Monday, August 26, 2024

मकड़ी (मैथिली कथा - प्रदीप बिहारी) MAKADEE (Maithili Short Story by Pradip Bihari)

मकड़ी



प्रदीप बिहारी


सौंसे बजारमे हल्ला पसरि गेलैक जे एकटा मौगी अयलै-ए। सिलाइ मशीन चलबैत छैक। नव-पुरान कपड़ा सीबैत छैक। बड़ सुन्नरि छैक। एकसरिये छैक। ओकरा संगमे केओ नहि छैक आ ओ ककरो दिस तकितो ने छैक।
दारू आ चाहक दोकान वाली मौगी सभ अपन संसद शुरूह कऽ देने रहैक। भागि कऽ आयल होयतैक। घरबला छोड़ि देने होयतैक। चोरनी होयति। छिनारि होयति।
एकटा दोसर मौगी बजलैक, ‘‘जरूरी छै जे अधलाहे होयतै। नीक लोक नहि भऽ सकै छै। इहो तँ भऽ सकैत छै जे...’’
मुदा सत्तारूढ़ मौगी ई कहि ओकरा चुप कऽ देलकैक जे सतबरती रहितै, तँ दिल कुमारीक घरमे किराया नहि लैतै। दिल कुमारी अपने ने कतेक घाटक पानि पीने अछि। ओकर किरायादार की सैंतलि होयतै?
जे, से। समय बीतऽ लगलैक। सुनीता नवसँ पुरान होमऽ लागलि। दिल कुमारी ओकर व्यवसाय आ जीवनमे अनेरे कोनो हस्तक्षेप नहि करैक।
दिल कुमारीकें ओ ‘काकी’ कहऽ लागलि।
आब किछु स्त्रीगण सेहो ब्लाउज आ साया सियाबऽ या भंगठी कराबऽ आबऽ लगलैक। मुदा, बेसी काज जुअनके छौंडा सभक ओकरा लग आबऽ लगलैक।
ओ अनुभव कयलकि जे ओकरा अयलाक बाद जुआन सभक पेन्ट आ अंगा बेसी फाटऽ लगलैक अछि। सभ ओकरे लग कोनो-ने-कोनो बहन्ने आबि जाइक।
मौगी सभक संसदमे प्रस्ताव पारित भऽ गेलैक। जँ मीठ नहि छैक, तँ चुट्टी किएक सोहरैत छैक?
सुनीताकें अपन खर्चक योग्य आमदनी भऽ जाइक। आर बेसी ओकरा किएक चाही? ओकर के छैक? ने आगू, ने पाछू।
एकटा गहिंकी आयल छलैक। नगरपालिकाक मेहतर। ओ कहलकै सुनीताकें, ‘‘हमरा बेटीक बियाहमे किछु कपड़ा सिअयतै। सीबि देबहक बहिन? तोहर सिलाइ किछु देबह आ किछु उधारी रहि जेतह। अगिला मास देबह।’’
सुनीताकें लगलैक जे जीवनमे पहिल बेर केओ ओकरा बहिन कहलकै-ए। ओ द्रवित भऽ गेलि, ‘‘तोरा बेटीक बियाहमे जतेक कपड़ा सीअयतह, हम एक्कहुटाक पाइ नहि लेबह। जाह! जहिया मोन होअऽ दऽ जइयह।’’
जानि नहि, सुनीताकें ओहि राति की भऽ गेलैक? निन्ने ने होइत छलैक। ओहि गहिंकीक गप्प बेर-बेर मोन पड़ैत छलैक, ‘‘हम तँ जानि-बूझि कऽ फाटल-पुरान लऽ कऽ तोरा लग अबैत छी। तोहर रूप हमरा मोहने जाइत अछि। तों एकटा मरद किएक ने कऽ लेत छह। असगरे कतेक खटबह?’’
सुनीता डाँटि कऽ भगा देने छलि ओहि गाँहककें। ओकरा कपड़ा सेहो घुरा देने छलि।
मुदा, सुनीता बेर-बेर अयनामे अपन मुँह देखैत छलि। साँचे, ओ एखनहुँ सुन्नरि अछि। ओकर बयसे की भेलैक अछि। बड़का घरक बेटी रहैत तँ एखनि बियाहो नहि भेल रहितैक। बीस-एकैस कोनो बयस होइत छैक? ई बयस तँ पोखरिमे चुभकऽ बला होइत छैक...साओनक झूला झूलऽ बला होइत छैक...कोनो राजकुमारक सपना देखऽ बला होइत छैक।मुदा, पुरुषक प्रतापें सुनीताकें एही बयसमे गृहस्थी सम्हारऽ पड़ि रहल छैक।
ओकरा बियहुआ मोन पड़लैक। पहिल बियाह, बियाह सन भेल रहैक। वर अयलैक, बरियात अयलैक। गाजा-बाजा बजलैक। खूब धूम-धामसँ ओकर वियाह कयने रहैक ओकर बाप। माय तँ ओकरा अबोधेमे छोड़ि अनका संग चलि गेल रहैक। तें सभ निमेरा ओकर बाप कयलकै।
ओहि समय सुनीताक बयसे कतेक रहैक? पनरह मे छलि। ई कोनो बियाहक बयस होइत छैक? मुदा, ओकरा बापकें अल्प बयसहिंमे विकसित ओकर देह अबूह लागऽ लगलैक। दोसर आशंका एहि बातक रहैक जे माये जकाँ इहो ने ककरो संग माया-पिरती जोड़ि लिअय आ...। तेसर स्वार्थ प्रायः ई रहैक जे बेटीकें बिदा कऽ देने दारू पीब लेल छुट्टा भऽ जायत। केओ रोकनिहार नहि रहतैक।
आ तें सुनीताकें गरदामी पहिरा देलकैक ओकर बाप।
मुदा, छओ मास नहि बोतलैक कि अनर्थ भऽ गेलैक। सुनीताक सीउथ उज्जर भऽ गेलैक। चूड़ी फुटि गेलैक आ पोते टुटि गेलैक। लोक सभ सरापऽ लगलैक। सालो ने बीतलैक कि बियहुआकें खा गेलि।
सुनीताक चारूकातक संसार सुन्न भऽ गेलैक। कतहु किछु नहि। चारूकात अन्हारे अन्हार। कतहु कानो प्रकाश-पुंज नहि देखाइत छलैक ओकरा।
बियहुआक विरासतमे भेटल रहैक एकटा देशी गाय, जकर सेवा-सुश्रुषा करय। दूध बेचय आ दिन काटय।
मुदा, बयसकें बेसी दिन धरि गाड़ि कऽ तँ नहि राखल जा सकैछ।
किछु गोटें लोभायल रहैक सुनीता पर आ किछु धपायल। मुदा, समय सुनीताकें साकांक्ष बना देने रहैक। ओ भावावेशमे ककरो जालमे फंसऽ बाली नहि छलि।
किछु छौंड़ा सभ तँ हाथ धो कऽ ओकरा पाछाँ पड़ल छल। ओकरा घर पर अयबाक हिम्मति तँ नहि करैक, मुदा साँझ खन कऽ जखन घास आनऽ बाध दिस जाय, तँ छौंड़ा सभ किछु-ने-किछु टोनैत रहैक ओकरा।
जखने काली खोला पार कऽ चाहक दोकान दिस मुड़य कि हेम बहादुर टहंकारसँ गीत उठाबैक, ‘‘मानै ने छौड़ी हमर बतिया...फेरै ने एको बेर अंखिया.....हो ऽऽऽ हो ऽऽऽ।’ आ सुनीताक संगी सभ ओकरा खौंझाबऽ लगैक। एक बेर फेरही नजरि हेमे दिस। छौंड़ा जुआन छै। सुन्नर छै। तरहत्थी पर रखतौ। आर-आर बहुत रास बात सभ कहऽ लगैक, मुदा सुनीता लेल धनि सन।
ओहि दिन सुनीता काली खोला दिस नहि गेलि। सतीघट्टा बगान दिस चलि गेल- एकसरिये। जानि नहि किएक, बाट भरि हेम बहादुर ओकर मानसपटल पर जगजियार होइत रहलैक। आइ ओ छौंड़ा काली खोला लग एकर बाट तकिते रहि जयतैक। मुँहक गीत मुँहेमे रहि जयतैक छौंड़ाक।
सतीघट्टा बगानमे निश्चिन्तसँ घास कटैत छलि सुनीता। कने कालक बाद एकटा गीत सुनाइ पड़लैक- ‘माया को बाड़ी ना पिरती को फूल, संभाली राखऽ है कुसुमे रूमाल...।’
सुनीता चैंकि गेलि। ई तँ हेमेक स्वर छैक। एम्हरो चलि अयलै छौंड़ा। ई तँ दिक् कऽ देलकै। ओ सोचलकि। आइ जे ने झड़ान झाड़ति जे...।
पुनः दोसर मोन कहलकै। छौंड़ा कोनो बेजाय तँ नहि छै। यैह ने कने अहदी छै। एसगरुआ छै छौंड़ा, तें ने जेना-तेना रहैत छै। दोसरति भेटतै, तँ सम्हरि जयतै। ओकरो तँ एकटा पुरुष चाही। दुनू मिलि कऽ कमायत-खटायत। समय बीतैत रहतैक।
मुदा, ओ हेम बहादुरकें बोर्डर पर दू-नम्मरी धंधा नहि करऽ देति। बहुत रास दोसर-तेसर काज छैक। नीको काजसँ पेट भरैत छैक...।
सुनीताक गफ्फा घाससँ भरि गेल छलैक। गफ्फा दुखयलैक तखन अख्यास भेलैक। ओह..। ओ की सोचऽ लागल छलि। धुर जो....। ओ स्वयं मुस्कियाइति छलि। ई की भऽ रहल छै ओकरा?
आ कि तखने हेम बहादुर जुमि गेलैक। बाजल ओ छौंड़ा, ‘‘आखिर कहिया धरि अपन कोमल हाथ सँ हंसुआ धरैत रहबही, सुनीता?’’
सुनीता बाजलि, ‘‘देख हेमे! बरोबरि जे हमरा पछुअबैत रहैत छें, से नीक बात नहि। तोरा मोनमे की छौक? तौं अपन बाट किएक ने बदलैत छें?’’
हेम बहादुर छक्का मारलक, ‘‘हमरो मोनमे वैह बात अछि, जे तोरा मोनमे छौ। हम तोरा चाहैत छियौ। हम तोरा सँ बियाह करऽ चाहैत छी। हम चाहैत छी जे अपन दुनू गोटें...।’’
सुनीता बिच्चहिमे रोकलकि, ‘‘अपन मुँह देखलेहें। इह! हमरा सऽ बियाह करता। तोरा सऽ के बियाह करतौ? जकर सभ साँझ कान्छीक दारूक दोकानमे बीतै छै, तकरा बुतें बहु की डेबल हैतै?’’
मुदा, हेम बहादुर मानऽ बला नहि छल। ओ बाजल, ‘‘हम तऽ सदिखन तोरे मुंह देखैत रहै छियौ, तऽ अपन मुँह की देखियै?’’ कने थम्हैत पुनः बाजल, ‘‘तों जनिते छें जे हमरा माय-बाप केओ नहि अछि। एकटा खोपड़ी अछि, ओहीमे रहैत छी। ओहीमे तोरो राखबौ। राखबौ मुदा माया-पिरतीक संग। आ जहिया हम आ तों एक मोन, एक परान भऽ जायब, तहिया सऽ कान्छीक होटल जायब बन्न भऽ जेतै।’’
सुनीताक देह झुनझुना गेलैक। रोइयाँ ठाढ भऽ गेलैक। करेज धड़कऽ लगलैक आ ठौंठ सुखाय लगलैक।
ओ प्रश्न-दृष्टिएँ हेम बहादुर दिस तकलकि।
‘‘सत्ते कहै छियौ सुनीता।’’
ओ तकैत रहलि।
‘‘एकदम सत्त। जे किरिया खुआ ले।’’
ओ तकिते रहलि।
‘‘विद्यानाश।’’
सुनीताकें हंसी लागि गेलैक। ओ बड़ी जोरसँ हंसलि।
‘‘हँसी किएक लागि गेलौ तोरा?’’
हंसिते बाजलि सुनीता, ‘‘तों पढ़ले-लिखल कतेक छें जे विद्यानाश बला किरिया लगतौ।’’
‘‘विश्वास नहि होउक, तऽ आर दोसर जे किरिया खुआ ले, मुदा...।’’ हेम बहादुर सुनीताक मनःस्थिति बूझि चुकल छल। ओ सुनीताक हाथ पकड़ि लेलक, ‘‘संसारक पैघ सऽ पैघ किरिया खा सकैत छी हम। खुआ ले।’’
सुनीताकें मात्र एतबे बाजल भेलैक, ‘‘आब तकर बेगरता नहि छै।’’
बहुत दूर पच्छिम दिस मेघ हड़हड़ा उठलैक। बिजुली चमकि उठलैक। लगलैक जेना ओतऽ दू गोटा नहि, एक्कहि गोटा ठाढ़ होअय।
हेम बहादुरक बाहुपाशमे सुनीताकें सुखक अनुभूति भेलैक।
मोन्हारि साँझ भऽ गेलैक। दुनू बिदा भेल। सुनीता निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि जे ओ हारलि अछि आ कि जीतलि।

दुनू दाम्पत्य बन्हनमे बन्हा गेल। टोल-पड़ोसमे फदका होमऽ लगलैक। नहूँ-नहूँ सभ किछु सामान्य भऽ गेलैक।
बियाहक बादो सुनीता अपन घर आ गायक सेवा नहि छोड़िलकि। हेम बहादुर अपन खोपड़ी अपन संगी दीपक सुब्बाक हाथें बेचि देलकैक।
दुनू कमाय-खाय लागल आ रहऽ लागल। घास काटऽ लेल सुनीता नहि, हेेम बहादुर जाइक।
समय पर समयक पथार लागऽ लगलैक।
मुदा, बहुत दिन धरि एहि तरहें नहि रहि सकल ओ सभ। हेम बहादुरक बहसल मोन छान-पगहा तोड़ऽ लगलैक। ओकर लुतुक अकास चढ़ऽ लगलैक। सुनीता अपनामे कमी ताकऽ लागलि। आखिर ओकर हेमे पुनः किएक बहकि रहल छैक।
हेम बहादुर दारू पीबि कऽ आबऽ लागल आ सभ राति कऽ दूनू प्राणीमे झगड़ा होमऽ लगलैक।
दरुपीबा पुरुष सुनीताकें किन्नहुँ पसिन नहि छलैक।
नहूं-नहूं हेम बहादुरक आन-आन बानि सभ सेहो सुनीताकें बुझबामे अयलैक। ओ हेम बहादुरकें समझाबऽ-बुझाबऽ लागलि, मुदा ओकर सभ प्रयास व्यर्थ भऽ गेलैक।
स्थिति एतऽ धरि पहुँचि गेलैक जे हेम बहादुर आठ-आठ दिन घरसँ बाहर रहऽ लागल। ओकरा लेल सुनीतासँ बेसी महत्वपूर्ण भऽ गेल छलैक कान्छी दोकानक दारू....तिनपतिया.....पपलू....फलास...।
सुनीता सभ किछु सहैत रहलि।
सुनीताकें सभसँ बेसी दुःख ओहि दिन भेल रहैक जहिया ओकर गाय बिका गेलैक। हेम बहादुर दुखित होमऽ लागल रहय। ओकरे दवाइ-बीरो लेल सुनीताकें गाय बेचऽ पड़लैक।
सुनीताक गाय दीपक सुब्बा कीनने छलैक। हेम बहादुरक दोस।
एतेक दिन सभ किछु बर्दासि कयलकि सुनीता। मुदा ओहिदिन हेम बहादुर साफे कहि देने रहैक, ‘‘आब तोरा सऽ मोन ओंगठि गेल।’’ ई गप्प सुनीताकें सहरजमीन पर आनि देलकैक। ओकरा पराजय-बोध भेलैक। लगलैक जे ओकरा जीवनमे हारिये-हारि छैक।
गाय बेचलाक बाद जे टाका भेटलैक, ताहिसँ थोड़ेक हेम बहादुरक दवाइ लेल खर्च कयलकि आ एकटा सेकेन्ड हैण्ड सिलाइ मशीन कीनलकि। वैह सिलाइ मशीन ओकरा जीवनक आबलम्ब भऽ गेल रहैक।
हेम बहादुर अपन बानि नहि छोड़ि सकल। ओकर रोग बढ़िते गेलैक। आब ओ घर आयब सेहो बन्न कऽ देने रहय। दीपक सुब्बा कहने रहैक सुनीताकें, ‘‘भौजी! दोसक रोग ठीक होमऽ बला नहि छौक। सम्पूर्ण विश्व एहि रोगक इलाज लेल अपस्याँत अछि। हम-तों की छी?’’
अन्ततः हेम बहादुरक जीवन-लीला समाप्त भऽ गेलैक। मेचीक कातमे मुइल पड़ल देखलकै लोक सभ। सुनीताकें कहलकै। ओ पाथर भऽ गेलि। देखहु लेल नहि गेलि हेम बहादुरक लहासकें।
हेम बहादुरक सेवामे ओ स्वयंकें एहि तरहे समर्पित कऽ देने छलि जे ओकरा इहो सोह नहि रहलैक जे मज्जर कहिया टिकुला भऽ गेलैक। सुनीताक हाथ-पयर भारी होमऽ लगलैक। अन्न-पानिसँ अरुचि होमऽ लागल रहैक। देह पीयर भेल जाइत छलैक। आदि आदि। आइ जखन हेम बहादुर नहि छैक, जखन ओकरा सोह भऽ रहल छैक जे ओ माय बनऽ बाली अछि।
दीपक सुब्बाक अबरजात बढ़ि गेलैक। मुदा, सुनीता ओकरा अपन उद्देश्यमे सफल नहि होमऽ देलकि।
सातम मासमे सुनीताके बच्चा भेलक। बेटा रहैक। मुदा छौंड़ा बंचलैक नहि। जनमि कऽ मरि गेलैक। दीपक दवाइ-बीरो करौने रहैक ओकर।
सुनीताक देहमे सक्क लागऽ लगलैक। ओ मशीन चलाबऽ लागलि छलि। दीपक आबैक। घंटाक घंटा बैसैक आ प्रणय निवेदन कऽ चलि जाइक।
सुनीताक मोन कोनादन करऽ लगलैक। लगैक जेना कोनो आवामे जड़ल जाइत होअय...अथाह पानिमे डूबल जाइत होअय...कोनो सड़ल-गन्हायल डबरामे उबडुब करैत होअय।
सभ पुरुषक आकृतिमे हेमबहादुरक छवि देखय सुनीता आ ओकर मोन तुरुछि जाइक।
ओ सोचलकि। दीपक सुब्बा घर-परिवार बला लोक अछि। ओकरा मात्र सुनीताक घर आ देह सऽ मतलब छै। ओ सुनीताक भऽ कऽ नहि रहि सकैछ।
ओ नियारलकि। आब बेसी दिन धरि अपन चेतनाकें ठाकि कऽ नहि राखि सकैछ। ओकरा की चाही? ओकरा नहि चाही सिन्नुर आ ने कोनो इलबाइस। ओकरा किछु नहि चाही। मात्र जीबाक लेल चाही पाँच हाथ वस्त्र आ पाँच कऽर अन्न। से ओ मशीन चला कऽ उगाहि लेति। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नहि चाही। ई घर नहि चाही। ई घर ओकरा काटि कऽ खा जयतैक। एत' भरि घर हेमे बहादुर देखाइत छै ओकरा।
आ एक दिन सुनीता अपन मशीन आ मोटा-चोटा उठौलकि आ आबि गेलि बजार। दिल कुमारीक घरमे किरायामे रहऽ लागलि।




