Tuesday, August 22, 2023

रखबार (मैथिली कथा) : प्रदीप बिहारी

कथा

रखबार
प्रदीप बिहारी

दुनू भाय-बहिन घरमे एकटा महिलाकें पैसैत देखि हतप्रभ भ' गेल। एक-दोसराकें प्रश्न-दृष्टिएं ताक' लागल। दुनूक माय ओहि महिलासं गप कर' लागलि आ ओही क्रममे दुनू भाय-बहिनक परिचय करौलकि- "यैह दुनू छै। जेठकी- स्वीटी आ छोटका- प्रफुल्ल। काज तं बुझले छह। ध्यान देबाक छै जे बच्चा सभ के कोनो कष्ट नहि होइक। दुनू स्कूल तं संगहि जाइए, मुदा स्कूल सं अयबाक समय अलग-अलग छै। स्कूलक वैन अपार्टमेंटक गेट धरि पहुंचा दै छै। ओत' सं आन' पड़तह। तें समय सं पाच मिनट पहिने गेट पर तैनात रहब जरूरी । तोहर नाम की छह?"
          "सुलेखा।" आगन्तुक महिला उतारा देलकि। उताराक बाद दुनू नेना दिस ताकलकि। अखियासलकि- जेठकी माने स्वीटी सात बरखक हेतै आ छोटका माने प्रफुल्ल चारि बरखक। ओ दुनू बच्चाकें 'गुड मॉर्निंग' कहलकि, मुदा दुनू उतारा नहि देलक। मायकें कोनादन लगलैक। एना तं कहियो ने करै छल दुनू। माय अपन दुनू संतानकें कहलकि, "आइ सं यैह आन्टी तोरा दुनूक संग दिन भरि रहथुन।"
          स्वीटीकें कोनादन लगलैक। मायसं पुछलकि, "आन्टी?"
         माय किछु बजितय, ताहिसं पहिने प्रफुल्ल बाजि उठल, "आन्टी जैसी तो नहीं लगती है। दादी लगती है। पर...।"
         माय, बेटा दिस तकलकि। 
         प्रफुल्ल बाजल, "पहली आन्टी की तरह स्मार्ट नहीं हैं।"
         मायकें हंसी लागि गेलै। सोचलकि- छौंड़ा बाज'मे पकठोस छै। एखनेसं वयस्क सन गप करैत रहै छै। मुंहें पर कहि दैत छै सभ कथू। ड'ए-भ'र नहि छै। हरिबोलबा छै छौंड़ा। बजन्ता सेहो। दुनू प्राणी सांझखन आफिससं झूर-झमान भेल अबैत अछि तं छौंड़ा दिन भरिक खिस्सा कहैत छैक। से, एहि तरहें कहैत छै जे दुनू प्राणीकें हंसी लाग' लगैत छै। आफिसक तनाओ कने कम भ' जाइत छै।
          मायकें ई बात नीक लगैत छैक। ओ एहि बातसं प्रसन्न होइत रहैत अछि। तखनहुं भेल छलि। ओ सुलेखाकें कहलकि, "कने बेसी बजै छै ई। तें एकर बात के बेजाय नहि मानह।"
         "नहि, नहि। धियापुता त' चंचल होइते छै। चंचल होमको चाही।" सुलेखा बाजलि, "स्वीटी दैया जानू कम बजै छिकथिन।"
          स्वीटीकें चुप देखि बाजल छलि सुलेखा।
          "हं, ई कने स्थिर छै। शान्त स्वभावक।‌ बजितो छै स्थिरे सं। मुदा, एकर डिमांड जं पूरा नहि होइत छै, तं घरे माथ पर उठा लैत छै। तामस नाके पर रहै छै एकरा।"
          "बेस, हमे सब सम्हारि लेबै।" सुलेखा बाजलि। सुलेखाक मोनमे उचरलैक जे कलियुगहा बच्चा छै, जेहन ओ देखलकि अछि, तेहने हेतै ने। एहिसं बेसियो भ' सकै छै। मुदा, ओ नहि बाजलि। कोना बजितय? ओहि घरमे नौरी बनि क' आयल छलि। बयस भने जे होउक, ओहदाक अनुसारे ने रह' पड़तै।
           गृहस्वामिनी माने डौली सुलेखाकें काज बुझाब' लागलि। पहिने भानसघरक सर-समान। तखन स्वीटीक कोठरी। ओकर वार्ड्रोव। स्कूलक ड्रेस। घरक कपड़ा। प्रफुल्लक कपड़ा सभ। 
           स्वीटी सोचि रहल छलि। चारि मासमे ई तेसर छै। पहिल तं पनरहियो ने रहलै। छोड़ि देलकै। जानि नहि की भेलै? मम्मी आ पापा तं किछु ने कहलखिन। जं कहनहुं हेथिन तं, ओकरा नहि बुझल छै।
           दोसर किछु दिन टिकलै। आरती आन्टी रहै ओ।  दुनू भाइ-बहिनकें बड़ मानै। स्कूलसं अबितहिं प्रफुल्लक ड्रेस बदलि दैक। स्वीटी अपन ड्रेस अपनहि बदलि लैत अछि। अपन काज अपने क' लैत अछि। आरती आन्टी खेनाइ ल' क' हाजिर। प्रफुल्लकें खेला-खेला क' खुआबै। मोबाइल द' दै। ओ देखय आ आरती आन्टीक हाथसं खाय। जेना अपन दादी खुआबै छथिन, तहिना खुआबै। एकहक क'र द' कहै- ई सुग्गा, ई मेना, ई परबा...। कखनो क' ओ डांटबो करै। हं, आरती आन्टी जखन प्रफुल्लकें मोबाइल द' क' खुआबै, तं हमरा टी वी पर रील आ आन मनपसन्द चीज देख' के सुविधा भेटि जाय। मुदा, ओहो चलि गेलै। आब ई तेसर...।
          दादीक स्मरण होइतहिं ओ मायसं पुछलकि, "मम्मी। आज दादी और दादू भी आ रहे है? कबतक आएंगे?"
          डौली ओकर जिज्ञासा शान्त कयलकि, "दो बजे तक।" आ तखनहि किछु मोन पड़लै।
          स्वीटीक मुंहसं बाबी आ बाबाक अयबाक गप सुनि सुलेखा डौलीसं पुछलकि, "मैडम! अपने के सासु-ससुर आबि रहलखिन हन। हिएं रहै छिकथिन?"
          "आबि रहल छथिन। आरती के हटला के बाद हमरा एकदिन छुट्टी मे रह' पड़ल। मम्मी जी के काल्हि खबरि केलियनि, तं कहलखिन जे आबि रहल छी।‌ एहि बीच काल्हि तोरा सं गप फाइनल भ' गेलै। हं, आइ दू बजे धरि आबि जेथिन। ड्राइवर स्टेशन सं ल' अनतनि। दिन के खेनाइ हुनको सभ लेल बनतै।"
          वैभव कोठरीसं बहरायल आ स्वीटीकें कहलक, "बेटी, तैयार नहीं हुई? स्कूल का टाइम हो रहा है। जल्दी करो।" ओ प्रफुल्लकें तैयार कर'मे लागि गेल। स्वीटी सेहो तैयार होमय लागलि।
          सुलेखाक पहिल दिन छलैक, तें डौली सेहो भानसघरमे छलि। बच्चा सभक टिफिन तैयार भ' रहल छलैक। सुलेखा पुछलकि, "आरती किए छोड़लकै काज?"
          "अरे, छोड़लकै कहां, हम सभ हटा देलियै।"
          "बोलब करै छै जे छोड़ि देलियै हन।"
          "झूठे । काज तं बढ़िया करै। घरो-दुआर नीक जकां राखै। मुदा, बजै बड़। हम सभ अपन घरोक कोनो गप करियै कि बीचमे टोकि दै। दोसर ई जे परसू प्रफुल्लकें स्कूलसं आब' काल ओ अपार्टमेन्ट के गेट पर नहि रहै। गार्ड ओकरा रखने रहलै। ओकर पापा के फोन केलकै। हम दुनू गोटे अयलियै, तं ओकरा घर अनलियै। ओ पैंतालिस मिनट लेट अयलैक।‌ पुछलियै तं बात बनाब' लागल। कहांदन निन्न नहि टुटलै। बुझहक, बारह बजे दिनमे कतौ लोक सुतै छै। मना क' देलियै। काल्हि सं नहि आ।"
         सुलेखा चुपचाप काज करैत छलि। डौली फेर बाजलि, "तोरो कहै छियह। ठीक बारह बीसमे स्कूलक वैन प्रफुल्लकें ल' क' अपार्टमेन्टक गेट पर आबि जाइ छै। तें ठीक सवा बारह बजे गेट पर उपस्थित रह' पड़तह। एहिमे कोनो आलस नहि। इफ-बट नहि। तेसर एकटा आर कारण रहै जे हटेलियै। घरक कैमरा सभ बरोबरि बन्द क' दैक। हम सभ मोबाइल पर देखियै, तं कैमरा औफ। ओना हमरा सभ के समये ने रहैए मुदा मम्मी जी बरोबरि देखैत रहै छथिन। हुनका जहां कैमरा औफ देखाइ छनि, कि हमरा दुनू के फोनियाब' लगै छथिन।"
           लगैक जे डौली ऑफिस मे अपन अधीनस्थ कर्मचारीकें काज बुझाइयो रहल अछि आ डांटियो रहल अछि।
          सुलेखा चुपचाप सुनि रहल छलि।
          संक्षेपमे दिन भरिक चर्या सुलेखाकें बुझा क' डौली अपन कोठरीमे चलि गेलि आ लैपटॉप खोलि लेलकि। 
          सुलेखा कोल्हुमे बह' लागलि।
          
बाबी-बाबाकें देखितहिं दुनू बच्चाकें बुझाइक जेना सगर जहान भेटि गेल होइक। जेना मेलामे हेरायल संगीकें एक-दोसरासं भेंट होइत छै, तहिना प्रफुल्ल बाबीक करेजसं सटल। 
           बाबीक मुंहसं बहरयलनि, "कोना छह बाबू?"
           नीक वा बेजाय तं नहि बाजल मुदा बाजल, "दादी, तुम आ गई। अब मजा आ जाएगा।"
           प्रफुल्ल बाबीक आलिंगनसं फराक होइत बाबा दिस लपकल, "हाइ फ्रेंड! हाउ आर यू?"
           बाबा ओकरा करेजमे साटलनि। बजलाह, "फाइन।"
           बाबा-पोतामे दोस्ती छैक। एक-दोसराक सम्बोधन 'फ्रेंड' छैक। पोताकें जखने केओ पुछैत छलैक जे  दादाक फ्रेंड के? तं ओ झटसं उतारा दैत छल- पोता। आब जे केओ ई प्रश्न पुछैत छैक, तं कहैए- प्रफुल्ल। एकदिन बाबी पुछलखिन जे आब नाम किएक कहै छी? भने पोता कहैत रही। ताहि पर बाजल - 'पोता तो अकेले हैं न। इसीलिए नाम कहते हैं।'
           से ठीके। बूढ़ाकें दू टा बेटा, तीनटा पोती आ एकटा पोता छनि। दुनूकें दू-दू टा संतान। इहो पोता जे भेलनि तकर खिस्सा छैक। बूढ़ी बरोबरि डौलीकें कहथिन, "स्वीटी कें एकटा आर भाय वा बहिन होमक चाही। एसगर..."
           कि बिच्चहिंमे पुतौहु गपकें लोकि लेलकनि, "हमरा दुनूक व्यस्तता देखिते छी। दू-दू साल पर बदली। कोना निमेरा हेतै? तें दोसरक प्लान नहि करै छी। एकटा छै, वैह बहुत भेलै। ओ तं हमर विभागक सुविधे एहन छैक जे दुनू प्राणीक बदली एक शहरमे भ' जाइ छै। नहि तं, इहो एकटा..."
           बूढ़ीकें मोन पड़लनि। पछिला बरख डौली अपन प्रोमोसन नहि लेलनि। दुनू चीफ मैनेजर भ' जइतय तं ई सुविधा नहि भेटितैक। तथापि ओ बजलीह, "से तं ठीक। तैयो, हम कहलहुं। अहां सभ सोचब।"
   ‌‌        से ओ दुनू दोसर बच्चाक 'प्लान' तखन बनौलक, जखन डौलीक नैहरक शहरमे दुनूक बदली भेलैक। आ जन्म भेलैक प्रफुल्लक।

बाबाक नजरि घड़ी पर गेलनि। बीस मिनटक बाद स्वीटीक स्कूल वैन औतैक। पोताकें कहलनि, "खाना खा लिए।"
             पोतासं पहिने सुलेखा बाजलि, "स्कूल स' अएला के बाद दूध पिलखिन हन। बोललखिन जे खेनाइ दादी के हाथे खेबै।"
            बूढ़ी बजलीह, "परसि दहक।"
            बूढ़ा दिस तकैत सुलेखा बाजलि, "हिनको खाना परसि देबनि?"
            "एखनि नहि। स्वीटी आबि जायत तखन..."
            सुलेखा प्रफुल्लक भोजन आनि क' देलकि। बाबी पोताकें खुआब' लागलि। मुदा, पोता छिड़िया लागल। एखनि नहि खायत। टी वी चलैत रहैक। ओ 'स्पाइडर मैन'क करतूत सभ देखि रहल छल से समाप्त नहि भेल छलैक। समाप्त भेलाक बाद खायत। बाबी परबोधैत छलीह। बाबा-बाबीकें बुझल छनि जे टी वी बन्न करताह तं आर छिड़िया जायत। चिचिअएबो करत- टी वी खोलो।
             सुलेखा बाजलि, "बाबू! टी वी बन्द कर दें। खाकर देखिएगा। तब तक मोबाइल देखकर खा लिजिए।"
             प्रफुल्ल शान्त भेल। सुलेखा टी वी बन्न क' देलकि आ मोबाइल प्रफुल्लक हाथमे थम्हा देलकि। मोबाइल देखितहिं बच्चा खाय लागल। बाबी खुआब' लगलखिन। हुनका किछु बजबाक अवसर नहि देलकनि पोता। 
            बाबा सुलेखाकें कहलनि, "ई कोन बानि छै? एकरे कहै छै तार पर सं खसि क' खजूर पर आयब।"
            बाबीकें रहल नहि गेलनि। पतिक गप काटलनि, "तार पर सं खसब नहि भेलै ई। खजूर बाटे तार पर चढ़ब भेलै।"
            सुलेखा माथ निचां कयने बाजलि, "ई आदति त' पहिले स' होतनि ने।"


संध्याकाल करीब साढ़े सात बजे सुलेखा बूढ़ीकें कहलकि, "अपने आर छेबे करथिन, त' हमे घ'र जइयै? राति के खाना बना देलियनि हन।"
            "गप की भेलह-ए?"
            "गप होलै हन जे जा तक साहेब या मैडम नहि आइ जैथिन, ता तक हमरा रहय के छिकै। आइ अपने आर छिकियै, तें सोचलियै जे...। काल्हि भोरे साढ़े छौ बजे आइ जेबै।"
            "बेस जाह।"

रातिक आठ बजे वैभव आयल। अबितहिं माय-बाबूकें गोड़ लागि बेटाकें कोरामे ल' दुलार कयलक। तकर कनिए काल बाद डौली आयलि। घर भरल-भरल सन लगलैक।
           फ्रेश भेलाक बाद सभ गोटें बैसल। प्रफुल्लक चंचलतासं आनन्दित होइत गेल। ट्यूशन आ स्कूलक होमवर्कक चर्च भेलैक। स्वीटी अपन होमवर्क आ डायरी पापाकें देखौलकि। प्रफुल्ल अपन मम्मीक कोरमे उछल-कूदमे लागल छल। बाजल- 'हमको मैम कोई होमवर्क नहीं दी है।"
          "हमको नहीं, मुझे।" वैभव टोकलकै, तं प्रफुल्ल बाजल, "मिन्स मुझे। क्लास मे जो पूछती है, सुना देता हूँ। ट्यूशन वाली मिस याद करा देती है।" ओ स्वीटी दिस तकैत अपन दुनू हाथक औंठा आ कान्ह हिलाब' लागल। शान्त स्वीटी बाजलि, "अभी नर्सरी में हो न, बड़े क्लास मे जाओगे तब समझना।"
           "ओ के। जब जाएंगे, तब समझेंगे।" प्रफुल्ल अपन स्वाभाविक रूपमे आबि गेल।
            वैभव गपकें बदललक, "एत' अएने एकरा दुनूक भाषा गड़बड़ा गेलैए। बिहारी हिंदी बाज' लगलैए।"
            डौली बाजलि, "की करबै? जेहन देश, तेहन भेष।"
            माय वैभवकें कहलनि, "मुदा, अपनो भाषा अएबाक चाही।"
            "से तं तोहीं सभ सिखेबही। आ तों सभ एत' पाहुन जकां अबै छें। कोना सिखतै?" बेटा मायक गपक उतारा दैत छल, "ओना मैथिली बूझि लै छै, मुदा रिटर्न‌ नहि क' पबै छै।"
            "हमहूं सभ परमानेंट नहि ने रहि सकै छियौ। घरो पर तं बहुत काज छै। कोनो किरायादारो नहि छै, जे घरक कने ओगरबाही हेतै। तखन, जखन-जखन जरूरी होइ छौ, आबिए जाइ छियौ।" माय बजलीह।
            पिता देखलनि जे बेटाक मोबाइल पर ताबड़तोड़ मैसेज आबि रहल‌ छलैक। पुतौहुक मोबाइल पर सेहो। दुनू मैसेज देखय। कतहु फोरवार्ड करय आ गपो करय। एक-दू बेर कौल सेहो अएलैक, मुदा ओ दुनू कौलकें साइलेंट क' दिअय। पिताकें रहल नहि गेलनि। बेटाकें कहलनि, "जरूरी फोन छह तं गप क' लैह। मैसेजो बहुत आबि रहल छह।" पुतौहु दिस तकैत बजलाह, "कनियां, अहूंक फोनक यैह हाल अछि। काज बढ़ि गेल अछि?"
           वैभव उठि क' गप कर' गेल आ डौली ससुरक प्रश्नक उतारा देलकि, "काज कमे कहिया रहै छै? एक-ने-एक जरूरी रहिते छै। आब प्राइवेटे की, सरकारियो बेसी आदेश मैसेजे सं अबै छै आ अनुपालनो होइ छै। कार्यालयी विस्तृत डेटा सभ मेल पर अबैत-रहैत छै। समय कहां छै? सभ के तुरन्ते उतारा चाही।"
            "मुदा, घर-परिवारक देखभाल, बाल-बच्चाक सही निमेरा आ दाम्पत्यक संतुलन सेहो जरूरी छै ने।" सासु पुतौहुकें कहलनि।
            वैभव कोठरीसं बहरायल। बाजल, "आब भोजन-भात होइ। भोजनक बाद कनेकाल एकरा दुनूकें पढ़यबाको छै।"
            सासु आ पुतौहु एक्के बेर भानस घरमे पैसलीह।

