओ मास नहि बोतलैक कि अनर्थ भऽ गेलैक। सुनीताक सीउथ उज्जर भऽ गेलैक। चूड़ी फुटि गेलैक आ पोते टुटि गेलैक। लोक सभ सरापऽ लगलैक। सालो ने बीतलैक कि बियहुआकें खा गेलि।
सुनीताक चारूकातक संसार सुन्न भऽ गेलैक। कतहु किछु नहि। चारूकात अन्हारे अन्हार। कतहु कानो प्रकाश-पुंज नहि देखाइत छलैक ओकरा।
बियहुआक विरासतमे भेटल रहैक एकटा देशी गाय, जकर सेवा-सुश्रुषा करय। दूध बेचय आ दिन काटय।
मुदा, बयसकें बेसी दिन धरि गाड़ि कऽ तँ नहि राखल जा सकैछ।
किछु गोटें लोभायल रहैक सुनीता पर आ किछु धपायल। मुदा, समय सुनीताकें साकांक्ष बना देने रहैक। ओ भावावेशमे ककरो जालमे फंसऽ बाली नहि छलि।
किछु छौंड़ा सभ तँ हाथ धो कऽ ओकरा पाछाँ पड़ल छल। ओकरा घर पर अयबाक हिम्मति तँ नहि करैक, मुदा साँझ खन कऽ जखन घास आनऽ बाध दिस जाय, तँ छौंड़ा सभ किछु-ने-किछु टोनैत रहैक ओकरा।
जखने काली खोला पार कऽ चाहक दोकान दिस मुड़य कि हेम बहादुर टहंकारसँ गीत उठाबैक, ‘‘मानै ने छौड़ी हमर बतिया...फेरै ने एको बेर अंखिया.....हो ऽऽऽ हो ऽऽऽ।’ आ सुनीताक संगी सभ ओकरा खौंझाबऽ लगैक। एक बेर फेरही नजरि हेमे दिस। छौंड़ा जुआन छै। सुन्नर छै। तरहत्थी पर रखतौ। आर-आर बहुत रास बात सभ कहऽ लगैक, मुदा सुनीता लेल धनि सन।
ओहि दिन सुनीता काली खोला दिस नहि गेलि। सतीघट्टा बगान दिस चलि गेल- एकसरिये। जानि नहि किएक, बाट भरि हेम बहादुर ओकर मानसपटल पर जगजियार होइत रहलैक। आइ ओ छौंड़ा काली खोला लग एकर बाट तकिते रहि जयतैक। मुँहक गीत मुँहेमे रहि जयतैक छौंड़ाक।
सतीघट्टा बगानमे निश्चिन्तसँ घास कटैत छलि सुनीता। कने कालक बाद एकटा गीत सुनाइ पड़लैक- ‘माया को बाड़ी ना पिरती को फूल, संभाली राखऽ है कुसुमे रूमाल...।’
सुनीता चैंकि गेलि। ई तँ हेमेक स्वर छैक। एम्हरो चलि अयलै छौंड़ा। ई तँ दिक् कऽ देलकै। ओ सोचलकि। आइ जे ने झड़ान झाड़ति जे...।
पुनः दोसर मोन कहलकै। छौंड़ा कोनो बेजाय तँ नहि छै। यैह ने कने अहदी छै। एसगरुआ छै छौंड़ा, तें ने जेना-तेना रहैत छै। दोसरति भेटतै, तँ सम्हरि जयतै। ओकरो तँ एकटा पुरुष चाही। दुनू मिलि कऽ कमायत-खटायत। समय बीतैत रहतैक।
मुदा, ओ हेम बहादुरकें बोर्डर पर दू-नम्मरी धंधा नहि करऽ देति। बहुत रास दोसर-तेसर काज छैक। नीको काजसँ पेट भरैत छैक...।
सुनीताक गफ्फा घाससँ भरि गेल छलैक। गफ्फा दुखयलैक तखन अख्यास भेलैक। ओह..। ओ की सोचऽ लागल छलि। धुर जो....। ओ स्वयं मुस्कियाइति छलि। ई की भऽ रहल छै ओकरा?
आ कि तखने हेम बहादुर जुमि गेलैक। बाजल ओ छौंड़ा, ‘‘आखिर कहिया धरि अपन कोमल हाथ सँ हंसुआ धरैत रहबही, सुनीता?’’
सुनीता बाजलि, ‘‘देख हेमे! बरोबरि जे हमरा पछुअबैत रहैत छें, से नीक बात नहि। तोरा मोनमे की छौक? तौं अपन बाट किएक ने बदलैत छें?’’
हेम बहादुर छक्का मारलक, ‘‘हमरो मोनमे वैह बात अछि, जे तोरा मोनमे छौ। हम तोरा चाहैत छियौ। हम तोरा सँ बियाह करऽ चाहैत छी। हम चाहैत छी जे अपन दुनू गोटें...।’’
सुनीता बिच्चहिमे रोकलकि, ‘‘अपन मुँह देखलेहें। इह! हमरा सऽ बियाह करता। तोरा सऽ के बियाह करतौ? जकर सभ साँझ कान्छीक दारूक दोकानमे बीतै छै, तकरा बुतें बहु की डेबल हैतै?’’
मुदा, हेम बहादुर मानऽ बला नहि छल। ओ बाजल, ‘‘हम तऽ सदिखन तोरे मुंह देखैत रहै छियौ, तऽ अपन मुँह की देखियै?’’ कने थम्हैत पुनः बाजल, ‘‘तों जनिते छें जे हमरा माय-बाप केओ नहि अछि। एकटा खोपड़ी अछि, ओहीमे रहैत छी। ओहीमे तोरो राखबौ। राखबौ मुदा माया-पिरतीक संग। आ जहिया हम आ तों एक मोन, एक परान भऽ जायब, तहिया सऽ कान्छीक होटल जायब बन्न भऽ जेतै।’’
सुनीताक देह झुनझुना गेलैक। रोइयाँ ठाढ भऽ गेलैक। करेज धड़कऽ लगलैक आ ठौंठ सुखाय लगलैक।
ओ प्रश्न-दृष्टिएँ हेम बहादुर दिस तकलकि।
‘‘सत्ते कहै छियौ सुनीता।’’
ओ तकैत रहलि।
‘‘एकदम सत्त। जे किरिया खुआ ले।’’
ओ तकिते रहलि।
‘‘विद्यानाश।’’
सुनीताकें हंसी लागि गेलैक। ओ बड़ी जोरसँ हंसलि।
‘‘हँसी किएक लागि गेलौ तोरा?’’
हंसिते बाजलि सुनीता, ‘‘तों पढ़ले-लिखल कतेक छें जे विद्यानाश बला किरिया लगतौ।’’
‘‘विश्वास नहि होउक, तऽ आर दोसर जे किरिया खुआ ले, मुदा...।’’ हेम बहादुर सुनीताक मनःस्थिति बूझि चुकल छल। ओ सुनीताक हाथ पकड़ि लेलक, ‘‘संसारक पैघ सऽ पैघ किरिया खा सकैत छी हम। खुआ ले।’’
सुनीताकें मात्र एतबे बाजल भेलैक, ‘‘आब तकर बेगरता नहि छै।’’
बहुत दूर पच्छिम दिस मेघ हड़हड़ा उठलैक। बिजुली चमकि उठलैक। लगलैक जेना ओतऽ दू गोटा नहि, एक्कहि गोटा ठाढ़ होअय।
हेम बहादुरक बाहुपाशमे सुनीताकें सुखक अनुभूति भेलैक।
मोन्हारि साँझ भऽ गेलैक। दुनू बिदा भेल। सुनीता निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि जे ओ हारलि अछि आ कि जीतलि।