दिलकुमारी केबाड़ पीटलकै, तखन तंद्रा भंग भेलैक सुनीताक। ओ हड़बड़ायलि। उठलि। राति भरि जागबाक उझकी रहैक। अंगैठी-मोड़ कयलकि। मोन भेलैक जे आइ काज नहि करय। दिन भरि आरामे करय।
मुदा से भऽ नहि सकलैक। नगरपालिकाक मेहतर अपन बेटीक बियाह वला कपड़ा आ नाप सभ दऽ गेलैक। संगहि एकटा समाद सेहो कहने रहैक, ‘‘बहिन गे! प्रधान पंच तोरा बजलकौ-ए। आइये दू बजे। आॅफिसमे।’’
सुनीता अचरजमे पड़ि गेल। प्रधान पंच ओकरा किएक बजौतैक? ओकरासँ कोनो अपराध तँ ने भऽ गेलैक अछि।
एतऽ अयलाक बाद कतोक आँखिक प्रहार सहलकि अछि सुनीता। बहुतो लोक हुलकी-बुलकी देलकैक। एक दिन दीपक सुब्बा सेहो आयल रहैक, मुदा ओ ओकरो मंँह दुसि देलकि। ओ अपरतीव भऽ कऽ चलि गेल। सुनीता अपन निर्णय पर दृढ अछि। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नहि चाही।
पुनः एकटा प्रश्न ओकरा मोनके हौंड़ि दैक। प्रधान पंच किएक बजौलकै-ए?
ओ कार्यालय पहुँचलि। प्रधान पंचसँ बजयकबा कारण पुछलकि। प्रधान पंच पुछलकैक, ‘‘तों एकसरिये रहैत छें?’’
‘‘हँ।’’
‘‘आर केओ?’’
‘‘केओ नहि।’’
‘‘एकटा काज कऽ सकैत छें?’’
सुनीताकें डर भेलैक। ओ डेरायलि बाजलि, ‘‘कोन काज?’’
‘‘कोनो खराप काज करऽ नहि कहैत छियौक।’’ प्रधान पंच एकटा अबोध बच्चा दिस संकेत करैत बाजल, ‘‘देख! ई अबोध अनाथ छैक। तोरो केओ नहि छौक। एकरा पोस। धर्मो होयतौक। पाछाँ जा कऽ ई बुढ़ारीक सहारा होयतौक। नगरपालिकासँ एकर खर्च सेहो भेटतौक, ‘‘एक सय टाका मास।’’
सुनीता ओहि छौंड़ा दिस तकलकि। देखनुक रहैक छौंड़ा। तीन-चारि बर्खक रहल होयतैक। ओ सकपका गेलि। बाजलि, ‘‘विचारि कऽ कहब।’’
‘‘ककरा सँ?’’
‘‘अपना मोन सऽ....काकी सऽ।’’
ताबत ओ अबोध आबि कऽ सुनीताक आँचर पकड़ि लेलक। सुनीता पुनः ओहि छौंड़ाकें देखलकि। ओकर वात्सल्य उमड़ि गेलैक। ओकर मोन पिघलि कऽ आँखि बाटें बहार होमऽ लगलैक।
क्षणहिं ओ नोर पोछलकि। नहि, ओ एक सय टाकामे एकटा घेध नहि लेति। स्वयंके कोनो सम्बन्धमे नहि बान्हति। कोनो सम्बन्ध नहि...कोनो सरोकार नहि...।
छौंड़ा आँचर पकड़नहिं छल।
दोसर मोन कहलकैक। ई घेघ नहि। कंठी-माला छौक-राम नामा। ई नहि ठकतौक। ई धोखा नहि देतौक। कतहु पड़ा कऽ नहि जयतैक।
सुनीतक मोन सकपक करऽ लगलैक। ओकर करेज जोर-जोरसँ काँपऽ लगलैक। ओ किछु निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि।
लोक सभ देखैत रहलैक। करुणा आ ममताक विचित्र दृश्य उपस्थित भऽ गेलैक।
सुनीताकें लगलैक जेना क्षणहिमे माया, मोह, स्नेह, भूख, प्यास आ ओकर सम्पूर्ण संवेदना जागि उठल होइक। ओकरा सकपंज कऽ लेने होइक। ओकरा हरलै ने फुरलै, ओहि नेना दिस तकलकि आ ओकरा कोरामे उठा कऽ चुम्मा लेबऽ लागलि।
मातृत्वक सजीव मूर्ति बनि गेलि सुनीता।
सुनीता कागज बनौलकि। नगरपालिका दिससँ तीन मासक अग्रिम भेटलैक आ छौड़ाकें लऽ कऽ डेरा आएलि।
सुनीताक निर्णय दिल कुमारीकें सेहो नीक लागल रहैक।
छौंड़ा बौक छलैक। छौंड़ाकें बौक होयब सुनीताकें कने झूस बना देने रहैक। ओ छौड़ाकें बजयबाक प्रयास करऽ लगलि।
ओहि राति सुनीताकें लागल रहैक जेना ओ खूब सुखसँ सुतलि होअय। बौकाकें करेजमे साटि कऽ सुतलि छलि। अपन जनमल नहि भेलैक ताहिसँ की? ओकर मातृत्व सजग भऽ गेलैक। मातृत्वक सम्पूर्णताक बोध भेल रहैक ओहि राति।
छौंड़ा बौके नहि, अखलाह सेहो छलैक। मुदा सुनीताक लेल ओ सोन सन छलैक। आब सुनीता ओकरा अपन संग काज-बट्टम बला काजमे सेहो लगाबऽ लगलैक।
शुरूहमे छौंड़ा बड़ तंग करैक ओकरा। काज दिस बट्टम लगा दैक आ बट्टम दिस काज बना दैक। नहूँ-नहूँ सुनीता ओकरा सीखाबऽ लागलि। छौंड़ा सीखि लेलक।
मुदा छौंड़ाक एकटा बानि एखनो छैके। एखनो ओ सुनीतक करेजेमे सटि कऽ सुतैत अछि। एक हाथ सुनीताक देह पर, दोसर...आ टाँग सुनीताक दुनू टाँगक बीच घोसिया कऽ...निर्विकार भावें सुति रहैक बौका। सुनीताक मातृत्व छिलकि जाइक। ओहो ओकरा पजिया कऽ सुति रहय।
ओना दिल कुमारी एक दिन मना कयने छहैक, ‘‘बौकाक ई आदति नीक नहि छैक। एखनि ने नेना छौक। नेने की? आब तऽ सियान भेल जाइत छौक। ओकर एहि आदतिकें छोड़ायब जरूरी।’’
सुनीता बाजि उठलि, ‘‘काकी। तोरो मोनमे पापे उठैत छौक। धुर जो....।’’

समय बीतऽ लगलैक। सुनीताक मशीनक चक्का चलऽ लगलैक। बौका काज-बट्टम करऽ लागल।
समयक संग मंहगी बढ़लैक। मजूरी, दरमाहा बढ़लैक। बढ़लैक कपड़ाक सिलाइ। बाट बढ़लैक। पीच रोड बढ़लैक। मोटर गाड़ी बढ़लैक। उड़ीस-मच्छर बढ़ि गेलैक। लबरै-लुचपनी बढ़लैक। दू-नमरी धंधा आकास छूबऽ लगलैक।
घरक किराया बढ़ि गेलैक। सुनीताक दोकान आ सुतबाक कोठरी फराक भऽ गेलैक। नगरपालिकासँ भेटऽ बला टाका बन्न भऽ गेलैक।
दिलकुमारीक बयस बढ़ि गेलैक।
बौका सेहो जुआन होमऽ लागल। सुनीता प्रौढा होमऽ लागलि।
समय बदललैक। राति-दिन मासमे बदलि गेलैक। मास बर्खमे। बर्ख युगमे। पंचायती व्यवस्था बदललैक। प्रधान पंच बदलि गेलैक। मेयर भऽ गेलैक। जनमत संग्रह भेलैक। आम चुनाव भेलैक। प्रजातांत्रिक व्यवस्था भेलैक। संविधान बदललैक।
मुदा, बौकाक बानि नहि बदललैक।
सुनीताकें लगैक जे ओ डोलि ने जाय। ओ बौकाक ओछाओन फराक कऽ देने छलि। मुदा बौका राति-राति भरि जागि कऽ बिता दैक। प्रात भेने जखन काज-बट्टम करैक तँ निसभेर भेल बुझाइक। आँगुरमे सुइया भोंकि लैक। सुनीताक ममता जागि जाइक।
एतेक दिन तँ नहि, मुदा आब बौका सुनीताक गराक घेघ बनि गेल छैक। सुनीता विचित्र उहापोहमे फंसलि छलि। बौका ओकरा गरदनिक ढोल बनि गेल छैक। ने बजौनहिं कल्याण आ ने हटौनहि शान्ति। कतऽ जयतैक छौंड़ा?
माघक पाला पड़ैत छलैक। दोकान बला कोठरीमे बौकाक ओछाओन कऽ देने रहैक सुनीता। मुदा छौंड़ा नहि मानलकैक। अन्ततः सुनीता अपन कोठरी बन्न कऽ लेलकि। बौका दोकान बला कोठरीमे ठिठुरैत रहल।
सुनीताकें सेहो निन्न नहि भेल रहैक। एकटा आशंका जगौने रहैक। बौका सुतलै आ कि जगले छैक?
ओ केबाड़ फोललकि। बौकाकें ठिठुरैत देखि ममता जागि उठलैक। ओकरा पुनः अपने लग बजा लेलकि। बौका गेल आ सुनीता लग अपन बानिक अनुसारें निर्विकार भावें सुति रहल- एकटा हाथ सुनीताक देह पर...दोसर...आ टाँग...। ओ निन्न पड़ि गेल।
ई क्रम पुनः चलऽ लगलैक। एही क्रममे एक राति डोलि गेलि सुनीता। कोन सीमा धरि संयमित रहितय? ओकर संयम टुटि गेलैक। सीमा पार कऽ गेलि। ओकर चेतना मरि गेलैक। ओ घिना गेलि।
मुदा, बौकाक लेल धनि सन। ओकरा ने हर्ष होइक आ ने विषादे।
प्रात भेने सभ किछु सामान्य रहैक। असामान्य मात्र एतबे रहैक जे सुनीता भरि मोन बौकाकें देखि नहि पाबय। ओकरा ग्लानि होइक। मोन होइक जे एहि घिनायल जिनगीसँ मुक्तिये उचित। मुदा बौका? ओकरा बाद बौकाकें के देखतैक?
आ सुनिता किछु नहि कऽ पाबय।
अपन सभटा असमर्थता एक दिन दिल कुमारीकें कहने रहैक सुनीता। दिल कुमारी सभ किछु सुनि लेने छलि आ अन्तमे बड़ निर्दयी भऽ बाजलि छलि, ‘‘जाहि दिन एहि छौंड़ा के जिम्मा लेलही, तहिया नहि बुझलही जे नमहर भऽ कऽ इहो पुरुषे हेतै।’’
आ सुनिता किछु नहि कऽ पाबय।
‘‘मुदा बौकाक कोन दोष छैक, काकी? ओकर कोनो दोष नहि छैक। हमहीं...।’’

एक दिन साँझ खन बौका बजार दिस बहार भेलैक, से घुरि कऽ नहि अयलैक। चारूकात ताक-हेरीमे लागि गेल सुनीता। रीति बीति गेलैक, मुदा बौका नहि अयलैक।
पाँच दिन बीति गेलैक। सुनीता कात करोटक सभ शहर-बजार आ गाम घर छानि लेलकि, मुदा बौका ने भेटलैक आ ने अयलैक।
सुनीता हारि कऽ बैसि रहलि। ओकर मोन हदमदाय लागल रहैक। देहमे कोनेा सक्के ने लगैक।
दिलकुमारी ओकरा सम्बल देलकैक ओहि दिन। ओ सुनीताक माथ अपन जाँघ पर राखि लेने रहैक आ ओकर केश पर हाथ फेरऽ लगलैक। सुनीताक जीवनमे पहिल बेर मायक छाँह सन लगलैक दिन कुमारीक स्नेहिल हाथ।
कने कालक बाद दिल कुमारी बाजलि, ‘‘उठ! आब बौका नहि औतौ। चल अस्पताल। खसबा दैत छियौ।’’
सुनीता टुकुर-टुकुर दिल कुमारी दिस ताकऽ लागलि। ओ कोनो निर्णय नहि कऽ पाबि रहलि छलि। दिल कुमारी बाजलि, ‘‘जाधरि मरैत नहि छें, मशीन चलाबहि पड़तौक। लोकक फाटल-पुरान सीबहि पड़तौक।’’

सुनीताक सिलाइ मशीन रखनहुँ चलिते छैक। कपड़ा सीबि लेलाक बाद ओ एकबेर विराट शून्यमे तकैत अछि...तकैत रहैछ, मुदा तखनहिं दिल कुमारी ओकरा तंद्रा भंग कऽ दैछ, ‘‘ला! काज-बट्टम कऽ दैत छियौ।’’

                                #####
न्यू कालोनी उलाव (बेगूसराय)/ 25.08.1997

संग्रहित :  कथा-संग्रह 'मकड़ी' ( मार्च 2020)
                कथा-संग्रह 'भरि राति भोर'
हिंदी अनुवाद : साक्षात्कार - 223, जुलाई 1998, अनुवादक- अविनाश
ओड़िया अनुवाद : अनुवादक- पारमिता षडंगी, 'साहित्य दर्पण' (मार्च-मई 2021 ई) मे प्रकाशित।

 

Saturday, August 17, 2024

शेष (मैथिली कथा)- प्रदीप बिहारी

शेष


प्रदीप बिहारी



ऑफिसमे सीमाक पयर पड़ितहि लगलैक जेना सम्पूर्ण कार्यालय महमह भ' उठल होइक। कर्मचारी आ अधिकारी सभ कने साकांक्ष भ’ उठैत छलाह। एतबे नहि, ग्राहक सभ सेहो कने सचेत होइत छल।
सीमा भीतर आयलि आ अपन बानिक अनुसार भूषण बाबू लग जा क’ अपन चेक-बुक पटकि देलकि, ’कने जल्दी पेमेन्ट करबहो।’ आ पुनः एम्हर-ओम्हर तकैत लोक सभक हालचाल पूछ’ लागलि। हालचाल पुछबाक ओकर अपन विधि छैक। बेसी लोककें आंखियेसं हालचाल पुछैत छैक ओ।
सीमाक नजरि सुभाष पर अंटकि गेलैक। ओ भूषण बाबूसं पुछलकि, ’ई नया स्टाफ अयल’ हन कि?’
’हं! दसो दिन नहि होलै हन।’ बजलाह भूषण बाबू, 'से किए? पसिन छओ कि?’
’धौर मर्दाबा।’ बाजलि सीमा, ’सैह हिबलयै। बच्चे हइ।’
ग्राहकमे सं एक गोटें बाजल, ’आब एकटा बहिक्रम भेल जाइ छह सीमा देवी।’
सीमा ओकरा उतारा देलकि, ’धौर मर्दाबा! हे हओ! जेना मरद कहियो नहि बुढाइ हइ, तेना हम पुरूफ कर’ चाहै छियै जे मौगियो कहियो नहि बुढाइ हइ।’
नहूं-नहूं बजबाक हिस्सक नहि छैक सीमा देवीक। सभ सुनलक। किछु गोटे हंसल। किछु चुप रहल।
सुभाषकें अचरज लगलैक। विचित्र माउगि छैक। ओ देखैत रहल। सीमाक काज भूषण बाबू स्वयं उठि क’ क’ देलखिन। ओ कैश काउन्टरक पाछां जा क’ टाका लेलकि आ टाका गनैत सुभाषक टेबुल लग आयलि आ पुछलकि, ’कत’ घर होल’ साहेब।’
सुभाष अपन ग्राम्य जिलाक नाम कहलकै।
’तखन तं अपने मिथिला के होइ छियै।’ भाषा परिमार्जित क’ बजबाक प्रयास कयलकि सीमा।
'अहूं मिथिले के छियै। इहो मिथिले छैक।’
सीमा एकटा गहींर नजरियें सुभाषकें देखलकि आ आगां बढ़ि भूषण बाबूकें कहलकनि, ’ई नवका स्टाफ तं चेहरे स’ बच्चा लगै ह’। मोन स’ त’ पकठोस बुझाइ हइ।’
भूषण बाबूकें विनोद सुझलनि, ’त’ की बूझै छहो? एक दिन जांचि, लियहो। तखने ने बुझबहक जे....।’
’धौर मर्दाबा।’ बजैत सीमा जहिना हनहनाइत आयलि तहिना दनदनाइत चलि गेलि।
सुभाषकें मोन पड़लैक गामक सलहेश नाच आ ओकर गीत- 'चलै छै मलिनियां बेटी, धरती धमकबै छै...।’
सीमा चलि गेलि। पुनः कार्यालयक स्थिति पूर्ववत्। जाधरि सीमा कार्यालय परिसरमे रहैत छैक, कार्यालय दलमलित भेल रहैत छैक।
जलखै बेरमे सुभाष सीमा देवीक मादे पूछने रहय अपन सहकर्मी सभसं। रंजन तुरन्ते उतारा देलकै, ’सीमाकें के नहि जनै हइ?’
’कोन चिड़क नाम छिकै सीमा, से त’ देखबे केलहो।' दोसर सहकर्मी।
'एहीठाम अस्पतालमे काज करै हइ। नर्स हइ।’
'अनुकम्पा बला नोकरी हइ। ओकर घरबला अही कम्पनीमे काज करै। मरि गेलै।’
सीमाक विधवा होयबाक गप्प सुभाषकें आर अचरजपूर्ण लगलैक। सीमाकें देखने कतहुसं नहि लगैत छैक जे ओ विधवा होइक।
'पहिने हेल्परमे नोकरी भेलै। बाद मे नर्सिंग बला ट्रेनिंग केलकै, तं आब नर्स छिकै।’
'से जे होउक, मुदा हइ बड़ मस्त-मस्त...।’
एकटा ठहक्का पड़लैक। सीमाक चर्चा ओहि दिनक जलखै बेरक मूल विषय बनल रहलैक।
सुभाषक जिज्ञासा शान्त भ’ गेलेक।
सीमा मासमे तीन-चारि बेर अबस्से अबैत छैक बैंक। मुदा, कोनो-ने-कोनो बेगरते ल’ क’। अनेरे कहियो नहि देखलकैए सुभाष।
एक दिन शर्माजी पुछलखिन सीमासं, 'अएं हइ सीमा देवी। सब दिन भूषणे बाबू लग बैसै छहक, की बात छै?’’
निधोख भ’ क’ बाजलि सीमा, ’अपन बौडी नहि देखै छहो! फुकना जकां फूलल ह’। तोरा बुते की होत?’
आ कि तखनहिं भूतपूर्व सैनिक रायजी बजलाह, ’आ हम हइ?’
'हं। तों छहो-स्टील बॉडी।’
सुभाष दिस संकेत करैत भूषण बाबू पुछलखिन, 'आ सुभाष?’
'धौर मर्दाबा!’ बजैत सीमा हॉलसं बहार भ’ गेलि।
एक बेर फगुआक छुट्टीसं पहिलुक दिन सीमा आयलि। बड़ भीड़ रहैक। भूषण बाबू ओकर चैक राखि लेलनि आ बजलाह, ’जाह! भीड़ सठि जयतै तखन अबिहो।’
सीमा चलि गेलि।
सीमा पुनः आयलि तखन भीड़ सांचे सठि गेल रहैक। भूषण बाबू ओकरा टाका देलनि। सीमा कने काल बैसलि। सभ अपन-अपन कार्यालयी काजसं निवृत होइत गेल आ तखन शुरू भेलैक फगुआ खेलबाक प्रक्रिया।
सुभाष देखैत छल। सीनियर सभ रंग, पेनक मसि, पैड इंक आदिसं प्रायः त’र क’ देलकै सीमाकें। सीमा सेहो सभकें रंग-अबीर लगौलकि।
भूषण बाबू तं ठाम-कुठाम मे कतेको मोहर छापलनि।
सर्वथा नव कर्मचारी होयबाक कारणें वा अन्य कोनो कारणें सुभाष ओकरा रंग लगाब’ नहि गेल। सुभाषकें नीक नहि लगलैक।
ओम्हरसं निवृत भेलाक बाद एक बाकुट अबीर नेेने सीमा सुभाष लग आयलि। सुभाष मना कयलकै। कागज-पत्तर छैक। लेजर-रजिष्टर छैक।
सुभाष अपन टेबुल छोड़ि बहार भ’ गेल। ओ सीमाकें कहलक, 'एहुना कतहु लोक रंग खेललक-ए। बगय देखै छहक?’
सीमा फगुनायल टोनमे बाजलि, 'जे जिएगा से खेलेगा फागु।’ आ बाकुट भरि अबीर सुभाषकें लगा देलकि।
सीमा बहार होम’ लागलि आ कि रायजी पुछलखिन, 'सुभाषक गाल ऐंठि लेलहो कि?’
'धीर मर्दाबा!’ बजैत सीमा बहार भ’ गेलि।