पत्नी पति लग अपन चिन्ता उझीलि रहल छलीह। बच्चा सभक नीक जकां निमेरा नहि भ' रहल छै। एकरे सभक बारे मे सोचि माथ टनकैत रहैए। आखिर संतति तं अपने सभक खराप भ' रहल अछि। एहि तरहें काज कोना चलतै? दुनूकें टी वी आ मोबाइलक एहन हिस्सक छै, से जानि नहि...अपनो दुनू अबैए तं मोबाइले मे ओझराएल रहैए। एकटा मोबाइल घरमे राखि देने छै। कहलियै जे किएक? तं कहलक जे दिनमे जेना-जेना समय भेटैए, तं वीडियो कौल क' लैत छियै। हाल तं यैह छै। अपनो सभ सभदिन नहि रहि सकै छी। हम तं डौलीकें कहलियनि जे पापा रिटायर भ' गेलाह। एकहक मासक पारी लगाउ। एक मास हम दुनू गोटें रहब, एक मास ओ दुनू गोटें रहथि। मुदा, से समधि-समधिनकें मंजूर नहि छनि। कहै छथिन जे एहिठाम बदली करा ले। धियापुताकें पोसि देबौ। नहि तं नोकरी छोड़ि दे।
            पति बजलाह, "ई बात बियाहक समय डौलीकें हम कहने रहियै, तं बाजल छलीह जे बेसी दिक्कति होयत तं नोकरी छोड़ि देब। मुदा, जत्तेक नोकरी होयब मोश्किल छै, ताहिसं बेसी छोड़ब होइ छै।"
             पत्नी बजलीह, "से तं डौली सेहो कहै छथि जे मम्मी जी नोकरी छोड़ल नहि होयत हमरा बुतें। एकाध बेर सोचबो कहलौं, तं लागल जे घरमे बिनु काजक कोना रहि पायब?"
            "बच्चो सभकें कोनो तेहन संगी नहि छैक। महानगर सनक अपार्टमेन्ट जिला आ कमीश्नरी बला शहरमे नहि छैक। एत' तं बुझू जे खुट्टा पर तहखाना बना देने छै। कत' बुलत बच्चा सभ? कत' खेलत? तें देखै नहि छियै। दोसर तल्ला बला ओ बच्चा बरोबरि अपना ओहिठाम अबैए आ प्रफुल्लक संग रड़धुम्मस मचौने रहैए।"
             दोसर दिन ससुर पुतौहुकें फोन क' पुछलनि जे ओ एक घंटाक लेल दुनू प्राणी आबि सकैत छथि। डौली मैनेज कयलकि। ससुरक कथनानुसार‌ चारि बजे दुनू प्राणी डेरा पहुंचल। ससुर डौलीकें कहलनि, "हम नेट पर चेक कयलहुंए जे एत' कला केन्द्रमे भरतनाट्यमक क्लास होइत छै। स्वीटी अहमदाबादमे सिखैत छलि। हम कलाकेन्द्रक हेडसं गप कयलहुं अछि। चलू, स्वीटीक नामांकन कराओल जाय।"
            बेटा-पुतौहु आ पोता-पोतीक संग बाबा कलाकेन्द्र गेलाह आ स्वीटीक नामांकन भेल। ओकरा पेंटिंगमे सेहो रुचि छलैक। ओहूमे नामांकन भेलैक। दू दिन माने शनि-रवि क' नृत्य आ शेष चारि दिन पेंटिंग। तय भेलै जे एक गोटें ओकरा कलाकेन्द्र पहुंचाओत आ दोसर आनत। वैभव बाजल, "आब इंगेज रहत स्वीटी।" 
            ओत' प्रफुल्ल सेहो हल्ला कर' लागल जे ओहो सीखत। मुदा ओकर माता-पिता तय कयलक जे एकरा लेल कोनो म्यूजिकल इन्स्ट्रूमेंट घरमे राखि देल जाय, जाहि पर अभ्यास करत। तकर बाद जेहन रूचि हेतै, करत। स्कूल-ट्यूशनक बाद पहिने एतेक इंगेज तं रहय।"

मुदा बाबीकें पोताक चिन्ता सालैत रहलनि। पोतीक सेहो। पतिकें कहलनि, "अहांकें नहि लगैए जे दुनू बच्चा पर बोझ बेसी भ' जेतै?"
            "हं, बोझ कने बढ़तै, मुदा ई सभ सीखब शुरू करबाको समय तं यैह छै।"
            पत्नी बजलीह, "से जे कहियौ।"
            अधरतियामे पत्नीक निन्न टुटलनि। पतिकें उठौलनि। पतिकें लगलनि जे काल्हि भोरे घुरबाक छनि, तें निन्न उचटि गेलनिहें। पुछलनि, "की भेल?"
            "अएं यौ। ई धियापुता सभ नीक नहि बनतै तं अपना दुनूकें केओ माफ करत वा अपने दुनू गोटें स्वयंकें माफ क' सकै छी?"
  ‌‌          पति सकदम। कनेकालक बाद बजलाह, "चिन्ता नहि करू। अपना सभक समयक हिसाबसं आजुक समयकें नहि तकियौ।"
             प्रात भेने ड्राइंग रूमसं बहराइत काल सुलेखाकें कहलनि, "जाइ‌ छियह। मुदा समय-कुसमय अबैत रहबह। दुनू बच्चाके अपने पोता-पोती सन राखिहह।"
            ‌‌‌             -------

Tuesday, August 1, 2023

नाच (मैथिली कथा) : प्रदीप बिहारी


नाच

प्रदीप बिहारी


सरस सिनेहीकें निर्देशक पर तामस उठल रहनि। तामस एहि दुआरें‌ उठल रहनि जे निर्देशक नाटकक आरंभिक दृश्य बदलि देने छलाह। केहन बढ़िया अल्लू बम चौकी पर बजारल जाइक आ जहिना लोक सुनय 'फटाक', तहिना पर्दा घिचनिहार रस्सी घिचय आ मंच पर सजल-सजाओल दृश्यक संग कलाकारकें‌ लोक देखय। नाटक शुरू भ' जाइक। मान्यता रहैक जे, जे जतेक जोरसं संवाद बाजय, से ततेक पैघ कलाकार।
       मुदा राजनारायण डाक्टर दू मास पर दिल्लीसं घुरलाक बाद नाटकक रूपे बदल' पर लागल रहथि। चाहैत रहथि जे पहिले दृश्य मे सभ कलाकार कोरसक रूपमे मंच पर नचैत आबय, नाटकक मुखगीत गाओल जाइक, मंचक दू-तीन फेरा लगा क' नेपथ्य मे चलि जाय। 
        नब ढंगक एहि आरंभक पक्ष-विपक्षमे गाममे दुगोला सन भ' गेलैक। एक गोल कहैक जे परिवर्तन जरूरी छै, सभ बेर एक्के रंगक आरंभसं मोन ओंगठि गेल छै लोकक। दोसर गोलक लोक कहैक जे एहिसं पात्रक गोपनीयता नहि रहतै। लोक के नब-नब दृश्य मे नब कलाकार के देखबाक आतुरताक आनन्द नहि रहि पौतैक। सरस सिनेही सेहो विरोधिए पक्षक रहथि, अपितु ई कहल जा सकैछ जे विरोधी पक्षक अगुआ छलाह। मुदा हुनक जुति नहि चललनि। निर्देशक राजनारायण अपन निर्णय पर कायम रहलाह। गाममे हुनक विरोध करब मोश्किल बात। पछिला बीस बरखसं वैह निर्देशक होइत रहलाह। ओ राजस्व विभागक कर्मचारी छलाह आ गमैया डाक्टर सेहो छलाह। मेटेरिया मेडिकाकें घोंकि होम्योपैथिक डाक्टर कहाथि, मुदा एलोपैथिकसं सेहो परहेज नहि छलनि। रोगीक दुख छुटक चाही, खाहे कोनो पैथीसं होअय। रोगीक दुख छुटि जाइक, बस...। गौंआके आर की चाही? 
       नाटकक नीक कलाकार होइतहुं सरस सिनेही निर्देशक डाक्टर राजनारायणक सोझां ठठि नहि सकलाह। हुनका नाच' नहि अबैत छलनि। समूह नृत्यमे स्टेप मिलायब हुनका लेल कुनैनक गोटी सन तीत छलनि। सात दिन धरि रिहर्सलक बादो स्टेप नहि मिललनि, तं निर्देशक हुनका अभिनयसं हटा क' नेपथ्यक काज थम्हौलखिन। कने-मने गुल-गुल चललै‌ गाममे। मुदा सभ शान्त। विरोध पर‌ दरी ओछा देल गेलै।
         सरस सिनेही सोचलनि जे‌ ओ नेपथ्यक काज नहि करताह। सभ दिन हीरो के पाट खेलाइ छलाह आ आब मेक-अप करताह वा वस्त्र-विन्यास करताह वा मंच-सामग्रीक ब्योंत करताह वा अल्लू-बम पटकताह वा परदाक डोरी घिचताह। नहि, एहन कोनो काज नहि करताह। गाममे अपन छवि खराप नहि करताह। बड़ समझौता करताह तं सेकेंड हीरो के पाट क' सकैत छथि। ओहिसं नीचां नहि खसताह। 
          तखनहि एकटा बात मोन‌ पड़लनि। निर्देशक राजनारायणकें जे कलाकार पसिन नहि पड़ैत छनि तकरा ओ बीच नाटकमे नाकाम क' दैत छथि आ दर्शक सभ पिहकारी मार' लगैत छैक। कारण प्रचलित मान्यताक कारणें निर्देशके प्राम्पटर सेहो होइत छल। जाहि पात्रकें ओ नहि चाहथि, ओकर संवाद एतेक स्थिर सं बाजथि जे ओ सुनबे ने करय, मंचे पर अकबका जाय। दर्शक सभ बुझै जे कलाकार पाठ बिसरि गेल आ पिहकारी शुरू । जं कोनो कलाकार अपना मोने संदर्भ के जोड़ैत कोनो दोसर संवाद बाजि‌ दिअय, तं राजनारायण तामसे फुच्च। परदाक पाछां लालटेम वा टार्च देखौनिहार पर तमसाथि आ चुप भ' जाथि। परदा घिचनिहार देखय जे कलाकार सभ चुप अछि तं परदा खसा दिअय। नटुआक नाच शुरू भ' जाइक आ नेपथ्य मे संसदक सत्र चालू। अपन अवज्ञाक बहन्ने निर्देशक राजनारायण रुसि जाथि। फेर मान-मनौव्वलि होनि आ नाटक शुरू होइक।
        ई सभ बात एहि दुआरे होइक जे बेसी कलाकार पाठ यादि करब अपन शानक विरुद्ध बुझय। ओहि गामक त्रिदिवसीय नाटकक‌ आयोजनमे कम-सं-कम‌ एको राति एहन घटना होयब सोहाग-भाग रहैक।
        सरस सिनेही सोचलनि जे प्रतिष्ठा बचयबा लेल नीक बात यैह जे नाटकक एहि सत्ताधारी मंडली सं हटि जाथि। देखताह जे हुनक अभाव गौआं सभकें कतेक खटकैत छनि?
         सरस सिनेही जी पहिने मात्र सिनेही रहथि। गामक नाटक छोड़लाक बाद कविता लिखबाक अभ्यास कर' लगलाह। नाममे जोड़लनि सरस। भ' गेलाह सरस सिनेही। मोनमे भेलनि जे नाम बदलने किनसाइत भाग्य बदलि जानि।
         से भाग्य बदललनि सिनेही जीक। नोकरी भेटि गेलनि आ गाम छोड़' पड़लनि। शहरमे अयलाह। पड़िकल मोन कतहु मानय? ताक' लगलाह नाट्य मंडली आ साहित्यिक संस्था सभकें। भेटबो कयलनि। नाटक आ कविता चल' लगलनि। मुदा, एकटा बात भेलैक। शहरोमे 'रियलिस्टिक प्ले'क अवस्था बदलल जा रहल छल। 'म्यजिकल प्ले' रंगमंचक केबाड़ ढकढ़काब' लागल छल। सरस सिनेही रियलिस्टिक प्ले मे सहज रहथि मुदा म्युजिकल प्ले मे असुविधा होम' होनि। मुदा, ओ ताहिसं डेरयलाह नहि। जखने रिहर्सल कर' जाथि कि गामक राजनारायण डाक्टर मोन पड़ि जाथिन। मोन पड़थिन निर्देशक आ प्राम्पटर राजनारायण। आ मोनकें बान्हथि। नहि, एत'सं पड़यताह नहि। सिखताह नृत्य। कम-सं-कम ओत्तेक अबस्से जतेक नाटकमे खगता होयतैक।
          से, सरस सिनेही नृत्य सिखलनि। 
          एकदिन पत्नी कहलखिन, "यौ, नाच सिखलहुं से एकबेर हमरो देखाउ ने।"
          पत्नीक गपकें 'फेर कहियो' कहि टारि देलनि। ओ कोठरी बन्न क' टेप रेकार्डर पर कैसेट बजौलनि आ नाचबाक उपक्रम कयलनि। मुदा पयर उठबे ने कयलनि।बेर-बेर प्रयास कयलनि। तैयो ओहिना। 
          जा, ई की भ' गेलनि? आब नाटक‌ कोना करताह? सांझखन रिहर्सलमे जयबाकाल तनाओ रहनि जे कोना करताह? मुदा, रिहर्सल मे कोनो असुविधा नहि भेलनि। तखन? निर्देशककें कहलनि तं कहलकनि, "किनसाइत संकोच होइत हैत। नृत्य कर' काल मोनमे राखू जे मंचे पर क' रहल छी। तहिना करैत रहब तं धाख टुटि जायत। बयस बढ़ने किछु गोटे के एना होइत छनि।"
          "मुदा मंच आ आन ठाम मे फरक होइ छै ने।"
          "एही बात के मोन सं हटा दियौ।"
          मुदा, सरस सिनेही जीक मोनसं से बात हटि नहि सकलनि। हटितनि कोना? स्वयंकें यथार्थवादी शिल्पक अभिनेता मानथि।
          
राति चढ़ल नहि रहैक। साढ़े सात बजैत हेतैक। टी वी देखैत छलाह। ककरो मूड़ी छोपि लेल गेल रहैक, सैह समाचार टी वीक सभ चैनल पर अनघोल मचौने रहैक।
चैनल सभ विशेषज्ञ आ विभिन्न पार्टीक नेता सभकें बजा-बजा बुझू जे नचा रहल छल। ओ सभ अपने ताले‌ नाचि रहल छल। सिनेही जी कें मोन पड़लनि जे बुलडोजर मिशन पर सेहो एहने नाच होइत रहै टी वी पर। ओहू सं बेसी तं लिव इन मे रह' वाली छौंड़ीके पैंतीस टुकड़ी क' देबाक घटना पर भेल रहैक। सि‌नेही जी सोचैत रहलाह‌ जे पैंतीस खण्डकें बुझू जेना पैंतीस टा तालमे पियाजुक खोइया हटा-हटा हत्याक प्रक्रिया कें बुझाओल जाइत रहैक। किछु गोटें अबस्से सिखने होयत। 
         टी वी बन्न करबा लेल रिमोट उठौनहि रहथि कि बाट पर बजैत डी जेक ध्वनि कोठरीके थरथरा देलकै मने। तखनहि पत्नी भीतर अयलीह आ बजलीह, "यौ अहां बहीरो छियै?"
        "से किएक?"
        "एत्तेक जोरसं डी जे बाजि रहल छै‌ से सुनै नहि छियै? चलू बाल्कनीमे। देखियौ कोना नृत्य करैत अछि छौंड़ी-मौगी सभ।"
        "हं डी जेक थरथरी हमरो बुझाएल। चलू।"
         पति-पत्नी बाल्कनी मे ठाढ़ भ' बाट दिस तकलनि। देखिते सिनेही जी बजलाह, "एकरा अहां नृत्य कहै छियै? ई सभ त' धमगज्जर ताल पर नाचि रहल अछि। मुदा, ब'र बला गाड़ी नहि देखै छियै।"
         "बरियाती थोड़े छै जे देखबै।"
         "तखन?"
         "कुमरम कर' जाइ छै। हे वैह देखियौ। ब'र के माथ पर पीयर धोती राखि क' एकटा मौगी जा रहल छै। मने, बिधकरी हेतै।"
         "मुदा, ओ छौंड़ा तं जिन्स पहिरने छै।"
         "ताहिसं की? अपना सभ सन नहि‌ छै। मुदा नाच  तं आब अपनो सभ मे‌ होम' लगलैए।"
         "हे देखियौ। कोनो मौगी के नाच' अबै छै? लगै छै जेना हाथ-पयर भंजैत होअय आ देह पटकैत होअय।‌ भूत लागल होइ जेना। जानि नहि, एहि मे कोन आनन्द भेटै छै। यैह देखाब' हमरा घिचने अनलहुं अहां?"
         "जे होइ। जहिना होइ। उत्सव के भोगैए ने। बेजाय नहि मानू, अहूं के तं नाच' नहिए अबैए।"
         पत्नीक ई बात छक् द' लगलनि सिनेहीकें। मुदा, सहि गेलाह। सोचलनि, पत्नी हुनका नचैत नहि देखने छथिन, तं यैह ने बुझतीह। गंभीर स्वरमे बजलाह, "भोगत की? केओ भोगा रहल छै। जानि नहि कुमरम‌ मे एहन तं बियाहमे केहन हेतै? चलू, चाह पिआउ।"
         ताबत कुमरमक जुलूस सेहो आगां बढ़ि गेलैक।