दुनू दाम्पत्य बन्हनमे बन्हा गेल। टोल-पड़ोसमे फदका होमऽ लगलैक। नहूँ-नहूँ सभ किछु सामान्य भऽ गेलैक।
बियाहक बादो सुनीता अपन घर आ गायक सेवा नहि छोड़िलकि। हेम बहादुर अपन खोपड़ी अपन संगी दीपक सुब्बाक हाथें बेचि देलकैक।
दुनू कमाय-खाय लागल आ रहऽ लागल। घास काटऽ लेल सुनीता नहि, हेेम बहादुर जाइक।
समय पर समयक पथार लागऽ लगलैक।
मुदा, बहुत दिन धरि एहि तरहें नहि रहि सकल ओ सभ। हेम बहादुरक बहसल मोन छान-पगहा तोड़ऽ लगलैक। ओकर लुतुक अकास चढ़ऽ लगलैक। सुनीता अपनामे कमी ताकऽ लागलि। आखिर ओकर हेमे पुनः किएक बहकि रहल छैक।
हेम बहादुर दारू पीबि कऽ आबऽ लागल आ सभ राति कऽ दूनू प्राणीमे झगड़ा होमऽ लगलैक।
दरुपीबा पुरुष सुनीताकें किन्नहुँ पसिन नहि छलैक।
नहूं-नहूं हेम बहादुरक आन-आन बानि सभ सेहो सुनीताकें बुझबामे अयलैक। ओ हेम बहादुरकें समझाबऽ-बुझाबऽ लागलि, मुदा ओकर सभ प्रयास व्यर्थ भऽ गेलैक।
स्थिति एतऽ धरि पहुँचि गेलैक जे हेम बहादुर आठ-आठ दिन घरसँ बाहर रहऽ लागल। ओकरा लेल सुनीतासँ बेसी महत्वपूर्ण भऽ गेल छलैक कान्छी दोकानक दारू....तिनपतिया.....पपलू....फलास...।
सुनीता सभ किछु सहैत रहलि।
सुनीताकें सभसँ बेसी दुःख ओहि दिन भेल रहैक जहिया ओकर गाय बिका गेलैक। हेम बहादुर दुखित होमऽ लागल रहय। ओकरे दवाइ-बीरो लेल सुनीताकें गाय बेचऽ पड़लैक।
सुनीताक गाय दीपक सुब्बा कीनने छलैक। हेम बहादुरक दोस।
एतेक दिन सभ किछु बर्दासि कयलकि सुनीता। मुदा ओहिदिन हेम बहादुर साफे कहि देने रहैक, ‘‘आब तोरा सऽ मोन ओंगठि गेल।’’ ई गप्प सुनीताकें सहरजमीन पर आनि देलकैक। ओकरा पराजय-बोध भेलैक। लगलैक जे ओकरा जीवनमे हारिये-हारि छैक।
गाय बेचलाक बाद जे टाका भेटलैक, ताहिसँ थोड़ेक हेम बहादुरक दवाइ लेल खर्च कयलकि आ एकटा सेकेन्ड हैण्ड सिलाइ मशीन कीनलकि। वैह सिलाइ मशीन ओकरा जीवनक आबलम्ब भऽ गेल रहैक।
हेम बहादुर अपन बानि नहि छोड़ि सकल। ओकर रोग बढ़िते गेलैक। आब ओ घर आयब सेहो बन्न कऽ देने रहय। दीपक सुब्बा कहने रहैक सुनीताकें, ‘‘भौजी! दोसक रोग ठीक होमऽ बला नहि छौक। सम्पूर्ण विश्व एहि रोगक इलाज लेल अपस्याँत अछि। हम-तों की छी?’’
अन्ततः हेम बहादुरक जीवन-लीला समाप्त भऽ गेलैक। मेचीक कातमे मुइल पड़ल देखलकै लोक सभ। सुनीताकें कहलकै। ओ पाथर भऽ गेलि। देखहु लेल नहि गेलि हेम बहादुरक लहासकें।
हेम बहादुरक सेवामे ओ स्वयंकें एहि तरहे समर्पित कऽ देने छलि जे ओकरा इहो सोह नहि रहलैक जे मज्जर कहिया टिकुला भऽ गेलैक। सुनीताक हाथ-पयर भारी होमऽ लगलैक। अन्न-पानिसँ अरुचि होमऽ लागल रहैक। देह पीयर भेल जाइत छलैक। आदि आदि। आइ जखन हेम बहादुर नहि छैक, जखन ओकरा सोह भऽ रहल छैक जे ओ माय बनऽ बाली अछि।
दीपक सुब्बाक अबरजात बढ़ि गेलैक। मुदा, सुनीता ओकरा अपन उद्देश्यमे सफल नहि होमऽ देलकि।
सातम मासमे सुनीताके बच्चा भेलक। बेटा रहैक। मुदा छौंड़ा बंचलैक नहि। जनमि कऽ मरि गेलैक। दीपक दवाइ-बीरो करौने रहैक ओकर।
सुनीताक देहमे सक्क लागऽ लगलैक। ओ मशीन चलाबऽ लागलि छलि। दीपक आबैक। घंटाक घंटा बैसैक आ प्रणय निवेदन कऽ चलि जाइक।
सुनीताक मोन कोनादन करऽ लगलैक। लगैक जेना कोनो आवामे जड़ल जाइत होअय...अथाह पानिमे डूबल जाइत होअय...कोनो सड़ल-गन्हायल डबरामे उबडुब करैत होअय।
सभ पुरुषक आकृतिमे हेमबहादुरक छवि देखय सुनीता आ ओकर मोन तुरुछि जाइक।
ओ सोचलकि। दीपक सुब्बा घर-परिवार बला लोक अछि। ओकरा मात्र सुनीताक घर आ देह सऽ मतलब छै। ओ सुनीताक भऽ कऽ नहि रहि सकैछ।
ओ नियारलकि। आब बेसी दिन धरि अपन चेतनाकें ठाकि कऽ नहि राखि सकैछ। ओकरा की चाही? ओकरा नहि चाही सिन्नुर आ ने कोनो इलबाइस। ओकरा किछु नहि चाही। मात्र जीबाक लेल चाही पाँच हाथ वस्त्र आ पाँच कऽर अन्न। से ओ मशीन चला कऽ उगाहि लेति। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नहि चाही। ई घर नहि चाही। ई घर ओकरा काटि कऽ खा जयतैक। एत' भरि घर हेमे बहादुर देखाइत छै ओकरा।
आ एक दिन सुनीता अपन मशीन आ मोटा-चोटा उठौलकि आ आबि गेलि बजार। दिल कुमारीक घरमे किरायामे रहऽ लागलि।




दिलकुमारी केबाड़ पीटलकै, तखन तंद्रा भंग भेलैक सुनीताक। ओ हड़बड़ायलि। उठलि। राति भरि जागबाक उझकी रहैक। अंगैठी-मोड़ कयलकि। मोन भेलैक जे आइ काज नहि करय। दिन भरि आरामे करय।
मुदा से भऽ नहि सकलैक। नगरपालिकाक मेहतर अपन बेटीक बियाह वला कपड़ा आ नाप सभ दऽ गेलैक। संगहि एकटा समाद सेहो कहने रहैक, ‘‘बहिन गे! प्रधान पंच तोरा बजलकौ-ए। आइये दू बजे। आॅफिसमे।’’
सुनीता अचरजमे पड़ि गेल। प्रधान पंच ओकरा किएक बजौतैक? ओकरासँ कोनो अपराध तँ ने भऽ गेलैक अछि।
एतऽ अयलाक बाद कतोक आँखिक प्रहार सहलकि अछि सुनीता। बहुतो लोक हुलकी-बुलकी देलकैक। एक दिन दीपक सुब्बा सेहो आयल रहैक, मुदा ओ ओकरो मंँह दुसि देलकि। ओ अपरतीव भऽ कऽ चलि गेल। सुनीता अपन निर्णय पर दृढ अछि। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नहि चाही।
पुनः एकटा प्रश्न ओकरा मोनके हौंड़ि दैक। प्रधान पंच किएक बजौलकै-ए?
ओ कार्यालय पहुँचलि। प्रधान पंचसँ बजयकबा कारण पुछलकि। प्रधान पंच पुछलकैक, ‘‘तों एकसरिये रहैत छें?’’
‘‘हँ।’’
‘‘आर केओ?’’
‘‘केओ नहि।’’
‘‘एकटा काज कऽ सकैत छें?’’
सुनीताकें डर भेलैक। ओ डेरायलि बाजलि, ‘‘कोन काज?’’
‘‘कोनो खराप काज करऽ नहि कहैत छियौक।’’ प्रधान पंच एकटा अबोध बच्चा दिस संकेत करैत बाजल, ‘‘देख! ई अबोध अनाथ छैक। तोरो केओ नहि छौक। एकरा पोस। धर्मो होयतौक। पाछाँ जा कऽ ई बुढ़ारीक सहारा होयतौक। नगरपालिकासँ एकर खर्च सेहो भेटतौक, ‘‘एक सय टाका मास।’’
सुनीता ओहि छौंड़ा दिस तकलकि। देखनुक रहैक छौंड़ा। तीन-चारि बर्खक रहल होयतैक। ओ सकपका गेलि। बाजलि, ‘‘विचारि कऽ कहब।’’
‘‘ककरा सँ?’’
‘‘अपना मोन सऽ....काकी सऽ।’’
ताबत ओ अबोध आबि कऽ सुनीताक आँचर पकड़ि लेलक। सुनीता पुनः ओहि छौंड़ाकें देखलकि। ओकर वात्सल्य उमड़ि गेलैक। ओकर मोन पिघलि कऽ आँखि बाटें बहार होमऽ लगलैक।
क्षणहिं ओ नोर पोछलकि। नहि, ओ एक सय टाकामे एकटा घेध नहि लेति। स्वयंके कोनो सम्बन्धमे नहि बान्हति। कोनो सम्बन्ध नहि...कोनो सरोकार नहि...।
छौंड़ा आँचर पकड़नहिं छल।
दोसर मोन कहलकैक। ई घेघ नहि। कंठी-माला छौक-राम नामा। ई नहि ठकतौक। ई धोखा नहि देतौक। कतहु पड़ा कऽ नहि जयतैक।
सुनीतक मोन सकपक करऽ लगलैक। ओकर करेज जोर-जोरसँ काँपऽ लगलैक। ओ किछु निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि।
लोक सभ देखैत रहलैक। करुणा आ ममताक विचित्र दृश्य उपस्थित भऽ गेलैक।
सुनीताकें लगलैक जेना क्षणहिमे माया, मोह, स्नेह, भूख, प्यास आ ओकर सम्पूर्ण संवेदना जागि उठल होइक। ओकरा सकपंज कऽ लेने होइक। ओकरा हरलै ने फुरलै, ओहि नेना दिस तकलकि आ ओकरा कोरामे उठा कऽ चुम्मा लेबऽ लागलि।
मातृत्वक सजीव मूर्ति बनि गेलि सुनीता।
सुनीता कागज बनौलकि। नगरपालिका दिससँ तीन मासक अग्रिम भेटलैक आ छौड़ाकें लऽ कऽ डेरा आएलि।
सुनीताक निर्णय दिल कुमारीकें सेहो नीक लागल रहैक।
छौंड़ा बौक छलैक। छौंड़ाकें बौक होयब सुनीताकें कने झूस बना देने रहैक। ओ छौड़ाकें बजयबाक प्रयास करऽ लगलि।
ओहि राति सुनीताकें लागल रहैक जेना ओ खूब सुखसँ सुतलि होअय। बौकाकें करेजमे साटि कऽ सुतलि छलि। अपन जनमल नहि भेलैक ताहिसँ की? ओकर मातृत्व सजग भऽ गेलैक। मातृत्वक सम्पूर्णताक बोध भेल रहैक ओहि राति।
छौंड़ा बौके नहि, अखलाह सेहो छलैक। मुदा सुनीताक लेल ओ सोन सन छलैक। आब सुनीता ओकरा अपन संग काज-बट्टम बला काजमे सेहो लगाबऽ लगलैक।
शुरूहमे छौंड़ा बड़ तंग करैक ओकरा। काज दिस बट्टम लगा दैक आ बट्टम दिस काज बना दैक। नहूँ-नहूँ सुनीता ओकरा सीखाबऽ लागलि। छौंड़ा सीखि लेलक।
मुदा छौंड़ाक एकटा बानि एखनो छैके। एखनो ओ सुनीतक करेजेमे सटि कऽ सुतैत अछि। एक हाथ सुनीताक देह पर, दोसर...आ टाँग सुनीताक दुनू टाँगक बीच घोसिया कऽ...निर्विकार भावें सुति रहैक बौका। सुनीताक मातृत्व छिलकि जाइक। ओहो ओकरा पजिया कऽ सुति रहय।
ओना दिल कुमारी एक दिन मना कयने छहैक, ‘‘बौकाक ई आदति नीक नहि छैक। एखनि ने नेना छौक। नेने की? आब तऽ सियान भेल जाइत छौक। ओकर एहि आदतिकें छोड़ायब जरूरी।’’
सुनीता बाजि उठलि, ‘‘काकी। तोरो मोनमे पापे उठैत छौक। धुर जो....।’’