समय बीतैत गेलैक। सीमा ओहिना हनहनाइत आबय आ वातावरणकें दलमलित क’ गनगनाइत चलि जाय।
बर्ख पर बर्खक पथार लागि गेलैक।
सुभाष गृहस्थ भ’ गेल।
मुदा, एकटा स’ख सुभाषकें लगले रहलै। आन-आन कर्मचारी जकां सुभाषक संग सीमा कहियो चौल नहि कयलकै। ओकरा मोन लागल रहलैक जे सीमा ओकर संग चौल करौक।
एही क्रममें एकटा खगता भेलैक सुभाषकें। ओकरा अपन दुनू पुत्रक नामांकन कम्पनी द्वारा प्रायोजित विद्यालयमे करयबाक छलैक। ज्ञातव्य जे एहि विद्यालयमे नामांकन हेतु कम्पनीक कर्मचारी सभक नेना वरीयताक क्रममें पहिल मानल जाइत छैक। बैंकक कर्मचारीक नेना सभक नम्बर सभसं अन्तमे, खाहे ओ कतबो मेधावी किएक ने होअय।
एहि असमानता हेतु ओहि विद्यालयक प्राचार्यसं बहुत रास वाद-विवाद कयने रहय सुभाष। अन्ततः ओकर दुनू पुत्रकें नामांकन हेतु आयोजित प्रतियोगिता परीक्षामे सम्मिलित होयबाक अनुमति भेटलैक। आ ओकर दुनु पुत्र प्रथम अयलैक।
प्राचार्यक अनुसारें सुभाषकें एकटा आर औपचारिकता पूरा करएबाक छलैक। कम्पनीक कोनो कर्मचारीसं प्रमाण-पत्र दिअयबाक छलैक जे दुनू नेना ओकर सम्बन्धी छैक।
सोचय लागल सुभाष। कोन सम्बन्ध देखेतैक? आ ई समस्या भूषण बाबू लग रखने छल। भूषण बाबू झट बाजि उठलाह, 'ई कोनो समस्या नहि भेलैक। ई मात्र औपचारिकता छिकै। एडमिशन भ’ गेलाक बाद कतहु किच्छो नहि। आइए ब्योंत क’ दै दिअ’।’
ओही दिन किछु क्षण बाद सीमा आयलि। भूषण बाबू ओकरा सभ गप कहलनि आ ओ मानि गेलि। तखनहिं आवेदन-पत्र टाइप भेलैक। सीमा दवी दसखत कयलकि।
सुभाषक मोनमे एकटा संशय भेलैक। आवेदनमे सुभाषक पुत्र द्वयक मादे सीमा देवी अंग्रेजीमे घोषणा कयलकि, 'बोथ कैन्डिडेट्स आर माइ ग्रैण्ड सन।’
सुभाष इथ-उथ मे छल आ कि सीमा कहलकै, ’चलहो वेलफेयर विभाग। ओहिजय सार्टिफिकेट बनतह’ आ आवेदन ल’ सीता कम्पनीक प्रशासकीय कार्यालय दिस बिदा भ’ गेलि। सुभाष पछोड़ धयलक। ओकरा लगलैक जे कतहु फंसि रहल अछि।
कल्याण विभागमे कोनो प्रकारक असुविधा नहि भेलैक सुभाषकें। सभ चिन्हल लोक। सभ बुझैत छैक जे ई मात्र एकटा औपचारिकता छैक-खानापुरी।
प्रमाण-पत्र बनि क’ तैयार भ’ गेलैक आ सुभाषक हाथमे आबि गेलैक। तखन कल्याण पदाधिकारी महतो जी पुछलखिन सीमासं, 'अएं हइ! ई तोहर सम्बन्धी कोना भेलखुन? ई तं तोरा जातिक नहि छथुन?’
आ कि सीमा बाजि उठलि, 'धौर साहेब! तोहूं आर कमाल करै छहो। हमर बेटी हिनके संगे लव-मैरिज कने रहै ने। तखन ई दुनू बच्चा हमर नाती नञि होलै? नाती के अंग्रेजीमे गैण्ड सन नहि कहब करै हइ की?’
सभकें अचरज लगलैक। सीमाक प्रत्युत्पन्नमतित्व पर सुभाषकें सेहो।
सीमा देवी ओहू कार्यालयकें दलमलित कयने बहार भ’ गेलि।
किछु दिनक बाद सीमा बैंक आयलि। परिसरमे पयर दितहिं सभ पूर्ववत् अपन-अपन हंसी ठट्ठासं ओकर अभिवादन कयलकै, मुदा ओ कोना उतारा नहि देलकि। ओ सोझें सुभाष लग जा क’ बैसलि, 'जल्दीसं हमर काज करा दहो।’
आ ओहिदिनक बाद कर्मचारी सभ सुभाषकें पूछ’ लगलैक जे ओ सीमाकें की पढ़ि क’ खुआ देलकैए जे ओ बदललि जा रहलि अछि।
कम्पनीक कर्मचारी सभक वेतन भुगतानक समय बैंकमे बड़ भीड़ भ’ जाइत छैक। परिसर छोट छैक आ लोक बेसी। लगैत रहैत छैक जे सभ एक्कहि दिन दरमाहा ल’ क’ रहत। मास भरिक प्रतीक्षा रहैत छैक। ओहि भीड़मे एक दिन सीमा आयलि-पिचाइत।
अबितहिं गरजि उठलि, 'अएं हौ भूषण बाबू! तोहर मनेजर कहां छिकथुन? जनाना के लेल अलग बेवस्था करथुन, से कहै नञि छहो। देखहो त’ अइ भीड़मे....। केना लेेतै लोक पेमेन्ट?’ कने थम्हैत बाजलि, 'आ मर्दाबा आउर त’ आर...। हटै लागी बोलला पर त’ आर सटब करै हइ। लगै हइ जेना अपना बहिन-बेटी नहि होइ।’
एतेक बजितहिं ओकर नजरि सुभाष पर पड़लैक। ओ चुप भ’ गेलि आ सुभाष लग आबि क’ बैसि गेलि। पासबुक आ चैक निकालि क’ सुभाषक सोझां रखैत बाजलि, 'देखहो अपनेस’ उठि क’।’
सुभाष चैक भरलक। सीमा दसखत कयलिक आ सुभाष अपन कुर्सी परसं उठले छल आ कि एक गोटें ठट्ठा कयलकै सीमाक संग। सीमा गंभीर होइत नहुएंसं बाजलि, 'चुप रह', दमाद हइ अइ जग।’
ओ व्यक्ति चारूकात नजरि खिड़ाब’ लागल आ सीमादेवीक जमायकें ताक’ लागल। सुभाष, सीमाक काज हेतु दोसर काउन्टर दिस चलि गेल।
ओ व्यक्ति पुछलकै, 'कहां छिक’ दमाद?’
सुभाष दिस संकेत करैत बाजलि सीमा, 'उहे।’
ओहि व्यक्तिकें अचरज भेलैक। पुछलकै, 'से कोना?’
बाजलि सीमा, 'धौर मर्दाबा! कोनो जरूरी छिकै जे सब सम्बन्ध ढोले-पिपही बजा क’ होइ?’
'एकर माने आब तोएं बूढ़ होइ गेलहो।’ बाजल ओ व्यक्ति, 'बड़य कहब करहो जे पुरूफ कर’ चाहै छियै जे मौगियो कहियो नहि बुढाइ हइ।’
बाजलि सीमा, 'धौर मर्दाबा! ऊ आ अइ बातमे अन्तर होइ हइ। तोएं आउर ने त’ सम्बन्ध के इमानदारी बूझै छहो आ ने मरजादा। जहिया बूझ’ लगबहो, तहिया तोहूं आउर बुढ़ारी आ जुआनी के भेद बूझि जेबहो।'
ओ व्यक्ति अपन सन मुंह ल’ क’ ससरि गेल।
सुभाष आयल, चपरासीकें टोकन देलकै आ पाइ आनि देब’ कहि अपन कुर्सी पर बैसि गेल। सोझांमे सीमा बैसलि छलि। सुभाष अपन जेबीसं पान मसल्लाक पुड़िया बहार कयलक आ अपना मुंहमे ढाड़’ लागल। आ कि तखनहिं सीमा देवी ओकर हाथ पकड़ि लेलकि, 'ई कोन बानि छह? ई कतेक खरापी करै हइ, से बूझै छहो। खबरदार! आइन्दा तोरा हाथमे पान मसल्ला देखलियो त’....।’
सभकें अचरज भेलैक। सुभाषकें सेहो।
सीमा देवीक सम्पूर्ण आकृतिसं वात्सल्य टपकैत देखलक सुभाष।

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हिन्दी अनुवाद : स्वयं कथाकार। जनसत्ता (सबरंग) 21 सितम्बर 1997 मे प्रकाशित। 'आर्यावर्त' (दैनिक), 23 मई 1998 ई. मे प्रकाशित।
ओड़िया - अनुवादक- पारमिता षडंगी, 'पर्यवेक्षक' दैनिक, भुवनेश्वर, 18 अगस्त 2024 ई. मे प्रकाशित।

Wednesday, July 31, 2024

खैंक (मैथिली कथा) - प्रदीप बिहारी

कथा

खैंक

प्रदीप बिहारी


हड़बड़ाइत ओ पेंसन काउण्टर धरि गेलि आ बाजलि, 'सुबोध बाबू! हमर बाबा के लाइफ सर्टिफिकेट लए लियौक।"
          सुबोध फार्म देखलक। बाजल, "कहां छथिन? हमरा सामनेमे दसखत करबाक चाही ने। अहां के भेलियै हुनकर?"
          "बोललौं जे बाबा के लाइफ सर्टिफिकेट लए लियौक, त' नहि बुझायल। पोती होलियै हुनकर।"
           काउण्टर पर ओहि महिलाक पाछां ठाढ़ एक गोटें बाजल, "हइ । एना किए बोलै छहो? साहेब सुनि नहि सकल होथिन। केतना भीड़ छै, से लक्खा नहि दए रहलो हन? अकेला साहेब, देखै नहि छहो केना औल-बौल होल छथिन।"
           महिलाकें अपन गलतीक आभास भेलै। बाजलि, "सौरी, गलती भए गेलै सर। माफ कए दियौ।"
     ‌     सुबोध महिला दिस ताकलक। प्राय: अठाइस-उनतीस बरखक ओहि महिलाक चेहरा निश्छल बुझयलै। अचरज भेलै जे एना किएक बाजलि? ओ मुस्कियाइत बाजल, "कोनो बात नहि। अहांक की नाम भेल?"
           "रजनी।"
           रजनीक मुखाकृति पर एकबेर फेर सुबोधक नजरि गेलै।‌ ओ बाजल, "ठीके कहलहुं अहां। मुदा कत' छथि दयाल चन्द्र शर्मा जी?"
          रजनी अपराध-बोध सं उबरि नहि चुकल छलि। बाजलि, 'सर जी, ऊ उप्पर नहि आबि सकै‌ छथिन।‌ निच्चां चरिचक्का मे छिकथिन। हुनका बुलल नहि ने होइ छनि।"
         "बेस, तं कने बैसि जाउ। लाइनमे‌ किछु गोटे छथि। हिनका सभक काज झट द' क' दै छियनि, तकर बाद चलै छी।"
         रजनी लाइनसं कात भ' गेलि।‌ मुदा, बैसलि नहि। कातेमे ठाढ़ रहलि। ओकरा लगलै जे बैसि गेने सर जी बिसरि ने जाथि। ओकर नजरि सुबोध दिस छलै। नजरिमे आतुरता छलै- सर जी ....
         कनिए कालमे पांतिक किछु गहि‌कीक काज कयलक बाद शेषकें‌ प्रतीक्षा करबाक बात कहि सुबोध बहरायल। रजनी आगां-आगां आ सुबोध पाछ-पाछां।‌
          "अहांक पिता की करै छथि?" सुबोध पुछलक‌।
           "गामे मे रहब करथिन। खेती-पथारी। जमीनो-जत्था कम्मे बचि गेल रहै। साले-साल खेत बेचैत रहलखिन। आब हुनकर काज हमर भाइ करब करै छै। जमीनो बहुत कम्मे बंचल छै।"
           "अहांक बाबा हुनका पर ध्यान नहि देलखिन की?"
           "बाबा के संतान नहि ने होलनि। हमर दादा के चच्चा होलखिन बाबा। ई बाबा कहांदन बड़े कोसिस कैलखिन, मुदा हमर अप्पन बाबा जत्ती ने दुलार करब करथिन जे दुलारे मे बगदि गेलखिन हमर दादा।"
          "अहां की करै छी?"
          "सब बात एक्के दा पुछि लेबै‌ सर। हम्मे...
          ताबत ओ दुनू कार धरि आबि गेल छल। सुबोध देखलक जे कारक पछिला सीट पर‌ प्राय: छओ फुटक एकटा बूढ़ ओंगठल छलाह। ओ पुछलक, "की  होइए दयाल बाबू? नीके छी ने।"
          "छी त' निक्के। खाली डांड़ स' निच्चा के भाग बेकामक भेल हन। कहुना आदमी के सोंगर स' ठाढ़ होइ जाइ छियै, दिसा-मैदान कए लै छियै।" दयाल बाबू उतारा देलनि।
          फार्म पर दयाल बाबूक दसखत लेलक सुबोध।
हुनकर हाथ थरथराइत छलनि। सुबोध कें बुझ' मे आबि गेलै जे ई दसखत‌ नहि मिलतनि।
          दसखत दिस तकैत सुबोधक असमंयशकें दयाल बाबू बुझलनि। बजलाह, "दसखत नहि मिलैत होत। बैंक‌ के‌ रेकर्ड मे एखुनका दसखत होना चाही ने।"
  ‌‌‌‌‌        "ई काज क' लेबाक चाही छल।" सुबोध बाजल।
         "बेस, अगिला‌ दा जहिया अपने समय देबै, भए जेतै।" रजनी बाजलि।
          सुबोध बिदा होइत बाजल, "बेस, एहि मासक अंत मे जहिया पेंसन पेमेंट हैत, दुनू मासक खातामे जमा भ' जायत। नवम्बरे‌ मे‌ अएबाक चाही ने। बड़ लेट भेल त' दिसम्बर धरि जरूरे। सेहो समय बीति गेल। आब पेमेन्ट ले' किछ थम्ह' पड़त।"
           दयाल बाबू आ रजनीक चेहरा पर असमर्थताक  भाव पसरि गेलै। दयाल बाबू बजलाह, "कम-स'-कम बितलहो महिना बला आइ भेटि जैतै, त'...."
           "मोश्किल अछि।"
           "सर, बात ई छिकै जे..."
           "की?"
      ‌‌‌‌     दयाल बाबू कें बाज' सं पहिने रजनी बाजलि, "बाबा, तोएं चुपहो ने। हम्में बता दै छियनि सर के।"
           सुबोधक मोनमे आशंका पैसि गेलै। रजनी दिस तकैत बाजल, "हिनका बाज' दियनु। पेंसनर ई छथि। टाका हिनका भेटतनि। बजियौ दयाल बाबू।"
          "की बोलू सर। बोलब त' कहबै जे दुखे बतिआइ -ए।"
          "काजक बात बाजू ने।"
          "बेस, मूल बात कहै छी। हम्मर अइ पोती छोड़ि क' कोइ ने छै। अपना संतान नहि होलै। एकरे बाप के सब कथू देलियै। आ उहे फुटबौल जैसन गुड़का देलक। इहे पोती हय, जे सेवा कए रहल हन।‌ एकरो दुख के ओर नहि छै। तें‌ एकरा पर शंका नहि करियौक।'
           सुबोध दयाल बाबूक बात सुनि लेलक, मुदा ओत्तेक ध्यान नहि देलक। ओकरा काउण्टर परक गहिंकी मोन पड़ि रहल छलै। तैयो रजनी दिस तकैत बाजल, "हम हिनका पर शंका किएक करबनि?"
     ‌      "देखियौ सर, हम यू डी सी (अपर डिविजन क्लर्क) स' रिटायर कैने छी। अपने जे रजनी के चुप रहए बोललियै, से हमे बुझि गेलौं।‌ तें बोललौं जे एकरा पर शंका नहि करियौ।"
           "दयाल बाबू, अपने हमरा 'सर' नहि कहू। हमहूं अपने के पोते के उमेर के हैब। अपने आदरणीय छियै। हमर नाम सुबोध अछि।"
           "बेस। घर कतए होल?"
          "अपने जकां हमहूं मिथिले के छियै। मधबन्नी जिला।"
           दयाल बाबू उत्साहित होइत पुछलनि, "कोन गाम यौ? एकदा हम्में बेनीपट्टी ब्लौक मे रहियै।"
     ‌‌ ‌     दयाल बाबू कें बाज' सं‌ पहिने रजनी बाबाक गपक प्रवाहकें रोकलकि। ओकरा बुझल छै जे गपसप मे ओकर बाबा ध' लै छथिन, तं जल्दी छोड़ै नहि छथिन।‌ ओ बाजलि, "सब बात एक्के दिन पुछबहो। सर के देरी होब करै छनि।"
            सुबोध जयबा लेल उद्यत भेल, कि दयाल बाबू बजलाह, "एकटा आर आग्रह सर। हमर पेंसन खाता मे रजनीक नाम जोड़ा सकै‌ छै?"
      ‌‌‌     "नहि, पेंसन खाता मे पति वा पत्नीक नाम जोड़ल जा सकै छै। आन ककरो नहि।"
           "तकर बाद मानि लियौ जे हम्मे मरि गेलियै, त' शेष पाइ बैंंक जप्त कए लेतै?"
           "नहि, जं अहांक पत्नी नहि छथि, तं जिनका अहां चाही, नौमिनी बना सकै छी।"
    ‌ ‌     "तखन रजनिए के बना दियौ। एकरा छोड़ि हमर के हय?"
           "अपने नीक जकां सोचि क' कहि रहल छी?"
           "हं, हमर सिर्फ डांड़ स' निच्चा बेकाम हय। ऊपर एकदम ठीक।" दुनू कान्हकें‌ व्यायाम करबाक मुद्रा मे‌ आगां-पाछां घुमौलनि। अपन दुनू हाथसं दुनू बांहि पर थाप मारलनि, "देखियौ, ई सब एकदम्मे दुरुस्त छिकै। दिमागि आ यादास्त एकदम ठीक। तें पूरे होशमे कहै छी जे रजनिए के हमर नौमिनी बना दियौ। जहां बोलियौ, हम्मे दसखत कए देब।"
   ‌‌‌         "मुदा, पहिने दसखत त' ठीक करू।"
            "ई काज सभ जहिया अपने बोलैबै, हम्मे बाबा के लए के आबि जैब।"
            दयाल बाबूक व्यक्तित्व कने आकर्षित कयलकै सुबोध के। हुनका प्रणाम करैत ओ अपन काउण्टर पर जाय लागल। रजनी कें कहलक, "चलू। एकर पावती ल' लिअ' आ शेष काज लेल फार्म सभ सेहो।"
            "अपने एतना काम कए देलियै हन, से की कम बात छिकै। रसीद लए के हम्मे की करबै।‌ अपने पर पूरा बिसबास छै। बरू फारम सब दए दियौ।"
            रजनीक गपक दही मे सही लगौलनि दयाल बाबू, "सुबोध बाबू! नुनू ठीके बोलि रहल हन।‌ की होतै रसीद? अपने एतना सज्जन बुझाइ छिकियै, से हम्मे अपने के की बोलू? एगो अपने छिकियै, एगो अपने स' पहिने बला छला। कोनो तुलने नहि। अपने गहूम‌ आ ऊ गर्रो।"