समधौतक बियाह तय भ' गेल रहनि। तैयारीमे लागल छलाह। एही क्रममे पत्नी कहलखिन, "आभासक बियाहमे नचबै ने?"
         "हं, आब सैह बाकी रहि गेल-ए। नाचू ग' अहां। आ अहूं सोचियौ जे समधियानामे रहब। समधि-समधिन भ' क' नचबै, से नीक हेतै?"
         "हेतै ने किए? आब गेलै जमाना। ओत्ते टा रिसॉर्ट मे बियाह हेतै, मेहदी हेतै, हल्दी हेतै, बियाह हेतै। सभ टा के शोभा-सुन्दर नाचे-गान ने। दोसर बात समधि अहां के छोड़ताह थोड़े। मानसिक रूप सं तैयारी करैत रहू।"
          सरस सिनेही कें लगलनि जे ई गप पत्नी नहि, राजनारायण डाक्टर कहि रहल छथि। भय आ तामस, दुनू मोनमे उपजि गेलनि।
          "सैह कहै छी, घिनेबै नहि ओत'।"
          "एखनि बड़ दिन बाकी छै।"
          "यौ, बियाह-दानक तैयारीमे दिन कोना ससरि जाइ छै, से बुझाइ छै? बेबी तं डान्स क्लास ज्वाइन क' लेलनिहें।"
          "से किए?"
          "भायक बियाहमे नाच' लेल। विभिन्न उत्सवक तीन-चारि टा क' गीत सभ पर प्रैक्टिस करा रहल छनि।"
         "अहूं किए ने ज्वाइन क' लैत छी। एतहु तं सुविधा छै।"
         "हमरा कोनो अबैए नहि। स्कूले समय सं सिखने छी। ई दोसर बात जे अभ्यास छुटि गेल अछि। हम घरे मे  अभ्यास क' लेब। अहां जकां नहि अछि जे पयर मे जांत बन्हा जायत।"
         "एना निकृष्ट नहि बुझू हमरा। हमरा कोनो नाच' नहि अबैए। कार्यालयी दबाओक कारणें रंगमंच छुटि गेल अछि। हमरो नाच' अबैए मैडम, मुदा हम अहां सभ सन धमगज्जर ताल पर‌ नहि नाचब।"
          "एकर माने बियाह-दानमे लोक बिनु रिदमेक नचैए? धमगज्जर करैए? कवि जी! भ्रम मे नहि रहू। लोक आनन्द लेल नचैए।"
         "आनन्द लेल तं अपना मोनसं नाचैए लोक। अहां जे कहै छी, ताहिमे लोक देखाउंसे नचैए, दोसर के देखब' लेल नचैए। अपने मोने नहि नचैए। नचेनहार केओ आर छै, तकरा नहि चिन्हैए। खाली नचैत रहैए।"
         "गलत। एकदम गलत। नाचबाक अपन-अपन स'ख-सेहन्ता होइ छै आ स'ख-सेहन्ता आनक मोने नहि होइ छै। आब तं ब'र-कनिया सेहो नाचक प्रैक्टिस करैए।"
         "बेस, आब तं..."
         बिच्चहिमे पत्नी रोकि लेलखिन, "बस, चुप भ' जाउ। आब अहां की कहब से बूझै छी। आब अहां लग अंतिम अस्त्र अछि- कवियाठी करब।"
        सरस सिनेही चुप भ' गेलाह। मोबाइल खोलि क' देख' लगलाह।
         मोबाइलमे रील, फेसबुक-स्टोरी आ यूट्यूब बेराबेरी देखलनि। खाली नाच, विभिन्‍न प्रकारक नाच। इंगेजमेंटक दृश्यमे लड़की नचिते लड़का लग जाइत छै। आर सभ ओकरा संग स्टेप मिलबैत छैक। पार्श्व गीत एहन, जकर बखान नहि। अकबका गेलाह।  निर्णय नहि क' पाबथि जे कोन नाच ठीक छैक? ओ सभ करैत छलाह, से वा एहिठाम देखि रहल छथि, से। आ मोबाइलमे जे नाच देखैत छथि, तकर व्यू तं लाखो-करोड़ो मे होइत छैक। सोचलनि सिनेही जे एहि मामिलामे ओ अल्पसंख्यक छथि मने।
         समधौतक बियाहमे 'हल्दी'सं एकदिन पहिने नहि पहुंचि सकलाह। तें पत्नीक मोन झूस छलनि। छुट्टी नहि भेटलनि।‌ एना बिदा भेलाह जे 'हल्दी'क समय‌ धरि पहुंचि जाथि।‌ पत्नीकें एकटा 'इवेंट मिस' भ' गेल रहनि। चूंकि कन्यागत सेहो ओही रिसॉर्टमे रहथि तें वियाहसं एकदिन पहिने कन्यागतक ओहिठाम 'मेहदी'क कार्यक्रम रहैक आ ताहिमे दुनू पक्ष सम्मिलित भेल छल। जमि क' नाच भेलै।‌ लगलै जेना दुनू पक्षक बीच प्रतियोगिता भ' रहल होइक। 
          ई सभटा बात पुतौहु व्हाट्स एप पर लिखने रहनि आ वीडियो क्लिप पठौने रहनि। ओ इयर फोन लगा क' वीडियो देखि रहल छलीह। रहल नहि गेलनि तं सिनेही जी कें कहलनि, "अहां बड़ निशोख लोक छी। एत्तेक सुन्दर प्रोग्राम छुटि गेल। के-के ने नाचल। एकटा हमहीं...। अपना नाच' अबितनि तखनि ने...!"
          "हमरा ऑफिस मे छुट्टीक हाल तं बुझले रहैए। एहन छल तं दस दिन पहिने किए ने चलि गेलहुं?"
          "हे, अकरहक लीला नहि करू। ओहो सभ एके दिन हल्दी आ बियाह राखि लेलनि। लोक की इंज्वाय करत?"
          "एहिनो होइ छै। रिसॉर्टक खर्च बूझल अछि? तें एके दिनक खर्चमे दुनू बीध रखलनि समधि।"
           "अहूं सं पुछनहि हेताह आ अहां दही मे सही लगा देने हेबनि। यौ कवि जी! एक्केटा तं बेटा छनि समधिके। ओत्तेक सम्पत्ति! हाथ खोलि क' खर्च कर' दीतियनि ने।"
           "सभटा बात अहीं बूझि जेबै?" कने थम्हैत बजलाह सिनेही जी, "अहांके नाचबाके अछि ने। एके दिनमे दुनू कार्यक्रम छै। नचैत रहब भरि दिन।"
          "तेना नहि ने होइ छै। लोक थाकियो जाइए, बोर सेहो भ' जाइए।"
          तखनहि मोबाइल पर आंगुर तेजीसं चल' लगलनि। किछु ताक' लगलीह। मोबाइल पर चलैत आंगुरे सन तामसे सांस सेहो तेजीसं चल' लगलनि। सिनेही जी पुछलनि, "की भेल?"
          लगलै जेना टेन अनचोके रुकि गेल होइ। मुदा नहि, टेन चलैत रहै। 
         "देखियौ, मेहदी बला प्रोग्राम मे मिथि कतहु‌ नजरिए ने आबि रहल छै।"
          मिथि हुनका दुनूक छओ बरखक पोती छनि।
          "मोन तं ने खराप भ' गेलै मिथिक? वीडियो मे कत्तहु ने देखाइत छैक।"
          सिनेही जीकें सेहो चिन्ता भेलनि।
          "बेबी के व्हाट्स एप करियौ ने। पुछियौ।"
          बेबीक व्हाट्स एप पर कौल भेल।
           "नहि, मम्मी जी। मिथि नहि नचलै।"
           "किएक? ओकर मोन ठीक छै ने?"
           "हं, ठीक छै। मिथि बाजलि जे ओकरा नाचबाक मोन नहि छै। हमहूं सभ छोड़ि देलियै। आर कोनो बात ने।"
           "ओ भरतनाट्यम सीख' जाइत अछि ने?"
           "हं, ओकर गुरुआइन अगिला मास एकटा कार्यक्रम क' रहल छथिन। ताहिमे मिथिक शो सेहो हेतै।"
           "बेस। इन्ज्वाय करू। काल्हि दुपहर धरि हमहूं सभ पहुंचि जायब।"
           "ओ के मम्मी जी।"

कतोक बिगहामे पसरल रिसॉर्ट मे भव्य आयोजन रहै। जखने सिनेही सपत्नीक पहुंचलाह तं समधि-समधिन स्वागत कयलखिन आ कहलखिन जे झट द' तैयार भ' ग्राउंड फ्लोर पर आबधि। हिनके दुनूक प्रतीक्षामे 'हल्दी'क कार्यक्रम रुकल छलैक।
        यंत्रवत दुनू पहुंचलाह आ शुरू भेलै बीध। कने दूर पर डी जे चिचिआयल। एक-दोसरासं गप करबाक परिस्थिति नहि रहैक। सभ नाचब शुरू कयलक। वीडियो बला बुझू विभिन्न तालमे दृश्य 'कैप्चर' क' रहल छल।
         मिथि माम लग बैसलि मुस्किया रहल छलि।
         बीध समाप्त भेलाक बाद अपन कोठरीमे सरस सिनेही ओछाओन पर ओंगठल रहथि आ टी वी देखबाक प्रयास क' रहल छलाह। हाथमे रिमोट छलनि। चैनल बदलैत रहलाह। एक्के रंगक समाचार। सोचलनि जखन समाचारमे एक्के आदमी छैक, तं केहन हेतै समाचार? एक्के रंगक ने। कतहु रामायण पर टिप्पणी, तं कतहु कुरान पर। कतहु हनुमान चालीसा बला विवाद तं कतहु बाट पर नमाज पढ़बाक बात । कोनो नेता जेल गेलाह, तं कोनो अपन पार्टीसं बहार कयल गेलाह। सभ पर गरम-गरम बहस। बहस कयनिहार सभ अपन-अपन नेताक गुणगान मे बेहाल। 
           सिनेही सोचलनि। अपन देशमे मने सदिखन कोनो-ने-कोनो चुनाओ होइते रहै छै। तें टी वीक समाचार चैनल सभ पर नाच सेहो होइते रहैत छै। 
           टी वी बन्न कयलनि सिनेही। मोन पड़लनि। एकटा प्रोफेसर साहेब कहैत रहथिन- मानल जे बियाहक बीध टी वी बाटे दिल्ली सं आबि अपना सभकें छापि लेलक। एकर माने ई नहि ने जे आबो बरदे गाड़ी पर बरियात जाय लोक?
          सिनेहीकें बुझयलनि जे राजनारायण डाक्टर दिल्ली चलि गेलाह अछि।
          तखनहिं समधि कोठरीमे अयलखिन, "समधि! पड़ल किएक छी? चलू ने।"
         "कत'?"
         "रूम नम्बर दू सय आठ मे? साफा बन्हबा लिअ'।"
         "पागक व्यवस्था नहि छै?"
         "नहि। पाग बेसी काल माथ पर नहि टिकै छै। डान्स कर' मे खसि पड़बाक बेसी संभावना।"
         "तेहन बात नहि छै। आब पागक बनौट मे सुधार भेलैए।"
         "तैयो नाच' कालमे खसि पड़बाक खतरा रहै छै। ओना साफा सेहो अपने सभक शिरो परिधान छल ने।"
         सरस सिनेही माथमे साफा बन्हबा क' अपन कोठरीमे अयलाह आ बड़का अयनामे स्वयंकें निहारलथि। माथ भारी लगलनि।


बियाह-दान सम्पन्न भेलै।‌ अपन कोठरीमे अयलाह तं पत्नीसं पुछलनि, "अएं यै, कनियाकें ओत्तेक भारी आ जबदाह लहंगा किएक पहिरा देलकै जे बेदीक चारुकात घुम' काल दू गोटेकें पकड़' पड़ैक।"
           "से सभ नहि बुझबै अहां। सभटा स'ख-मनोरथ होइ छै। बियाह दोबारा थोड़े होइ छै।"
          "मर, हम पुछै छी किछु आ अहां उतारा दै छी किछु।"
          "तं सही बात कहि क' अहां सं के बतकुट्टनि करय। थाकल होएब। सूति रहू।"
          सिनेही पत्नी लग आत्मसमर्पण कयलनि, "बेस। अहूं कम थाकल नहि होयब। खूब नचलहुं अछि।"
          पत्नीकें जेना किछु मोन पड़लनि, "अएं यौ, समधि संगे तं अहूं के नचैत देखलहुं। हमरा सोझां पयरे ने उठय आ समधि संगे तं...। मुदा..."
          "की?"
         "मंचक दुनू कातक पर्दा पर लाइव वीडियो देखाइत रहै, ताहिमे अहांक डान्स नहि देखलहुं।"
          "नहि देखलहुं तं की भ' गेलै? भने नहि देखलहुं।"
          "कैमरा बला काटि तं ने देलकै? मुदा लाइव‌मे काटतै कोना?"
         सिनेही जी कोठरीक प्रकाश बन्न कयलनि। बजलाह, "आब अन्हारमे अहांक मुंह सं एक्को टा शब्द नहि बहराय।"
          कनिए कालक बाद पत्नी फोंफ काट' लगलीह। मुदा, सिनेही जीकें निन्न नहि भेलनि। बौआय लगलाह।तीन दिन पहिलुक बजारक ओ घटना मोन पड़ि गेलनि।‌
बजनिहार तं सामान्ये गप सन बजलाह, मुदा सिनेही जीक लेल ओ घटने सन छलनि।
          राजनारायणे डाक्टर सन हुनको शहरमे एक गोटे छलाह। ओहि साहित्यिक संस्थाक अध्यक्ष, जाहिसं कहियो सिनेही जुड़ल रहथि। ओहि संस्थाक बैनरमे किछु नाटक खेलायल छलाह। एक समय हुनका शहरमे जगजियार छल ओ संस्था, मुदा नहूं-नहूं ओकर अधोगति शुरू होम' लगलैक। बीच शहरमे संस्थाक करीब अढ़ाइ कट्ठा जग्गह रहैक, जे जन सहयोगसं अरजल गेल रहैक। सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट सं पंजीकृत संस्थामे अध्यक्ष-सचिव बनबा लेल उतराचौड़ी शुरू भ' गेलैक। सदस्य सभ एक-दोसराकें छिटकी मारबा पर बिर्त होइत गेलाह। मुदा सभ छिटकी अंततः संस्थेके लगलैक आ संस्था मृतप्राय भ' गेलै। स्थानीय राजनीतिक दुष्परिणामक कारणे सिनेही सन लोक संस्थासं हटैत गेलाह आ राजनारायण डाक्टर सन लोक संस्थाक डोरि धयने रहलाह। छहरदेबाली कयल संस्थाक जमीन, जाहि पर संस्थाक मकान नहि बनि पौलैक, मुंह बौने रहल जे कोनो भागिरथ ओकर उद्धार‌ करतैक। 
           समय बीतैत गेलैक। सिनेही सन-सन पुरान लोक संस्थाक जमीन देखि चुपचाप आगां बढ़ि जाइत छलाह। ग्लानि होनि। एक मोन होनि जे आगां बढ़थि, बनथि भागिरथ। मुदा, दोसर मोन नकारि जानि। डर होनि। ओ की महादेवक तपस्या करताह? आजुक महादेव अपन जटामे ओझरा क' तत्तेक ने दूर फेकि देतनि जे ककरो जनतबो ने होयतैक।
          तीन दिन पहिने संस्थाक पूर्व अध्यक्षक पुत्र बजारमे भेंट भेलखिन। 
          "समितिक जगह दिस गेलियैए?"
          "हं, ओहि बाटे जाइते रहै छी। पहिने एकटा सामुदायिक भवन बनल देखलियै आ आब..."
          "आब मंदिर बनैत देखने हेबै।"
          "जी।"
          "दुनू चीज हमहीं बनबा रहल छियै।"
         "तखन तं खूब खर्च लगैत होयत।"
         "किछु अपनो आ बेसी जन सहयोग सं। किछु विधायक आ सांसदक सहयोग सं। आजादीक अमृत महोत्सव चलि रहल छै, किछु ताहूक मद सभ सं उपरौलियैए। आब अपनेक सहयोग चाही।"
           "हम की सहयोग क' सकै छी?"
           "डेराउ नहि, पाइ नहि मांगब। देखनहि हेबै। नाम देलियैए - उगना महादेव मंदिर।"
          "से तं दू-तीन टा मंदिरक गुम्बद सन देखने रही। बस, जाइते-जाइत। भीतर नहि गेलहुं।"
          "भीतर जैतियै ने। अपने तं पुरान सदस्य छियै। बाबा आ मैयाक मंदिर सोझा-सोझी। कातमे उगनाक मंदिर। गेट पर थोड़ेक जगह बचैत रहै, तं ओत' नन्दी के बैसा देलियनि। हमरा बुते जत्ते भेलै से क' देलियै। आब समाज जानय।"
           सिनेही सोचलनि, समाज रहितैक, तं यैह बनितैक साहित्य आ सांस्कृतिक संस्थाक जमीन पर। मुदा ओ बजलाह किछु आर बात। कहलनि, "समाज की करत? अहां एत' धरि बनौलहुं तं कमान सेहो अपने हाथमे राखू।"
           "से बाबाक सेवा सं हम पयर पाछु थोड़बे करबनि? दू मासक बाद प्राण-प्रतिष्ठाक तिथि बनै छै। आग्रह जे ओहिमे अपने अग्रणीक भूमिकामे रहियैक। कवि-कलाकार सभ के रहबाके चाहियनि।"
           "सीतेश जी, हमर कोनो भूमिका तय नहि करू। ओही समय हमर समधौतक बियाह तय छैक प्राय:। तिथि मिला लेबै, तखने किछु कहि पायब।"
           "सोचने छी जे प्राण-प्रतिष्ठाक अवसर पर पूरे शहरमे कलश यात्रा होइक। नाच-गान होइक। आदि-आदि। पूरा शहर बाबामय बनि जाय। तें अहां अपन समय जरूर रखियौ। संस्थाक एकोटा पुरान सदस्य नहि रहतै, तं की कहतै लोक? आ एकटा आग्रह आर।"
          "की?"
          "हमर पत्नी आ धियापुता सभ मोन बनौने छै जे बाबा, मैया, उगना आ नन्दीक प्राण-प्रतिष्ठा दिन खूब नाचय। मुदा ओकरा सभ के नाच' नहि अबै छै। किछु समय बहार क' थोड़े स्टेप सिखा दीतियै, तं बड़ उपकार होइत। थोड़बो अपने सं सीखि लेतै, तं बांकी लोक सभ के देखि क' टानि लेतै।"
          "ई नाच सिखायल हमरा बुते नहि होयत सीतेश जी। हमरा अपने ने नाच' अबैए।"
          "फुसि नहि बजियौ। अहां के टाउन हॉल मे नचैत देखने छी हम।"
          "ओ समय रहैक। आब पयरे ने उठैए। दोसर गप ई जे जुलूस‌ मे नाच' लेल सिखबाक कोन खगता। नचौनिहार नचा दैत छैक। नाचि लेती कनिया आ बच्चा सभ। अहां चिन्ता नहि करू। आब चलै छी।"
          "बेस, मुदा ओहि दिनक कलश-यात्रामे अपने के आगू-आगू रह' पड़त।"
            सिनेही ओत'सं बिदा तं भ' गेलाह। मुदा, लगलनि जे पयर उठिए ने रहल छनि। पयर दिस तकलनि। पयर उठैत रहनि मुदा स्टेप नहि मिलैत रहनि। चारूकात तकलनि। बुझयलनि जे राजनारायण डाक्टर तं ने देखि रहल छनि।
           पत्नीक खोंखीसं तंद्रा टुटलनि। समधौतक बियाहमे तं तीन दिनक बादे आबि गेलाह। दू मासक बाद कोन बहन्ना बनौताह? 
           सोचलनि। बहन्ना किएक बनौताह। सोझे कहताह जे मंदिरक मूर्ति सभक प्राण-प्रतिष्ठामे ओ कोनो सहयोग नहि करताह। मिथि मोन पड़लनि। मिथि अपन मायकें कहने रहय जे ओ मामाक बियाहमे नहि नाचति। 
                      ------

मातबर कथाकार अशोक

आलेख

मातबर कथाकार अशोक

प्रदीप बिहारी


.                 (कथाकार अशोक)