समय बीतऽ लगलैक। सुनीताक मशीनक चक्का चलऽ लगलैक। बौका काज-बट्टम करऽ लागल।
समयक संग मंहगी बढ़लैक। मजूरी, दरमाहा बढ़लैक। बढ़लैक कपड़ाक सिलाइ। बाट बढ़लैक। पीच रोड बढ़लैक। मोटर गाड़ी बढ़लैक। उड़ीस-मच्छर बढ़ि गेलैक। लबरै-लुचपनी बढ़लैक। दू-नमरी धंधा आकास छूबऽ लगलैक।
घरक किराया बढ़ि गेलैक। सुनीताक दोकान आ सुतबाक कोठरी फराक भऽ गेलैक। नगरपालिकासँ भेटऽ बला टाका बन्न भऽ गेलैक।
दिलकुमारीक बयस बढ़ि गेलैक।
बौका सेहो जुआन होमऽ लागल। सुनीता प्रौढा होमऽ लागलि।
समय बदललैक। राति-दिन मासमे बदलि गेलैक। मास बर्खमे। बर्ख युगमे। पंचायती व्यवस्था बदललैक। प्रधान पंच बदलि गेलैक। मेयर भऽ गेलैक। जनमत संग्रह भेलैक। आम चुनाव भेलैक। प्रजातांत्रिक व्यवस्था भेलैक। संविधान बदललैक।
मुदा, बौकाक बानि नहि बदललैक।
सुनीताकें लगैक जे ओ डोलि ने जाय। ओ बौकाक ओछाओन फराक कऽ देने छलि। मुदा बौका राति-राति भरि जागि कऽ बिता दैक। प्रात भेने जखन काज-बट्टम करैक तँ निसभेर भेल बुझाइक। आँगुरमे सुइया भोंकि लैक। सुनीताक ममता जागि जाइक।
एतेक दिन तँ नहि, मुदा आब बौका सुनीताक गराक घेघ बनि गेल छैक। सुनीता विचित्र उहापोहमे फंसलि छलि। बौका ओकरा गरदनिक ढोल बनि गेल छैक। ने बजौनहिं कल्याण आ ने हटौनहि शान्ति। कतऽ जयतैक छौंड़ा?
माघक पाला पड़ैत छलैक। दोकान बला कोठरीमे बौकाक ओछाओन कऽ देने रहैक सुनीता। मुदा छौंड़ा नहि मानलकैक। अन्ततः सुनीता अपन कोठरी बन्न कऽ लेलकि। बौका दोकान बला कोठरीमे ठिठुरैत रहल।
सुनीताकें सेहो निन्न नहि भेल रहैक। एकटा आशंका जगौने रहैक। बौका सुतलै आ कि जगले छैक?
ओ केबाड़ फोललकि। बौकाकें ठिठुरैत देखि ममता जागि उठलैक। ओकरा पुनः अपने लग बजा लेलकि। बौका गेल आ सुनीता लग अपन बानिक अनुसारें निर्विकार भावें सुति रहल- एकटा हाथ सुनीताक देह पर...दोसर...आ टाँग...। ओ निन्न पड़ि गेल।
ई क्रम पुनः चलऽ लगलैक। एही क्रममे एक राति डोलि गेलि सुनीता। कोन सीमा धरि संयमित रहितय? ओकर संयम टुटि गेलैक। सीमा पार कऽ गेलि। ओकर चेतना मरि गेलैक। ओ घिना गेलि।
मुदा, बौकाक लेल धनि सन। ओकरा ने हर्ष होइक आ ने विषादे।
प्रात भेने सभ किछु सामान्य रहैक। असामान्य मात्र एतबे रहैक जे सुनीता भरि मोन बौकाकें देखि नहि पाबय। ओकरा ग्लानि होइक। मोन होइक जे एहि घिनायल जिनगीसँ मुक्तिये उचित। मुदा बौका? ओकरा बाद बौकाकें के देखतैक?
आ सुनिता किछु नहि कऽ पाबय।
अपन सभटा असमर्थता एक दिन दिल कुमारीकें कहने रहैक सुनीता। दिल कुमारी सभ किछु सुनि लेने छलि आ अन्तमे बड़ निर्दयी भऽ बाजलि छलि, ‘‘जाहि दिन एहि छौंड़ा के जिम्मा लेलही, तहिया नहि बुझलही जे नमहर भऽ कऽ इहो पुरुषे हेतै।’’
आ सुनिता किछु नहि कऽ पाबय।
‘‘मुदा बौकाक कोन दोष छैक, काकी? ओकर कोनो दोष नहि छैक। हमहीं...।’’

एक दिन साँझ खन बौका बजार दिस बहार भेलैक, से घुरि कऽ नहि अयलैक। चारूकात ताक-हेरीमे लागि गेल सुनीता। रीति बीति गेलैक, मुदा बौका नहि अयलैक।
पाँच दिन बीति गेलैक। सुनीता कात करोटक सभ शहर-बजार आ गाम घर छानि लेलकि, मुदा बौका ने भेटलैक आ ने अयलैक।
सुनीता हारि कऽ बैसि रहलि। ओकर मोन हदमदाय लागल रहैक। देहमे कोनेा सक्के ने लगैक।
दिलकुमारी ओकरा सम्बल देलकैक ओहि दिन। ओ सुनीताक माथ अपन जाँघ पर राखि लेने रहैक आ ओकर केश पर हाथ फेरऽ लगलैक। सुनीताक जीवनमे पहिल बेर मायक छाँह सन लगलैक दिन कुमारीक स्नेहिल हाथ।
कने कालक बाद दिल कुमारी बाजलि, ‘‘उठ! आब बौका नहि औतौ। चल अस्पताल। खसबा दैत छियौ।’’
सुनीता टुकुर-टुकुर दिल कुमारी दिस ताकऽ लागलि। ओ कोनो निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि। दिल कुमारी बाजलि, ‘‘जाधरि मरैत नहि छें, मशीन चलाबहि पड़तौक। लोकक फाटल-पुरान सीबहि पड़तौक।’’

सुनीताक सिलाइ मशीन रखनहुँ चलिते छैक। कपड़ा सीबि लेलाक बाद ओ एकबेर विराट शून्यमे तकैत अछि...तकैत रहैछ, मुदा तखनहिं दिल कुमारी ओकरा तंद्रा भंग कऽ दैछ, ‘‘ला! काज-बट्टम कऽ दैत छियौ।’’

                                #####
न्यू कालोनी उलाव (बेगूसराय)/ 25.08.1997

संग्रहित :  कथा-संग्रह 'मकड़ी' ( मार्च 2020)
                कथा-संग्रह 'भरि राति भोर'
हिंदी अनुवाद : साक्षात्कार - 223, जुलाई 1998, अनुवादक- अविनाश
ओड़िया अनुवाद : अनुवादक- पारमिता षडंगी, 'साहित्य दर्पण' (मार्च-मई 2021 ई) मे प्रकाशित।

 