सुबोध बिदा भेल। रजनी ओकर पाछां-पाछां छलि। ओ टोकलकि, "बाबा त' दोसरे बात बोलला। असल बात.."
           सुबोधक पयर अनचोके थम्हि गेलै।‌ पाछां घुरल, "की?"
          "इहे जे आइ एक्को महिना के पेमेंट नहि हेतै त' चरिचक्का के किरायो नहि होइ पैतै?"
      ‌‌‌    "माने?"
         "हम्मे आर सोचलियै जे रूपा मिलिए जेतै, तें गाम मे बेबस्था नहि केलियै।" रजनीक माथ झुकि गेलैक।
          "देखियौ! हम नियमक अनुसारे कहलहुं-ए। जं संभव होइतै, त' अबस्से पेमेंट क' दितहुं।"
    ‌‌‌      "से, अपने के बात पर भरोस छै सर।"
         "कत्ते पाइ लैए कार बला?"
          "चारि सौ रूपा?"
          "से किए? दुओ किलोमीटर दूर नहि अछि अहांक गाम। तखन?"
         "पहिने पेंसन लेबए अबियै, त' भीड़ होब करै आ समय लागि जाइ। तें देरी होइ जाइ। से सब जोड़ि लै। बेसी नहि लै छै। हम्मे आर गाम मे नहि ने रहै छियै।"
          "तं कत' रहै छी?"
          "से सब कोनो दोसर दिन बताएब।‌ एखन अपने जइयौक। हम्मे आर बहुत समय लए लेलौं। फारम दोसर दिन आबि कए ल' लेब। हमरो लेट होइ रहलैहन।‌ एखन चलबै त' समय पर क्लिनिक पहुंचि जेबै।"
            रजनी घुरि गेलि। मुदा, सुबोध‌ टोकि देलकै, "मुदा, कार के किराया कोना‌ देबै?"
           "जा क' देखबै जे कोन बेबस्था होइ छै।"
          सुबोध अपन पर्स बहार क' चारि टा नमरी बहार करैत बाजल, "जं बेजाय नहि मानी, तं ई राखि लिअ'। पेंसन लेब' आयब तं घुरा‌ देब।"
          रजनी असमंयश मे ठाढ़ि रहलि।
   ‌‌‌‌‌      सुबोध बाजल,‌ "सोचू नहि, हम कर्ज द' रहल छी। हमरा घुरा देब। राखू। हमरा लेट भ' रहल अछि।"
    ‌      रजनी टाका लैत बाजलि, "सर, अइ मदति के हम मोन राखब। एखने बाबा के बोलबै हम्मे।"
          जानि नहि, रजनीक बोल सुबोध सुनि सकल कि नहि। ओ अपन काउण्टर दिस विदा भ' गेल रहय।

सुबोधकें दयाल बाबू नीक लगलखिन। रजनीक निश्छलता सेहो प्रभावित कयलकै। दयाल बाबूक बारेमे बूझि गेल, मुदा रजनी? ओकरा बारेमे बस एतबे बुझि सकल जे कोनो क्लिनिकमे काज करैए। मोन भेलै जे डेरा गेलाक बाद पत्नीकें आजुक बात कहत। कहत जे ओ दयाल बाबूकें चारि सय टाकासं मदति कयलक। रिफंडेबुल।
             संध्याकाल भेबो कयलै ओहिना। फ्रेश भेलाक बाद पत्नीक खेरहा कहलक। जाहि प्रशंसाक लोभें ओ पत्नीकें कहलक, से उन्टा पड़ि गेलै। पत्नी पुछलकि, "बूढ़ा के मदति केलियै, की मौगी के? अहां त' दानवीर कर्ण बनि गेलहुं।"
             "अहां दोसर रूपें सोचलियै एहि बात के। एना नहि सोचियौ।"
             "हम बेजाय नहि सोचलहुं। अहां लग एहन बहुत लोक आबि सकैए। सभ के देबै जेबी सं?"
              "अरे, हम पैंच देलियैए। जहिया पेंसन भेटतै, घुरा देत। ई बुझियौ जे पेंसन लेब' हमरे लग आओत, हम काटि लेबै।"
             "एकटा बात पुछू?"
             "पुछू ने।'
             "जं ओहि बुढ़बाक संग ओकर पोती नहि रहितै, त' दितियै?"
             "केहन गप करै छी?"
             "ठीके करै छी। जे भेल से भेल। नोकरी करै छी, नोकरी करू। लहना लगायब बन्द करू। सेठ-साहुकार नहि छी अहां।"
            सुबोधक मोनमे एकटा किछु गड़ि गेलै। पत्नीक गपक कोनो उतारा नहि देलक।

ओकरा मोनमे जे गड़लै, तकर बिसबिस्सी ओहि मासक अंत धरि रहलै।
          रजनी अपन क्लिनिकक फोन नम्मर देने रहै। कहने रहै जे पेंसन खातामे जमा भेलाक बाद फोन क' दिअय। फोन रिसेप्सन पर रहै छै। कहतै तं बजा देतै। मोन होइ जे फोन करय। मुदा, अनेरो ओकरा फोन करब नीक नहि लगलै।
             खातामे पेंसन जमा भेलाक बाद सुबोध रजनीकें फोनसं जनतब देने रहय। आ प्राते भेने रजनी अयलै। सुबोधक काउण्टर पर ठाढ़ भ' प्रणाम सर कयलकै। सुबोध ओकरा देखितहिं थथमथाएल। रजनी ओकर असमंयश बुझलकि। बाजलि, "अपने फ्री भ' जैयौ। ताबत हम्मे बैसै छी।"
            "बाबा अयलाह-ए?"
            "नहि।"
            "किएक?"
            "अपने फ्री होइयौक ने, त' कहै छी।"
            रजनी ग्राहक बला कुर्सी पर बैसि गेलि।

सुबोधक काउण्टर खाली भेलाक बाद रजनी सुबोधक सोझां ठाढ भेलि। बाजलि, "हम्मे सोचलियै से पेमिंट स' पहिने बला कागजी काज आर कराए लियै। तखन बाबा के नानियनि। नहि त' बहुत समय लागि जाइ छै।"
           "एत' निचैनसं फार्म नहि भरि पायब। चलू कैंटिन रूममे।'
           रजनी सुबोधक पछोड़ धयलकि। लंचक समय भ' गेल रहै, तें किछु स्टाफ सेहो ओत' छल।
           फार्म सभ भरि क' तैयार कयलाक बाद रजनीकें दैत सुबोध बाजल, " काल्हि वा जहिया सुविधा होअय, एहि फार्म सभक संग बाबाकें नेने अयबनि।"
            "हम्मे सोचै छिकियै जे अपने के उपकार हम्में..." रजनी आगां नहि बाजि सकलि।
            कने थम्हैत एकटा पुरान सन लिफाफ सुबोधकें दैत बाजलि, "ई राखि लियौक।"
            "ई की छै?"
            "लिफाफ छै। पहिने राखियौक‌ ने।'
             सुबोध लिफाफ पकड़लक। रजनी बाजलि, "ओहि दिन गड़ी के किराया बला हय। बहुत खगल समय पर अपने मदति केलियै। बाबा बोललखिन जे सर भगमान बनि क' ठाढ़ होलखु‌न।"
             "एहन बात नहि। एत' सभ आदमिए छै। ई एखन किए घुरौलहुं-ए। पेंसन लितहुं तखन दितहुं।"
            "हम क्लिनिक स' अगाउ मांगलियै त' डाक्टर साहेब दए देलखिन। अचरजे लगलै जे एक्के दा मांगलियै आ ऊ दए देलखिन।"
            "क्लिनिक मे नर्स छियै?"
            "नहि, नर्स सन पढ़ल-लिखल लगै छी हम्मे? हम्मे त' गमार छिकियै।"
            "तखन?"
            "हेल्पर के काज करै छियै।"
            "अहांक पति?"
            "पता नहि, कत्त' छै। हमरा दागि देलकै आ भागि गेलै। एकटा बेटा छै। तीसरा मे पढ़ब करै छै। बोरिंग स्कूल मे दए देने छियैक।"
           "ओह। मुदा, पति जे भागि गेलाह तकर..."
    ‌‌ ‌      "तकर कारण फेर कहियो कहब। अपने के सीट पर खोजब करैत हैत। त' काल्हि अइयै बाबा के लए के?"
            "अबियौ ने। कखन एबै?"
           "दोसरके बेरिया मे ने? तखन अपने फ्री रह। आ हमहूं आधा दिन के छुट्टी लए लेबै।"

दयाल चन्द्र शर्माक प्राय: सभ काज भ' गेलनि। रजनीक नाम हुनक खातामे नामिनीक रूपमे चढ़ि गेलै। तकर रसीद सेहो मिलि गेलै। एकठाम बात अंटकि गेलै रहै। दयाल बाबू भने कहथुन जे डांड़सं ऊपर एकदम ठीक अछि, मुदा हाथ खूबे कांपनि। नव जे दसखत लेल गेलनि से एकरंगाह नहि भ' पाबनि। जतेक बेर करथिन, ततेक रंगक होनि। अंतरो थोड़-बहुतक नहि। तखन एक्केटा उपाय। ओ औंठा छाप लगाबथि।
             औंठा छापक नाम पर दयाल बाबू तैयार नहि होथि, "सुबोध बाबू! कहलौं ने जे हम्मे यू डी सी स' रिटायर छी। पढ़ल-लिखल छी। हम्मे जे मसौदा लिखि दियै, से हाकिमक बापो के मजाल नहि रहै जे ओहि मे कत्तौ कलम लगैबितैक। से, हम औंठा छाप लगा क' कोना घोषित करू जे निरक्षर छी। दिन-समैया खराप होइ गैलै, तें..."
    ‌‌        "अपने एक रंग के दसखत नहि क' पबै छियै, त' कोन उपाय? जत्ते बेर अयबै, दसखत नहि मिलत त' अहीं परेशान हेबै ने। तंग हेती रजनी जी। जाबत हम छी, मानि लिअ' जे सुविधा भेटि जायत। हमरा बाद दोसर जं एहन सुविधा दै बला नहि आयल त'....?"
          "से त' अइबे ने करतै। अपने जैसन ने पहिले अइलै आ ने बादो मे औतै। बाबा! औंठा छाप लगौने तोएं मुरुख थोड़े होइ जेबहो? तोहें जे छिकहो से त' पूरा इलाका जनै छह। जै मे सुभिस्ता हेतै, सेहे ने ठीक।"
    ‌‌ ‌       "लेकिन औंठा छाप लगैने चेक नहि ने मिलतै। तखन त' महिने-महिना आबए पड़तै।"
           "तकर व्यवस्था भए जेतै।"
           "की?"
           "भए जेतै ने।"
            आ एत्तेक निस्तुकीक बाद दयाल बाबू औंठा छाप लगौलनि।
             व्यवस्था एहन भेलै जे सुबोध प्रत्येक मास हुनका ओत' जायत आ अपना सामने मे हुनकर औंठा छाप लेत। टाका रजनी ल' जायति। ई व्यवस्था दयाल बाबूकें नीक लगलनि।
             सुबोध प्रत्येक मास रजनीक डेरा पर जा क' ई काज करय, तखन दयाल बाबू कें पेन्सनक भुगतान भेटनि। दयाल बाबू आ रजनी एकरा बड़का उपकार बुझय।
             एही क्रममे सुबोधकें अवसर भेटलै जे रजनीक बारेमे बुझय। ओ बुझलक जे रजनीक ब'र दोसर बियाह क' लेलकै। ताहिमे एकर भाइक विशेष हाथ छलै।
             "कोनो भाइ चाहतै जे ओकर बहिनोइ ओकरा बहिन कें छोड़ि दोसर बियाह क' लै।"
            "आर चाहौ कि नहि, हमरे भाइ चाहलकै। असल बात ई रहै जे बाबा के पूरा धन हमर दादा अपना नामे लिखाय लेलखिन। बाबा के बचलै मात्र पेंसन। हमरा एक्के गो भाइ। बाबा के सम्पत्तियो लए लेलकै आ घर मे राखैयो नहि चाहलकै। हम्मे बाबा के पच्छ लेलियै, त' हमरा दुनू के घर स' निकालि देलकै। हम्मे डाक्टर साहेब के सर्भेन्ट रूम मे बाबा के लए आनलियै। हमर भाइ चाहै-  ने हम्मे आर गाम मे रहियै, ने हिस्सा मांगियै। बैला देलकै।"
           एही क्रममे सुबोध के बुझना गेलै जे रजनीक ब'र जे एकर भाइये चढ़ा-बढ़ा देलकै-
           "हमरा साईं के हमर भाइये बोललकै जे डाक्टरे स' फंसल छै हमर बहिन। एक-दू दा हमर साईं के भ्रम सच्चे नाहित लगलै। होलै एहन जे क्लिनिक स' सब चलि जाइ तखनो डाक्टर साहेब हमरा रोकने रहथिन। इहे बात आर हमरा साईं के बरदास नहि होलै। दोसर बात ई जे..."
           "की?"
           "हमर बियाह होल रहै - पकड़ौआ। केतना ने पर-पंचैती के बाद हमरा राखलकै। राखितै की? कोनो काम-रोजगार नहिए सन करब करै। हम्में ई काज धरलियै। बस, लाट साहेबी करए लगलै। पाकिट खर्चा हमर भाइ दै। दारुओ-तारू के चसक लागि गेलै। आ बाद मे एगो मौगी के लए के भागि गेलै। लोक आर बोलब करै छै जे भगाबैओ के बेबस्था हमर भाइए कैलकै।"
            "किएक? अहां के भाइक प्रति किछु झूठ नहि ने केओ कहि देलक?"
            "सर, अपने होलियै सुद्धा लोक। हम्मे सब बात बूझि गेलियैक। भाइ ओकरा बैलाए देलकै। हम्मे होलियै अकेला जनिजाति। ताहू पर बूढ़ विकलांग बाबा। के जेतै हिस्सा मांगए?"
            "ओ..."
           "आब अपने बोलियै जे हम्मे बाबा के देखियै कि...."