अशोक माने फेसबुकक कथाकार अशोक माने मैथिलीक कवि, कथाकार आ आलोचक, जिनक अद्यावधिक रचना कर्ममे मिथिलाक लोक आ सम्पूर्ण मिथिला जगजियार होइत देखाइत अछि। ई अपन मैथिल आंखिसं विश्व आ वैश्विक परिदृश्य कें देखैत छथि, गुनैत छथि आ तकरो अपन रचनाक विषय बनबैत छथि। आ से एहि तरहें बनबैत छथि से सोझे-सपाटे जं पढ़ि क' ससरि गेलहुं, तं बुझयबे ने करत। माने ई हिनक शिल्पक कलाकारी छनि जे अहांकें लागत जे बड़ सहज बात कहैत छथि, मुदा कहैत रहैत छथि ओतबे गंभीर गप।
         बहुविधावादी छथि अशोक जी। आरंभमे कविता लिखलनि...लिखैत रहलाह...आ तकर बाद कथा दिस मुड़लाह। हमर कहबाक तात्पर्य ई नहि जे पहिने कथा नहि लिखथि, मुदा कविता प्राय: छोड़लनि आ कथा पर केन्द्रित भेलाह। संगे संग अन्य विधा सेहो चलैत रहलनि।  हम एत' कथाकार अशोक आ अशोकक कथा पर गप कर' चाहैत छी।
         अशोकक लेखन आठम दशकसं आरंभ भेलनि अछि। आठम दशक कहबाक माने जे एहि समयसं पाठककें हिनक प्रकाशित रचना सभ पढ़बा लेल उपलब्ध होम' लगलनि। ई जहिया लेखन शुरू कयलनि ताहिसं पहिलुक दशक, माने सातम दशकमे मैथिली कथामे छठम दशकक कथाक विषय, स्वरूप आ भाव-भूमि सं आगांक बात नहि देखना जाइत अछि। सामाजिक चेतना आ प्रतिरोधक जे भुम्हुर छठम दशकमे पजरलैक, से सातम दशकमे पझयलैक नहि, मुदा धधरो नहि बनि पौलैक। तकर एकटा कारण हमरा इहो बुझाइत अछि जे एहि (सातम) दशकमे मैथिली कथामे नव कथाकारक आगमन आंगुरे पर गन' योग्य भेल। एकटा बैच चललै, मुदा नियमित कमे कथाकार रहलाह।
        अशोक जी सातम दशकक धोन्हिकें फाड़ैत अपन कथा सभक संग अबैत छथि। व्यक्ति, समाज, संवेदना, सौमनस्यता, चेतना आ प्रतिरोधक सोझ-सोझ बाट बनबैत छथि। ई अपन बात सोझ-सोझ पाठककें कहैत छथि, जाहिमे हिनक भाषाक जादूगरी देखबा योग्य रहैत अछि। अपने लाथे पूरा समाजकें युग-सत्य देखबैत छथि। ई बात हिनका मैथिली कथामे एकटा फराक पहिचान आ स्थान दैत छनि।
         लेखक समयक संग बदलैत व्यक्ति, समाज आ देशक भाव-स्वभावक संग चलैत अछि आ ओकरा अपना रचनाक विषय बनबैत अछि। जे समयक संग होइत परिवर्तन कें नहि देखैत अछि, ओ खाधि खुनि क' स्वयंकें गाड़ि दैत अछि। कथाकार अशोक एहि मामिलामे हरेक समयक संग चलैत देखाइत छथि। एकर बानगी हिनक 1986 ई मे छपल कथा "मिर्जा साहेब" (ओहि रातिक भोर) आ "छल" (डैडीगाम- 2017) मे देखल जा सकैत अछि। "मिर्जा साहेब"क मिर्जा मुजफ्फर आलम जे भारत-पाकिस्तानक संबन्ध खराप भेला पर भारतमे रहैत छथि। एकटा बियाहमे भाग लेबा लेल पत्नी आ बेटा पाकिस्तानेमे घेरा जाइत छथि। बहुत प्रयासक बाद जखन ओ दुनू घुरैत छनि आ अपने पत्नी आ बेटाकें लेब' बम्बई जाइत छथि आ ओत्तहि तत्काल भेल दंगामे मारल जाइत छथि। मुखिया जीक संग पत्नी आ बेटा अबैत छनि, जिनक अयबाक तैयारीमे गाम प्रफुल्लित छल, भव्य आयोजनक व्यवस्था कयने छल, ताहि पर पानि पड़ि जाइत छैक। ओत्तहि कथा 'छल'मे भोली झा कोआपरेटिवक आम सभामे ब्रीफकेसक लोभें मुहम्मद असलम बनैत छथि। कोआपरेटिवक मीटिंग मे जाइत छथि। आ अंतमे एकटा बात लेल तामसे माहुर भ' जाइत छथि आ बाज' लगैत छथि- 'अरे, ई हाकिम तखनी सं हम्मर मजहब के की-कहां कहि रहल छथ। कहै  छथ जे इसलाम बहुत कट्टर मजहब हय। तलबार के जोर पर चलै हय। मुसलमान सब गाय के मांस खाइ हय। हिंदु के काफिर कहै हय। हम तब्बे से हिनका समझा रहल छली। अरे भाइ, अइ मे हम्मर की कसूर हय। एतना दिन सं हम सब एक-दोसरा के संग रहल छी। तब्बो एक-दोसरा के नहि समझली? कौआ के पाछू दौड़ल जाइ छी। पर ई मानिते नहि छथ। की-कहां बकने जाइ छथ।'
       साम्प्रदायिकताक दू टा स्थिति दुनू कथामे राखलनि अछि कथाकार। 1986 सं 2017 धरि अबैत-अबैत साम्प्रदायिक सद्भाव कतेक विकृत भ' गेल अछि, तकर बानगी। मिर्जा साहेबक पत्नी आ बच्चा पकिस्तान सं औथिन, तें गामक लोक स्वागतक भव्य ओरिआओन कयने रहैछ। ई प्रायः एहि दुआरें जे मिर्जा साहेबक मोजर हुनक समाजमे धर्मक कारणें नहि, मनुक्खक कारणे छलनि। मुदा, सामाजिक स्तर पर धार्मिक वैमनस्य एत' धरि पहुंचि गेल अछि जे मुहमद असलम के ठाह-पठाहिं ओकरा धर्मक खिधांस क' दैत अछि लोक। बहुतो असलम अपन समाजमे छथि जे कहैत रहैत अछि जे कौआक पाछू नहि दौड़ू। मुदा...। कथाकार दुनू समयक चित्रण करैत वाजिब चिन्ता रखैत छथि। दोसर, एकटा आर बात! मिर्जा साहेबक संग मुखिया जी बम्मई‌ (आजुक मुम्बई) जाइत छथिन। मुदा, आजुक‌ स्थिति ई बनि गेल अछि जे कोनो मिर्जा साहेबक संग कोनो मुखियाजी कतहु जयबा लेल तैयार नहि भ' सकैत छथि। दुनूक बीच अविश्वसनीयताक खाधि एतेक गहींर क' देल गेल छैक जे रमजान आ रामनवमी मे एक-दोसराक भेंट-घांट सेहो बनौआ लगैत छैक। आजुक समयक ई सभसं पैघ त्रासदी भ' गेलैए जे एहि देशक मुसलमानकें कह' पड़ैत छैक जे हमर देश भारत अछि। आ एकरा लेल दुनू धर्मक लोक जिम्मेदार छथि जे तेसर, मदारीक होहकारा पर नाचि रहल छथि। 
       सद्भावक एहने एकटा कथा डैडीगाम संग्रहमे अछि- 'ओ दुनू साइकिल सिखैत अछि'। सुधीर आ रमेशक साइकिल सिखबाक बहन्ने कथाकार बड़ीटा बात करैत छथि। एहि कथाक अलाउद्दीन आ कैंची मिस्त्रीक चरित्र समाज लेल एकटा आदर्श स्थापित करैत अछि।
        कथाकार अशोकक कथा रूपी तरकसमे रंग-विरंगक वाण छनि। हिनक एकटा कथा मोन पड़ैत अछि- भोज। एहि कथामे लगैत छैक जे कथाकार एकटा नेनाकें भोजक प्रति आकर्षणक वर्णन क' रहल छथि। भोजक खाद्य-पदार्थक अद्भुत वर्णन अछि। तकर कारण ई जे कथाकार स्वयं सेहो भोजन संदर्भमे विन्यासी छथि। भोजे नहि, आन-आन कथा सभमे सेहो भोजनक वर्णन मनोयोगपूर्वक करैत छथि। 'भोज' कथामे नेनाक मनोविज्ञानक चित्रन अद्भुत अछि। मुदा, पैघ बात ई जे एहि कथाक बहन्ने गामक आपसी सद्भावक गप कहि जाइत छथि कथाकार। भोज गामक लोककें एकठाम बान्हि क' रखबा लेल जरूरी छैक।
        हिनक बहुत रास कथा अछि जे मानवीय संवेदनाक विभिन्‍न आयामकें सफलतापूर्वक छुबैत अछि। हिनक कथा-संसारके अवगाहन कयने पाठककें बुझबामे औतनि जे ई कथाकार ओहू सभ विषयकें अपन कथामे आनलनि अछि जे मनुक्ख आ समाजक समृद्धिक कारक भ' सकैत अछि। 
       हिनक संग्रह 'डैडीगाम'क कथा सभमे एकटा केन्द्रिय बात ई देखबामे अबैत अछि जे फोरलेन/सिक्सलेनक बढ़ैत जालक अछैत गामकें कोना बचाओल जाय? मनुक्खकें बचबा लेल गामक बांचब जरूरी छैक।
       मल्टीनेशनल कम्पनी सभक अधिकारी आ कर्मचारी सभ प्रोमोशन आ पदक जाहि वृत्तमे घूमि रहल अछि, जे ओकर व्यक्तिगत आ सामाजिक जीवन धूमिल भेल जाइत छैक। ओकरा पाइ आ पद चाही। एहि विषय पर मैथिलीमे किछु नव-पुरान कथाकारक कथा अयलनि अछि, जाहिमे विभिन्न प्रकारक चिन्ता आ चिन्तन प्रस्तुत कयल गेल अछि। एहने घुरमुरिया दैत लोक सभक लेल हालहिमे अशोक जीक एकटा दोसरे रंगक कथा अयलनि अछि- 'जिम्मेदारी'। एहिमे ओ 'वर्क लाइफ बैलेंस'क नीक उदाहरण प्रस्तुत कयलनि अछि। परिस्थिति तं यैह छैक आ एहिना कि एहूसं बेसी व्यस्ततम भ' सकैत छैक। मुदा, एहन परिस्थितिमे जीवनक राग-अनुराग कोना बचा क' राखल जा सकैछ, से बात कथाकार अशोक अपन एहि कथामे कहैत छथि। 
         अशोक भाइसं मासमे एकदिन अबस्से भेंट होइत अछि। ओ दिन होइछ 'उपमान'क मासिक गोष्ठीक। ओ मैथिलक प्राय: सभ महत्वपूर्ण विधामे लिखलनि अछि। एकटा विधा छुटल छनि। एकबेरक गोष्ठीक समापनक बाद वियोगी (तारानन्द वियोगी) आ हम कहलियनि जे भाइ, उपन्यास छुटल अछि। लिखियौ ने। ओ साफे नकारि गेलाह। नहि, उपन्यास नहि लिखायत। एकबेर सोचने रही, मुदा नहि । एहि लेल कहियो मूडे ने बनल। जे, से। ई गप हमरा दुनूक मुंहसं प्राय: एहू दुआरें बहरायल जे ओहि गोष्ठीमे वियोगी अपन उपन्यास अंश पढ़ने रहथि। एहि गपक बाद हम दुनू गोटे हुनका संग कौफी पीब' पटना गांधी मैदानक मैकडोनाल्ड मे गेलहुं। कौफीक संग गपसपक बला फोटो हम फेसबुक पर तखनहि द' देलियैक। उनतीस मई 2022क गप थिक।  फेसबुकक टाइटिल देने रहियै - कौफीक संग कथा-वार्ता करैत मैथिलीक तीन टा कथाकार। एहि पोस्टक बहुत रास प्रतिक्रिया आयल। मुदा मुख्य प्रतिक्रिया आदरणीया उषाकिरण खानक आयल छल। ओ लिखने छलीह -'तीनू मिलि क' एक टा दीर्घ कथाक सूत्रपात तने करता? बड़ नीक प्रयोग हेतनि- मधुबनी, सहरसा आ बेगूसरायक परिवेश मे। बगअप भाइ लोकनि।
        एकर प्रतिक्रिया पर आदरणीय भीमनाथ झा तीनू गोटेकें उपन्यास लिखबा लेल आग्रह कयलनि। हमरा मादे कहलनि जे हाथ झारल छनि। लिखिए देताह। वियोगी जी आ अशोक जी गछथु। एहि पोस्ट पर बहुत संवाद भेल। वियोगी गछलनि। भीम भाइ अंतत: अशोक जी सं सेहो गछबाइए लेलनि। कथाकार अशोक अपन पोस्ट उषाकिरण खानक उतारामे लिखलनि- "प्रणाम। अहांक आदेश त' पहिनहि सं अछि। भीम भाइ सेहो कहि देलनि। वियोगी बहुतो दिन सं पाछू पड़ल छथि। लगैए आब एकटा उपन्यास लिखैए पड़त।"
        हम सभ अशोक भाइक एहि घोषणाक स्वागत कयने रही। आ, आब हुनक उपन्यासक प्रतीक्षा क' रहल छी।
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Wednesday, December 28, 2022

एक और सान्ता क्लॉज : प्रदीप बिहारी की मैथिली कहानी : हिंदी अनुवाद - अरुणाभ सौरभ



मैथिली कहानी

एक और सान्ता क्लॉज

प्रदीप बिहारी

मित्र की तमाम कोशिशों के बावजूद उसे बस में बैठने की जगह नहीं मिली। पटना से चलनेवाली इस बस में लोग ठसाठस भरे हुए थे। मित्र के चेहरे पर जगह न दिला पाने का अपराध-बोध साफ-साफ झलक रहा था। वे अपनी जगह मुझे दे रहे थे, पर मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने मन ही मन उनका आग्रह नहीं मानने का निर्णय ले लिया।

उनकी सीट के ऊपर बने रैक में सामान रख, हम दोनों नीचे उतरे। बस के चलने में अभी देर थी। स्टाफ के चाय-पान कर लेने के बाद ही बस चलती। इस बीच दूसरे यात्री भी बस से नीचे उतर आए।

मित्र ने एक और कोशिश की। उन्होंने कण्डक्टर से कहा, ‘‘तुम्हें पटने में ही मैने कहा था, दरभंगा में एक सीट चाहिए। तुमने आश्वस्त भी किया था। अब बताओ, इनके जैसे बड़े लोग खड़े जाएँगे, यह अच्छा लगेगा? सीट नहीं थी, तो पहले बता देते। इनको इस बस में नहीं बुलाता।’’

कण्डक्टर ने तिरछी निगाहों से मुझे घूरा। मैंने गम्भीर होने का नाटक किया और कण्डक्टर से थोड़ी दूरी पर जाकर खड़ा हो गया।

मुझे लगा कि मित्र की बात उसे प्रभावित नहीं कर सकी। मुझे ‘बड़े लोग’ बताने की बात पर कण्डक्टर को तनिक भी विश्वास नहीं हुआ। वह बोला, ‘‘जमाना लद गया सर! पहले थाना के मुंशी और दारोगा के लिए सीट रिजर्व आता था, अब तो एस.पी. के लिए भी सम्भव नहीं है। आप ही बताइए, किसे उठाकर बोनट पर बिठाऊँ और किसको छत पर लाद दूँ? ’’

खलासी ने मेरी ओर देखा और मित्र से पूछा, ‘‘कौन हैं सर? कोई नेता-वेता?’’

बीच में कण्डक्टर बात काटते हुए बोला, ‘‘बहनचो...! देखने से नहीं लगता है! नेता तो सफेद झक-झक कपड़ा पहने रहते हैं, इनकी तरह जीन्स पर मोटा कुर्ता नहीं पहनते। रोड पर चलते हो, इतना भी नहीं समझोगे तो...’’

मित्र को अजीब लगा। उन्होंने कण्डक्टर को चुप करने की कोशिश की, ‘‘जगह दोगे, तो दो, भाषण मत दो।’’

कण्डक्टर थोड़ा सहम गया। मित्र अनवरत बोलते रहे, ‘‘बहुत बड़े लेखक हैं। कहानियाँ लिखते हैं। इस क्षेत्र के गौरव हैं, देश के भी। जनकपुर जा रहे हैं...’’

कण्डक्टर पर मित्रा की बातों का कोई असर नहीं हुआ। उसके हाव-भाव से ऐसा लगा जैसे कोई हों, उसे क्या लेना-देना।’’

मगर खलासी ने पूछा, ‘‘कैसा लेखक! अखबार में लिखते हैं क्या?’’

मित्र की आँखें उम्मीद में चौड़ी हो गईं, ‘‘हाँ! बड़े-बड़े अखबारों में लिखते हैं।’’

‘‘तो ऐसा कहिए न हुजूर!’’ खलासी बोला, ‘‘हैं पत्रकार, और बताते हैं लेखक। चलिए, जुगाड़ लगाते हैं! चढ़िए बस में।’’

ड्राइवर के पीछे बेंचनुमा जगह पर मुझे एडजस्ट कर दिया गया।

मित्र ने कहा कि मैं उनकी सीट पर बैठ जाऊँ और वे मेरी सीट पर, पर मैंने नहीं माना। उन्हें आश्वस्त किया कि पीठ टेकने की जगह मिल गई है। इस भीड़ में यही बहुत है।

बस के चलते-चलते सुबह हो गई। सुबह की हवा मुझे अच्छी लग रही थी। इस कारण रात की थकावट नींद में बदल गई।

बचपन में सुना था, नींद छूत की बीमारी होती है। इसलिए कार-बस में ड्राइवर के बगल की सीट पर नहीं बैठना चाहिए। बगल में ऊँघने पर ड्राइवर डाँट देता है।

बालमन की यह बात मेरे दिमाग में जमी हुई थी। जब कभी ऐसी स्थिति आती, मेरे जेहन में आता कि ड्राइवर के बगल में बैठने पर सावधान रहना चाहिए। मगर लम्बी दूरी और रात की यात्रा...ये बातें बकवास लगने लगीं।

सोचते-सोचते झपकी के झूले पर सवार मधुबनी पहुँच गया। ड्राइवर सावधानीपूर्वक बस चला रहा था। फिर भी कण्डक्टर उसे ‘वैल्यू’ नहीं देता, उस पर झल्लाता रहता। मुझे इसका आभास इसलिए हुआ कि वह जब-तब ड्राइवर को डपटता रहता, और उस झिक-झिक में मेरी झपकी टूट जाती। शायद, इसलिए बस की रफतार कम थी।

मधुबनी में बस ज्यादा देर रुक गई। मैंने बगल वाले यात्री से पूछा, ‘‘बहुत देर रोक दिया। कहाँ गया ड्राइवर?’’