Saturday, August 17, 2024

शेष (मैथिली कथा)- प्रदीप बिहारी

शेष


प्रदीप बिहारी



ऑफिसमे सीमाक पयर पड़ितहि लगलैक जेना सम्पूर्ण कार्यालय महमह भ' उठल होइक। कर्मचारी आ अधिकारी सभ कने साकांक्ष भ’ उठैत छलाह। एतबे नहि, ग्राहक सभ सेहो कने सचेत होइत छल।
सीमा भीतर आयलि आ अपन बानिक अनुसार भूषण बाबू लग जा क’ अपन चेक-बुक पटकि देलकि, ’कने जल्दी पेमेन्ट करबहो।’ आ पुनः एम्हर-ओम्हर तकैत लोक सभक हालचाल पूछ’ लागलि। हालचाल पुछबाक ओकर अपन विधि छैक। बेसी लोककें आंखियेसं हालचाल पुछैत छैक ओ।
सीमाक नजरि सुभाष पर अंटकि गेलैक। ओ भूषण बाबूसं पुछलकि, ’ई नया स्टाफ अयल’ हन कि?’
’हं! दसो दिन नहि होलै हन।’ बजलाह भूषण बाबू, 'से किए? पसिन छओ कि?’
’धौर मर्दाबा।’ बाजलि सीमा, ’सैह हिबलयै। बच्चे हइ।’
ग्राहकमे सं एक गोटें बाजल, ’आब एकटा बहिक्रम भेल जाइ छह सीमा देवी।’
सीमा ओकरा उतारा देलकि, ’धौर मर्दाबा! हे हओ! जेना मरद कहियो नहि बुढाइ हइ, तेना हम पुरूफ कर’ चाहै छियै जे मौगियो कहियो नहि बुढाइ हइ।’
नहूं-नहूं बजबाक हिस्सक नहि छैक सीमा देवीक। सभ सुनलक। किछु गोटे हंसल। किछु चुप रहल।
सुभाषकें अचरज लगलैक। विचित्र माउगि छैक। ओ देखैत रहल। सीमाक काज भूषण बाबू स्वयं उठि क’ क’ देलखिन। ओ कैश काउन्टरक पाछां जा क’ टाका लेलकि आ टाका गनैत सुभाषक टेबुल लग आयलि आ पुछलकि, ’कत’ घर होल’ साहेब।’
सुभाष अपन ग्राम्य जिलाक नाम कहलकै।
’तखन तं अपने मिथिला के होइ छियै।’ भाषा परिमार्जित क’ बजबाक प्रयास कयलकि सीमा।
'अहूं मिथिले के छियै। इहो मिथिले छैक।’
सीमा एकटा गहींर नजरियें सुभाषकें देखलकि आ आगां बढ़ि भूषण बाबूकें कहलकनि, ’ई नवका स्टाफ तं चेहरे स’ बच्चा लगै ह’। मोन स’ त’ पकठोस बुझाइ हइ।’
भूषण बाबूकें विनोद सुझलनि, ’त’ की बूझै छहो? एक दिन जांचि, लियहो। तखने ने बुझबहक जे....।’
’धौर मर्दाबा।’ बजैत सीमा जहिना हनहनाइत आयलि तहिना दनदनाइत चलि गेलि।
सुभाषकें मोन पड़लैक गामक सलहेश नाच आ ओकर गीत- 'चलै छै मलिनियां बेटी, धरती धमकबै छै...।’
सीमा चलि गेलि। पुनः कार्यालयक स्थिति पूर्ववत्। जाधरि सीमा कार्यालय परिसरमे रहैत छैक, कार्यालय दलमलित भेल रहैत छैक।
जलखै बेरमे सुभाष सीमा देवीक मादे पूछने रहय अपन सहकर्मी सभसं। रंजन तुरन्ते उतारा देलकै, ’सीमाकें के नहि जनै हइ?’
’कोन चिड़क नाम छिकै सीमा, से त’ देखबे केलहो।' दोसर सहकर्मी।
'एहीठाम अस्पतालमे काज करै हइ। नर्स हइ।’
'अनुकम्पा बला नोकरी हइ। ओकर घरबला अही कम्पनीमे काज करै। मरि गेलै।’
सीमाक विधवा होयबाक गप्प सुभाषकें आर अचरजपूर्ण लगलैक। सीमाकें देखने कतहुसं नहि लगैत छैक जे ओ विधवा होइक।
'पहिने हेल्परमे नोकरी भेलै। बाद मे नर्सिंग बला ट्रेनिंग केलकै, तं आब नर्स छिकै।’
'से जे होउक, मुदा हइ बड़ मस्त-मस्त...।’
एकटा ठहक्का पड़लैक। सीमाक चर्चा ओहि दिनक जलखै बेरक मूल विषय बनल रहलैक।
सुभाषक जिज्ञासा शान्त भ’ गेलेक।
सीमा मासमे तीन-चारि बेर अबस्से अबैत छैक बैंक। मुदा, कोनो-ने-कोनो बेगरते ल’ क’। अनेरे कहियो नहि देखलकैए सुभाष।
एक दिन शर्माजी पुछलखिन सीमासं, 'अएं हइ सीमा देवी। सब दिन भूषणे बाबू लग बैसै छहक, की बात छै?’’
निधोख भ’ क’ बाजलि सीमा, ’अपन बौडी नहि देखै छहो! फुकना जकां फूलल ह’। तोरा बुते की होत?’
आ कि तखनहिं भूतपूर्व सैनिक रायजी बजलाह, ’आ हम हइ?’
'हं। तों छहो-स्टील बॉडी।’
सुभाष दिस संकेत करैत भूषण बाबू पुछलखिन, 'आ सुभाष?’
'धौर मर्दाबा!’ बजैत सीमा हॉलसं बहार भ’ गेलि।
एक बेर फगुआक छुट्टीसं पहिलुक दिन सीमा आयलि। बड़ भीड़ रहैक। भूषण बाबू ओकर चैक राखि लेलनि आ बजलाह, ’जाह! भीड़ सठि जयतै तखन अबिहो।’
सीमा चलि गेलि।
सीमा पुनः आयलि तखन भीड़ सांचे सठि गेल रहैक। भूषण बाबू ओकरा टाका देलनि। सीमा कने काल बैसलि। सभ अपन-अपन कार्यालयी काजसं निवृत होइत गेल आ तखन शुरू भेलैक फगुआ खेलबाक प्रक्रिया।
सुभाष देखैत छल। सीनियर सभ रंग, पेनक मसि, पैड इंक आदिसं प्रायः त’र क’ देलकै सीमाकें। सीमा सेहो सभकें रंग-अबीर लगौलकि।
भूषण बाबू तं ठाम-कुठाम मे कतेको मोहर छापलनि।
सर्वथा नव कर्मचारी होयबाक कारणें वा अन्य कोनो कारणें सुभाष ओकरा रंग लगाब’ नहि गेल। सुभाषकें नीक नहि लगलैक।
ओम्हरसं निवृत भेलाक बाद एक बाकुट अबीर नेेने सीमा सुभाष लग आयलि। सुभाष मना कयलकै। कागज-पत्तर छैक। लेजर-रजिष्टर छैक।
सुभाष अपन टेबुल छोड़ि बहार भ’ गेल। ओ सीमाकें कहलक, 'एहुना कतहु लोक रंग खेललक-ए। बगय देखै छहक?’
सीमा फगुनायल टोनमे बाजलि, 'जे जिएगा से खेलेगा फागु।’ आ बाकुट भरि अबीर सुभाषकें लगा देलकि।
सीमा बहार होम’ लागलि आ कि रायजी पुछलखिन, 'सुभाषक गाल ऐंठि लेलहो कि?’
'धीर मर्दाबा!’ बजैत सीमा बहार भ’ गेलि।