सुबोधकें मोन पड़लै। जहिया पहिल बेर रजनीक डेरा पर गेल रहय, तं कोनादन लागल रहै। डाक्टरक मकानक गैरेज दिस एसबेस्टसक पलानी खसा क' बनाओल कोठरी। भीतरे-भीतर एकटा ओसार सन घेराएल, ताहिमे दयाल बाबूक खाट। कोठरीमे रजनीक चौकी। भानसक इंतिजाम सेहो ओही‌मे। हं, डाक्टरक बहरिया बाथरूम एकर पलानी दिस‌ रहै, जे एकरा कोठरी संग अटैच भ' गेलै।
           ओहि दिन दयाल बाबूसं गपसप भेलै। चाह पीलक आ घुरि आयल।
            आयबे-जायबक क्रममे सुबोधकें बुझना गेलै जे रजनी के क्लिनिकक अलावे डेरामे सेहो काज कर' पड़ैत छै। मेम साहेब कखनो बजा क' किछु अढ़ा दैत छथिन। अढ़ाएब अपन अधिकार बुझथि मेम साहेब। रजनीकें रह' लेल घर देने छथिन। हुनका मोन होइ छनि त' क्लिनिकमे फोन क' दै छथिन जे रजनी दाइ के घर पठाउ । एहि दुनू ठामक काज पूरा कयलाक बाद‌ अपना घरक काज आ बाबाक सेवा।
  ‌‌‌         सुबोधकें रजनीक प्रति निष्ठा उपज' लगलै...एकटा विशेष भाव जनम' लगलै। ओ निर्णय नहि क' पाबय जे ओ कोन भाव छै? कोन भाव छै जे बेर-बेर रजनी ओकरा‌ सोझांमे जगजियार भ' जाइ छै। आ सैह निस्तुकी करबा लेल कोनो मास बिच्चहुमे ओ दयाल बाबूसं भेंटक बहन्ने रजनीक डेरा पर चलि जाय।
          एकदिन भेलै एना जे लाइन कटल रहै। रजनीक घरमे डिबिया जरैत रहै। सुबोध पहुंचल। केबाड़ खोलबाक आ बन्न करबाक क्रममे डिबिया मझा गेलै। प्राय: दुनू अकबका गेल। रजनी सलाइ ताक' लेल थाहैत-थाहैत बाबाक कोठरी दिस जाय लागलि। आ कि तखने दयाल बाबू पुछलनि-
           "नुनू गे! डिबिया किए मिझा गेलौ?"
           "सर अयलखिन हन। केबाड़ी खोलए आ बन्द करए मे डिबिया बुति गेलै। हे भेटि गेलै सलाइ।"
          डिबिया बारलाक बाद दुनू एक-दोसराक कपार पर पसेनाक बुन्न देखलक आ कने काल देखैत रहल।
           "लालटेमे ने किए बारि लेलें नुनू?" दयाल बाबूक स्वर सुनि दुनू साकांक्ष भेल।
           "तोरा नहि ने बुझल ह'। मटिया तेल मिलै हइ सौर्टकट मे। एन्नी लाइन कराबर काटब करै छै। तें डिबिया बारै छियै जे मटिया तेल कम लगतै।"
         

सुबोध रजनीक संग दुख-सुख बतिआय लागल छल। रजनीक संघर्ष ओकरा प्रभावित करै। ओ रजनीसं पुछलक, "अहां एत्तेक काज करै छी। मोन नहि होइए जे कखनो किछु समय अपनो लेल बहार करी। अपनो लेल जीबी।"
            "मोन केकरा ने करै छै सर? मगर, हमर चिनवार, चौकठि आ अंगना इहे छिकै। ई रूम, क्लिनिक आ डाक्टर साहेब के डेरा।‌ बस...इहे दुनिया छै हमर।"
            "मुदा एमहर सं बाहरो दुनिया होइ छै, जत' भने कनिए काल लेल होइ, लोक मात्र अपना लेल जीब' चाहैए। अपन एकान्तमे चैनसं रह' चाहैए‌।"
           "सर, अपने पत्थर पर दुब्भी उगाबए चाहै छियै?"
            "नहि, हमरा मोन‌ मे जे आयल, से कहलहुं। आ  पाथर पर दूभि उगयबाक बात सोचल नहि जा सकैए?"
             "से ने किए?"

किछु मासक बाद मासक बिच्चेमे रजनी आयलि। किछु टाका बहार करबाक रहै। सुबोध एकटा परिवर्तन देखलक। ओहिदिन रजनीक सिऊंथमे सिन्नुर नहि रहैक। सुबोध एहि मादे पुछलक तं बाजलि, "जखन साइंए ज'र मे नहि रहलै, त' सिन्नुर किए ओगरतै हमर सीथ?"
           बाजि तं गेलि रजनी, मुदा ओकर संवादक भितरिया जे पीड़ाक अनुभूति रहै, से सुबोध लग साफ-साफ झलकि गेलै।

रजनीक घरमे एकटा अज्ञात महिलाकें देखि सुबोध कोठरीमे पैसबा काल थोड़े इथ-उथ मे पैसि गेल। मुदा, ओ महिला एकर असमंयश कें तोड़लकि। सुबोधक स्वागत करैत बाजलि, "आबियौ सुबोध सर‌।"
         "एम्हरे चौकिए पर अबियौक।"
         महिला दिस तकैत पुछलक सुबोध, "अपने?"
          "हम रजनी के पड़ोसी होलियै। स्वास्थ्य विभागमे अधिकारी छिकियै।  अपने दुनू के बारे मे हमरा सब कथू बुझल हय। रजनी अपने के बड़ प्रशंसा करब करै हय। नीक बात।"
           ताबते दयाल बाबू हाक देलनि, "नुनू गे, दवाइ नानलहो?"
           रजनीकें मोन पड़लै। बाजलि, "अपने आर गप करियौ। हमे क्लिनिक स' बाबा के दवाइ  लेने आबै छी।"
           रजनी कोठरीसं बहरा गेलि।
           "सुबोध बाबू! एगो गप हम्में अपने स' बतिआय चाहै रहियै।"
            "बाजू।'
           " रजनी के त' देखिते छियै जे कत्ती मोसीबत मे छिकै।"
           "जी। मेहनतिओ तेहने छथि।"
           "मुदा एत्ती के बादो एकर भविष्य निश्वित नहि छै। घरबला छोड़ियो देने छै। बेटा के बन' मे बड़ देरी छै। केना चलतै एकर पहाड़ नाहित जिनगी?"
            सुबोध चुप।
            "अपने एकरा लेल बहुत कयलियै। एकटा आर काज कए देबै त' एकर जिनगी बनि जेतै।"
             सुबोधक मोनमे एकटा डर पैसि गेलै। पहिले भेंटमे ई महिला एहि तरहें की कह' चाहैए? की बूझैए हमरा दुनू के? भ्रममे तं ने अछि?
            "बोललियै नहि।"
            "बाजू ने हम की क' सकै छियनि? हमरा बुतें जे नियमानुसार संभव होइ छनि से सहयोग करिते छियनि।"
             "कहू त', बूढ़ा ज' मरि जेथिन त' पेंसनो बन्द भए जेतै।'
             "जी।"
             "ऐसन उपाय नहि होइ सकै छै जे बूढ़ा बला फैमिली पेंसन रजनी के भेट सकै।"
            "नहि, हमरा तेहन कोनो उपाय नहि बुझाइए।"
            "मुदा हमरा लग उपाय अछि। अहां बैंकक काज सम्हारि दियौ। जिनगी बनि जेतै एकर।"
           "नियम सं बाहरक कोनो काज नहि क' सकै छी हम।"
    ‌‌‌‌       "हम नियमक भीतरे के बात बोलै छी।"
           "जं बूढ़ाक संग रजनीक कोर्ट मैरेज करा देल जाय तं..."
             सुबोधकें लगलै जे स'री धिपा क' केओ कानमे ध' देने होइक।
            "समाजमे त' दादा-पोतिए रहतै, मुदा सरकारी अभिलेखमे पति-पत्नी। बूढ़ाक बाद फैमिली पेंसन एकरा भेटैए ने लगतै।"
             सुबोधक तामस सुनग' लागल रहै।
              महिला बाजि रहल छलि, "एमहर सरकारी काज हम सम्हारि लेबै। बैंकक काज अहां सम्हारि दियौक।"
              सुबोध आब बरक' लागल छल।
             "कत्ती दिन स' ई बात हमरा मन मे छै। रजनिया के कहियै जे अपने स' भेंट करा दिअय। मुदा, अपने अबियै, से सूचने ने दिअय। आइ अपने के आब' के सूचना भेल त' अपने स' पहिने दरबर मारने आबि गेलौं। ओना कानून स' त' भैए जेतै, मुदा हम चाहै छियै जे चुपचुप भ' जाइ। समाजक लोक के, बुझिते छियै- कत्ती ने हाथ, पैर, कान आ मुह होब करै छै।"
            सुबोध के रहल नहि गेलै। एकटा तीव्र गतिए कोठरीसं बहार भेल, स्कूटर स्टार्ट कयलक आ गति पकड़ि लेलक। मोन कोनादन कर' लगलै। सोचलक, एहि प्रस्ताव लेल रजनी तैयार अछि? ओना होअय वा नहि, ओ रजनीक ई रूप नहि देख' चाहैए। स्कूटरक हैंडिल तलमलाए लगलै। ठाढ़ क' देखलक। टायरमे कांटी गड़ि गेल रहै।
            सुबोधकें घरमे नहि देखि रजनी बाजलि, "काकी, अपने के मना कयने रहियनि जे ई बात सर के नहि बोलबै। लेकिन नहि मानलियै अपने। एकदा फेर खतम होइ गेलै। जिनगी मे पहिले दा एगो नीक लोक राह देखबए बला हमरा मिलल रहथिन,‌ तिनको..."
            सुबोधक पयर रजनीक डेरा दिस नहि घुरलै।
                            ######
बेगूसराय / 01.02.2024
प्रकाशित - समदिया मिथिला (दैनिक) 10 फरवरी 2024
कथा-संग्रह "इएह हमर संसार" मे संग्रहित।
    