‘‘यहाँ से दूसरा ड्राइवर जाएगा। देखिएगा...कितना गजब चलाता है!’’ किसी की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘वो देखिए! ड्राइवर...सरदारजी आ रहे हैं।’’

मैंने देखा, पच्चीस-छब्बीस साल का एक युवा सरदार आ रहा है। वह आया और ड्राइवर की सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर में बस चलने लगी।

यह क्या? सरदार तो बेफिक्र होकर बस चला रहा था। वह किसी-किसी गड्ढ़े में स्टेयरिंग छोड़ देता और दोनों हाथ उठाकर लोगों का अभिवादन करने लगता। मेरे मन में आशंकाएँ घुमड़ने लगीं। न जाने सुबह-सुबह क्या होगा? सड़क किनारे आते-जाते तमाम लोगों को सरदार दुआ-सलाम करते चल रहा था। जहाँ लोग नहीं मिलते वहाँ जोर से हार्न बजाने लगता। आवाज सुनकर बस्ती के लोग घर से बाहर निकल आते। एक-दूसरे के दुआ-सलाम में हाथ हिलाते और संकेत में हालचाल पूछते। बस आगे बढ़ जाती।

थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि छोटे-छोटे बच्चे सरदार से दुआ-सलाम करने अपने दरवाजे पर जमा हो गए। सभी ‘बाय सरदार अंकल’ कहते। जवाब में सरदार भी स्टेयरिंग छोड़ दोनों तरफ खड़े बच्चों को ‘बाय’ कहता।

सरदार की यह लोकप्रियता मुझे मोहने लगी। उसे कुछ कहे बगैर मैं इस स्थिति का अवलोकन करता जा रहा था। मगर स्टेयरिंग छोड़कर बस चलाने की उसकी यह आदत मुझे अच्छी नहीं लगी। इस जर्जर सड़क पर दुर्घटना हो सकती है।

सरदार के हार्न बजाने की धुन से हर कोई परिचित लग रहा था। बस्ती के बाहर आ जाने पर भी हार्न की आवाज सुनकर, दूर खेत में काम कर रहे बच्चे हाथ उठाकर ‘बाय अंकल’ कहते। सरदार के चहेरे पर प्रसन्नता और सन्तोष का भाव दिखाई देता।

रास्ते में एक बच्चा नंगे खड़ा था। सरदार ने उसकी ओर देखा, उसे ‘बाय’ कहा, और इशारे से उसके नंगेपन का मजाक किया। समझाया, कि नंगा नहीं रहना चाहिए। बच्चे ने शरमाते हुए बाएँ हाथ से अपनी छुन्नी ढँक ली और दायाँ हाथ हिलाकर ‘बाय अंकल’ बोला।

मैंने गौर किया, इस गाँव के बच्चों को सरदार अंकल से दुआ-सलाम करने में खुशी होती है। आत्म-गौरव होता है। सरदार भी इस बात का खयाल रखता कि किसी बच्चे से दुआ-सलाम छूट न जाए।

कण्डक्टर का रवैया अब बदल चुका था, कोई झल्लाहट नहीं, बोलती बन्द!

अचानक बस रुकी। सड़क किनारे कुएँ पर बर्तन माँजने हेतु खड़ी स्त्री को देखकर सरदार ने संकेत से पूछा, ‘‘इतनी देर से...?’’

रास्ते के सभी बस्तियों के लोगों से सरदार का घरेलू रिश्ता जैसा हो गया था। जिससे बात करता, रिश्तेदारों के अन्दाज में जवाब मिलता। वह स्त्री पलटकर बोली, ‘‘तुम्हें बर्तन माँजने के क्या मतलब? खाना तो लौटकर ही खाओगे? ‘जटही’ से लौटो, खाना तैयार रहेगा।’’

सरदार मन ही मन मुसकराया।

अपनी दुनिया में मस्त सरदार आगे चल पड़ा। बस की आवाज सुनकर बच्चों का घर से बाहर निकलकर सरदार अंकल को ‘बाय’ कहना जारी रहा। ये वे बच्चे थे, जिनके नसीब में कोई कान्वेन्ट स्कूल, या ए फोर एपल सिखाने वाले टीचर, या गार्जियन नहीं थे।

एक जगह बस फिर रुकी। सरदार ने हार्न बजाई। एक महिला आँगन से बाहर आई। उसके तीनों बच्चे साथ थे, एक बच्चा पोलियो का शिकार था। महिला ने घूँघट से आधा मुँह ढँक रखा था। कुछ नहीं बोली। उसके चेहरे पर प्रतीक्षा की लकीरें खिंच आईं। बच्चे भी सरदार अंकल को आतुरता से देख रहे थे। सारे चुप थे, मगर बहुत कुछ कहा जा रहा था।

सरदार बोला, ‘‘अधीर मत हो! वह जरूर आएगा।’’

‘‘कब तक इन्तजार करूँ?’’ महिला बोली, ‘‘तुम्हारी ही बस से कमाने गया था। बोल गया था, जनकपुर में काम नहीं मिला, तो बीरगंज-मोरंग की ओर जाएगा। कहाँ आया अब तक? कोई हाल-खबर भी नहीं भेजता!’’

‘‘आएगा! जरूर आएगा!’’ सरदार बोला, ‘‘कोई चिट्ठी-पत्री?’’

‘‘नहीं!’’ महिला बोली, ‘‘भगवान से ज्यादा तुम पर भरोसा है भैया! बाल-बच्चे को भी जवाब नहीं दे पाती हूँ। बाप की याद में ये सूखकर काँटे होते जा रहे हैं।’’

‘‘मन छोटा मत करो, बहन! मैंने कहा था, अब भी कहता हूँ, बहनोई को जरूर धून्ध निकालूँगा!’’

‘‘तुम तो जाने वाले दिन भी कह रहे थे कि मन छोटा मत करो!’’ महिला बोली, ‘‘...कमा कर आएगा तो बाँस-फूस का घर ईंट का हो जाएगा!’’

‘‘सब हो जाएगा, बहन! सब।’’ सरदार बच्चों को ‘बाय’ करते हुए आगे बढ़ने लगा।...बस खिसकने को हुई कि महिला ने सरदार को संकेत से रुकने को कहा। बस फिर रुकी। महिला बोली, ‘‘मुझे शंका हो रही है। पूरे नेपाल में कोहराम मचा है। राजा के हारने के बावजूद माहौल शान्त नहीं हुआ है!’’

‘‘धत् पगली!’’ सरदार बोला, ‘‘ऐसा नहीं सोचते! वह कमा कर जरूर लौटेगा।’’

‘‘सच?’’ महिला बोली, ‘‘भगवान तुम्हारे मुँह में अमृत दें।’’

बस फिर खिसकने लगी। मैंने गौर किया, सरदार की मुसकान खत्म हो गई थी।

मेरा मन किया कि सरदार से कहूँ- आप ही दुखी हो जाएँगे तो बच्चों में खुशियाँ कौन बाँटेगा?’’

पर मैंने कुछ कहा नहीं, मन ही मन सोचा। शायद वह मेरे मन की बात भाँप गया। दुबारा अपनी लय में लौट आया।

सरदार की लोकप्रियता से मुझे जलन होने लगी थी।

‘जटही’ पहुँचकर वह बस से उतरा, और चाय-दुकान की ओर बढ़ गया। मैं भी उसके साथ हो लिया। मैंने उससे बात करने की इच्छा प्रकट की।

उसने अपने सामने वाली बेंच पर जगह बना दी। मैंने मित्र को बुला लिया।

थकान उतारने के लिए सरदार ने अपने जूते-मौजे उतारे और बेंच पर पालथी मारकर बैठ गया। मैंने संक्षेप में उसकी प्रशंसा की। जवाब में वह केवल मुसकराया।

अपने बारे में उसने ज्यादा बातें नहीं कीं। बस इतना कि मधुबनी में रहता है, अकेला है, मधुबनी से जटही तक की सड़क के किनारे के सारे उपेक्षित बच्चे उसके जीने के सहारे हैं।

इसी बीच उसने हम दोनों का परिचय जाना, फिर हमारे प्रति उसका आदर-भाव बढ़ गया। अपेक्षाएँ भी।

उसी समय एक लड़का आया। उसे देखकर सरदार मुसकराया। पूछा, ‘‘अब कब बन्द होगा नेपाल?’’

लड़का बोला, ‘‘परसों।’’

सरदार हमारी तरफ मुड़ा और पूछा, ‘‘आपलोग कब लौटैंगे?’’

‘‘लौटना तो परसों ही है।’’ मित्र बोले, ‘‘कल सेमिनार खत्म होगा। परसों ही लौट पाना सम्भव होगा।’’

‘‘तब तो सर! सुबह-सुबह रिक्शा से लौट जाइएगा। पौ फटने से पहले। वर्ना रिक्शा भी नहीं मिलेगा!’’ लड़के ने कहा।

‘‘यह सेमिनार क्या होता है?’’ सरदार ने जिज्ञासापूर्वक पूछा।

‘‘किसी विषय पर विचार-विमर्श के लिए विद्वानों का सम्मेलन।’’ मित्र ने बताया, ‘‘हम दोनों उसी के लिए जा रहे हैं! ’’

‘‘किस विषय पर विचार-विमर्श होगा?’’

‘‘नेपाल की वर्तमान स्थिति और शान्ति बहाली की समस्या पर।’’

सरदार गम्भीर हो गया। थोड़ी देर के लिए लगा, कहीं खो गया वह। सामान्य होने पर मुझसे पूछा, ‘‘एक बात बता सकते हैं?’’

‘‘क्या?’’

‘‘किसी भी आन्दोलन में निर्दोष ही क्यों मारे जाते हैं? निर्दोष की लाश पर ही क्यों शुरू होती है राजनीति?’’

मैं चुप रहा।

सरदार बोला, ‘‘आपलोग पत्रकार हैं। महत्वपूर्ण सम्मेलन में भाग लेने नेपाल जा रहे हैं। मुझे सलाह दे सकते हैं, मैं अपनी मुँहबोली बहन को कैसे बताऊँ कि पेट के लिए जनकपुर-वीरगंज भटकने वाला उसका पति मारा जा चुका है।’’

हम दोनों चुप रह गए। सरदार बोला, ‘‘मुझे समझ में नहीं आता, मैं किस मुँह से उसके विश्वास का गला घोंट दूँ? आपलोग बता सकते हैं?’’

हमारे होश उड़ गए।

सरदार की आँखों से आँसू बह रहे थे...।

 

खुशियाँ बाँटनेवाले सान्ता क्लॉज को पहली बार रोते देखा था।
                   ++++++
             ‌‌‌       हिंदी अनुवाद – अरुणाभ सौरभ 




Saturday, November 5, 2022

मच्छरदानी (मैथिली कथा) - मेनका मल्लिक

कथा

मच्छरदानी

मेनका मल्लिक
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घर मे पैसतहि मीनू हाथक बेग टेबुल पर राखलकि आ तरकारीक झोड़ा भनसाघरमे। फ्रीज स' पानिक बोतल लेलकि आ सोफा पर बैसलि। बोतलक बहरिया सतह पर अभरल पानि के तरहत्थी स' पोछलकि आ ओही तरहत्थी स' अपन कपार, कनपट्टी, दुनू आंखि आ गाल हंसोथैत कंठ धरि ल' गेलि। तखन सोह भेलै जे आफिस स' एलाक बाद मुंह-हाथ नहि धोलकि अछि। ओ उठ' चाहलकि, मुदा आसकति लगलै। थकान स' सौंसे देह टुटै छलै जेना। ओ आंखि मुनि लेलकि।
       घरबला चौकी पर गेरुआ स' पीठ ओंगठौने टी वी देखि रहल छलै। मीनू के घर मे पैसतहि ओ टी वीक आवाज कम क' देने छलै। सभ दिन एहिना होइ छै। पत्नी दिस तकैत बजलै, "आबि गेल'। आइ टाइमे पर...।"
       मीनू किछु जवाब नहि देलकि। उन्टे प्रश्ने पुछलकि, "सोनाली कत' गेलै?"
       "से, हमरा पूछि क' गेल' हय। मेट्रिक पास करिते पांखि भ' गेलै छौंड़ी के। आखिर बेटी ककर छै, तोरे ने? पुछलियै त' बोललै जे सहेली लग जाइ छी। बस, एतबे। आब हम की पुछितियै- कोन सहेली? केहन सहेली? आ पुछबे करितियै त' हमरा कहैत? तखन..."
       मीनू चुप भ' गेलि। ई कोनो एक दिनक नहि, सभ दिनक सोहाग-भाग छै। सभटा सुनबाक आदति भ' गेल छै ओकरा। मुदा, बेटीक बात कहियोकाल होइ। ओकरा रहल नहि गेलै, "से, बाप सन रहितियै तखन ने। घर आ बाहर, दुनूठाम सिपहिये सन बनल रहने...।"
       मीनू चुप भ' गेलि। सोचलकि, पूरा कहतै त' बमक' लगतै घरबला। कह' लगतै जे खबरदार! सिपहिया नहि कह हमरा। परमोसन लेने रहितियै त' दरोगा भेल रहितियै। मुदा किए लियै परमोसन ? परमोसन लेने बदली होइतै आ परिवार छुटि जैतै। कत्ते चाही? बहु कमाइते छै। ओना अहू पोस्ट मे बदली के सुन-गुन होइ छै। जोगार धरा लै छियै। बहु के छोड़ि क' कत्त' जेबै? एतेक बाजि ओकर घरबला मुस्कियाइत रहै छै, मुदा ओकर मुस्की मीनू के अंगोर सन लगै छै।
       बेटी के दुलार चाही। मायक दुलार। बापक दुलार। ई बात ओकर घरबलाक दिमाग मे नहि अबै छै। ओकरा ताहि सभ स' कोनो मतलब नहि छै। ड्यूटी स' एतै आ टी वी लग बैसि रहतै। कात मे जग भरि पानि, गिलास आ चुनौटी राखि लेतै। आर कोनो बेगरता हेतै, त' अढ़बैत रहतै। बस एतबे टा दुनिया। मीनू के अएलाक बाद जे कहैत रहै छै, से ओहू दिन कहलकै, "थक्कल लगै छहक। चाह नहि पीबहक? हमरो बड़ी देर भ' गेल। सोनलिया के कहलियै, मुदा...।
       मीनू बाजलि, " तं बना क' लाउ ने।"
       "इह। हम बनबियै?" घरबला बजलै, "हमरा बनाब' के रहितै त' बनौने ने रहितियै।"
       मीनू बेसी नहि सुनलकि। उठलि। दू कप चाह आ एकटा प्लेट मे बिस्कुट आनलक। घरबला के चाह देलक। अपने चाह आ बिस्कुट लेलकि। ओकरा बिस्कुट नहि दैत अछि। चाहक संग बिस्कुट पसिन नहि छै ओकरा। एकबेर देने रहै त' नहि खेलकै। कहलकै जे चाहक संग बिस्कुट खेने चाहक इज्जति उतरि जाइ छै। मीनू सोचलकि जे एहन उनटल दिमाग बला के की कहल जाय? तहिया स' अगबे चाह देब' लागलि
       चाह पीलाक बाद जेना आन दिन होइ छै, तहिना घरक कोल्हुमे अपन कान्ह लगा देलकि।
ओकरा पिता मोन पड़लखिन। बियाहक समय पिता कहने रहथिन जे तोरा बेटे सन पोसलिय' ह'।  तों पढ़ल-लिखल छहक बेटी। एम ए पास। नोकरी करै छहक। बर तोरा लायक नहि छह, से हम मानै छिय'। मुदा, हम की करिय'? अपना सभ मे तोरा जुगलक बर कठिन छै। सिपाहिए छै, त' की भेलै? हमरा भरोस छै जे तों ओकरा अपना लायक बना लेबहक। परमोसन हेबे करतै। बनि जेत' तोरा लाइक।
       मुदा, मीनू किछु ने बाजलि। बुझयलै- बाबू ओकर बियाह नहि कयलखिन, अपन माथक बोझा उतारि क' ओकरा माथ पर एकटा बोझा राखि देलखिन। मुदा, असल बात नहि कहलखिन। वाह रे कन्यादान। तकर बाद मीनू मशीन बनि गेलि। आफिस मे, घर मे आ पलंग पर। घरबलाक संग दूटा बेटा आ एकटा बेटीक सेवा मे लिप्त। दुनू बेटा इंजिनियरिंगक पढ़ाइ लेल बाहर छै। 
       लोक कहै छै- बड़ सुखी अछि ओ।
       एकदिन घरबला कहलकै, "आफिस मे तोरा बारे मे किदन-किदन सुनै छिय'।"
       "की सुनै छियै?"
       "कहांदन बड़ करगर छहक। ककरो गुदानिते ने छहक। लोक कहै छ' जे सिपाही छै घरबला आ मुंहक जोरगर छहक तों।"
       "आर किछ?"
       घरबला चुप भ' गेलै।
       मीनू के मोन पड़लै। जहिया ओकरा नोकरी भेल रहै, ताहि समय कम्मे महिला नोकरी मे अबै। खास क' छोट-छोट शहरक आफिस सभ मे। तेहन महिला सभ अपन गाम, शहरक मोहल्ला सं ल' क' हाट-बजार आ आफिस धरि आकर्षणक वस्तु होअय। ओकरा डेगडेगे आंखिक प्रहार सह' पड़ै। मीनूक संग सेहो तहिना भेल रहै। आफिसक सहकर्मी सं हाकिम धरिक लेल ओ अजगुत भ' गेल रहय। आ सबहक आंखि-बोलक प्रहार ओकरा बेध' लागल रहै। एहि प्रहार सभ स' बच' लेल ओ एकटा उपाय सोचलकि। ओ अपन स्वभावक बहरिया आवरण पर कठोर होयबाक लेप लगौलकि। जोर-जोर स' बाजब, ठाहिं-पठाहिं जवाब देब, ककरो अपन ल'ग-पास मे अभर' नहि देब ओकर स्वभाव भ' गेलै। आ ओकर एहि रूप के लोक मनसब्बरि कह' लगलै। फरदबाल कह' लगलै।
       मुदा, ताहि स' नहूं-नहूं ओ एकसरुआ होम' लागलि। घरो एकसरि, बाहरो एकसरि। ओकरा लगलै जे ओकर मूल परिचिति हेरा रहल छै।
       एम्हर आफिसक एकटा सहकर्मी, सुबोधक प्रति ओकर आकर्षण बढ़' लागल छलै। सुबोध बदली भ' क' आयल छल। ककरो स' बिना काजक गप नहि करय। काजोक गप बान्हले-छान्हल। सुबोधक ई गुण मीनू के नीक लाग' लगलै। एकदिन टिफिन बेरमे वैह सुबोधक केबिन मे गेलि। गप्पे-गप्पमे सुबोध कहने रहै, "आफिस मे अहांक छवि बदमासि बला अछि। मुदा, हमरा लगैए जे लोक अहांक मोन के देखबाक प्रयास नहि केलक अछि।"
       मीनू चुप भ' गेलि। कने कालक बाद बाजलि, "अहांक कनियां बड़ भाग्यशाली छथि।"
       सुबोध बाजल, "हमर बातक आ अहांक बातक कोन तारतम्य?"
       "से हम नहि बूझै छी। हमरा मोन मे आयल, से कहलौं।' मीनू बाजलि।
       आ तकर बाद स' आफिस मे जलखै दुनू एक्कहि ठाम कर' लागल आ दुख-सुख बतिआय लागल। आफिसक लोकक लेल ई दोसर अचरज रहै। किछ गोटे कह' स' बाज नहि अयलै - "की मीनू मैडम? जे लबारी मे नहि, से बुढ़ारी मे...।"
       तकर बाद स' मीनू के आफिस स' आब' मे कने अबेर भ' जाइ। सुबोध के सेहो। काजक समय समाप्त भेलाक बाद दुनू आफिस मे बेसी बेर धरि गपसप कर' लागय। ताहि कारणें घर पर ओकर घरबलाक तामस सिरिंग चढ़ल जाइ। दुनू मे कहासुनी सेहो भ' जाइ।
       प्राय: तीन-चारि मासक बाद आफिसक प्रधानक बदली भ' गेलनि। नव प्रधान अयलाह। मुसलमान छलाह। सभक परिचय भेलनि। 
       दोसर दिन मीनू के प्रधान बजौलनि। पुछलनि, "अहां समस्तीपुर मे कहियो रही?"
       "हं, हमर पहिल पोस्टिंग ओत्तहि छल। अहां किनसाइत वैह तौफीक सर तं ने छी जे ओत' प्रोबेसन मे आयल रही।" मीनू पुछलकि।
       "हं, मुदा चिन्ह' मे अहां के देरी भेल।"
       "अहांक चेहरा बहुत बदलि गेल अछि।" मीनू बाजलि, "काल्हि जखन अहां के देखलौं, त' हमरा बुझायल। राति भरि हम ठेकनबैत रहलौं जे किनसाइत अहीं छी।"
       "चेहरा बदलल अछि, मोन नहि। एखनो हम अहांक वैह..." तौफीक सर सम्हरलाह, "सोचल नहि भ' पबै छै। खैर, कोनो बात नहि। हमरा दुनूक अपन-अपन परिवार अछि आ से महत्वपूर्ण अछि। एकटा आग्रह।"
       मीनू चुप। कतौ हेरायलि।
       "सुनि रहल छी?"
       "जी।"
       "आफिस मे अपना दुनू गोटे अपन-अपन अतीत बिसरि क' काज करी, से आग्रह।" तौफीक साहेब बजलाह।
       "प्रयास करब जे बिसरि सकी।" मीनू बाजलि, "मुदा, एते धरि अवश्य जे अहांक मर्यादा के बचा क' राखब।"
       तौफीक साहेब चुप।
       मुदा मीनू एतबे बाज' मे घामे-पसेने नहा गेल छलि। ओ प्रधानक चेम्बर स' बहरा गेलि।
       सुबोध लग आबि ओ अपन ओहि अतीत के उझीलि देलकि। ताबत सुबोध ओकरा लेल एहन मित्र भ' गेल छलै जकरा प्रति ओ विश्वस्त छलि। समस्तीपुरक अपन पोस्टिंगक बारे मे कहलकि। ओत' स' बदलीक कारण कहलकि।
       तौफीक आ मीनू, दुनूक पहिल पोस्टिंग छल समस्तीपुरक आफिस। दुनू नव-नौतार। दुनू एक-दोसराक ध्यान राख' लागल। दुनूक मोन मिल' लगलै। दुनू एक-दोसराक संग कतेको-कतेको सपना देख' लागल। आ नहूं-नहूं दुनूक सपना आफिस सं ल' क' बाहर धरि पसर' लगलै। तहिया शांत-चित्त स्वभावक छलि मीनू। दुनूक सपना बाटे-घाटे गन्हाय लगलै। गुलंजर उठ' लगलै। आफिस स' बहराय त' सुनय- लैला ओ लैला...।
       बिन कोनो परबाहिक ई दुनू तरे-तर तय कयलक जे दुनू वयस्क अछि, कोर्ट मैरेज क' लेत‌। रहत मुदा एक-दोसराक भ' क'।
       मुदा, आफिस आ समाजक लोक के मीनू आ तौफीकक सम्बन्ध सोहइतै कोना? मीनूक पिता के चेतौनी देलक जे एकर बियाह तुरंत कोनो दोसर ठाम क' देल जाइ। सभ मिलि दुनूक बदली करौलक। दुनू दू दिशा मे चलि गेल। दुनूक बीच मे बान्ह बन्हा गेलै। आइ सन मोबाइलक जमाना नहि रहै आ ने टलीफोने सभठाम सहज रहै।
       नवका आफिस के प्रधान आ संगठनक किछ लोक के मीनूक बदलीक कारण बुझा गेलै। ओ सभ दोसरे माने लगेलक। ओ सभ मीनू के अजमाब' चाहलक, मुदा अपने सनक मुंह भ' गेलै।
       असल बात यैह रहै, जकर कारणें मीनूक पिता झट स' ओकर बियाह क' देलनि। पहिने एहिनो होइ। माय-बाप सोचैत अछि जे समयक संग सभ ठीक भ' जेतै। समयक संग माय-बाप बुझितो यैह छै जे ठीक भ' गेलै, मुदा...।
       "मुदा, माय-बाप के ई अंतो धरि नहि बुझाइ छै जे बेठीक‌ की रहलै।" सुबोध बाजल।
       "तौफीक सर के अयलाक बाद सहजतापूर्वक काज कोना क' सकबै, सैह सोचि-सोचि....।"
       "जेना ओ कहलनि।" सुबोध बाजल, "जेना रहै छी। दुनू गोटे अपन-अपन मर्यादाक रक्षा करैत रहू।"
       तकर बाद मीनू के आफिस स' घूर' मे देरी भ' जाइ। पहिने स' कने बेसी। तौफीक सर, सुबोध आ मीनू। तीनू कोनो-ने-कोनो बहन्ने काज समाप्त भेलाक बाद गपसप मे लागि जाय। हुलसि जाय तीनू।
      घर घुरलाक बाद घरबलाक व्यवहार मीनू के झरका दै आ टंटा शुरू भ' जाइ। टंटाक ग्राफ बढ़' लगलै। कतेको राति एहन होइ जे टंटा समाप्त कर' लेल सोनाली दुनू भाय के वीडियो कौल करय आ देखाब' लागय। वीडियो पर बेटा दुनू के देखैत मीनू चुप भ' जाय। घरबला मुदा बमकैते रहय।
       एक राति रुसि रहलै घरबला। मीनू सोनाली के कहलकै जे खाइ ले' कहै ओकरा। दुनू परानी मे दू दिन स' बाजा-भुक्की नहि रहै। सोनाली बाप के खाइ ले' कह' नहि गेलि, त' मीनू स्वयं जाय लागलि। सोनाली ओकरा पकड़ि लेलकै, "छोड़ि दहुन मम्मी। ठेहिअयता त' अपने खयता। नब-नब ड्रामा शुरू केलनिहें।"
       "नहि बेटी, घर मे सब खेतै आ एकटा भुक्खल रहयै, से हेतै? हमहीं कह' जाइ छियै।"
       "एकदिन कहबिही त' सब दिन अहिना करथुन। हमर बात मानि ले मम्मी। कखनो अपनो मान धर। अपनो ले' जी।" सोनाली बाजलि।
       मीनू बाजलि, "बेटी! तों हमर बांहि पूर' जोग भ' गेलें। बी ए पास करबें एहि साल। तों अपना अनुसारें ठीके सोचै छें। मुदा, हम हुनकर कनियां छियै ने। जाइ छियै। दू दिन स' बाजा-भुक्की नहि छै, तकरे कान्हि छै।"
      मुदा सोनाली ओकरा नहि जाय देलकै। अपने पिता लग गेलि‌‌। पिता कें मायक बारे मे कहलकै जे अहां नहि खेबै तं मम्मीयो नहि खायत। आ, अहां दुनू नहि खेबै त' हम केना खेबै। अहां चाहै छी जे घर मे सब भूखल रहय? अन्न बेरबाद होअय? भैया सब ई नब बात सुनता त' की कहता?
      बेटीक एहने-एहने बात पर पिता मानलकै आ भोजनक बाद स्थिति सामान्य सन बुझयलै।
      सोनाली सुनलकि- पिता अपन पलंग पर कीदन-कहांदन  बड़बड़ाइते छलै।
       मीनू बैसल छलि। सोनाली दोसर घर स' बहरयलै आ माय के कहलकै, "मम्मी ओहि घरक पलंग पर मच्छरदानी टांगि देलियौए। सूति रह।"
       मीनू बाजलि, "हम टांगि लितहुं ने। तों अपन कोठरी मे सूत ग'।"
       "आब तोहर मच्छरदानी हमहीं टांगि देल करबौ। चल।" सोनाली मीनूक बांहि पकड़ि क' उठयबाक प्रयास कर' लागलि।
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Thursday, October 6, 2022