समय बीतैत गेलैक। सीमा ओहिना हनहनाइत आबय आ वातावरणकें दलमलित क’ गनगनाइत चलि जाय।
बर्ख पर बर्खक पथार लागि गेलैक।
सुभाष गृहस्थ भ’ गेल।
मुदा, एकटा स’ख सुभाषकें लगले रहलै। आन-आन कर्मचारी जकां सुभाषक संग सीमा कहियो चौल नहि कयलकै। ओकरा मोन लागल रहलैक जे सीमा ओकर संग चौल करौक।
एही क्रममें एकटा खगता भेलैक सुभाषकें। ओकरा अपन दुनू पुत्रक नामांकन कम्पनी द्वारा प्रायोजित विद्यालयमे करयबाक छलैक। ज्ञातव्य जे एहि विद्यालयमे नामांकन हेतु कम्पनीक कर्मचारी सभक नेना वरीयताक क्रममें पहिल मानल जाइत छैक। बैंकक कर्मचारीक नेना सभक नम्बर सभसं अन्तमे, खाहे ओ कतबो मेधावी किएक ने होअय।
एहि असमानता हेतु ओहि विद्यालयक प्राचार्यसं बहुत रास वाद-विवाद कयने रहय सुभाष। अन्ततः ओकर दुनू पुत्रकें नामांकन हेतु आयोजित प्रतियोगिता परीक्षामे सम्मिलित होयबाक अनुमति भेटलैक। आ ओकर दुनु पुत्र प्रथम अयलैक।
प्राचार्यक अनुसारें सुभाषकें एकटा आर औपचारिकता पूरा करएबाक छलैक। कम्पनीक कोनो कर्मचारीसं प्रमाण-पत्र दिअयबाक छलैक जे दुनू नेना ओकर सम्बन्धी छैक।
सोचय लागल सुभाष। कोन सम्बन्ध देखेतैक? आ ई समस्या भूषण बाबू लग रखने छल। भूषण बाबू झट बाजि उठलाह, 'ई कोनो समस्या नहि भेलैक। ई मात्र औपचारिकता छिकै। एडमिशन भ’ गेलाक बाद कतहु किच्छो नहि। आइए ब्योंत क’ दै दिअ’।’
ओही दिन किछु क्षण बाद सीमा आयलि। भूषण बाबू ओकरा सभ गप कहलनि आ ओ मानि गेलि। तखनहिं आवेदन-पत्र टाइप भेलैक। सीमा दवी दसखत कयलकि।
सुभाषक मोनमे एकटा संशय भेलैक। आवेदनमे सुभाषक पुत्र द्वयक मादे सीमा देवी अंग्रेजीमे घोषणा कयलकि, 'बोथ कैन्डिडेट्स आर माइ ग्रैण्ड सन।’
सुभाष इथ-उथ मे छल आ कि सीमा कहलकै, ’चलहो वेलफेयर विभाग। ओहिजय सार्टिफिकेट बनतह’ आ आवेदन ल’ सीता कम्पनीक प्रशासकीय कार्यालय दिस बिदा भ’ गेलि। सुभाष पछोड़ धयलक। ओकरा लगलैक जे कतहु फंसि रहल अछि।
कल्याण विभागमे कोनो प्रकारक असुविधा नहि भेलैक सुभाषकें। सभ चिन्हल लोक। सभ बुझैत छैक जे ई मात्र एकटा औपचारिकता छैक-खानापुरी।
प्रमाण-पत्र बनि क’ तैयार भ’ गेलैक आ सुभाषक हाथमे आबि गेलैक। तखन कल्याण पदाधिकारी महतो जी पुछलखिन सीमासं, 'अएं हइ! ई तोहर सम्बन्धी कोना भेलखुन? ई तं तोरा जातिक नहि छथुन?’
आ कि सीमा बाजि उठलि, 'धौर साहेब! तोहूं आर कमाल करै छहो। हमर बेटी हिनके संगे लव-मैरिज कने रहै ने। तखन ई दुनू बच्चा हमर नाती नञि होलै? नाती के अंग्रेजीमे गैण्ड सन नहि कहब करै हइ की?’
सभकें अचरज लगलैक। सीमाक प्रत्युत्पन्नमतित्व पर सुभाषकें सेहो।
सीमा देवी ओहू कार्यालयकें दलमलित कयने बहार भ’ गेलि।
किछु दिनक बाद सीमा बैंक आयलि। परिसरमे पयर दितहिं सभ पूर्ववत् अपन-अपन हंसी ठट्ठासं ओकर अभिवादन कयलकै, मुदा ओ कोना उतारा नहि देलकि। ओ सोझें सुभाष लग जा क’ बैसलि, 'जल्दीसं हमर काज करा दहो।’
आ ओहिदिनक बाद कर्मचारी सभ सुभाषकें पूछ’ लगलैक जे ओ सीमाकें की पढ़ि क’ खुआ देलकैए जे ओ बदललि जा रहलि अछि।
कम्पनीक कर्मचारी सभक वेतन भुगतानक समय बैंकमे बड़ भीड़ भ’ जाइत छैक। परिसर छोट छैक आ लोक बेसी। लगैत रहैत छैक जे सभ एक्कहि दिन दरमाहा ल’ क’ रहत। मास भरिक प्रतीक्षा रहैत छैक। ओहि भीड़मे एक दिन सीमा आयलि-पिचाइत।
अबितहिं गरजि उठलि, 'अएं हौ भूषण बाबू! तोहर मनेजर कहां छिकथुन? जनाना के लेल अलग बेवस्था करथुन, से कहै नञि छहो। देखहो त’ अइ भीड़मे....। केना लेेतै लोक पेमेन्ट?’ कने थम्हैत बाजलि, 'आ मर्दाबा आउर त’ आर...। हटै लागी बोलला पर त’ आर सटब करै हइ। लगै हइ जेना अपना बहिन-बेटी नहि होइ।’
एतेक बजितहिं ओकर नजरि सुभाष पर पड़लैक। ओ चुप भ’ गेलि आ सुभाष लग आबि क’ बैसि गेलि। पासबुक आ चैक निकालि क’ सुभाषक सोझां रखैत बाजलि, 'देखहो अपनेस’ उठि क’।’
सुभाष चैक भरलक। सीमा दसखत कयलिक आ सुभाष अपन कुर्सी परसं उठले छल आ कि एक गोटें ठट्ठा कयलकै सीमाक संग। सीमा गंभीर होइत नहुएंसं बाजलि, 'चुप रह', दमाद हइ अइ जग।’
ओ व्यक्ति चारूकात नजरि खिड़ाब’ लागल आ सीमादेवीक जमायकें ताक’ लागल। सुभाष, सीमाक काज हेतु दोसर काउन्टर दिस चलि गेल।
ओ व्यक्ति पुछलकै, 'कहां छिक’ दमाद?’
सुभाष दिस संकेत करैत बाजलि सीमा, 'उहे।’
ओहि व्यक्तिकें अचरज भेलैक। पुछलकै, 'से कोना?’
बाजलि सीमा, 'धौर मर्दाबा! कोनो जरूरी छिकै जे सब सम्बन्ध ढोले-पिपही बजा क’ होइ?’
'एकर माने आब तोएं बूढ़ होइ गेलहो।’ बाजल ओ व्यक्ति, 'बड़य कहब करहो जे पुरूफ कर’ चाहै छियै जे मौगियो कहियो नहि बुढाइ हइ।’
बाजलि सीमा, 'धौर मर्दाबा! ऊ आ अइ बातमे अन्तर होइ हइ। तोएं आउर ने त’ सम्बन्ध के इमानदारी बूझै छहो आ ने मरजादा। जहिया बूझ’ लगबहो, तहिया तोहूं आउर बुढ़ारी आ जुआनी के भेद बूझि जेबहो।'
ओ व्यक्ति अपन सन मुंह ल’ क’ ससरि गेल।
सुभाष आयल, चपरासीकें टोकन देलकै आ पाइ आनि देब’ कहि अपन कुर्सी पर बैसि गेल। सोझांमे सीमा बैसलि छलि। सुभाष अपन जेबीसं पान मसल्लाक पुड़िया बहार कयलक आ अपना मुंहमे ढाड़’ लागल। आ कि तखनहिं सीमा देवी ओकर हाथ पकड़ि लेलकि, 'ई कोन बानि छह? ई कतेक खरापी करै हइ, से बूझै छहो। खबरदार! आइन्दा तोरा हाथमे पान मसल्ला देखलियो त’....।’
सभकें अचरज भेलैक। सुभाषकें सेहो।
सीमा देवीक सम्पूर्ण आकृतिसं वात्सल्य टपकैत देखलक सुभाष।

    ‌‌‌                            #####

हिन्दी अनुवाद : स्वयं कथाकार। जनसत्ता (सबरंग) 21 सितम्बर 1997 मे प्रकाशित। 'आर्यावर्त' (दैनिक), 23 मई 1998 ई. मे प्रकाशित।
ओड़िया - अनुवादक- पारमिता षडंगी, 'पर्यवेक्षक' दैनिक, भुवनेश्वर, 18 अगस्त 2024 ई. मे प्रकाशित।