मौगियाह (कथा)- मैथिली : प्रदीप बिहारी


कथा

मौगियाह

प्रदीप बिहारी
तरकारीक दोकान पर पहिने बेर देखने रहियै ओकरा। हमरे पार्श्वमे ठाढ़ भऽ तरकारी किनैत रहय। हमरासँ पहिने पहुँचल रहय, तें पहिने ओकरे भेटैत रहै तरकारी। हम प्रतीक्षारत रही।
       तरकारीक पाइ देबाक कला हमरा आकृष्ट कयलक। ओ उपरका जबीसँ पाइ बाहर कयलक। एक आइटमक भुगतान कयलक आ घुरती पाइ लेलक। पुनः बटुआसँ पाइ बहार कयलक। लुंगीक फाँड़सँ। आइटम सभक भिन्न-भिन्न ढंगसँ भुगतान कयलक।
        हमरा बूझि पड़ल जे अपना गामक हाट पर ठाढ छी।
        हम तरकारी लेब छोड़ि ओकरा निहारऽ लगलहुँ। भुगतान कयलाक बाद दोकान परसँ चलि गेल। हम ओकर चालि देखैत रहलहुँ। देखिते रहलहुँ।
        हमरा किछु भेटि गेल मने। एहने पात्र तकैत छलहुँ। मोन हल्लुक भेल।
        '‘की सब दिअऽ?’’ परिचित तरकारीबला टोकलक। साकांक्ष भेलहुँ।
        ‘‘ओकरा हिबै छलियै?’’ तरकारिएबला पुछलक।
        '‘हँ! देखलहक नहि। कोना माउगि सन गप्प करैत छलै। मुँह, आँखि, हाथ...सभ ओहिना चलैत छलै। चालि सेहो ओहिना। डाँड़ कोना लचकै छलै।’’ हम बजैत रहलहुँ।
        '‘से अपने आइ देखलियै हन। ई बड़गाड़ी मौगियाह हेबे करै।’’ बाजल तरकारीबाला, ‘‘की दू अपने के?’’
        हम तरकारी लेबऽ लगलहुँ। हमर मोन तरकारी लेबऽसँ बेसो ओकरे पर रहय।
        हम तरकारी लेलहुँ। बिदा होमऽ काल तरकारी बलासँ पुछलियै, ‘‘तोरा ओहिठाम बरोबरि अबैत छह?’’
       ‘‘हँ।’’ रहस्यमय मुस्की पसारैत बाजल तरकारीबला, ‘‘कोनो काम हय? बोला दू। एनही घुमब करै होतै बड़गाही।’’
       '‘नहि, छोड़ह।’’ हम मना कयलियै, ‘‘दोसर दिन भेंट करबै। कतऽ रहै छै?’’
        अचरज लगलैक तरकारीबलाकें, ‘‘अपने नञि जनै छिकियै?’’
        ‘‘अहंऽ।’’ 
        ‘'हमे बुझली जे अपने जनै छिकियै आ ओही जग के काम हय।’’ बाजल तरकारीबला, ‘‘इंडियन आयलमे रहै हइ। नाम हइ- मिरदंगी। काल्हि औते। अपने अइथिन, तऽ भेंट करा देबनि।’’
       हम बिदा भऽ गेलहुँ।
       मिरदंगी। ओकर नाम।
       इंडियन आयल।
       एहि शहरमे एकटा देह व्यापार केन्द्र छैक। इंडियन आयलक पेट्रोल पम्पसँ सटले कातमे। तें एहि केन्द्रकें लोक -'इंडियन आयल’ कहैत छैक। किछु गोटे 'पेट्रोल पम्प' सेहो। बेसी लोक ‘इंडियन आयल’ कहैत छैक।
       मिरदंगी माने ओही केन्द्रक टहला।
       राति भरि मिरदंगी हमरा मोनमे ढोल पीटैत रहल। ठीक एहने चरित्र छै प्रस्तावित नाटकमे। निर्देशन हमरे करबाक अछि। दोसर कलाकारकें सीखाबऽ पड़त। ई तँ प्राकृतिके अछि।
       दोसर दिन संस्थाक किछु वरिष्ठ कलाकार आ सहायक निर्देशकसँ मिरदंगीक मादे गप्प कयल। ओ लोकनि पहिने प्रतिवाद कयलनि। किछु प्रश्न ठाढ़ भेलै। ‘इडियन आयल’ मे रहै छै, तँ कोनो-ने-कोनो रोग होयतैक। अन्य कलाकार सभ सेहो प्रभावित भऽ सकैछ। आदि-आदि...।
       अंततः निस्तुकी ई भेलैक जे मिरदंगीक डाक्टरी परीक्षण कराओल जाय। जँ ठीक-ठाक रहल, तँ ओकरा आनल जाय। एकटा आर शर्त रहैक जे मिरदंगीक कोनो दोसर ठेकान कहल जाय- आन कलाकार सभकें।
       मुदा ई सभ मिरदंगी मानय तखन ने।
       मिरदंगी मानलक। मुदा हमरा पानि पिया कऽ। ठेकानक मादे फुसि बाजऽ लेल तैयारे ने रहय। बहुत रास गप्प आ तर्कक छान-पगहासँ मानलक।
       डाक्टरी परीक्षणकें अपन संस्थाक बीध कहि ओकरा लग रखने रही तं ओ गंभीर होइत बाजल रहल, ‘‘बूझि गेली। हमे आर जइ ठाँ रहै छिकियै, ओइ ठाँ के लोक के कोनो...। अपने जे बहन्ना बनबियौ। हमे बुझै छिकियै।’’
       मिरदंगी मानि गेलि। ओ नाटक करत।
       मिरदंगीक डाक्टरी परीक्षण भेलै। पूर्वाभ्यासमे आबऽ लागल।
       ओकर शर्तक अनुसार रिहर्सलक समय बदलऽ पड़ल। साँझक बदला भिनसर नओ बजेसँ।
       रिहर्सल चलऽ लगलैक। संवाद याद करबाक आ बजबाक अभ्यास चलैत रहैक।
       एकदिन, रिहर्सल समाप्त भेलाक बादो ओ बैसले रहय। आर-आर कलाकार सभ चलि गेल रहैक। जयबाकाल हम ओकरा बैसल देखलियै।
       ‘‘की मिरदंगी। आइ एखनि धरि?’’ हम पुछलियै।
       ‘‘अपने सऽ एगो काम रहै।’’ मिरदंगी बाजल।
       ‘‘की?’’
        '‘काम ई रहै जे...एगो काम रहै।’’
       मिरदंगीकें बाजऽ मे असुविधा होइत रहैक।
       ‘‘साफ-साफ बाजऽ ने। संकोच किए करै छह?’’
       ‘‘बात ई हइ जे ऊ कतेक दिन सऽ बोलब करै छलै किताब दऽ।’’
      ‘‘के ऊ?’’
       '‘उहे।’’
       ‘‘के?’’
       ‘‘आर के? हमरे जऽरे जे रहै हइ- मालती।’’
       ‘‘के मालती?’’
       ‘‘हम जहाँ रहै छिकियै, ओतै एगो छौड़ी हइ।’’ बाजल मिरदंगी, ‘‘सुन्दर हइ। सब सऽ सुन्दर! ड्राइवर, खलासी आउर के अपना भीरू बैठैयो ने दै हइ। ओकरा भिरू खाली साहेबे सन लोक आर अबै हइ।’’
       ‘‘हँ तँ की बात छै?’’
       ‘‘ओकरा पढ़ऽ के सऽख हइ। हमे जब इहाँ अयलियै, तऽ हमरा दिस खूब ताकब करै आ एक दिन...।’’
       मिरदंगीक खिस्सा हमरा रुचिगर लागऽ लागल।
       ‘‘हम तऽ पहिने ओकरा सऽ कोनो मतलब नञि रखियै। उहे हमरा पोल्हाबऽ लगलै। बरोबरि अपन हिस्सा सऽ दू-चारि गो रूपा देब करै।’’
       मिरदंगीक बजबाक शिल्प हमरा बेसो नीक लागय। हम ओकरासँ आगाँक खिस्सा पुछैत गेलहुँ। मिरदंगी बजैत रहल।
       ‘‘रूपा देबऽ सऽ मना केलकै ओकरा संगी, तऽ मालती बोललै जे कंजूसी कऽ कऽ की होतै? हमे बलू नीक लगै छिकैय मालती के। अपना संगी के कहलकै जे रूपा घटऽ लगतै तऽ हमरा लेल एगो गहिंकी आर बढ़ा लेतै। एत्ते गोरे भिरू सुतब करै हइ, तऽ एगो आर। की फरक पड़तै?’’
       हमरा कोनादन लगल। हम बुझयलियैक मिरदंगीकें। नीक लोकसँ सम्पर्क भऽ रहल छै। एहि तरहें नहि बाजक चाही।
       मिरदंगी मानि गेल। ओकरा गलतीक आभास भलैक। ओ बाजल, ‘‘मालती के किताब पढ़ऽ के आदति छइ। हमे बजार सऽ किताब लाबि दै छिकियै। आइ बोललै जे अहीं सऽ किताब लाबि देबऽ।’’ पढ़ि कऽ घुरा देत। हमहीं लाइ देब।’’
       ‘‘हमरा कोना चिन्हैत अछि ओ?’’ हम पुछलियैक।
       ‘‘अपने के बारे मे हमहीं बोललियै हन। किरिया खा कऽ बोलै छिकी जे ओकरा छोड़ि आर कोइ ने जनै हइ नाटक के बारे मे।’’ मिरदंगी बाजल, ‘‘मालती सेहो औतै नाटक देखऽ।’’
       हम चुप रहलहुँ।
       ‘‘किताब देबै ने?’’
       हमरा एकटा गपक जिज्ञासा भेल। हम कहलियै, ‘‘किताब देबौ मुदा एकटा गप कहऽ पड़तौ।’
       ‘‘की?’’
       ‘‘तोरा बड़ मानै छौ मालती?’’
       ‘‘बुझाइ हइ तहिना।’’
       ‘‘तों?’’
       ‘‘हमे ई गलती फेरो नञि करऽ चाहै छिकियै।’’ गंभीर होइत बाजल मिरदंगी, ‘‘मुदा आब एगो बात होइ हइ। पहिने मालती गहिंकी भिरू बन्द रहब करै छलै, तऽ हमरा कुच्छो नञि होइ रहय आ आब जे ऊ गहिंगी के लऽ कऽ कोठरी मे जाइ छै आ केबारी बन्द करै छै तखने हमरा मोन मे किछ कचकि जाइ हय।’’
       हम मिरदंगीक बात बुझलहुँ।
       दोसर दिन रिहर्सलमे ओकरा लेल एकटा साहित्यक पोथी नेने आयल रहियै। उपन्यास।
       ई क्रम चलैत रहलैक। प्रत्येक दू दिन पर पोथी घुरि कऽ आबि जाइक। कहाँ दन भरि दिन मालती उपन्यासे पढ़ैत रहैत छैक।
       रिहर्सल चलैत रहैक। संवाद यादि करबाक आ बजबाक अभ्यास पूरा भऽ गेल रहै।    
       कम्पोजिशन शुरू कयने रही। आंगिक अभिनय।
       एकदिन एकटा घटना घटि गेलै।
       नाटकमे एकटा दृश्य रहैक। नायिकाकें प्रेम करबाक अपराधमे ओकर माय भयंकर सजाय दऽ रहल छलैक। अभ्यास होइत रहैक।
       मिरदंगी एक कोनमे बैसल देखैत छल।
       दुनू महिला कलाकार अभ्यास कऽ रहलि छलि।
       अभ्यास होइत रहलैक।  एक...दू...तीन...                            
       आ कि तखनहिं मिरदंगी बिजुली जकाँ अयलैक आ नायिकाक मायक भूमिका कयनिहारिकें गरदनि दबैत चिकरऽ लागलैक, ‘‘तोंए हमरा इन्दू के मारलही हन। हमे जीबय नञि देबौ...।’’
       सभ ‘हाँ-हाँ’ करैत मिरदंगीकें घीचलक। मिरदंगी हकमि रहल छल। ओ वर्तमान आबि गेल छल। माथ झुकि गेल छलैक।
       महिला कलाकारक प्राथमिक उपचार भेलैक। कने कालमे ओहो सामान्य भेलि।
       कलाकार सभ हमरे दोष देबऽ लागल। हमरे कारण ई घटना घटलै। ने हम मिरदगीकें अनितियैक आ ने एहन घटना घटितैक। एहिना स्थितिमे केओ अपन बेटीकें सस्थामे नहि आबऽ दतैक।
      बड़ी कालक बाद सभ एहि गपकें मानलक जे मिरदंगी कोनो-ने-कोनो असामान्य परिस्थितिमे एहन काज कयने होयत।
       सामान्य भेलाक बाद मिरदंगी ओहि महिला कलाकारक पयर छानि लेलक, ‘‘बहिन, हमरा से गल्ती होइ गेलऽ। माफ कऽ दहो। अनबुझमे हमरा सऽ गलती होइ गेलऽ। आब नञि होतऽ एना।’’
       मिरदंगीकें माफ कऽ देल गेलै। रिहर्सल ओहि दिन ओत्तहि समाप्त भऽ गेलैक।
       हम मिरदंगीकें अपना डेरा अनलहुँ। चाह पान भेलकै। स्थिर होइत ओहि घटनाक कारण पुछलियैक।
       ओ बाजल, ‘‘इहाँ सऽ पहिले हमे मुंगेर सरबन बजार मे रहियै। इहाँ तऽ तीन-चारि महिना पहिले अएलियै हन। उहाँ बहुत दिन रहलियै। एगो सऽ परेम होइ गेल रहै। बड़ सुन्नरि रहै। उहो हमरा बड़ मानै। हमरा लेल जान दै लेल तैयार। हमहूँ...।
       ओहिठाम के मलिकिनी सी नम्मर के बदमास रहै मौगी। हमरा दुनू के बारे मे ओकरा पता लगि गेल। बड़गाही हमरा आर के देखय नञि चाहै। कुभेला करय लगलै। ओकरा बेसी-सऽ-बेसी गंहिकी देबय लगलै। कतबो ऊ बोलै जे आब सहाज नञि होइ हय, तैयो...। सोलह-सतरह घंटा रहय पड़ै गहिंकी भिरू। कते सहाज करितै?
       हमे मना करियै ओकरा। ऊ कहब करय हमरा जे अइ जग सऽ भागि जो तऽ उगरास भेटत। मुदा, से होलै नञि।
       हमे उहाँ के छौंड़ी आर के बोललियै जे कम-सँ-कम गहिंकी भिरू जो। छौंड़ियो आर मानलकै। मलिकिनी भिरू बोलब शुरू कऽ देने रहै।
       मलकिनी डँटलकै। आर-आर छौंड़ी सभ चुप्प होइ गेलै। मुदा हमर ऊ नहि मानलकै। ओकरा हमरे बोली के निसाँ लागल रहै। मलिकिनी के हमरे पर शंका  होलै। हमरो मारलक आ ओकरो। ओकरा तऽ बोलै बलू ऐसन ठाम मे फाड़ धिपा कऽ दागि देबौ जे डागदरो जल्दी नञि देखतौ।
       करीब पनरह दिन के बाद हमे आर ठीक होलियै। ओकरा ठीक होइते जोतय लगलै। विदेशी टुरिस्ट सभ आयल रहै। सब के ओकरे भिरू पठबै। हमे एक दिन ओकरो आ मलिकिनियो के बोललियै, ‘‘ई गोरा आर बीमारी लऽ कऽ अबै छइ। मुदा मलिकिनी नञि मानलकै। ओकरा बोललियै तऽ हमरे दोष देलकै। बोलब करै, ‘‘हटा कऽ लऽ जो हमरा। तोरा सऽ बाहर हमे नञि ने छिकियौ।
       जे हमरा शंका छलै, उहे होलै। ऊ मरि गेलै। अखबार मे अपने आर पढ़ने होबै। सरबन बजार के दूगो वेश्या मरलै, जकरा बारे मे पटना के डागदर आर बोललै जे ’एड्स’ से मरलै हन। ओइ मे एगो उहो रहै।’’
       मिरदंगी कानऽ लागल। पुनः किछु कालक बाद स्थिर होइत बाजल, ‘‘हमरा गोस्सा उठि गेलै। हमे उठलौं आ मलिकाइन के गरदनि चापि देलियै। जा लोक आउर अइलै, मौगी अधमरू होइ गेलै। मरि नञि सकलै। लोक आउर बचा लेलकै। हमरा बहुत मारलक आ भगा देलक। नहियो भगाबितै तेयो हमे उहाँ नञि रहितियै।’’ किछु थम्हैत पुनः बाजल मिरदंगी, ‘‘आइ रिहल-सिहल बेरू उहे यादि आइ गेलै, तें...। आब ऐसन गलती नञि होतै।’’
       किछु काल धरि वातावरण शान्त रहल।
       मौन भंग करैत हमहीं पुछलियै, ‘‘मालतीकें बुझल छैक ई सभ?’’
       ‘‘नञि।’’ मिरदंगी बाजल, ‘‘ओकरा ई बात आर नञि छिकै बूझल।’’
       ‘‘तें ओ तोरासँ...।’’
       ‘‘से जे होइ। हमे नञि चाहै छिकियै जे ओकरा सऽ हेम-छेम बढ़बियै। मुदा ऊ कहाँ मानै छै। हमरा पर...।’’ किछु थम्हैत बाजल मिरदंगी, ‘‘असल बात ई हइ जे पढ़ल-लिखल लड़िकी हमरा निम्मन लागब करै हय। मालती पढ़ै-लिखै छै। काबिल छै। तें हमे ओकरा किताब लऽ जा कऽ दै छिकियै। ओ बूझै हय जे हमे ओकरा परेम...।’’
       ‘‘से बात तोरा कहि देबाक चाही। ओकरा अन्हारमे नहि राखक चाही।’’
       ‘‘सोचै तऽ हमहूँ छिकियै, मुदा कहि नञि पाबि रहलियै हन।’’
       हम मिरदंगीक चेहराक भाव पढ़लहुँ। हमरा लागल जेना एकटा नमहर बोझ उतरि गेल होइक ओकरा माथ परसँ।
       रिहर्सल चलैत रहलैक। प्रदर्शनक तिथिक घोषणा भऽ गेल रहैक।
       मिरदंगी रिहसलमे नहि आयल। एक दिन...दू दिन...।
       हमरा चिन्ता भेल। हम तरकारीबला लग गेलहुँ। पुछलियै। तरकारीबाला बाजल, ‘‘के? मौगियाहा? दू दिन पर आइ आयल हन। अपने अही जग रहियै। बोलि कऽ गेल हन।
       मिरदंगीकें ‘मौगियाहा’ कहैत छै, तँ हमरो बेजाय लगैत अछि आब।
       मिरदंगी आयल। हालचाल भेलै। दोसरे समस्या बाजल।
       मालती लग एकटा साहेब अबैत छैक। तीन-चारि बर्ख पहनहि ओकर पत्नी स्वर्गीय भऽ गेलै। ओ बरोबरिक ग्राहक छैक। सप्ताहमे दू दिन तँ अबस्से। एहिठामक मलिकिनीकें ओ ‘लाइसेंस’ लेबऽ कहलकैक।
       मुदा लाइसेंस तँ मात्र मोजराक लेल भेटतैक।    
       मलिकिनीकें नीक लगलैक। सोचलकि- मोजराक लाइसेंस भेटि गेने ओकर बिजनेस आओर बढ़तैक। एखनि जकाँ पुलिसक दमन एत्तेक नहि रहतैक। संभ्रान्त लोक सभकें सेहो कोनो असोकर्य नहि होयतैक।
       ड्राइवर आ खलासी सन ग्राहककें सेहो कोनो उपराग नहि रहतैक। कहयो काल तँ सिपहिया मलिकिनीयोसँ पाइ लैत छैक आ घूरऽकाल गहिंकियोसँ।
       यैह सभ विचार भेल रहैक। मिरदंगी एकर विरोध कयने रहय। मालती सेहो। ई दुनू कहलकै जे संगीत सन पवित्र बात एतऽ नहि होयतैक। जँ होयतैक तँ आन काज नहि होयतैक। मोजराक नाम नहि बिकयतैक। संगीतक अपमान नहि होयतैक। कसि कऽ विरोध कयने रहै दुनू।
       मिरदंगी किताब घुरा देलक आ बाजल, ‘‘हमे आइ मालती के सब बात बोलि देलियै।’’
       ‘‘कोन बात?’’
       ‘‘सरबन बजार बला बात।’’ बाजल मिरदंगी, ‘‘लाइसिंस बला बात के हमे आर जखन खूब विरोध केलियै, तऽ मारय-मारय कऽ दौगल हमरा आर के। मुदा मारलक नञि। किछ काल के बाद मालती बोलल जे बलू हमे ओकरा लऽ कऽ कतौ भागि जइयै। हमे सोचलौं- सरबने बजार बला कांड ने होइ जाइ, तैं हम ओकरा सब बात खुलस्ता बोलि देलियै। बोलि देलियै जे हम तोरा पियार नञि करै छिकियौ।’’
       हम चुप रही। मात्र निहारैत रही मिरदंगीकें।
       ‘‘ओकरा तऽ बुझयलै जेना कोइ अनचोके मे थप्पर मारने होइ।’’ बाजल मिरदंगी, ‘‘अहीं सोचियौ। ई संभव छै जे हम ओकरा लऽ कऽ कहीं इज्जति-परतिष्ठा सऽ रहि सकै छिकियै? दुनू तऽ ओइसने छिकियै- एकटा रंडी, दोसरा भरुआ।’’
       हमरा किछु नहि फुरायल। स्तब्ध रही। अन्तमे, दोसर दिन रिहर्सलमे अयबाक निश्चय कऽ मिरदंगी चलि गेल।
       दोसर दिन समय पर मरंदगी रिहर्सलमे आयल। मोनसँ काज कयलक। जयबाकाल हमरा एकटा कोनमे लऽ जा कऽ कहलक, ‘‘मालती अहाँ सऽ भेंट करऽ चाहै हय।’’
       ‘‘ई कोना संभव छै?’’ हम बजलहुँ।
       ‘‘सेहे तऽ हमहूँ बोललियै ओकरा, तऽ ऊ कहलक जे नाटक दिन अपने कने समय देबै ओकरा। कुछो बतिआइ के छै। ओकरा बड़ सऽख छै हमरा इस्टेज पर देखय के...नाटक देखय के...।’’
       ‘‘बेस। हेतै।’’ हम बजलहुँ, '‘लाइसेंस बला बात के की भेलौ?’’
       मिरदंगी बाजल, ‘‘बात बड़ अगाड़ी बढ़ल जाइ छै। हमे चुपचाप रहै छिकियै, मुदा सहाज नञि होइ हय। मालती के कहलकै जे नाच सीखय पड़तौ। मालती नञि मानलकै, तऽ राति खन लोहाक छड़ लऽ कऽ दुनू तरबामे मारलकै ओकरा। पयर फुलि गेलै हन। तैयो गहिंकी भिरू ठेलिये देलकै।’’
       मिरदंगी घुरि गेल। हम दोसर काजमे लागि गेलहुँ।
       रिहर्सल चलैत रहलै। मिरदंगी अबैत रहल। अभ्यास करैत रहल। जेना-जेना प्रदर्शनक तिथि लऽग आबऽ लगलैक, हमर व्यस्तता बढ़ैत गेल। मिरदंगीसँ कोनो नोक-बेजाय गप नहि भऽ सकल।
       प्रदर्शनसँ तीन दिन पहिने।
       चारि बजे साँझमे चौक पर गेलहुँ। चौक कोनो घटना विशेषक चर्चमे डूबल छल। जिज्ञासा कयलहुँ। तरकारीबला अभरल। पुछलियैक।
       तरकारीबाला बाजल, ‘‘पेट्रोल पम्प के मलिकिनी के मारि देलकै।’’
       "कोन पेट्रोल पम्प?
       "उहे, जकरा बगली मे मौगियाहा रहै हय।"
       हम प्रश्न दृष्टिएँ तकलहुँ, ‘‘केे?’’
       ‘‘आर के? मौगियाहा।’’ बाजल तरकारीबला।
       ‘‘नहि, मिरदंगी नहि मारने होयतैक।’’ हम बजलहुँ।
       ‘‘नञि मालिक।’’ तरकारीबला बाजल, ‘‘पुलिस भिरू अपने कबूल केलकै हन मौगियाहा।’’
                            .....

लेखन: बेगूसराय/ 30.10.1991 ई. 
 प्रकाशन: पूर्वाचल-3/1992



मेनका मल्लिकक काव्यचित्र : रमेश

::समीक्षा::
:: 'मेनका मल्लिकक काव्यचित्र' ::
    ('गेल्ह सभ झाड़ैत अछि पांखि')
                :: रमेश ::

मिथिला समाजक नारी-दशा देखैत,आइ ई स्पष्ट अछि जे 'विद्रोही नारी-काव्य'क आवश्यकता,आइयो समाप्त नहि भs गेल अछि ।

तथापि,मैथिली नारी-काव्य के, विद्रोह-बिन्दु स' आगां बढ़ेबाक आ 'सृजनात्मक मोड़ देबाक' जे कोशिस, नव्यतम नारी कवि सभ कs रहल छथि, ताहि मे शारदा झा,रोमिशा,डा.विभा कुमारी आ दीपा मिश्रक संग,मेनका मल्लिक सेहो सक्रिय छथि। 

ई महिला कविगण,विभारानी,सुस्मिता पाठक,ज्योत्स्ना चंद्रम् आ कामिनीक 'विद्रोह-काव्य' सं फूट आ फराक काव्य-लीक बनबैत,अपन काव्य-यात्रा मे सन्नद्ध होइत छथि। 

ई सभ नव नारी स्वर, 'पूर्ण विद्रोह' क कारणें, नारीक 'असगर जीवन-नियति के पक्ष मे' नहिं रहि,'परिवार' नामक संस्थाक विध्वंस नहिं चाहैत छथि,अपितु 'परिवार कें वैयक्तिक आ सामूहिक न्याय-प्रणाली सं स्नेहक संगम करैत', अपना हिसाबें,अपना तरीका सं संचालन आ संरक्षण के पक्ष मे छथि, जाहि मे सभ सदस्यक स्वतंत्रता आ व्यक्तित्व विकासक उद्देश्य अन्तर्निहित हो! मुदा,से मानवीय न्यूनतम अनुशासनक संग!

नव्यतम नारी-स्वर सब व्यक्ति, परिवार आ समाजक, समाजशास्त्रीय मूल्यांकन सं लs कs व्यवहारशास्त्रीय आ मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन धरि मे लागल अछि, सेहो काव्य-शिल्पीय तीक्ष्णताक रुप मे। परिवार मे रहैत, अपन उचित महत्व आ अस्तित्वक सार्थकता लेल संघर्ष करैत, साहित्य मे सक्रिय रहब,'असाधारण उपलब्धि' थिक!

ताहि धारा मे,ताही  मोड़-बिन्दु सं प्रस्थान करैत,मेनका मल्लिक अपन पहिल काव्य-संग्रह 'गेल्ह सभ झाडै़त अछि पांखि', लs कs अबैत छथि,जाहि मे ओ मैथिली नारी काव्य के परिवार स' बाहरो ल' जा क' जीवन आ जगत स' जोड़बाक कोशिस करैत छथि। मैथिली नारी-काव्यक कथ्य-विस्तारक,हुनकर से कोशिस,निरंतरता के प्राप्त हेबाक चाही।

 हुनके टा कोशिस नहिं,आजुक तिथि मे सक्रिय सब नारी कवि के,अपन निजी जीवन आ पारिवारिक सीमारेखा स' बाहर निकलि,सम्पूर्ण समाजक व्यथा-कथा के, काव्य-स्वर देबाक चाही!आब नारीक निजी जीवनक कथ्य,मैथिली नारी काव्य मे,'रुढ़' भेल जा रहल अछि,'रुढ़ि' बनल जा रहल अछि!

            तीन 'कोला' मे बांटल,मेनका जीक उनचास टा कविताक ई पोथी, डा.नारायणजीक 'भूमिका' 
(एकटा सम्पूर्ण स्त्रीक आहत मनक कविता)क संग आयल अछि, जाहि मे 'स्त्रीक आहत मन'क दुइये -तीनटा कविता अछि। 
मुदा एत' 'एकटा संपूर्ण स्त्री', वस्तुत: 'संपूर्ण नारी कवि' छथि, जिनकर मन 'आहत' सं बेसी, 'सृजनधर्मी तनाव'क उपयोग मे तल्लीन अछि!