साधो! देखह जग बौरायल (मैथिली कथा) : प्रदीप बिहारी

कथा

साधो! देखह जग बौराएल

प्रदीप बिहारी

बचनू गुम्म छल। मात्र लयमे टिनही बाटी पटकि-पटकि मांगि रहल‌ छल। ओहिदिन ओ किछु बाजि नहि रहल छल, से खखरीकें सोहाइत नहि छलैक। ओ बाजलि, "हे, मौनी बाबा किए बनल छहो? बिना मंगने के देत'?"
       मुदा, बचनू चुप। आर भिखमंगू सभ मांगि रहल छल। गंगनहौन‌ वा आने करतेबता बला श्रद्धालु सभ जहिना सिरहीसं धार दिस खंघरैत छल, भिखमंगू सभ अपन-अपन बाटी लयमे पटक' लगैत छल आ मंगैत रहैत छल- "दए दहो बाबू आर, मैयो आर, मामा (पितामही) आर, भैया आर, भौजी आर, बहिन आर...। धरम करहो, दान करहो, पुन्न करहो। दोहाइ गांग माइ के...दाता के कलियान करियौक...मनकामना पूरा करियौक...।
       किछु भिखमंगू एहुना बाजय, "दान करियौक दानी सब। भिखमंगा के जतबे देबै, सेहे फल। सेहे धरम। सेहे संग जायत। जय गंगा मैया। सब के रछिया करियौक।"
        एकटा श्रद्धालु महिला बजैत जाइत छलीह, "कतेक गन्दा छै ई सभ? नहाइ ने किए छै? एकरा सभ के पानिक कोन‌ संकट छै? जखन साक्षात् गंगे माइ छथिन, तखन...।"
        बाटे परसं श्रद्धालु सभक संग अबैत पंडा सभ बजैत रहैत अछि, "आबू जजमान। अइ बाटे आबू। ई सब अहिना काते-कात‌ भेटत। अपने गामक फल्लां बाबू सेहो हमरे जजमान छिका।"
       "से त' हेबे करत पंडा जी।‌ जखन हमर गामे अहांक जजमान अछि, तं सभ केओ हेबे करताह।"
       मुदा, बचनू चुप। बचनूक चुप रहब खखरीकें बेध' लगलै। 
       दाता सभ यथा साध्य बाटी सभमे खसबितो छलाह। जकरा बाटीमे जहिना किछु खसल, तहिना ओ द्रव्य वा खाद्य-वस्तु सभ अपन-अपन कपड़ाक धोकड़ीमे सहेजि लैत छल। बाटी खालिक-खालिए।
       खखरीकें बाटीक लयात्मक आवाज साफे नीक नहि लगैत छलैक। बाजलि, "है बुढ़बा! बोलब ने करै‌ छहो? गंगाघाटके लोक आर खुशी स' नाचब करै छै जे कुंभ लगतै। सबहक आमदनी बढ़तै। किछ सोचबहो कि...। बौकी देवी धए लेलक' हन?
       खखरीक इहो प्रयास खालिए गेलैक। बचनू नहि बाजल। खखरी सोचलकि- आर सभ बात त' ठीक, मुदा खखरीक मुंहसं अपना लेल 'बुढ़बा' शब्द नहि सुन' चाहय। एकबेर खखरी एहि शब्दसं संबोधन कयलकि तं तरंगि उठल बचनू । अबस्से कोनो विशेष बात छै। 
       खखरी अखियास' लागलि। कखन स' बचनू चुप रह' लागल छल? मोन पड़लै। काल्हि दुपहरमे बजार होइत मास मेलामे आब' बला श्रद्धालु सभक खोपड़ी देखैत मुर्दघट्टी दिस गेल। जाइ बेर स' पहिने बेस चरफर छल। जिलेबियासं बतिआयल। जानि नहि, घुरलाक बाद अनचोके स्वभाव किएक बदलि गेलैक।
       जिलेबिया जुआन भेल जाइत अछि। भरि मासमेला ओ एकरा सभक संग नहि बैसैत अछि। जेम्हर खालसा सभ बनैत छैक, ओम्हरे अपन अपन ग'र धरबैत अछि। भिखमंगू सभ बुझैत अछि जे जिलेबियाक बाप मंगनुआ, बचनूक बेटा नहि छैक, मुदा जिलेबिया बचनूक पोती छैक। तें एहि छौंड़ीकें सभ मानैत छैक। बचनू भिखमंगू सभक माइन्जने सन अछि। घाट परक भिखमंगुए सभ नहि, दोकानदार आ पंडो सभ बचनूकें गुदानैत छैक। तें जिलेबिया सभक दुलारू छैक।
       एहिठामक सभ भिखमंगू विभिन्न ठामसं लोहछल पेट आ पीठ ल' क' आयल छल। एकरा सभमे ककरो केओ नहि आ सभ सबहक। 
       जिलेबियाक माय कदमिया आ मंगनुआक बीच माया-पिरती भेलैक। नुकायल बात देखार होम' लगलैक। एकरा दुनूकें अन्दाज नहि भेलैक जे दुनूक माया-पिरतीक सुगंध घाटक भिखमंगू सबहक नाकमे पैसि जयतैक। ओकरा सभक समाजमे रंग-रंगक गप होम' लगलैक। नीक आ बेजाय, दुनू रंगक। 
       "इह, घर ने दुआरि आ मौगी डेबए लेल उताहुल।"
       "हे रे, अपना आर के की? जइ जए घ'र ओही जए ध'र। दिनो-दुनिया त' ओही जए ने?"
       "धु: बड़गाही। पेट मे ख'ढ़ ने आ सिंह मे तेल।"
       "दुनू मिलि कए कमैतै त' जरूरे आगां बढ़तै।"
       "रे बड़गाही! केतनो आगां बढ़तै, रहतै त' भिखमंगुए ने।"
       "नञि रे। रूपा भेने सब किछ बदलि जाइ छै। रूपा होतौ त' बितलाहा काल्हि गांग माइके पानि मे दहाय जेतौ। आबइ बला काल्हि बनतौ। आ रूपा नञि रहतौ त' किछ ने। आर सी सी बला सड़क पर गांड़ि रगड़ैत रह।" 
       "ताही ले' मुर्दघट्टी बला रस्ता दिस दुनू मांगब करै छै। दियौक हे दाता। दियौक हे कर्ता। दियौक हे मालिक के बेटा-भतीजा, सर-सम्बन्धी, गौंआ-घरुआ। अपने आर ले' केतना अरजि क' मालिक चलि गेला, से मोन राखियौ। राजा छियैक अपने आर। मालिक के बैकुण्ठक रस्ता क्लियर करियौक। आ से भिखमंगुए के देने होत। दोहाइ मालिक, दोहाइ गंगा माइ।"
       "से सब टा त' मुर्दघट्टी स' पहिने ने । मुर्दघट्टी लग ट'पौ ने दै छै। ओइ जए के गूहो डोमे राजा आ ठीकेदार के होइ छै।"
        पहिल बेर एकटा बजलैक, "हमरा बिचारे मंगनुआ आ कदमिया के बुझेबाक चाही। हमरा सब के भाग मे मांगनाइ टा छिकै। मौज-इलबाइस नञि छिकै।"
       "इह बड़गाही! पढुआ पढ़ब करै हय। तोरा पटितौ त' छोड़ि दितही रे? चुपें। होमए दही। बचनू दा छेबे करै।"
       सैह, बचनुएक कहला पर मंगनुआ आ कदमियाक बियाह भेलैक आ बियाहक साते मासक बाद जनमलै जिलेबिया‌। जनमिते छौंड़ी माय-बापक संग चर्चाक केन्द्रमे आबि गेलैक। गुल-गुल शुरुह भ' गेलैक। होउक ने किए? मुदा, एहू बातकें बचनुए दाबलक। ओ बाजल रहय, "जकर रहै, तकरा ज'रे छिकै। छोड़ि नञि ने देलकै। बच्चा पहिले के होइ या बाद के, एकरे दुनू के छिकै ने। की हरजा?
      बात सेरा गेलै। मुदा सेराइत-सेराइत बचनू आ खखरीक बियाहक चर्च सेहो शुरू भ' गेलै। कहांदन एकरो दुनूक मोन मिललैक आ पैसि गेल गंगा जी मे। दुनू संगहि डूब द' कछेरमे आयल आ बचनू खखरीके सिनुरा देलक। दुनू संगहि क'ल जोड़ि गंगा माइकें प्रणाम कयलक आ सिरही पर चढ़ैत पहुंचि गेल अपन-अपन जगह पर। पहिने सोझा-सोझी बैसि क' मांगैत छल। तकर बाद खखरी अपन मैल-कुचैल बैसका आ बाटी उठौलकि आ आबि क' बचनूक कातमे बैसि गेलि।
       जिलेबियाकें ताकि आयलि खखरी मुदा, छौंड़ी नहि भेटलैक। खखरी सोचलकि- छौंड़ी छोट रहै तखने स' पयर‌मे घुरघुरा छै। आ आब चेष्टगर भेल जाइ छै, त' पयर मे किनसाइत मोबिलो लागि गेल छै। 
       खखरीकें विश्वास छलै जे जिलेबियाक पुछने बुढ़बा जरूर बजतै। मुदा, छौंड़ी भेटै तखन ने। अनदिनो मेले सन रहै छै एत'।
       बचनूक चुप्पी खखरीकें घोंटने जा रहल छलैक।
       तखने खखरीकें अपन ब्रह्मास्त्रक सोह भेलैक। एकटा शब्द आर छैक जे बचनूकें पसिन नहि छैक। ई शब्द सुनितहि ओ बमकि जाइत अछि। ओना एकरो नाम "खखरी" पसिन नहि छैक बचनूकें। बियाहक किछुए दिनक बाद ओ बाजल छल, "तोहर नाम खखरी के रखलकौ?"
       "बुतरुआ के नाम के राखै छै? माइए-बाप या दादा-मामा ने।" खखरी बाजलि, "से किए?"
       "हमरा नीक नञि लागब करै हय ई नाम।"
       "हे हौ! हमें हीरोइन छिकियै जे बैजन्ती माला आ हेमामालिन नाम रहितै। कहांदन हमरा माइ-बाबू के बुतरुआ होइ आ मरि-मरि जाइ। हमें जलमलियै त' हमरा गाम के एगो बराहमन बोललखिन जे एकर नाम जेहन-तेहन राखि दही। तखन किनसाइत बांचि जाउक।‌ तखन हमर नाम पड़लै खखरी ।" कने चुप भ' क' फेर बाजलि, "नाम जैसन लोक होइयो जाइ छै। देखहो ने! हमें की छिकियै? खखरिए ने।"
       "है, चुपें। आब हमरा जौरे छिकहो से यादि राखल करहो।" बचनू बाजल, "हमें आर एक तरहे उमेर बितला पर ज'र होलियै, एकर माने ई नञि जे तोएं अपना के खखरी बुझहो। तोएं खखरी नञि, हमर पुष्ट धान छिकहो।"
       "जे बुझहो।" खखरी लजा गेलि। मुदा, एके पलमे बाजलि, "अपने सन के हमें तोरो नाम रखिय'?"
       "से तोएं किए रखबहो हमर‌ नाम? तोएं हमर माइ कि मामा?"
       "गोस्सा किए उठल'?" खखरी बाजलि, "परेम स' लोक सांइ के नाम नञि रखै छै?"
      बचनू मुस्किआइत बाजल, "बेस राखहो।"
       "हमें जैसन छिकियै, तैसने ने राखब'।"
       खखरी जखन नाम कहलकि तं पहिने मुस्किया देलक बचनू, मुदा बादमे कहलकै, "सांइ के नाम राखए के स'ख पूरा होइ गेल' ने। आब सुनहो! आब कहियो अइ नाम स' हमरा नञि बोलबिहो।"
       से सांचे। जहिया कहियो धोखो वा विनोदोमे खखरीक मुंहसं ओ नाम बहरयलैक, बचनू बमकि जाय। तें खखरी अपन ब्रह्मास्त्र ल' क' बचनू लग गेलि। बाजलि, "हे, खखरा। खखरी के सांइ खखरा। बोलबहो कि हमें चलि जइय' दोसर घाट पर। परेम स' पुछै छिअ' त' अगरायब करै छहो। हमें चललिय' दोसर घाट दिस। बूढ़ भेने अइसने अगरायब करै छै लोक। रह' बैसल। खखरा नहितन।"
       'खखरा' सुनितहिं बचनू ठीके बमकि उठल, "है, तोएं मौगी छिकहो कि मौगी के झ'र। जे मना करब' सेहे करबहो। हमें मौनी बाबा नञि बनल‌ छिकियै।"
       "त' एतना बोलैला पर मुंह किए ने खोललहो?"
       "सोचब करै रहियै।"
       "की?"
       "अपना आर के माथा पर अकास छिकै। ई अकास एतना उप्पर छिकै‌ जे अपना आर के छतो ने बनै छै। निच्चा छिकै सिमटी-रोड़ा-छड़ स' ढलाइ कयल जग्गह। अइ पर पोन छिलाइते रहै छै। माटि अपना आर लेल कहां छिकै? सेहे सोचै रहियै जे..."
       "जे की?"
       "छोड़हो। जा जइ घाट पर जाइ छ'।"
       "इह बुढ़बा! तोरा छोड़ि क' कतौ जइब' से? जाइए ले' सामने स' कात मे अइलिअ' हन।" 
       खखरीक मुंह पर मुस्की पसरि गेलै।