Wednesday, July 31, 2024

खैंक (मैथिली कथा) - प्रदीप बिहारी

कथा

खैंक

प्रदीप बिहारी


हड़बड़ाइत ओ पेंसन काउण्टर धरि गेलि आ बाजलि, 'सुबोध बाबू! हमर बाबा के लाइफ सर्टिफिकेट लए लियौक।"
          सुबोध फार्म देखलक। बाजल, "कहां छथिन? हमरा सामनेमे दसखत करबाक चाही ने। अहां के भेलियै हुनकर?"
          "बोललौं जे बाबा के लाइफ सर्टिफिकेट लए लियौक, त' नहि बुझायल। पोती होलियै हुनकर।"
           काउण्टर पर ओहि महिलाक पाछां ठाढ़ एक गोटें बाजल, "हइ । एना किए बोलै छहो? साहेब सुनि नहि सकल होथिन। केतना भीड़ छै, से लक्खा नहि दए रहलो हन? अकेला साहेब, देखै नहि छहो केना औल-बौल होल छथिन।"
           महिलाकें अपन गलतीक आभास भेलै। बाजलि, "सौरी, गलती भए गेलै सर। माफ कए दियौ।"
     ‌     सुबोध महिला दिस ताकलक। प्राय: अठाइस-उनतीस बरखक ओहि महिलाक चेहरा निश्छल बुझयलै। अचरज भेलै जे एना किएक बाजलि? ओ मुस्कियाइत बाजल, "कोनो बात नहि। अहांक की नाम भेल?"
           "रजनी।"
           रजनीक मुखाकृति पर एकबेर फेर सुबोधक नजरि गेलै।‌ ओ बाजल, "ठीके कहलहुं अहां। मुदा कत' छथि दयाल चन्द्र शर्मा जी?"
          रजनी अपराध-बोध सं उबरि नहि चुकल छलि। बाजलि, 'सर जी, ऊ उप्पर नहि आबि सकै‌ छथिन।‌ निच्चां चरिचक्का मे छिकथिन। हुनका बुलल नहि ने होइ छनि।"
         "बेस, तं कने बैसि जाउ। लाइनमे‌ किछु गोटे छथि। हिनका सभक काज झट द' क' दै छियनि, तकर बाद चलै छी।"
         रजनी लाइनसं कात भ' गेलि।‌ मुदा, बैसलि नहि। कातेमे ठाढ़ रहलि। ओकरा लगलै जे बैसि गेने सर जी बिसरि ने जाथि। ओकर नजरि सुबोध दिस छलै। नजरिमे आतुरता छलै- सर जी ....
         कनिए कालमे पांतिक किछु गहि‌कीक काज कयलक बाद शेषकें‌ प्रतीक्षा करबाक बात कहि सुबोध बहरायल। रजनी आगां-आगां आ सुबोध पाछ-पाछां।‌
          "अहांक पिता की करै छथि?" सुबोध पुछलक‌।
           "गामे मे रहब करथिन। खेती-पथारी। जमीनो-जत्था कम्मे बचि गेल रहै। साले-साल खेत बेचैत रहलखिन। आब हुनकर काज हमर भाइ करब करै छै। जमीनो बहुत कम्मे बंचल छै।"
           "अहांक बाबा हुनका पर ध्यान नहि देलखिन की?"
           "बाबा के संतान नहि ने होलनि। हमर दादा के चच्चा होलखिन बाबा। ई बाबा कहांदन बड़े कोसिस कैलखिन, मुदा हमर अप्पन बाबा जत्ती ने दुलार करब करथिन जे दुलारे मे बगदि गेलखिन हमर दादा।"
          "अहां की करै छी?"
          "सब बात एक्के दा पुछि लेबै‌ सर। हम्मे...
          ताबत ओ दुनू कार धरि आबि गेल छल। सुबोध देखलक जे कारक पछिला सीट पर‌ प्राय: छओ फुटक एकटा बूढ़ ओंगठल छलाह। ओ पुछलक, "की  होइए दयाल बाबू? नीके छी ने।"
          "छी त' निक्के। खाली डांड़ स' निच्चा के भाग बेकामक भेल हन। कहुना आदमी के सोंगर स' ठाढ़ होइ जाइ छियै, दिसा-मैदान कए लै छियै।" दयाल बाबू उतारा देलनि।
          फार्म पर दयाल बाबूक दसखत लेलक सुबोध।
हुनकर हाथ थरथराइत छलनि। सुबोध कें बुझ' मे आबि गेलै जे ई दसखत‌ नहि मिलतनि।
          दसखत दिस तकैत सुबोधक असमंयशकें दयाल बाबू बुझलनि। बजलाह, "दसखत नहि मिलैत होत। बैंक‌ के‌ रेकर्ड मे एखुनका दसखत होना चाही ने।"
  ‌‌‌‌‌        "ई काज क' लेबाक चाही छल।" सुबोध बाजल।
         "बेस, अगिला‌ दा जहिया अपने समय देबै, भए जेतै।" रजनी बाजलि।
          सुबोध बिदा होइत बाजल, "बेस, एहि मासक अंत मे जहिया पेंसन पेमेंट हैत, दुनू मासक खातामे जमा भ' जायत। नवम्बरे‌ मे‌ अएबाक चाही ने। बड़ लेट भेल त' दिसम्बर धरि जरूरे। सेहो समय बीति गेल। आब पेमेन्ट ले' किछ थम्ह' पड़त।"
           दयाल बाबू आ रजनीक चेहरा पर असमर्थताक  भाव पसरि गेलै। दयाल बाबू बजलाह, "कम-स'-कम बितलहो महिना बला आइ भेटि जैतै, त'...."
           "मोश्किल अछि।"
           "सर, बात ई छिकै जे..."
           "की?"
      ‌‌‌‌     दयाल बाबू कें बाज' सं पहिने रजनी बाजलि, "बाबा, तोएं चुपहो ने। हम्में बता दै छियनि सर के।"
           सुबोधक मोनमे आशंका पैसि गेलै। रजनी दिस तकैत बाजल, "हिनका बाज' दियनु। पेंसनर ई छथि। टाका हिनका भेटतनि। बजियौ दयाल बाबू।"
          "की बोलू सर। बोलब त' कहबै जे दुखे बतिआइ -ए।"
          "काजक बात बाजू ने।"
          "बेस, मूल बात कहै छी। हम्मर अइ पोती छोड़ि क' कोइ ने छै। अपना संतान नहि होलै। एकरे बाप के सब कथू देलियै। आ उहे फुटबौल जैसन गुड़का देलक। इहे पोती हय, जे सेवा कए रहल हन।‌ एकरो दुख के ओर नहि छै। तें‌ एकरा पर शंका नहि करियौक।'
           सुबोध दयाल बाबूक बात सुनि लेलक, मुदा ओत्तेक ध्यान नहि देलक। ओकरा काउण्टर परक गहिंकी मोन पड़ि रहल छलै। तैयो रजनी दिस तकैत बाजल, "हम हिनका पर शंका किएक करबनि?"
     ‌      "देखियौ सर, हम यू डी सी (अपर डिविजन क्लर्क) स' रिटायर कैने छी। अपने जे रजनी के चुप रहए बोललियै, से हमे बुझि गेलौं।‌ तें बोललौं जे एकरा पर शंका नहि करियौ।"
           "दयाल बाबू, अपने हमरा 'सर' नहि कहू। हमहूं अपने के पोते के उमेर के हैब। अपने आदरणीय छियै। हमर नाम सुबोध अछि।"
           "बेस। घर कतए होल?"
          "अपने जकां हमहूं मिथिले के छियै। मधबन्नी जिला।"
           दयाल बाबू उत्साहित होइत पुछलनि, "कोन गाम यौ? एकदा हम्में बेनीपट्टी ब्लौक मे रहियै।"
     ‌‌ ‌     दयाल बाबू कें बाज' सं‌ पहिने रजनी बाबाक गपक प्रवाहकें रोकलकि। ओकरा बुझल छै जे गपसप मे ओकर बाबा ध' लै छथिन, तं जल्दी छोड़ै नहि छथिन।‌ ओ बाजलि, "सब बात एक्के दिन पुछबहो। सर के देरी होब करै छनि।"
            सुबोध जयबा लेल उद्यत भेल, कि दयाल बाबू बजलाह, "एकटा आर आग्रह सर। हमर पेंसन खाता मे रजनीक नाम जोड़ा सकै‌ छै?"
      ‌‌‌     "नहि, पेंसन खाता मे पति वा पत्नीक नाम जोड़ल जा सकै छै। आन ककरो नहि।"
           "तकर बाद मानि लियौ जे हम्मे मरि गेलियै, त' शेष पाइ बैंंक जप्त कए लेतै?"
           "नहि, जं अहांक पत्नी नहि छथि, तं जिनका अहां चाही, नौमिनी बना सकै छी।"
    ‌ ‌     "तखन रजनिए के बना दियौ। एकरा छोड़ि हमर के हय?"
           "अपने नीक जकां सोचि क' कहि रहल छी?"
           "हं, हमर सिर्फ डांड़ स' निच्चा बेकाम हय। ऊपर एकदम ठीक।" दुनू कान्हकें‌ व्यायाम करबाक मुद्रा मे‌ आगां-पाछां घुमौलनि। अपन दुनू हाथसं दुनू बांहि पर थाप मारलनि, "देखियौ, ई सब एकदम्मे दुरुस्त छिकै। दिमागि आ यादास्त एकदम ठीक। तें पूरे होशमे कहै छी जे रजनिए के हमर नौमिनी बना दियौ। जहां बोलियौ, हम्मे दसखत कए देब।"
   ‌‌‌         "मुदा, पहिने दसखत त' ठीक करू।"
            "ई काज सभ जहिया अपने बोलैबै, हम्मे बाबा के लए के आबि जैब।"
            दयाल बाबूक व्यक्तित्व कने आकर्षित कयलकै सुबोध के। हुनका प्रणाम करैत ओ अपन काउण्टर पर जाय लागल। रजनी कें कहलक, "चलू। एकर पावती ल' लिअ' आ शेष काज लेल फार्म सभ सेहो।"
            "अपने एतना काम कए देलियै हन, से की कम बात छिकै। रसीद लए के हम्मे की करबै।‌ अपने पर पूरा बिसबास छै। बरू फारम सब दए दियौ।"
            रजनीक गपक दही मे सही लगौलनि दयाल बाबू, "सुबोध बाबू! नुनू ठीके बोलि रहल हन।‌ की होतै रसीद? अपने एतना सज्जन बुझाइ छिकियै, से हम्मे अपने के की बोलू? एगो अपने छिकियै, एगो अपने स' पहिने बला छला। कोनो तुलने नहि। अपने गहूम‌ आ ऊ गर्रो।"

सुबोध बिदा भेल। रजनी ओकर पाछां-पाछां छलि। ओ टोकलकि, "बाबा त' दोसरे बात बोलला। असल बात.."
           सुबोधक पयर अनचोके थम्हि गेलै।‌ पाछां घुरल, "की?"
          "इहे जे आइ एक्को महिना के पेमेंट नहि हेतै त' चरिचक्का के किरायो नहि होइ पैतै?"
      ‌‌‌    "माने?"
         "हम्मे आर सोचलियै जे रूपा मिलिए जेतै, तें गाम मे बेबस्था नहि केलियै।" रजनीक माथ झुकि गेलैक।
          "देखियौ! हम नियमक अनुसारे कहलहुं-ए। जं संभव होइतै, त' अबस्से पेमेंट क' दितहुं।"
    ‌‌‌      "से, अपने के बात पर भरोस छै सर।"
         "कत्ते पाइ लैए कार बला?"
          "चारि सौ रूपा?"
          "से किए? दुओ किलोमीटर दूर नहि अछि अहांक गाम। तखन?"
         "पहिने पेंसन लेबए अबियै, त' भीड़ होब करै आ समय लागि जाइ। तें देरी होइ जाइ। से सब जोड़ि लै। बेसी नहि लै छै। हम्मे आर गाम मे नहि ने रहै छियै।"
          "तं कत' रहै छी?"
          "से सब कोनो दोसर दिन बताएब।‌ एखन अपने जइयौक। हम्मे आर बहुत समय लए लेलौं। फारम दोसर दिन आबि कए ल' लेब। हमरो लेट होइ रहलैहन।‌ एखन चलबै त' समय पर क्लिनिक पहुंचि जेबै।"
            रजनी घुरि गेलि। मुदा, सुबोध‌ टोकि देलकै, "मुदा, कार के किराया कोना‌ देबै?"
           "जा क' देखबै जे कोन बेबस्था होइ छै।"
          सुबोध अपन पर्स बहार क' चारि टा नमरी बहार करैत बाजल, "जं बेजाय नहि मानी, तं ई राखि लिअ'। पेंसन लेब' आयब तं घुरा‌ देब।"
          रजनी असमंयश मे ठाढ़ि रहलि।
   ‌‌‌‌‌      सुबोध बाजल,‌ "सोचू नहि, हम कर्ज द' रहल छी। हमरा घुरा देब। राखू। हमरा लेट भ' रहल अछि।"
    ‌      रजनी टाका लैत बाजलि, "सर, अइ मदति के हम मोन राखब। एखने बाबा के बोलबै हम्मे।"
          जानि नहि, रजनीक बोल सुबोध सुनि सकल कि नहि। ओ अपन काउण्टर दिस विदा भ' गेल रहय।

सुबोधकें दयाल बाबू नीक लगलखिन। रजनीक निश्छलता सेहो प्रभावित कयलकै। दयाल बाबूक बारेमे बूझि गेल, मुदा रजनी? ओकरा बारेमे बस एतबे बुझि सकल जे कोनो क्लिनिकमे काज करैए। मोन भेलै जे डेरा गेलाक बाद पत्नीकें आजुक बात कहत। कहत जे ओ दयाल बाबूकें चारि सय टाकासं मदति कयलक। रिफंडेबुल।
             संध्याकाल भेबो कयलै ओहिना। फ्रेश भेलाक बाद पत्नीक खेरहा कहलक। जाहि प्रशंसाक लोभें ओ पत्नीकें कहलक, से उन्टा पड़ि गेलै। पत्नी पुछलकि, "बूढ़ा के मदति केलियै, की मौगी के? अहां त' दानवीर कर्ण बनि गेलहुं।"
             "अहां दोसर रूपें सोचलियै एहि बात के। एना नहि सोचियौ।"
             "हम बेजाय नहि सोचलहुं। अहां लग एहन बहुत लोक आबि सकैए। सभ के देबै जेबी सं?"
              "अरे, हम पैंच देलियैए। जहिया पेंसन भेटतै, घुरा देत। ई बुझियौ जे पेंसन लेब' हमरे लग आओत, हम काटि लेबै।"
             "एकटा बात पुछू?"
             "पुछू ने।'
             "जं ओहि बुढ़बाक संग ओकर पोती नहि रहितै, त' दितियै?"
             "केहन गप करै छी?"
             "ठीके करै छी। जे भेल से भेल। नोकरी करै छी, नोकरी करू। लहना लगायब बन्द करू। सेठ-साहुकार नहि छी अहां।"
            सुबोधक मोनमे एकटा किछु गड़ि गेलै। पत्नीक गपक कोनो उतारा नहि देलक।