तीनू कोलाक काव्य-कथ्य कें स्पर्श करितो, भूमिका-लेखकक ध्यान 'समाज खण्ड'क कविता सभ (बहुसंख्य अछि ) पर कम, आ 'स्त्री'- खण्डक कविता, 
वा प्रेम-खण्ड'क कविता सभ पर विशेष केन्द्रित भेल छनि, जखनकि 'समाज' एकटा 'सांगोपांग संपूर्ण ईकाई' थिक आ 'स्त्री' आकि 'प्रेम' फराक-फराक 'पूरक ईकाई' थिक,जे समाजक अस्तित्व-निर्माण सेहो करैत अछि, आ तकरा पूर्ण सेहो करैत अछि।
 मुदा कने थम्हू! 
कनेक मैथिलीक धनीक कविताक पृष्ठभूमियो मे जाय पड़त।

 राजकमल चौधरी अपन 'महावन' नामक कविता मे औसत मैथिल आ भारतीय परिवारक जेहेन संरचनाक व्याख्या केने छलाह, से तकर भयावहता तत्कालीन परिवारक यथार्थ छल ।
 सुकान्त सोम अपन 'बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे' नामधारी कविता मे, व्यक्ति आ परिवारक ताही अन्तर्सम्बन्धक अपन कालखंडीय नवीन जनवादी व्याख्या प्रस्तुत केने छलाह।
 आ 'तकरे छायाभावक मंचधर्मी मनोरंजक कविता', उदयचन्द्र झा 'विनोद', 'तड़िपिब्बा जकां तलमलाइत' सेहो,तकर बाद प्रस्तुत कs, मैथिली आ भारतीय परिवारक सदस्यगणक,परिवारिक जीवन प्रस्तुत केने छलाह।

उदाहरणार्थ लेल गेल उपर्युक्त तीनू कविता आ तीनू कविक द्वारा कयल गेल 'परिवार-व्याख्या', परिवार-चित्रांकन,'परिवार नामक संस्थाक खदकैत कडा़ह सदृश् वर्णन', प्रस्तुत केने अछि ।

मुदा आइ परिवारक स्वरूप बदलल अछि। ओ परिवर्तन कतेक सकारात्मक आ कतेक नकारात्मक भेल अछि, तकरे मूल्यांकन करैत अछि, आजुक नव्यतम नारी कविगणक कविता। 

मुदा सैह टा नहि करैत अछि, आजुक नारी-काव्य!
 निवेदिता झा,दीपा मिश्र,निक्की प्रियदर्शिनी,स्वाती शाकम्भरी,नेहा झा मणि,नन्दनी पाठक,रुचि स्मृतिक संग, उपर्युक्त सभ नामित आ अनामित आजुक नारी कविगण आ मेनका मल्लिक सेहो, परिवार संस्थाक संग सम्पूर्ण समाज, स्त्री आ प्रेम धरि के, व्याप्ति प्रदान करैत छथि, मैथिली नारी-काव्य के रचैत काल।आ से आर बेसी करबाक चाही!

 तें हिनका लोकनिक प्रतिपाद्य, आजुक सम्पूर्ण मैथिल समाज आ परिवारे टा नहि, सम्पूर्ण भारतीय समाजो भs गेल अछि,आ से हेबाको चाही। 

 मेनका मल्लिकक कविता मे सभ सृजित नारी-पात्र, सृजनधर्मी  आ सांस्कृतिक  चेतनाबाली अछि। कारण, आजुक नारी कवि, समाजक सांस्कृतिक प्रदूषण सं व्यथित रहिते छथि आ से मेनका सेहो छथि। स्त्रीक विविध स्वरूप, 'पारम्परिक आ परिवर्तित होइत',
 दुनू प्रकारक आयल अछि,हिनकर कविता मे,से स्वाभाविके अछि!

बच्चाक माता आ पतिक प्रेयसी, दुनू रूप!
 महानगर मे 'मिनी मिथिला' बसबैत 'सोनकाकी' सेहो आ पुरुष मजदूरक समान मजदूरी मंगैत ' गोबिन्दपुरवाली ' सेहो! स्वातंत्र्यक प्रतीक तसलीमा नसरीन सेहो, 'अजन्मी भ्रूणक बयान' सेहो,आ बेटी-ललना सेहो!
 'टीस आ कचोट' तं हिनकर नारी-काव्य के,
भावना-संवेदना-करुणाक चासनीए मे बोरि दैत अछि!

          तहिना 'प्रेम'क विविध आयाम आ रूप,छओ टा  प्रेम-काव्यक संग, आनो 'स्त्री-विषयक आ समाज खण्ड'क कविता मे, आयल अछि।
 दाम्पत्य-प्रेमक संग वात्सलय-प्रेम सेहो, कैक टा कविता मे आयल अछि। हिनकर प्रेम-काव्य 'चाहक चुस्की', ' सुगंध'  आ 'मुस्की'क संग आम जनजीवन मे 'सिंगरहार झहरेबाक आकांक्षी' अछि, जतs एकटा मजदूरिनो अपना कें 'मुमताज' आ अपन घरबला के 'शाहजहाँ' वा घरे के 'ताजमहल' बूझय,इजोरिया मे!

          मेनका मल्लिकक 'समाज' विषयक कविता मे - विषय-वस्तुक विविधता आ समकालीनता,सामान्यो पाठक के देखा पड़ैत अछि । कथ्यक वैविध्य,नीक काव्य-भविष्यक संकेत करैत अछि । 

मिथिलाक प्रति अनन्य प्रेम, गाम आ समाजक प्रति उचित माश्चर्य ,सांस्कृतिक प्रदूषणक चिन्ताक संग व्यक्त होइत, अपन संस्कृतिक प्रति मोह -ममता,पचल आ सृजनधर्मी नारीवाद, संवेदनासिक्त करुण- कथ्यक कविता,परिवार मे आ व्यक्तिक मोन मे व्यक्त होइत सन्तापबला कविता, तीनू खण्ड मे स्थान पओलक अछि । 

ओ एहन मिथिलाक  काव्य-चित्रांकन सेहो केलनि अछि, जाहिमे 'नेना सभ उदास अछि ', 'गाम उदास अछि', ' गाछ -बिरीछ अपन व्यथा कथा ' बखानैत अछि , चिट्ठी आ डाकपीन , मोबाइल आ 'ह्वाट्स एप्प' के नामें, कानैत अछि, 'स्मृति'क 'आगमन ''  'मायक आंगुरक स्पर्श'क 'भावना 'क  'देखैत अछि सपना '।

'हरसट्ठे' गाम मे ओना बहुत किछु नहियों भेटैत, गाम मे अनका प्रति संवेदना तैओ,भेटि जाइत छनि,मेनकाक कवि के! कारण,हिनका अपन नेपाली मिथिला मातृभूमि (नैहर )आ भारतीय मिथिला मातृभूमि  (सासुर) क संग नेपाली मातृभाषा आ मैथिली मातृभाषा (द्वितीय) दुनू सं अपरिमेय प्रेम छनि ।

 हिनका विश्वास छनि जे,प्रवासी के अबिते गाममे, बांसक फुलायब बन्न भs जाएत आ 'गुलाबक  ठाढ़िपर लतरत तिलकोर '। मुदा परिवारक भाषा- संस्कृतिक संस्कार मे होइत क्षरण देखू जे मायक लोरी सुनायब 'उफांटि' पड़ि जाइ छै, जखन बच्चा 'कजरारे - कजरारे' सुनाब' कहै छै ! 
परिवार आ समाजक समकालीन परिस्थितिक काव्यात्मक अभिव्यक्ति, कविता सभ मे भेल अछि ।

 आजुक सम्बन्ध, मधुरक चासनीमे बोरल बिक्खे थिक (गुलदस्ता आ कैक्टस) । तें ग्रामीण युवती द्वारा कयल बलात्कारीक हत्या (स्वतंत्रता दिवस पर ) उचिते कवयित्रीक ऊर्जा बढ़बैत अछि । खेहारैत अतीत आ टूटैत मनोरथक वर्तमान (जीबs नहि अबैछ सपनामे )ककरो परीक खिस्सा कोना सुनाबs देतैक?

 तैओ हिनका गाम,'माइये सन सुन्दर' लगैत छनि , जखनकि 'मेक इन इंडिया'क अभियान 'फोंका-मुट्ठी शून्य'  आ फूसि बुझाइत छनि, कारण 'काठ चिरैत बालेस्सर'क आरीक गति तेज होइते, हाथक फुलैत मोट-मोट नस पर पसेना  छहला दैत अछि!

कनियांक लहास उघैत 'दिना मांझी'क प्रति समाजक संवेदनहीनता आ गामक जमीन बेचि महानगरीय फ्लैट किनैत पूतक पिताक 'समदाउन' गायब, भयावह समकालीन यथार्थक करुण कथा थिक । 

मिथिलाक माटिसं पयरक बढ़ैत दूरी 'मौसम कें जबदाह' बनौने जा रहल अछि, तं प्रगतिशील वैचारिकता  'अप - टू - डेट ' भs कs  कैकटा  कविता ( 'बेटी' , गोविन्दपुरवाली ',  'ललना ', ' तसलीमा नसरीनक प्रति ', ' गंगाक कछेर मे ठाढ़ि पुनीता ', 'अजन्मीक बयान ' आदि ) मे आयल अछि । सेहो वैचारिक प्रगतिशीलता, कविता मे आयल अछि।

मुदा, तें की?
हिनकर काव्यलेखन मे अपेक्षित आर श्रमक अभाव, झांपल नहि रहि सकल अछि।

 एकटा  कविता, एक बैसकी मे लिखबाक आ 'फाइनल ' करबाक मन:स्थितिक दवाबक कारणें, कनेक कांच रहि गेल अछि,अनेक कविता एकटा वक्तव्य-प्रधान भs गेल अछि।

सम्पूर्ण कविता मे कविता आ काव्य-तत्त्व नहिं आबि सकल अछि । 
आंशिक काव्य-तत्त्व मात्र, कविताक अन्त मे, कएटा कविता मे आयल अछि । कए टा कविताक प्रारम्भिक बहुलांश,सपाट-बयानीक सीमा धरि,अभिधात्मक भs गेल अछि ।हिनका काव्यतत्व बढ़ेबाक लेल, 'आजुक अभिव्यंजना-कला' पर विशेष ध्यान देबाक चाहियनि।

 'परिवर्तन'क प्राचीन शिल्प त्याज्य, तं नवकविताक स्थापित शिल्प मे, एकशिल्पीय कविता सभ,प्रस्तुत भेल अछि,जे शैल्पिक वैविध्यक मांग करैत अछि ।

 मुदा ताहिसं की ? 
जीवनक उड़ान लेल जखन 'गेल्ह सभ झाडै़त अछि पांखि', त' 'आहत मनक विरुद्ध', प्रेमकविताक सिंगरहार झहरि-झहरि सुगंध पसारबे करत ! 

से सुगं,अगिला संग्रह मे,उपर्युक्त अभाव-अभियोगक निराकरण करैत आओत।
कविता-संग्रह स्वागतेय अछि,जकर काव्य-पांती आ काव्य-टुकड़ी सबहक स्मृति,पाठकक मोन,हृदय आ माथ मे गमगमा त' रहले अछि,माथ के गनगना आ चनचना सेहो रहल अछि!ई हिनका लेल शुभ लक्षण थिक,जे 'वैचारिकता', हिनकर कविता मे,पहिले संग्रह स', 'काव्य-पुटक संग', स्थान पाबि रहल अछि..! 
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Thursday, December 7, 2023

'मुनिक मतिभ्रम' (नाटककार योगानन्द झा)क निहितार्थ

'मुनिक मतिभ्रम' (नाटककार योगानन्द झा)क निहितार्थ 
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                  विभूति आनन्द

          योगानंद झाक नाम स्मरणमे अबैत देरी स्वतः एकटा कथाक शीर्षक समक्ष मे आबि नाचि जाइत अछि– 'आम खयबाक मुँह' ! मुदा सेहो एसगरे नहि, ओकरा संगे 'रुसल जमाय' सेहो. मुदा दुनूक रचनाकार दू. एक टाक तँ योगानंद झा, आ दोसरक उपेंद्रनाथ झा 'व्यास'. ई दुनू टा कथा हमर तरुण मोनक लेल तँ सहजहि, उक्त दुनू टा कथाकारक लेल सेहो 'आइ कार्ड' बनि गेल छनि ! ओना एहि प्रकारक 'आइकार्ड' बनबाक प्रवृत्ति आनहुँ-आन कथाकार ओ कथालेखिका सभहक संग लागल चलैत रहल अछि...
          मुदा एतय हम सीमित होइत छी योगानंद झा पर. आ से जखन कौलेजिया भेलहुँ तँ हरिमोहन झाक 'कन्यादान' आ 'खट्टर ककाक तरंग'क बाद जे कृति सभ सँ बेसी ध्यान आकर्षित कयलक, ताहि मे प्रमुख रहय 'भलमानुस' ! ई उपन्यास छल योगानंद झाक. फेर तँ पढ़लहुँ जेना तकर प्रतिक्रिया मे 'जयवार', 'बनमानुष' इत्यादि सेहो लिखल गेल. मुदा 'भलमानुस' अपन प्रसिद्धिमे यथावत रहल. आ सेहो 'पवित्रा' उपन्यास अएलाक बादो. ओना तकर एक कारण सिलेबसमे आबि जायब सेहो छल. आ सेहो तहिया जहिया 'टेक्स्टबुक' पढ़क चलन शेष छलै.
          तहिना कथा 'आम खयबाक मुँह' मे, जे तत्कालीन रोमांटिसिज्मक दौर मे लिखल गेल छलै, तरुण सहित प्रौढ़ मोन कें सेहो खूबे गुदगुदौलक. ईहो ध्यातव्य जे योगाबाबू द्वारा तकर बाद एगारह टा आर कथा लिखलाक, अर्थात अपन जीवन मे कुल बारहटा कथा लिखलाक बादो, 'आम खयबाक मुँह'क प्रभावसँ ओ मुक्त नहि भ' सकलाह ! एते धरि जे अपन कथासंग्रहक नाम 'उड़ैत बंसी' रखलाक बादो ओ चेन्ह अमिट रहलनि ! मुदा एत' फेर ईहो स्मरण कराबी जे 'आम खयबाक मुँह' सेहो सतत सिलेबस मे स्थान पबैत रहल...

          ओना आजुक समय मे ओ सभ टा स्थिति, आ स्थिति-चित्र अपन स्मृति जीबि रहल अछि. ओहुना नवीन पीढ़ी कें आम खएबाक प्रेमातुर स्थिति, कनेक कालक लेल जरूर मोनकें घेरि ल' सकैत होयतनि मुदा ओ पूर्वक भलमानुस-जयवार तरहक जिच-जिरह वला स्थिति आब कालातीत भ' चुकल अछि. मैथिलीक साहित्य ताहि तरहक छान-बान्ह सँ आब प्रायः-प्रायः मुक्त भ' गेल अछि.
          तहिना एहि ठाम महात्मा गांधीक आत्मकथाक अनुवादक सेहो चर्चा कएल जा सकैत अछि. योगा बाबू उक्त कृतिक अनुवाद, मैथिली अकादमीक निदेशक रहथि, तखन कयलनि आ प्रकाशन सेहो मैथिली अकादमी सएह कयलक. मुदा ताहि मे हुनक कोनो विशेष अनुवादकीय क्षमता ओ स्फीत दृष्टि, दृष्टिगोचर नहि होइछ.
           हम तें अपन विमर्श हुनक नाटक 'मुनिक मतिभ्रम' पर केंद्रित राखय चाहब. ओना एहू पर विस्तारमे गेलापर जिच ठाढ़ भ' सकैत अछि जे ई नाटक थिक, आकि एकांकी ! तहिना ईहो जे ई कृति इण्टर सँ एमए धरिक सिलेबस मे स्थान पबैत रहल अछि ! 
          एत' मुदा फेर शास्त्रीयविमर्श आबि जा सकैत अछि जे नाटक ओ एकांकी मे की अंतर ! तें एहि सँ बचबा लेल एत' हम नाट्य साहित्य मे प्रथम पीएच. डी. प्राप्त कयनिहार लेखनाथ मिश्रक मंतव्य कें लैत विषय-विमर्श कें आगू ल' जाय चाहब. ओ प्रकाशित शोध पुस्तक 'मैथिली नाटकक उद्भव अओर विकास' मे लिखैत छथि जे पौराणिक एकांकी कोटि मे एहन एकांकी सभ अछि जकर कथावस्तु पुराणसँ गृहीत अछि. एकर अर्थ ई नहि जे कविक कल्पनाक कोनो श्रेय एहि रूपक एकांकी मे नहि अछि. एहिमे कविक कल्पना सेहो प्रश्रय पौलक अछि, किंतु पौराणिक पात्रक अंगभूत भ'क'. एहि रूपक मैथिली एकांकीमे प्रमुख अछि 'मुनिक मतिभ्रम'...
          'मुनिक मतिभ्रम' एकगोट एकांकी नाटक अछि. किंतु एकर अस्तित्व, पूर्ण नाटकक रूपमे मानबा मे किनको आपत्ति नहि भ' सकैत छनि. अनेक दृश्यमे विभक्त रहबाक कारणें एकर कलेवर सेहो ततेक छोट नहि अछि. घटनाक वैविध्य अछि. आ एकर प्रभाव सेहो दर्शक पर एकांकी जकाँ नहि पड़ैछ.

          मुदा मैथिली साहित्यक प्रथम इतिहास लिखनिहार जयकान्त मिश्र एकरा महान नाटक नहि मानैत छथि. अंग्रेजी मे अपन मंतव्य दैत ओ लिखैत छथि जे हम सदाय अनुभव कयलहुॅं अछि जे यद्यपि 'मुनिक मतिभ्रम' साहित्यक एक नीक उदाहरण अछि, मुदा तें ई एकटा महान नाटक नहि अछि, किएक तॅं एकर मंचन नहि कएल जा सकैत अछि.
          एही तथ्य कें ध्यान मे अनैत प्रायः भीमनाथ झा 'परिचायिका'( एकरा 1978 मे मुदा छद्मनाम 'मध्यम पाण्डव' नाम सँ छपबौने रहथि )मे सेहो लिखैत छथि जे एकर कथावस्तु पौराणिक अछि. च्यवन आ सुकन्याक कथा ल' क' लेखक उच्च कोटिक साहित्यिक नाटक तैयार कयलनि अछि. मुदा एकरा मंच पर अभिनीत करब दुष्कर अछि. तें ओहि दृष्टि सँ ई दुर्बल कहल जा सकैछ, किंतु नाटकक अध्येता कें एहि मे नीक काव्यात्मक तृप्ति भेटैछ, ताहिमे संदेह नहि.
          मुदा दू पीढ़ीक एहि दुनू विद्वानक मन्तव्य पर आगू विमर्श सम्भावित अछि. किएक तॅं मंचन-संबंधी दुनू विद्वानक मत अनेक-अनेक दशक पुरान लगैत अछि. तें एखन पहिने विवेच्य एकांकी वा नाटकक कथानक जानि लेब एहि लेल आवश्यक अछि जे आगूक विमर्श कें सुविधापूर्वक बुझबा मे सहायक भ' सकैछ. ओना एकर कथानक किनको लेल प्रायः अज्ञात नहि अछि, खिस्सा रूप मे जानल-सूनल जरूर लागि सकैत अछि. एहि मे तपलीन च्यवन ऋषि आ राजा शर्यातिक पुत्री राजकुमारी सुकन्याक एकगोट अजगुत सनक घटना- कथा गुंफित अछि, आ जे सहीमे नाटकीय घटना-क्रमक दिस इंगित करैत अछि...