अर्द्ध कुंभक घोषणा भ' चुकल छलैक। समितिक संग विभिन्न राजनीतिक पार्टी सभक स्थानीय विधायक सभक सहयोग तय भ' गेल छलैक। दलगत राजनीतिसं ऊपर उठि क्षेत्रक विकास लेल कुंभ मेलाक आयोजन जरूरी बुझायल रहनि सभकें। घोषणा भेल रहैक जे कल्पवासेक समयमे‌ एकरो आयोजन होअय।
       बचनूक मोनमे जे प्रश्न उठलैक, से किछु आर गोटेक मोनमे सेहो उठल रहैक।‌ बचनू कतोक पंडासं पुछने छल जे पचासो बरखसं ओ एहिठाम अछि। कुंभ मेलाक आयोजन पहिल बेर सुनि रहल अछि। शास्त्र-पुराणमे रहितैक, तं होइत रहितैक। ताहि पर एकटा पंडा कहलकै जे ई सभ‌ गोटे अध्ययन-मनन कयलनि अछि जे बहुत पहिने एत्तहु कुंभ होइत रहैक। तात्कालीन सरकार बन्न करबा देलकै। आब समाज फेरसं कुंभ लेल माथ उठा रहल‌ छै, तं की बेजाय?
       बेजाय बातक चर्च शुरू भ' गेल छलैक। पंडा समाजमे एहि आयोजन ल' क' दू गोल भ' गेल रहैक। किछु नवयुवक एकर विरोध कयलकैक, "हे हौ! हमे बहुत तकलियै, मुदा अइ ज' कुंभ के कोनो इतिहास नञि भेटलैक। एना ज' लगाब' लगलै त' कत्ती जग्गह मे कुंभ मेला लागए लगतै?"
       "हे रे, लगतै त' तोरा की दिक्कत?"
       "हमर दिक्कत तोएं आर नञि बुझबें। तोरा आर के दिमागि लगाब' पड़तौ।"
       "बड़े काबिल छिकही त' बताबें अपन दिमागि के बात।"
       "सुनहो। अइ अर्द्ध कुंभ के सरकार मान्यता नञि देतै। कुंभ किए शुरू होलै, तइ कारण मे अपना आर के गंगाघाट नञि छिकै। तें ई समिति मासमेला के जौरे एकरा कए रहलै हन। मासमेला त' राजकीय मेला घोषित छिकै। अही जौरे करतै‌ त' प्रशासनिक काज निमहि जेतै। अइ दा पहिल बेर छिकै। एत्ते जल्दी के सब औतै‌ शाही-स्नान आ आर काजमे?"
        "सभे औतै। बड़का पंडित 'हं' बोलि देने छिकथिन। ऊ ओहिना 'हं' नहि बोलने होथिन। ओत्ती विद्वान लोक ओहिना मुंह नहि खोलब करै छै। ओकर एक-एक गो बोली के महत्व होब करै छै। कोनो बात तौलि क' बोलब करै छथिन। कहियो हुनकर दर्शन केलही हन?
       " अहं।" 
       "एकदा हुनकर दर्शन कए ले। दिमागि के खरबहा किल्ली जे छिकौ ने, से ठीक भ' जेतौ। हुनकर पहुंच बहुत ऊपर तक छिकनि। ऊ सब किछो मैनेज कए लेथिन।"
        "अइ मेला स' अपन क्षेत्र के कत्ती विकास होतै, से सोचब करही।"
        "सोचै छिकियै हमे। मासमेला के बाद गंगाघाट नरक सन होइ जाइ छै। हियां के लोक अपन जरुरति अनुसार साफ करब करै छै, बांकी सभ त' बाढ़ि‌ मे‌ गंगा माइ अपने साफ कए लै छिकथिन।"
       "साफ होइ जाइ छै ने रे?"
        "हं, से त' होइ चाइ छै। मुदा, सोचही! कुंभ मेला के बदला गंगा के सफाइ आ घाट के विकास पर खर्चा होइ त' कत्ती नीक होतै। ज' विष्णु भगवान के अमृत कलश स' बुन्न अइ ज' खसल रहितै‌ त' एकटा बातो। ई त' बजार लगायब होलै।"
        एहि वक्ताकें छोड़ि बाकी सभ, माने एके स्वर मे बाजि उठल, "रे बड़गाही। ई कमनिस्ट सन के बात बोलै हौ। एकरा बड़का पंडी जी स' भेंट कराना जरूरी छिकै।"
       तकर बाद एकाएकी बाज' लागल, "बाप रे! पंडा के बेटा कमनिस्ट होइ गेलै। हे गंगा माइ रक्षा करू। रक्षा करू मैया।"
        "हे रे सुनें, अपन दिमागि अपने जौर मे राख,  नञि त'...। अइ जए उनटल दिमागि बला के काज नञि‌ छिकै। जे होइ रहल‌ छिकै, एकदम सही छिकै। अमृत‌ के बुन्द जहां खसलै, से तोएं देखए गेल‌ रही? हमें कहब करै छियौ जे अहू ज' खसलै। तोहर‌ नजरिए ओहन‌ नञि छिकौ जे देख सकबें। घाटक पंडा आ छोट-पैघ दोकानदार आर के आमदनी बढ़तै। बुझल छौ? भोजनालय आ जलपान गृह बला आर गाम स' लोक मंगा रहल छै। ओतने नहि, गंगौटक थुम्हा बना-बना राखि रहलै हन। चुप रहें। ऐसन बात नहि बोल। जा क' बाबू जौरे सनसकिरीत सीख। अइ घाट पर उहे काज देतौ, उहे कलियाण करतौ।" तकर बाद जोरसं बाजल, "जय श्री राम । हर हर गंगे।" 
       जय श्री राम आ हर हर गंगेक स्वर आर सभ दोहरयलक, तेहरयलक। पूर्वक वक्ता जकरा ई सभ लुलुआ रहल छलैक, एकरा सभक उतारा देब' लेल उद्यत भेल कि फेर सभ डांटलकै ओकरा। एकटा बाजल, "लगै छै‌ ई कोनो गैंग के सदस्य बनि‌ गेलौ हन। एकर हियां रहब विनाशकारी होतौ। एकर बाबू के कहए पड़तौ जे एकरा सैंति क' राखय वा कत्तौ बाहर पठा दिअए।"
        दोसर बाजल, "लछमी दा, आब पता लगब' पड़त' जे एकर गैंग के आर लोक नञि ने घाट पर घुमब करै छै।"
        लक्ष्मी बाजल, "से पता लगो। भेटौ त' पहिले कहि दिहै जे गंगाघाट पर उहे रहि सकै छै जे मन-वचन-कर्म स' हियां के रहतै। जे रहब करै छै हियां आ सोचै छै कतौ आर के बारे मे, से हियां नञि रहतै। पहिने बुझा दीहै। नञि बुझतै त' उपाय छिकै ने रे!
       ओ वक्ता चुपचाप ओहिठामसं सहटि गेल।

बचनू खखरीकें डांटि तं देलकै, मुदा कहलकै‌ नहि जे किए मौन रहै? ओ जे बात कहलकै, से खखरी बूझि नहि सकलि। ओकरा जिलेबिया पर विश्वास छैक। वैह छौंड़ी बचनूसं पूछि सकैत अछि आ ओकर बात बूझि सकैत अछि। चंसगर छैक छौंड़ी।
        खखरी जिलेबिया के घाट दिस ताकि रहल छलि। ओकरा मोन पड़लै। ई सभ पहिने जे टिनही बाटी पटकए, तं कोनो लय‌ नहि बहराइक। सभ ढलाइ पर टिनही बाटी पटकए-बेसुरा। जिलेबिया सभ के लय मे पटक' सिखा देलकै। एकरा सभकें लय देलकै छौंड़ी।
       एकटा दोसर भिखमंगूसं खखरी पुछलकि, " जिलेबिया के देखलहो हन?"
       "से किए? तोरो किछ बोलल' हन‌ की?"
       "नञि, लेकिन..."
       "एगो मौगी ओकरा खिहारै रहै।"
       "किए?"
       "बोललै जे मलिकाइन, खाली गांग लहैने कुच्छो नञि‌ होत। हमरा आर के जे दान देबै, सेहे ओइ जनम भेटत। नञि देबै त' अइ जए आबि क' मांगए पड़त। अही पर ऊ मौगी अपना हाथक लोटा लए क' मार' दौगलै जिलेबिया के।"
       "तखन?"
       "तखन की? जिलेबिया लंक लेलकै। थुलथुल मौगी कत्ती दौगितै? छौंड़ी के बिखिन्न-बिखिन्न गारि पढैत घुरि अइलै।"
        खखरीक मोन कने हल्लुक भेलैक। ओ घुरल तं बचनू लग जिलेबियाकें देखलक। दुनू‌ बतिया रहल छल।
       "बुझलही नुनू। मेला समिति के एगो सदस्य हमरा बोलल हन जे मेला भरि ई जग्गह खाली कए दहो। सब भिखमंगा आर पुरना मुर्दघट्टी स' कने आगां चलि जाह। ओइ ज' तोरा आर के लेल खोपड़ी बनि रहल छह।"
       "से किए हौ बाबा?" जिलेबिया पुछलकि।
       "एत्ती गो मेला हेतै। बाहर स' बड़का-बड़का संत महात्मा औतै। भिखमंगा के‌ देखतै त' हियां के छवि खराप होइ जेतै। बोललै‌ जे जा मेला रहतै, ता पुरना मुर्दघट्टी लग के नबका खोपड़ी मे‌ तोएं आर चलि जाहो। मेला मे भीख मांगैत कोइ नजरि नञि एबहो। सब के खोराकी मिलत'।"
       खखरी बाजलि, "कहलहो नञि जे भिखमंगा आर सेहो धरम असथल के सोभा-सुन्दर होइ छिकै।"
       "हमे बहुत कहलियै, ऊ आर सुनै छै? एखनी सब एकबोलिया होइ गेलै हन। मुंह स' गिरलै, नञि मानबहो त' तेरहम बिदिया।" बचनू बाजल, "काल्हिए हमरा बोलल। आइ संझिया मे जवाब मांगलक। सेहे सोचि क' हमे गुम्म भए गेलियै।"
       जिलेबिया सुनि रहल छलि। ओकर देह तना रहल छलै।
       खखरी बाजलि, "त' भिखमंगा आर के बोलितहो ने। सलाह लितहो ने। की बोलबहो आइ?"
       खखरी डेरा गेलि। बहुत रास अधलाह स्थिति मोनमे नाच' लगलै। घाट परक एहन-एहन बहुत लीला ओ देखने अछि।
       "पहिने जे बात हमरे नीक नञि लगलै, से ओकरा आर के किए बोलितियै?" बचनू बाजल, "हमे बुझै छिकियै जे लोक के एहिना हटाएल जाइ छै। तोरा हटबै छियौ, से थोड़बे कहै छै? कोनो बहन्ना लगा क' हटौतौ। हमरा जेना पता लागल हन जे हियां कुंभ-द्वार बनौतै। तकर बाद जहां हमे आर जइबै, ऊ झग्गड़ बला जग्गह छिकै। ओन्नी के गौंआ बोलै छै जे हम्मर आ सरकार बोलै छै जे हम्मर। जकर होउ, उहो अपना आर के भगाइए देतै।"
       "तखन।" खखरी पुछलकि।
       "की?" बचनू बाजल, "राति भरि इहे सोचै रहियै जे हमरा आर के पोन त'र ने माटिए छै आ ने माथ पर अकासे।"
       एतेक कालसं चुप जिलेबिया बाजलि, "आखिर सोचलहो की? आइ सांझ खन अइत' त' की बोलबहो?"
       "सेहे ने फुराएब करै छै।‌ करेजा केरा के भालरि होइ गेल छै।" बचनू बाजल।
       "मोन स्थिर करहो बाबा। जे हेतै, देखल जेतै।" जिलेबिया बाजलि, "बोलियहो जे हमें आर इहें रहब। कहीं नञि जायब।"
       "तकर बाद की हेतै से अन्दाज‌ छौ?"
       "हं, छिकै। हमें आर डटल रहबै‌। तों स्थिर रहक। हमें सभ स' बतिआइ छिकियै।" जिलेबिया बाजलि, "जे करतै, से सब दुनिया जहान देखतै। अखबारि बला आर पढ़ैतै सब के। चैनल बला आर देखैतै।"
       "पोती! ऊ आर ओकर छोड़ि अपना आर के होतौ?" बचनू बाजल।
      "छोड़हो‌ ने बाबा। ऊ आर किछ नञि करतै, त' नञि करतै। एहन-एहन वीडियो बनबै बला बहुत रहै छै आ उहे आर भाइरल करब करै छै।" जिलेबिया बाजलि, "हमे आर ई जग्गह‌ नञि छोड़बै। बस। एतने।"
       बचनू जिलेबिया दिस तकलक। ओकरा लगलै जे जिलेबियाक आंखि स' धाह बहरा रहल‌ छै।
                        ######
पटना/ 27.03.2022