ओकरा मोनमे जे गड़लै, तकर बिसबिस्सी ओहि मासक अंत धरि रहलै।
          रजनी अपन क्लिनिकक फोन नम्मर देने रहै। कहने रहै जे पेंसन खातामे जमा भेलाक बाद फोन क' दिअय। फोन रिसेप्सन पर रहै छै। कहतै तं बजा देतै। मोन होइ जे फोन करय। मुदा, अनेरो ओकरा फोन करब नीक नहि लगलै।
             खातामे पेंसन जमा भेलाक बाद सुबोध रजनीकें फोनसं जनतब देने रहय। आ प्राते भेने रजनी अयलै। सुबोधक काउण्टर पर ठाढ़ भ' प्रणाम सर कयलकै। सुबोध ओकरा देखितहिं थथमथाएल। रजनी ओकर असमंयश बुझलकि। बाजलि, "अपने फ्री भ' जैयौ। ताबत हम्मे बैसै छी।"
            "बाबा अयलाह-ए?"
            "नहि।"
            "किएक?"
            "अपने फ्री होइयौक ने, त' कहै छी।"
            रजनी ग्राहक बला कुर्सी पर बैसि गेलि।

सुबोधक काउण्टर खाली भेलाक बाद रजनी सुबोधक सोझां ठाढ भेलि। बाजलि, "हम्मे सोचलियै से पेमिंट स' पहिने बला कागजी काज आर कराए लियै। तखन बाबा के नानियनि। नहि त' बहुत समय लागि जाइ छै।"
           "एत' निचैनसं फार्म नहि भरि पायब। चलू कैंटिन रूममे।'
           रजनी सुबोधक पछोड़ धयलकि। लंचक समय भ' गेल रहै, तें किछु स्टाफ सेहो ओत' छल।
           फार्म सभ भरि क' तैयार कयलाक बाद रजनीकें दैत सुबोध बाजल, " काल्हि वा जहिया सुविधा होअय, एहि फार्म सभक संग बाबाकें नेने अयबनि।"
            "हम्मे सोचै छिकियै जे अपने के उपकार हम्में..." रजनी आगां नहि बाजि सकलि।
            कने थम्हैत एकटा पुरान सन लिफाफ सुबोधकें दैत बाजलि, "ई राखि लियौक।"
            "ई की छै?"
            "लिफाफ छै। पहिने राखियौक‌ ने।'
             सुबोध लिफाफ पकड़लक। रजनी बाजलि, "ओहि दिन गड़ी के किराया बला हय। बहुत खगल समय पर अपने मदति केलियै। बाबा बोललखिन जे सर भगमान बनि क' ठाढ़ होलखु‌न।"
             "एहन बात नहि। एत' सभ आदमिए छै। ई एखन किए घुरौलहुं-ए। पेंसन लितहुं तखन दितहुं।"
            "हम क्लिनिक स' अगाउ मांगलियै त' डाक्टर साहेब दए देलखिन। अचरजे लगलै जे एक्के दा मांगलियै आ ऊ दए देलखिन।"
            "क्लिनिक मे नर्स छियै?"
            "नहि, नर्स सन पढ़ल-लिखल लगै छी हम्मे? हम्मे त' गमार छिकियै।"
            "तखन?"
            "हेल्पर के काज करै छियै।"
            "अहांक पति?"
            "पता नहि, कत्त' छै। हमरा दागि देलकै आ भागि गेलै। एकटा बेटा छै। तीसरा मे पढ़ब करै छै। बोरिंग स्कूल मे दए देने छियैक।"
           "ओह। मुदा, पति जे भागि गेलाह तकर..."
    ‌‌ ‌      "तकर कारण फेर कहियो कहब। अपने के सीट पर खोजब करैत हैत। त' काल्हि अइयै बाबा के लए के?"
            "अबियौ ने। कखन एबै?"
           "दोसरके बेरिया मे ने? तखन अपने फ्री रह। आ हमहूं आधा दिन के छुट्टी लए लेबै।"

दयाल चन्द्र शर्माक प्राय: सभ काज भ' गेलनि। रजनीक नाम हुनक खातामे नामिनीक रूपमे चढ़ि गेलै। तकर रसीद सेहो मिलि गेलै। एकठाम बात अंटकि गेलै रहै। दयाल बाबू भने कहथुन जे डांड़सं ऊपर एकदम ठीक अछि, मुदा हाथ खूबे कांपनि। नव जे दसखत लेल गेलनि से एकरंगाह नहि भ' पाबनि। जतेक बेर करथिन, ततेक रंगक होनि। अंतरो थोड़-बहुतक नहि। तखन एक्केटा उपाय। ओ औंठा छाप लगाबथि।
             औंठा छापक नाम पर दयाल बाबू तैयार नहि होथि, "सुबोध बाबू! कहलौं ने जे हम्मे यू डी सी स' रिटायर छी। पढ़ल-लिखल छी। हम्मे जे मसौदा लिखि दियै, से हाकिमक बापो के मजाल नहि रहै जे ओहि मे कत्तौ कलम लगैबितैक। से, हम औंठा छाप लगा क' कोना घोषित करू जे निरक्षर छी। दिन-समैया खराप होइ गैलै, तें..."
    ‌‌        "अपने एक रंग के दसखत नहि क' पबै छियै, त' कोन उपाय? जत्ते बेर अयबै, दसखत नहि मिलत त' अहीं परेशान हेबै ने। तंग हेती रजनी जी। जाबत हम छी, मानि लिअ' जे सुविधा भेटि जायत। हमरा बाद दोसर जं एहन सुविधा दै बला नहि आयल त'....?"
          "से त' अइबे ने करतै। अपने जैसन ने पहिले अइलै आ ने बादो मे औतै। बाबा! औंठा छाप लगौने तोएं मुरुख थोड़े होइ जेबहो? तोहें जे छिकहो से त' पूरा इलाका जनै छह। जै मे सुभिस्ता हेतै, सेहे ने ठीक।"
    ‌‌ ‌       "लेकिन औंठा छाप लगैने चेक नहि ने मिलतै। तखन त' महिने-महिना आबए पड़तै।"
           "तकर व्यवस्था भए जेतै।"
           "की?"
           "भए जेतै ने।"
            आ एत्तेक निस्तुकीक बाद दयाल बाबू औंठा छाप लगौलनि।
             व्यवस्था एहन भेलै जे सुबोध प्रत्येक मास हुनका ओत' जायत आ अपना सामने मे हुनकर औंठा छाप लेत। टाका रजनी ल' जायति। ई व्यवस्था दयाल बाबूकें नीक लगलनि।
             सुबोध प्रत्येक मास रजनीक डेरा पर जा क' ई काज करय, तखन दयाल बाबू कें पेन्सनक भुगतान भेटनि। दयाल बाबू आ रजनी एकरा बड़का उपकार बुझय।
             एही क्रममे सुबोधकें अवसर भेटलै जे रजनीक बारेमे बुझय। ओ बुझलक जे रजनीक ब'र दोसर बियाह क' लेलकै। ताहिमे एकर भाइक विशेष हाथ छलै।
             "कोनो भाइ चाहतै जे ओकर बहिनोइ ओकरा बहिन कें छोड़ि दोसर बियाह क' लै।"
            "आर चाहौ कि नहि, हमरे भाइ चाहलकै। असल बात ई रहै जे बाबा के पूरा धन हमर दादा अपना नामे लिखाय लेलखिन। बाबा के बचलै मात्र पेंसन। हमरा एक्के गो भाइ। बाबा के सम्पत्तियो लए लेलकै आ घर मे राखैयो नहि चाहलकै। हम्मे बाबा के पच्छ लेलियै, त' हमरा दुनू के घर स' निकालि देलकै। हम्मे डाक्टर साहेब के सर्भेन्ट रूम मे बाबा के लए आनलियै। हमर भाइ चाहै-  ने हम्मे आर गाम मे रहियै, ने हिस्सा मांगियै। बैला देलकै।"
           एही क्रममे सुबोध के बुझना गेलै जे रजनीक ब'र जे एकर भाइये चढ़ा-बढ़ा देलकै-
           "हमरा साईं के हमर भाइये बोललकै जे डाक्टरे स' फंसल छै हमर बहिन। एक-दू दा हमर साईं के भ्रम सच्चे नाहित लगलै। होलै एहन जे क्लिनिक स' सब चलि जाइ तखनो डाक्टर साहेब हमरा रोकने रहथिन। इहे बात आर हमरा साईं के बरदास नहि होलै। दोसर बात ई जे..."
           "की?"
           "हमर बियाह होल रहै - पकड़ौआ। केतना ने पर-पंचैती के बाद हमरा राखलकै। राखितै की? कोनो काम-रोजगार नहिए सन करब करै। हम्में ई काज धरलियै। बस, लाट साहेबी करए लगलै। पाकिट खर्चा हमर भाइ दै। दारुओ-तारू के चसक लागि गेलै। आ बाद मे एगो मौगी के लए के भागि गेलै। लोक आर बोलब करै छै जे भगाबैओ के बेबस्था हमर भाइए कैलकै।"
            "किएक? अहां के भाइक प्रति किछु झूठ नहि ने केओ कहि देलक?"
            "सर, अपने होलियै सुद्धा लोक। हम्मे सब बात बूझि गेलियैक। भाइ ओकरा बैलाए देलकै। हम्मे होलियै अकेला जनिजाति। ताहू पर बूढ़ विकलांग बाबा। के जेतै हिस्सा मांगए?"
            "ओ..."
           "आब अपने बोलियै जे हम्मे बाबा के देखियै कि...."