          अर्थात् पिता-पुत्री सपरिवार अपन लाव-लश्कर संग वन-भ्रमण लेल निकलैत आ यथास्थान पहुँचैत छथि. आ ओत' जा राजकुमारी सुकन्या, सखी लतिकाक संग घुमैत-फिरैत एकटा जलाशय लग आबि जाइत छथि, जत' एक गोट गाछक नीचा दिबड़ाक भीड़ पर नजरि पड़ैत छनि. मुदा अजगुत ई जे ओहि भीड़मे दूटा भूर रहैछ, जकर अंदरसँ एक विशेष प्रकारक ज्योति बहराइछ. ताहि दृश्य कें देखि राजकुमारी सुकन्याक कौतूहल बढ़ि जाइत छनि आ ओ ओतहि कतहु फेकल शाही-काँट उठा ओहि भूर मे भोंकि दैत छथि ! तखने एक अचरज होइत अछि. अंदर सँ आर्तनादक संग सोनितक टघार निकल' लगैत अछि ! दुनू सखी डरि जाइत छथि, आ चोट्टे ओत' सँ भागि पड़ाइत छथि...
          एतय धरि सभ किछु यथार्थपरक घटना लगैत छै. मुदा तकर बाद एहि कथा मे मोड़ अबैत छै. सम्पूर्ण राज्य, राज्यक जन-जीवन, घोर कष्ट सँ आबि छटपटाय लगैत छै. राजा धरि बेचैन– आब की हो !
          फेर ज्ञात होइछ जे सुकन्या किछु नेनपना कयलनि, आ तकर बादहिं सँ एहि तरहक अनिष्टपूर्ण परिदृश्य उपस्थित भेल छै...
          फेर परिदृश्य बदलैत अछि. ज्ञात होइछ जे ओ पीड़ित स्वर आन किनको नहि, अपितु सैकड़ो वर्ष सँ तपलीन ऋषि च्यवनक छनि, जिनकर आँखि सुकन्या द्वारा कौतूहलवश फोड़ि देल गेल छलनि, आ जकर फल भेल अछि जे पूरा तंत्र एक तरह सँ विकल-बेचैन भ' उठल अछि !
          तकर बादक परिदृश्य फेर बदलैत अछि. राजा प्रायश्चित करबाक हेतु ऋषि लग पहुँचैत छथि. महोजरो आरम्भ होइत अछि, होइते जाइत अछि...
          आकि तखनहि वृद्ध-जर्जर ऋषिक ऑंखि, जे शेष छलनि, सुकन्या पर पड़ैत छनि. आ से देखिते हुनक रूप-लावण्यपर ओ मोहित भ' उठैत छथि. आ फेर तकर बाद तँ ऋषि अपन होसमे नहि रहि जाइत छथि ! 
          एकटा बहुत प्रसिद्ध काव्यखंड, जे आब लोकोक्ति रूपमे प्रसिद्ध अछि– होय बुढ़ारी वयस तँ बुद्धि जाय भसिआय ! से अत्यधिक पीड़ा सँ पीड़ित रहितहुँ च्यवन, मुदा सुकन्या संग पत्नी रूप मे शेष जीवन बितयबा लेल जिद्द पकड़ि लैत छथि. जेना 'तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा' कें चरितार्थ करैत होथि !...
          आब एत' आबि क' ई कथा अपन क्लाइमेक्स पर पहुँचैत अछि. एक दिस षोडशीक प्रति च्यवन ऋषिक लिप्सा, तँ दोसर दिस राज्यक सकल जन-गणक पीड़ा ! मुदा राजा-रानी अपन सुकन्याक एबज मे तेहन त्याग करय लेल तैयार नहि होइत छथि. स्थिति बड़ कठिन ओ दुखद स्थिति दिस बहुत तेजी सँ बढ़ैत चलल जाइत छै. संगहि जेना-जेना समय बीतल जाइत छै, तेना-तेना आमलोकमे हाहाकार बढ़ैत जाइत अछि...
          अंततः कथानक एकटा निर्णायक मोड़ पर पहुँचैत अछि, जखन राजकुमारी सुकन्या अपन निर्णय सुनबैत शेष जीवन च्यवन ऋषिक संग बितयबाक घोषणा क' पूरा परिदृश्ये कें बदलि, सभ कें अचम्भित क' दैत छथि. ई हुनक जनहित मे लेल गेल आत्मनिर्णय, वा परिस्थितिजन्य विवशता, से लेखकीय कौशल सॅं अव्याख्येय छोड़ि देल गेल सन लगैत अछि. 
          आ हमरा जनैत इएह ओ प्रस्थान बिंदु बनैत छै जत' सॅं आब'वला काल्हि मे एहि कथानकपर पुनर्विमर्श करैत मंचनक संभावनाक आधुनिक बनबैत छै ! आ तें हमर मानब अछि जे कथा-विमर्शक द्वार वस्तुतः एतहि सॅं फुजितो छै. ओना एहि ठमकल कथानक पर, विमर्शक आरम्भ हिंदी कथालेखिका सिनीवालीक टटका उपन्यास 'हेति' मे अकानल जा सकैत अछि... 
          ओना एकर आनुषंगिक आर बहुत रास दैवीयकथा सभ सेहो नाटक मे अबैत अछि. देवताक वैद्य अश्विनी कुमार आबि अपन आयुर्वेदीय पद्धतिसॅं च्यवन ऋषिक आँखि ठीक क' दैत छथि. संगहि नाटक मे एकरो संबंध आजुक औषधि 'च्यवनप्राश' सँ जोड़बाक उल्लेख भेटैत अछि. अर्थात एहि औषधिक सेवन जे करताह-करतीह, हुनका सभ मे युवा-स्फूर्तिक स्वतः संचार  होब' लगतनि !...
          संकेत ई जे जाहि वृद्ध संग अपन सुपुत्रीक पाणिग्रहण करयबा सँ संबंधित राजा डरैत रहथि, ओ उक्त औषधि सँ पुनः यौवनावस्थाकें प्राप्त करैत छथि. फेर मुदा तकर बादक कथा एत' मौन अछि. अर्थात विवेच्य एकांकी-नाटक एत' आबि विराम ल' लैत अछि.

          एहि एकांकी-नाटक मे ओना तँ लगैत एना छै जे लेखक प्रचलित कथेक आधार ल' तकरा नाट्यरूप मे गुंफित कैने छथि, मुदा ताहि प्रसंग हुनक मंतव्य किछु भिन्न छनि. ओ लिखैत छथि जे एहि मे संदेह नहि जे नाटक तथा उपन्यास हृदय सँ, सत्यतापूर्वक मानवताक अभिव्यक्ति करैछ, जाहि सँ प्राचीनताक कर्णधार लोकनिक भावनापर आघात पहुँचि सकैत छनि. तें डराइत-डराइत हम एहि कथानक कें ओही रूपमे प्रस्तुत कयलहुँ अछि, जाहि तरहें ओ हमरा हृदय तथा कल्पनामे उपस्थित भेल. तें सुकन्या आ च्यवनक चरित्र पौराणिक आधार सँ भिन्न भेटत. सुकन्याक जीवनक निरर्थकता तथा तुच्छता कें अहाँ अधर्म नहि मानब, से विश्वास अछि. जीवनक यथार्थता एवं सार्थकता मनुष्यक वाह्य आचरण तथा चरित्र सँ नहि ज्ञात भए सकैछ...
          आ एहि तरहें नाटकक कथ्यकें ओ अपन शब्द-जाल मे ओझराबैत सन प्रतीत होइत छथि. मुदा हुनकर जे सकारात्मक मनसा वएह अछि, जकर उल्लेख पूर्व मे कएल अछि. एहि कृतिमे सुकन्याक चरित्र काफी सकारात्मक रूपसँ विस्तार पौलक अछि, मुदा कनेक आर खुलबाक जरूरति छलै...
          एकर भाषा सेहो प्रांजल अछि, आ सांकेतिक सेहो. आ जाहि बल पर विवेच्य एकांकी-नाटकक उद्देश्य, आजुक समयक अनुकूल बनि गेल अछि. 
          ध्यातव्य ई जे विवेच्य कृति, एखन अपन प्रकाशनक एकहत्तरिम वर्ष मे चलि रहल अछि. विषयान्तर होइत एतय कनेक बेसी व्यक्तिगत होइत ईहो उल्लेखनीय जे 'मुनिक मतिभ्रम'क प्रकाशन वर्ष 1953 अछि, आ संयोग एहन जे हमरो जन्म वर्ष सेहो सएह थिक ! खैर.

          मुदा एतेक तरह सँ विमर्शित होइत हमरा कतहु सँ ई बोध नहि भ' सकल जे प्रस्तुत कृति मंचन-योग्य नहि अछि. ओना जाहि समय-कालमे एकर लेखन-प्रकाशन भेलैक, ताधरि ताहि तरहें सोचब कें सही मानल जा सकैत अछि. मुदा जखन हम अपन मध्यकालीन नाटकक इतिहास कें पढ़ैत छी तथा नाटकक धारावाही मंचनक उल्लेख पबैत छी, तखन एहि रहे सोचल जायब सही नहि लगैत अछि. एकर भाषा ओ कथ्य आधुनिक ओ काव्यात्मक अछि जे एक सकारात्मक पक्ष मानल जा सकैत अछि. तहिना एहि एकांकी-नाटक मे सभ किछु स्पष्ट नहि कहितहुँ, संकेत मे सभटा बात कहि जयबाक चातुर्य भेटैत अछि, संगहि बदलैत परिदृश्य, नाटकक अक्षुण्ण मूल कथा-रूप, एकर पौराणिकता कें बेस विश्वसनीयता प्रदान करैत अछि. 
          तें जत' धरि एकरा पाठ्य-नाटकक कोटिमे राखल जयबाक प्रश्न अछि तँ एत' स्पष्ट भ' ली जे आजुक रंग-तकनीक बहुत अधिक विकसित भ' चुकल अछि. सिनेमा जकाँ, अथवा कही तँ ताहू सँ अधिक सही आ विश्वसनीय ढंग सॅं अभिप्रेत विषय कें प्रस्तुत करबामे वर्तमान रंगमंच पूर्ण सक्षम अछि. अंतर एतबे भेलैक अछि जे लेखक लोकनि द्वारा लिखल गेल नाटक कें मंच पर व्यवस्थित आ वास्तविक ढंगे प्रस्तुत करबाक लेल ओकर 'प्रदर्शन आलेख' तैयार क' लेल जाइत छै. आ तें निस्तुकी कहल जा सकैत अछि जे आइ रंगमंचक लेल किछुओ टा असंभव नहि रहि गेल छै...
          एहि संदर्भ मे अपना कें कने-मने विस्तारित करैत कहय चाहब जे हिंदीक सुप्रसिद्ध लेखक जयशंकर प्रसादकें हुनक समय मे जतेक नाटक रहनि, तकरा एहि तर्कक संग कात क' देल गेल रहै जे ई सभ पाठ्य-नाटक थिक. ई मंचनक योग्य नहि अछि. एकरा पढ़ू आ आनंद लिअ ! मुदा ओही सभ नाटक कें अस्सी-नब्बेक दशक मे आबि क' सुप्रसिद्ध निदेशक ब ब कारंत निदेशन कयलनि, से 'ध्रुवस्वामिनी' सँ ल' क' 'स्कंदगुप्त' धरिक !...
          आ ओ जे परंपरा आरम्भ भेल, जे कोनो कृतिक मंचन असंभव नहि अछि, आइ तकरे परिणति अछि जे कोनो एहन साहित्यिक-गैर साहित्यिक विधा शेष नहि रहल, जकर मंचन नहि भ' रहलय. आ से ओ आत्मकथा होइ, आकि रपट-समीक्षा ! बिहार 'इप्टा'क द्वारा अभिनीत आ चर्चित नाटक 'मैं बिहार हूँ' तँ एकगोट अखबारक कतरन मात्र थिक ! तहिना ई पंक्ति लेखक स्वयं साक्षी रहल अछि, जखन सुचर्चित सिने ओ रंग अभिनेता टॉम अल्टर (आब दिवंगत) भोपालक भारत भवन मे एकटा विशेष अवसरपर चचा गालिबक चरित्रक अभिनय, हुनके कविताक आधारपर कैने रहथि ! आ मराठीक रंगमंच तँ अपन नित नवीन प्रयोगक बल पर हिंदी सिनेमाक हृदयस्थली मे ओकर समान्तर चलि रहल अछि. बंगला थियेटरक सेहो सएह त्वरा अछि...
          तखन प्रश्न उठि सकैत अछि जे मैथिली रंगमंचक स्थिति एहि सभ सँ भिन्न अछि. मुदा हम कहब, कोनो टा भिन्नता नहि अछि ! रंगमंचक अपन एकटा अलग व्याकरण होइत छै, जे सभ ठाँ यथासंभव अपन स्थान बना लैत छै. 
          आ ताही संदर्भमे एत' उल्लेख कर' चाहब जे एही मैथिली रंगमंचपर ललितक उपन्यास 'पृथ्वीपुत्र', मणिपद्मक 'फुटपाथ' आ अनिल कुमार ठाकुरक 'आब मानि जाउ'क सफल मंचन भ' चुकल छै. तहिना महेंद्र मलंगिया लिखित 'गोनूक गवाह' खिस्साक संगहि हरिमोहन झाक कथा 'मर्यादा भंग' 'पाँच पत्र', 'कन्याक जीवन' (तित्तिरदाइ), 'पंडितक गप्प', 'मिथिलाक संस्कृति', वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री'क 'हीरक जयंती', पं. गोविंद झाक 'पातक मनुक्ख', राजकमल चौधरीक 'ललका पाग', मलाहक टोल, 'कमलमुखी कनियाँ', 'ननदि-भाउज', 'साँझक गाछ', आ सुधांशु शेखर चौधरीक 'भारती', धूमकेतुक 'अगुरवान', सुभाषचन्द्र यादवक 'डर', प्रदीप बिहारीक 'काॅंट' सहित श्याम दरिहरेक 'रक्तसंबंध' आदि कें मैथिली रंगमंच अपन प्रयोग-परिधिमे आनि चुकल अछि. प्रयोग तॅं एकटा कथा लेखकक अनेक कथाक गुलदस्ता बना क' सेहो मंचन भेल अछि, यथा : 'मैथिल नारि : चारि रंग', 'कथा रंग', 'कथा पौती', 'एकादशी', 'घाट पर जाति', 'दुखहि जनम भेल' आदि.
          एतबहि नहि, मैथिली कविताक मंचनक सेहो एकटा सूची अछि, जे मंचित भ' चुकल अछि. तत्काल किछु स्मरण भ' रहल अछि– यात्री-नागार्जुनक 'विलाप', 'गाछ लगाउ', तंत्रनाथ झाक 'उपनयनक भोज, 'सिमरिया डूब' (मुसरी झा) आदि. 
          तहिना स्मरण करी, लोकमहागाथा सभ सेहो मैथिली रंगमंचपर अपन प्रभाकें पसारि चुकल अछि. तावत 'लोरिकाइन' आ 'सलहेस'कें हम स्मारित क' सकैत छी. आ ताही क्रम मे चर्चित लोक-गीत-नृत्य 'सामा-चकेबा', 'जटा-जटिन' कें सेहो ल' सकैत छी. तहिना पारंपरिक गीत-नृत्य 'झरनी', 'डोमकछ' सेहो...

          किंतु एखन तँ हम पौराणिक कथा सभक मंचन-प्रसंग विमर्श क' रहल छलहुँ जे ओहन सभ विषयक नाटक, पाठ्य टा भ' सकैत अछि ! तें एतय हम पुनः विषय विस्तारित करैत सूचित कर' चाहैत छी जे मैथिली रंगमंच एते धरि साहस क' चुकल अछि जे ज्योतिरीश्वरक 'धूर्त्त समागम' आ विद्यापतिक 'मणिमंजरी', 'गोरक्ष विजय'क मंचन तँ कैये चुकल छै, हुनके कथा संग्रह 'पुरुष परीक्षा'क कथा सभ मे सँ लगभग चालीस-चौवालीस कथाकें आकाशवाणी पटना प्रसारित सेहो क' चुकल अछि. आ जकर नाट्यरूपांतरण कयलनि योगानन्द सिंह झा, ओ प्रस्तुति छत्रानन्द सिंह झाक छलनि...
          पौराणिक कथाक मंचन पर जत' धरि प्रश्न उठैत अछि तँ पं. गोविन्द झाक 'रुक्मिणी हरण'क दर्जनो प्रस्तुति एखन धरि भ' चुकल अछि. तहिना उमापतिक 'पारिजातहरण'क लगभग आधा दर्जन सँ बेसी बेर मंचन भ' चुकल छै. एही परिधिमे पारम्परिक 'जानकी परिणय' कें सेहो हम ल' सकैत छी.
          तहिना प्रसंगवश उल्लेख करी जे कथ्यक स्तर पर कनेक अधिक कठिन आ टेढ़ नाटक अछि नचिकेताक– 'नो एण्ट्री : मा प्रविश' ! मुदा तकरहु मंचन क' मैथिली रंगमंच एक तरह सँ असंभव कें संभव क' चुकल अछि. 

          ... आ एतेक रास जे मंचन, आ से कठिन मंचन सभ भेलैक, भ' रहलै अछि, ताहि मे अहर्निश लागल पटनाक 'अरिपन' ओ 'भंगिमा' तथा दिल्लीक 'मैलोरंग'क अविस्मरणीय योगदान रहल अछि. ओना तॅं कलकत्ता, दरभंगा, बेगूसराय, जनकपुर धामक योगदान सेहो कम नहि छैक, आ जकर सभक संपूर्ण गतिविधि ज्ञात नहि रहबाक कारणें उल्लेख नहि कएल.

          अस्तु, एहना स्थिति मे आ आजुक परिप्रेक्ष्य मे रंगमंच लेल एक पंक्ति मे कही तँ 'असंभव' सनक किछुओ शेष नहि रहि गेल अछि. आ तें विवेच्य 'मुनिक मतिभ्रम' एकांकी-नाटकक संदर्भ मे हमर निहितार्थ एतबे अछि जे एकरहु आब' वला समय मे मंचन असंभव नहि छै.
          के जनैत छल जे भारतक 'चंद्रयान' चंद्रलोकक यात्रा करत ! ओहुना, भनहि तॅं भवभूति लिखि गेल छथि– 'कालोऽह्ययं निरवधि विपुला च पृथ्वी'. मने काल अनंत आ पृथ्वी बहुत पैघ. आ तें कतहु-ने-कतहु कहियो-ने-कहियो, हमर समानधर्मा जन्म लेत...