सुबोधकें मोन पड़लै। जहिया पहिल बेर रजनीक डेरा पर गेल रहय, तं कोनादन लागल रहै। डाक्टरक मकानक गैरेज दिस एसबेस्टसक पलानी खसा क' बनाओल कोठरी। भीतरे-भीतर एकटा ओसार सन घेराएल, ताहिमे दयाल बाबूक खाट। कोठरीमे रजनीक चौकी। भानसक इंतिजाम सेहो ओही‌मे। हं, डाक्टरक बहरिया बाथरूम एकर पलानी दिस‌ रहै, जे एकरा कोठरी संग अटैच भ' गेलै।
           ओहि दिन दयाल बाबूसं गपसप भेलै। चाह पीलक आ घुरि आयल।
            आयबे-जायबक क्रममे सुबोधकें बुझना गेलै जे रजनी के क्लिनिकक अलावे डेरामे सेहो काज कर' पड़ैत छै। मेम साहेब कखनो बजा क' किछु अढ़ा दैत छथिन। अढ़ाएब अपन अधिकार बुझथि मेम साहेब। रजनीकें रह' लेल घर देने छथिन। हुनका मोन होइ छनि त' क्लिनिकमे फोन क' दै छथिन जे रजनी दाइ के घर पठाउ । एहि दुनू ठामक काज पूरा कयलाक बाद‌ अपना घरक काज आ बाबाक सेवा।
  ‌‌‌         सुबोधकें रजनीक प्रति निष्ठा उपज' लगलै...एकटा विशेष भाव जनम' लगलै। ओ निर्णय नहि क' पाबय जे ओ कोन भाव छै? कोन भाव छै जे बेर-बेर रजनी ओकरा‌ सोझांमे जगजियार भ' जाइ छै। आ सैह निस्तुकी करबा लेल कोनो मास बिच्चहुमे ओ दयाल बाबूसं भेंटक बहन्ने रजनीक डेरा पर चलि जाय।
          एकदिन भेलै एना जे लाइन कटल रहै। रजनीक घरमे डिबिया जरैत रहै। सुबोध पहुंचल। केबाड़ खोलबाक आ बन्न करबाक क्रममे डिबिया मझा गेलै। प्राय: दुनू अकबका गेल। रजनी सलाइ ताक' लेल थाहैत-थाहैत बाबाक कोठरी दिस जाय लागलि। आ कि तखने दयाल बाबू पुछलनि-
           "नुनू गे! डिबिया किए मिझा गेलौ?"
           "सर अयलखिन हन। केबाड़ी खोलए आ बन्द करए मे डिबिया बुति गेलै। हे भेटि गेलै सलाइ।"
          डिबिया बारलाक बाद दुनू एक-दोसराक कपार पर पसेनाक बुन्न देखलक आ कने काल देखैत रहल।
           "लालटेमे ने किए बारि लेलें नुनू?" दयाल बाबूक स्वर सुनि दुनू साकांक्ष भेल।
           "तोरा नहि ने बुझल ह'। मटिया तेल मिलै हइ सौर्टकट मे। एन्नी लाइन कराबर काटब करै छै। तें डिबिया बारै छियै जे मटिया तेल कम लगतै।"
         

सुबोध रजनीक संग दुख-सुख बतिआय लागल छल। रजनीक संघर्ष ओकरा प्रभावित करै। ओ रजनीसं पुछलक, "अहां एत्तेक काज करै छी। मोन नहि होइए जे कखनो किछु समय अपनो लेल बहार करी। अपनो लेल जीबी।"
            "मोन केकरा ने करै छै सर? मगर, हमर चिनवार, चौकठि आ अंगना इहे छिकै। ई रूम, क्लिनिक आ डाक्टर साहेब के डेरा।‌ बस...इहे दुनिया छै हमर।"
            "मुदा एमहर सं बाहरो दुनिया होइ छै, जत' भने कनिए काल लेल होइ, लोक मात्र अपना लेल जीब' चाहैए। अपन एकान्तमे चैनसं रह' चाहैए‌।"
           "सर, अपने पत्थर पर दुब्भी उगाबए चाहै छियै?"
            "नहि, हमरा मोन‌ मे जे आयल, से कहलहुं। आ  पाथर पर दूभि उगयबाक बात सोचल नहि जा सकैए?"
             "से ने किए?"

किछु मासक बाद मासक बिच्चेमे रजनी आयलि। किछु टाका बहार करबाक रहै। सुबोध एकटा परिवर्तन देखलक। ओहिदिन रजनीक सिऊंथमे सिन्नुर नहि रहैक। सुबोध एहि मादे पुछलक तं बाजलि, "जखन साइंए ज'र मे नहि रहलै, त' सिन्नुर किए ओगरतै हमर सीथ?"
           बाजि तं गेलि रजनी, मुदा ओकर संवादक भितरिया जे पीड़ाक अनुभूति रहै, से सुबोध लग साफ-साफ झलकि गेलै।

रजनीक घरमे एकटा अज्ञात महिलाकें देखि सुबोध कोठरीमे पैसबा काल थोड़े इथ-उथ मे पैसि गेल। मुदा, ओ महिला एकर असमंयश कें तोड़लकि। सुबोधक स्वागत करैत बाजलि, "आबियौ सुबोध सर‌।"
         "एम्हरे चौकिए पर अबियौक।"
         महिला दिस तकैत पुछलक सुबोध, "अपने?"
          "हम रजनी के पड़ोसी होलियै। स्वास्थ्य विभागमे अधिकारी छिकियै।  अपने दुनू के बारे मे हमरा सब कथू बुझल हय। रजनी अपने के बड़ प्रशंसा करब करै हय। नीक बात।"
           ताबते दयाल बाबू हाक देलनि, "नुनू गे, दवाइ नानलहो?"
           रजनीकें मोन पड़लै। बाजलि, "अपने आर गप करियौ। हमे क्लिनिक स' बाबा के दवाइ  लेने आबै छी।"
           रजनी कोठरीसं बहरा गेलि।
           "सुबोध बाबू! एगो गप हम्में अपने स' बतिआय चाहै रहियै।"
            "बाजू।'
           " रजनी के त' देखिते छियै जे कत्ती मोसीबत मे छिकै।"
           "जी। मेहनतिओ तेहने छथि।"
           "मुदा एत्ती के बादो एकर भविष्य निश्वित नहि छै। घरबला छोड़ियो देने छै। बेटा के बन' मे बड़ देरी छै। केना चलतै एकर पहाड़ नाहित जिनगी?"
            सुबोध चुप।
            "अपने एकरा लेल बहुत कयलियै। एकटा आर काज कए देबै त' एकर जिनगी बनि जेतै।"
             सुबोधक मोनमे एकटा डर पैसि गेलै। पहिले भेंटमे ई महिला एहि तरहें की कह' चाहैए? की बूझैए हमरा दुनू के? भ्रममे तं ने अछि?
            "बोललियै नहि।"
            "बाजू ने हम की क' सकै छियनि? हमरा बुतें जे नियमानुसार संभव होइ छनि से सहयोग करिते छियनि।"
             "कहू त', बूढ़ा ज' मरि जेथिन त' पेंसनो बन्द भए जेतै।'
             "जी।"
             "ऐसन उपाय नहि होइ सकै छै जे बूढ़ा बला फैमिली पेंसन रजनी के भेट सकै।"
            "नहि, हमरा तेहन कोनो उपाय नहि बुझाइए।"
            "मुदा हमरा लग उपाय अछि। अहां बैंकक काज सम्हारि दियौ। जिनगी बनि जेतै एकर।"
           "नियम सं बाहरक कोनो काज नहि क' सकै छी हम।"
    ‌‌‌‌       "हम नियमक भीतरे के बात बोलै छी।"
           "जं बूढ़ाक संग रजनीक कोर्ट मैरेज करा देल जाय तं..."
             सुबोधकें लगलै जे स'री धिपा क' केओ कानमे ध' देने होइक।
            "समाजमे त' दादा-पोतिए रहतै, मुदा सरकारी अभिलेखमे पति-पत्नी। बूढ़ाक बाद फैमिली पेंसन एकरा भेटैए ने लगतै।"
             सुबोधक तामस सुनग' लागल रहै।
              महिला बाजि रहल छलि, "एमहर सरकारी काज हम सम्हारि लेबै। बैंकक काज अहां सम्हारि दियौक।"
              सुबोध आब बरक' लागल छल।
             "कत्ती दिन स' ई बात हमरा मन मे छै। रजनिया के कहियै जे अपने स' भेंट करा दिअय। मुदा, अपने अबियै, से सूचने ने दिअय। आइ अपने के आब' के सूचना भेल त' अपने स' पहिने दरबर मारने आबि गेलौं। ओना कानून स' त' भैए जेतै, मुदा हम चाहै छियै जे चुपचुप भ' जाइ। समाजक लोक के, बुझिते छियै- कत्ती ने हाथ, पैर, कान आ मुह होब करै छै।"
            सुबोध के रहल नहि गेलै। एकटा तीव्र गतिए कोठरीसं बहार भेल, स्कूटर स्टार्ट कयलक आ गति पकड़ि लेलक। मोन कोनादन कर' लगलै। सोचलक, एहि प्रस्ताव लेल रजनी तैयार अछि? ओना होअय वा नहि, ओ रजनीक ई रूप नहि देख' चाहैए। स्कूटरक हैंडिल तलमलाए लगलै। ठाढ़ क' देखलक। टायरमे कांटी गड़ि गेल रहै।
            सुबोधकें घरमे नहि देखि रजनी बाजलि, "काकी, अपने के मना कयने रहियनि जे ई बात सर के नहि बोलबै। लेकिन नहि मानलियै अपने। एकदा फेर खतम होइ गेलै। जिनगी मे पहिले दा एगो नीक लोक राह देखबए बला हमरा मिलल रहथिन,‌ तिनको..."
            सुबोधक पयर रजनीक डेरा दिस नहि घुरलै।
                            ######
बेगूसराय / 01.02.2024
प्रकाशित - समदिया मिथिला (दैनिक) 10 फरवरी 2024
कथा-संग्रह "इएह हमर संसार" मे संग्रहित।