मेला उतर गया : प्रदीप बिहारी की मैथिली कहानी : हिंदी अनुवाद - अरुणाभ सौरभ

मैथिली कहानी

मेला उतर गया

प्रदीप बिहारी  
        
मेला उसर गया। मनभौका थका-माँदा घर लौटा। आँगन के द्वार पर रिक्शा खड़ा कर अन्दर आया। गोल गलेवाली अपनी गंजी के जेब से पैसे निकालकर बरामदा पर पड़ी चारपाई पर बिखेर दिया। दस....बीस....और पचास के नोट। एकाध् सौ के नोट भी थे। कुछ सिक्के भी।
          उसकी पत्नी बुचनी चारपाई की ओर आयी। चारपाई पर बिखड़े पैसे भूने हुए भुट्टे के दानों की तरह नजर आ रहे थे। वह पैसे समेटने लगी। पैसे देखकर हतोत्साह हो गयी। बोली, ‘‘मेले में आग लग गयी थी या भांग चढ़ाकर पड़े रह गए कहीं? सवारी को देखने-पकड़ने का प्रयास नहीं किया, तब तो इतने कम पैसे हुए। इतने कम पैसे देखकर मन बैठा जा रहा है। इतना खराब नहीं रहा होगा बाजार। दुर्गापूजा के मेले के लिए पूरे वर्ष नजर टिकाए रहते हैं। पर...।’’
          मनभौका भी अपनी आय से निराश था। विजयादशमी थी। मुख्य मेला और आमदनी इतनी कम? वह भी खींझकर ही घर लौटा था। रास्ते भर सोचता आ रहा था कि किस पर गुस्सा उतारे? पोते पर? नहीं। वैसे जब वह रिक्शा लेकर कमाने निकला था, तो पोते ने पीछे से टोक दिया था, ‘‘बाबा! लौटते समय मेले से बैलून लेते आना। अपनी दोनों बाहों से घेरा बनाते हुए दिखाकर कहा था, ‘‘इतना बड़ा।’’
          नहीं, पोते पर वह अपना गुस्सा नहीं उतारेगा। उसका क्या कसूर है? वह अबोध् है। उसे क्या पता कि पीछे से टोकने पर जतरा (शगुन) खराब हो जाता है।
          इस तरह विजयादशमी के दिन ही मनभौका का जतरा खराब हो गया। रिक्शे के पैडल पर पाँव और हैंडल पर दोनों हाथ रखकर मनभौका सोचने लगा कि रात भर मनोयोग से रिक्शा चलाएगा। पैसे बटोरेगा। कुछ ऐसे ग्राहक (दर्शनार्थी) भी मिल जाते हैं जो किराया के अलावे ‘पैरवी’ (टिप्स) भी देते है। इसके अलावे चाय-पान के लिए भी कुछ दे देते हैं। रात भर कमाकर कल सुबह पिछले वर्ष की तरह घर लौटेगा।
          पत्नी, बुचनी, फूस की एकल छत वाले कमरे में बिछावन कर चुकी होगी। उसे आँगन में देखते ही कहेगी, ‘‘जाओ। घर में बिछौना कर दिया है। पहले आराम कर लो। बाद में और कुछ।’’ वह हाथ-मुँह धोएगा। पैर पर पानी डालेगा। कुल्ला करेगा। उसके बाद सीधे घर में घुस जाएगा। गोल गले वाली गंजी की जेब को छुएगा। जेब भरी-भरी और उभरी सी नजर आएगी। होली में दामोदर बाबू के यहाँ बनने वाले मालपूए की तरह लगेगी उसकी जेब। जेब खाली कर पैसे सिरहाने में रखेगा और देह को बिछावन पर छोड़ देगा। नींद भी जल्दी नहीं आएगी। बुचनी कटोरी में सरसों तेल लेकर आएगी और पूरी देह मालिश कर देगी। उसके बाद...
          मनभौका सोच ही रहा था कि पोते ने टोक दिया।
          पत्नी पर गुस्सा उंड़ेलकर क्या करेगा? पत्नी उस पर बीस पड़ती है, यह बात वह कभी नहीं भूलता। पर, यह औरत दिमाग से गर्म भले ही हो, पर है होशियार। यह बात मनभौका भी मानता है। तब तो उसके परिवार को सँभाल कर रखा है बुचनी ने। उसके एकमात्र बेटे को काबिल बनाया। मनभौका को मना करने के बावजूद बेटे को बैटरी वाला रिक्शा खरीद कर दी। बुचनी ने जिद ठान लिया, ‘‘फेकना पैडिल वाला रिक्शा नहीं चलाएगा। सुकुमार है। टिक नहीं पाएगा। और जब देह-समांग ठीक नहीं रह पाएगा, तो कमाएगा क्या? क्यों कमाएगा?’’
          ‘‘मैने कैसे कमाया? मेरे माँ-बाप नहीं थे क्या? अनाथ था क्या?’’ मनभौका ने कहा था, ‘‘तुमने इसे जिस तरह सुकमार बना रखा है, मेरे माँ-बाप ने वैसा नहीं बनाया है मुझे। सुनो। मरद को सुकमार बनने से काम नहीं चलता। लड़के का मन मत बढ़ाओ। अभी जवान-जहान है। अभी मेहनत नहीं करेगा तो कब करेगा? दूसरी बात यह कि बैटरी वाले रिक्शा का दाम इस रिक्शा से बहुत ज्यादा है। उतने पैसे कहाँ से आएँगे?’’
          बुचनी अपनी जिद पर कायम थी, ‘‘सो जहाँ से आवे। पैसों की व्यवस्था तो करनी ही होगी, चाहे कर्जा की क्यों न हो। एक तो उसे ठीक से पढ़ा भी न सके।’’ कुछ रुककर बुचनी बोली, ‘‘वह नहीं कमाएगा क्या? कमाएगा और कर्जा सधाएगा। हमलोग भी मदद करेंगे।’’
          और मनमौका ने कर्ज लेकर बेटे के लिए बैटरी वाला रिक्शा खरीदा।
          बुचनी चारपाई से रुपये समेट चुकी थी। मनभौका ने उसके हाथ की ओर देखा। पैसों को निहारा। सोचा, ‘‘इतने कम पैसों से नहाएगा कितना और निचोड़ेगा कितना?
          उसे पोते की बात याद आयी। हाथ-पाँव धोकर घर में जाने के बदले चारपाई पर पड़े कुछ सिक्कों को समेटा और आँगन से बाहर निकलने लगा।
          बुचनी ने टोका, ‘‘कहाँ चले?’’
          '‘भोलुआ के लिए फुकना (बैलून) लाना भूल ही गया। चौक पर से लेकर आता हूँ।’’
          ‘‘लगता है ठीक ही भाँग खाकर नशे में चूर था।’’ बुचनी बोली, ‘‘काम धंधा नहीं था। गहिंकी (सवारी) नहीं था, तो इतनी बात भी याद नहीं रही। किस आशा से भोलुआ ने फुकना लाने को कहा था। जल्दी जाओ। अभी फेकना आएगा, तो जग जाएगा वह और फुकना नहीं देखेगा तो रोने लगेगा। अपना ही माथा पीटने लगेगा। देह नोचने लगेगा। फेकना भी रात भर का थका-माँदा आएगा। आराम करेगा कि...’’
          मनभौका आँगन से निकल गया। चौक की ओर चल दिया।
          वह चौका पर पहुँचा। दुकानें बन्द थी। थके-मांदे दुकानदार जहाँ-तहाँ सोये थे। एक-दो चायवाले जगे थे। उन्हीं से एक ने मनमौका को पुकारा, ‘‘भैया हो! आइए। चाह बनाते हैं।’’
          ‘‘नहीं रे।’’
          ‘‘दुकानदारी में नहीं कहता हूँ। भैयारी में बुलाता हूँ। आइए न। अभी साथ ही चाय पीएँगे दोनों भाई। बिजनेस अलग और संबंध अलग।’’
          मनभौका थोड़ा ठिठका। चाय पीने की इच्छा हुई। पर बोला, ‘‘नहीं रे। पोते ने फुकना लाने को कहा था, वह मैं लौटते समय भूल गया। संयोग कहो कि लड़का सोया हुआ है, नहीं तो रोने-चिल्लाने लगता। वह जब रोने-चिल्लाने लगता है तो जल्दी संभलता ही नहीं है। इसीलिए तुम्हारी भौजी ने कहा कि पहले उसके लिए फुकना लेते आओ।’’
          ‘‘पर अभी कहाँ मिलेगा? चाह पी लीजिए भैया। दिन थोड़ा और उठने दीजिए। दुकानें खुलेंगी तब तो मिलेगा। और तब भी अगर नहीं मिला तो जगाया जाएगा किसी को। पोता लाल का डिमांड तो पूरा करना ही होगा।’’
         मनभौका रुक गया। चाय पीने की ईच्छा हो गई। चायवाले की बातों में दम था। इस तरह के मेले में बैलून की दुकान कहीं स्थिर तो रहती ही नहीं। घूम-घूमकर बेचे जाते हैं बैलून। जहाँ-जहाँ बच्चों की भीड़ रहती है, वहाँ पहुँच जाते हैं बैलून बेचनेवाले। वैसे दूसरे दुकानदार भी बैलून रखते हैं, पर सामान के मेल के लिए ही। उनके पास वेरायटी नहीं रहती।
          मनभौका बेंच पर बैठ गया।
         पर उसके मन में एक प्रकार की अस्थिरता पैठ गई। मन स्थिर नहीं हो पा रहा था। जब तक बैलून नहीं खरीदेगा, मन स्थिर नहीं होगा। चायवाला चम्मच से चाय के गिलास में चीनी घोल रहा था। उससे जो आवाज निकलती थी, वह मनभौका के दिमाग में टनटना रही थी। रात भर जगने के कारण नींद भी परेशान कर रही थी। बेकार ही जगा। नींद खराब। पर उसी वक्त उसे डाक्टर साहेब याद आये।
          डाक्टर साहेब बूढ़े हो गये हैं। इतना कि खुद से चलने-फिरने में भी कठिनाई होती थी, पर अपने क्लिनिक पर बैठना उन्होंने नहीं छोड़ा। इतना ही नहीं, कहीं से बुलाहट आती, तो चल देते। बेटे या किसी स्टाफ के साथ कार या बाईक से निकल जाते। वे कहा करते थे, ‘‘ऊपरवाले ने सब के लिए मनिआर्डर भेजा है। उनका डाकिया सब के दरवाजे पर जाता है। लोग अगर अपना दरबाजा बन्द कर रखेंगे, तो क्या होगा? डाकिया लौटेगा ही।’’
          मनभौका ने डाक्टर साहेब के इस बात की गाँठ बाँध ली। इसीलिए रात भर अपने रिक्शे पर बैठा टुकुर-टुकुर देखता रहा। एकाध सवारी की कोई गिनती थोड़े ही होती है?
          चायवाले ने चाय देने के लिए उसकी देह हिलायी, तो वह साकांक्ष हुआ। चायवाले ने पूछा,‌ ‘‘कहाँ खो गये थे?’’
          ‘‘खोयेंगे कहाँ? झपकी आ गई थी?’’
          चायवाले ने पूछा, ‘‘अबकी मेला कैसा रहा?’’
          ‘‘वही सोच रहा था, तो आँख लग गई। अबकी मेले की तरह कहाँ लगा?’’ मनभौका बोला, ‘‘अब मेले में रिक्शे की दुकानदारी अच्छी तरह नहीं चलती है।’’
          ‘‘क्यों?’’
          ‘‘इतने फटफटिया (बाईक) आ गये है कि...। क्या बताऊँ? लोगों से कहता था- रिक्शा, रिक्शा। तो किसी ने जवाब भी नहीं दिया। उल्टे कुछ ने कहा-  ‘‘धुर मर्दे। इस भीड़ में रिक्शा से धुकुर-धुकुर जाएँगे, सो टहलते ही नहीं चले जाएँगे?’’
          ‘‘पर आज भीड़ भी बहुत थी।’’ चायवाले ने कहा, ‘‘इतने लोग थे कि...। दूर से सब का माथा बराबर लग रहा था। एक ही तरह का। पलेन। अगर लोगों के माथे पर दरी बिछा देते, तो जरा भी ऊबड़-खाबड़ नहीं होता।’’
          '‘ठीक ही कहा तुमने।’’ मनभौका बोला, ‘‘उस पर ये फटफटिया वाले तो जहाँ-तहाँ घुस जाते थे। जाम कर देते थे। क्या कमाता? समझो कि इस मेले से अच्छा तो जेनरल दिन में कमा लेते हैं।’’
         चायवाले ने मनभौका की ओर देखा।
         मनभौका बोला, ‘‘पहले लोग रिक्शा से दूर-दूर तक जाते थे। हमलोग भी पूरे टाउन के दुर्गा जी के दर्शन कराने का ठेका ले लेते थे। कम-से कम दस-बीस पैसेंजर तो मिल ही जाते। पर अबकी सब खतम। सारे पैसेंजरों को ठेलेवाले ने समेट लिया।"
          '‘ठेलेवाले?’’
         ‘‘हाँ रे! मोटरवाला ठेला।’’ मनभौका बोला, ‘‘गाँवघर के लेाग साथ-साथ आते हैं। मोटर वाला ठेला में आसानी होती है। बस के छत की तरह बैठ जाते है। रजाई की मगजी की तरह चारों ओर पाँव लटका लेते हैं। कुछ बीच में भी बैठ जाते है। ज्यादे लोग अँट जाते है। ठेलेवाले को भी अच्छा पैसा मिला जाता है और बैठने वाले को भी एक-एक सिर पर कम पैसा आता है। समय भी कम लगता है।’’
          ‘‘यह तो अच्छी बात नहीं हुई।’’ चायवाले ने कहा, ‘‘उनलोगों का बिजनेस सामान ढोना है। उन्हें आदमी को नहीं ढोना चाहिए। बिजनेस का कायदा होना चाहिए।’’
          मनभौका बोला, ‘‘बाबू। अब आदमी भी सामान ही हो गया है। बिजनेस का भी कोई कायदा रहा अब? तरह-तरह के बिजनेस करते हैं लोग। सबको पैसे कमाने हैं। कहीं से हो, जैसे भी हो, पैसा होना चाहिए। महँगी नहीं देखते हो। तुम ही बताओ। आमदनी कितनी है और जरूरत कितनी?’’
          ‘‘फिर भी। दूसरे का रोजगार नहीं मारना चाहिए।’’ चायवालों ने मनभौका को तुष्ट करना चाहा, ‘‘महँगी तो है ही। अब एक कमाई से काम चलनेवाला नहीं है। आपको तो एक सहारा भी है- फेकना। फेेकना भी कमाने लगा है, तो थोड़ा साँस लेने का समय होगा। मुझे देखिए। इसी दुकान के बल पर सब कुछ। ऊपर से बाल-बच्चों की फुटानी अलग से।’’
          ‘‘फुटानी करने में मेरा फेकना भी कम नहीं है। माई का सहयोग मिलता है, उड़ाता रहता है।’’ मनभौका बोला, ‘‘अब देखो! दो महीने पहले बहुरिया को मोबाइल खरीद दिया। हमको अच्छा नहीं लगा। पूछे कि इसकी क्या जरूरत? तुम्हारे पास तो है ही। पहले बैटरीवाला रिक्शा का लोन समाप्त कर रिक्शा को अपना बना लेते न। इस पर उसकी मैया ने हमीं को डाँट दी। खरीद लिया तो क्या हुआ? शौक हुआ तो खरीद लिया। फुर्सत में दोनों प्राणी बतियाएगा न। इससे इसको क्या होता है? खुद तो सभी शौक और सपना जलाता रहा...।’’
          ‘‘भौजी को बोले नहीं कि पैसे पर ही शौक होता है, सपना पूरा होता है और अच्छा भी लगता है। सुहाता भी है।’’
          '‘धुर बुड़बक। ऐसी औरतों को समझाने का मतलब है चालनी में पानी भरना।’’
          लाउडस्पीकर में फिल्मी धुन पर भगवती गीत आरंभ हो गया। दोनों की बातचीत में व्यवधान होने लगे।
          '‘हे देखिये। जोत दिया। अपने यहाँ एक कहावत है न- ‘भोर भेल बिख पादल कुजरनी, लेब भट्टा-मिरचाइ हे’ (सुबह-सुबह ही सब्जीवाली पादने लगी कि बैगन ले लो, मिर्ची ले लो...) वही शुरू कर दिया। अब दिन भर कान फाड़ता रहेगा। किसी बढ़िया लय-सुर में गाये तो एक बात भी...।
          ‘‘क्या करोगे? लोगों को यही अच्छा लगता है।’’
          ‘‘अच्छा क्या लगेगा? इन गीतों में सब कुछ सिनेमावाला रहता है, केवल नाम-गाँव भगवती का। गीत सुनेंगे तो ध्यान सिनेमा के सीन पर चल जाता है। भगवती पर ध्याने नहीं जाता है।’’ चायवाले ने कहा, ‘‘और आजकल के सिनेमावाला गीत कैसा होता है, सो जानते ही हैं। बगैर लाज-धाक वाला गीत।’’
          '‘रे बाबू। फटफटिया पर बैठने का ढंग भी बदल गया। अब दोनों टाँगों के एक तरफ रखकर वही औरत बैठती है जो साड़ी पहने रहती है। बाकी सब दोनों टाँगोें को दोनों तरफ रखकर बैठती है। सो केवल जवान-जहान ही नहीं, हर उमेर वाली।’’
          ‘‘लाज-धक तो उठ ही गया बाबू!’’ मनभौका बोला, ‘‘अब रिक्शा को ही लो। पहले दो प्राणी रिक्शा पर बैठते थे तो धीरे-धीरे बतियाते रहते थे। ध्यान रखते थे कि रिक्शावाला सुन न ले। उसी तरह की बात करते थे। रिक्शा का ओहार लगा लेते थे और जैसे मन होता बैठते थे। पर अब देखो। रिक्शा क्या? फटफटिया पर इस तरह सट के बैठते हैं कि समझ पाना कठिन होता है कि दो बैठे हैं या एक।’’
          चायवाला बोला, ‘‘अब साड़ी पहनती ही कितनी है? कम ही न?’’
          '‘नहीं, साड़ी भी पहनती है।’’ मनभौका बोला, ‘‘छोड़ो, जिसे जो मन होता है, करता है। जिसे जो सुभीता होता है, करता है। अब कौन किसकी बात मानता है?’’
          '‘यह तो सही कह रहे हैं।’’
          मनभौका विदा होते हुए बोला, ‘‘अच्छा चलता हूँ।’’
          वह आगे बढ़ गया।

पाँच-सात दुकान के बाद बैलून बेचने वाले लड़के को देखा। वह लड़का सड़क के किनारे पड़ी एक चारपाई पर सो रहा था। बगल में गैस सिलिंडर था, जिसे उसने चारपाई के एक पाँव से बाँधकर आश्वस्त हो सो रहा था।
          मनभौका ने पहले पुकार कर जगाने की कोशिश की। पर लड़के की आँखें नहीं खुलीं। फिर उसकी देह पकड़कर हिलाया। फिर भी उसकी आँखें नहीं खुलीं। वह गहरी नीद में सोया था। पर मनभौका ने हार न मानी। उसे पकड़कर जोर-जोर से हिलाने लगा। पुकारता रहा, ‘‘उठ न रे बाबू! एक बड़ा सा फुकना दो।’’
          प्रायः लड़केे की नींद टूटी। पर उसने अपनी आँखें नहीं खोली। लेटे-लेटे बोला, ‘‘नहीं है।’’
         '‘रे। पहले उठो न। सुबह-सुबह के ग्राहक को लौटाना नहीं चाहिए। ग्राहक लक्ष्मी होता है रे बाबू।’’
          लड़का आँखें मलते हुए जगा। मनभौका की ओर देखकर इस कदर बोला मानों उसे पहचानता हो, ‘‘हो बूढ़ा! भोरे-भोर जगा दिए। बड़ा वाला फुकना गैस से फुलाकर मिलेगा।’’
          ‘‘नहीं रे बाबू। पम्प से फुलाकर दो न। पोता के लिए ले जाऊँगा। गैस वाला ले जाएँगे और अगर हाथ से छूट गया, तो गया भैंस पानी मे। उड़ ही जाएगा।’’
           लड़का हँसा, ‘‘आप भी पिछड़ले हो बूढ़ा। उड़ जाएगा तो हवाई जहाज थोड़े हो जाएगा? जमाना कहाँ से कहाँ गया। अब कोई फुकना वाला पम्प रखता है?’’
          मनभौका को लगा कि वह इस लड़के से बहुत छोटा है। उम्र में और बुद्धि में भी। उसने लड़के से कहा, ‘‘बाबू रे! मुँह से ही फुलाकर दो न।’’
          ‘‘इह! इतना बड़ा फुकना मुँह से फुलाएँगे तो गले में मरोड़ देने लगेगा।’’ लड़का बोला, ‘‘गैस वाला नहीं लेना है, तो ऐसा करिये कि फुकना ले जाइए और घर में फुलाकर पोता को दे दीजिएगा।’’
          पर यह मनभौका को मंजूर नहीं था। मेला से फुला हुआ बैलून ले जाने का ठाठ और आनन्द ही अलग होता है। वह खुद भी बैलून फुलाना नहीं चाहता था। अगर फुला नहीं सका और गले में मरोड़ आ गया तो अलग ही बात हो जाएगी। इस लड़के के समक्ष पोल खुल जाएगी। उसने एक उपाय किया। बैलून गैस से फुलाया और बड़ा सा धागा से बाँध दिया। इतना बड़ा कि अगर भूल से छूट भी जाय तो जब तक बैलून बहुत ऊपर जाय, वह धागा पकड़ सके।
          मनभौका घर की ओर चला। सोचा, भोलू जग गया होगा। उसे ढूंढ़ता होगा। बैलून को भी। नखरा कर रहा होगा। खैर बाप संभाल रहा होगा। आ गया होगा फेकना।
          वह चाय की दुकान पर रुक गया। चायवाले ने रोक लिया था उसे।
          मनभौका पूछा, ‘‘क्या बात है?’’
          चायवाला गंभीर था। उसने एक ओर ईशारा किया। मनभौका उधर देखते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ है? किस बात का हल्ला-गुल्ला है?’’
          ‘‘फेकना घर लौटा?’’ चायवाले ने पूछा।
          ‘‘पता नहीं। मैं तो इधर ही हूँ। आया ही होगा।’’ मनभौका बोला, ‘‘पर क्या हुआ है? किस बात की भीड़ है?’’
          ‘‘अनर्थ हो गया।’’ चायवाले ने कहा, ‘‘कल शाम में रावण को जलाकर निकलते समय भगदड़ मच गई। उसमें पैंतीस लोग मर गये। तैंतीस की लाशों की पहचान हो गई। दो लाशों की पहचान नहीं हो पायी है। सरकार से भी नहीं। उसी दोनों लाश का फोटो राम अशीष के टी.वी. पर दिखा रहा है।’’
          मनभौका आशंकित हुआ। डर गया। बोला, ‘‘चलो न। हम भी देखें। अगर पहचान गये तो...।’’
          चायवाले ने उसे मना किया, ‘‘क्या देखिएगा? जाइए। पोता जग गया होगा।’’
          एक प्रकार जबर्दस्ती ठेलकर चायवाले ने मनभौका को घर की ओर भेजा।
          मनभौका एक प्रबल वेग से घर पहुँचा। उसका मन बेचैन होेने लगा। आशंका से कलेजा उलटने लगा।
          दरवाजे पर पहुँचते ही जोर से बुचनी से पूछा, ‘‘फेकना आया?’’
          बुचनी बोली, ‘‘नहीं। नहीं आया है बौआ? क्या बात है?’’
          ‘‘भोलुआ के माई को कहो कि उसको मोबाइल लगाबे।’’
          तब तक चायवाला भी पहुँच गया। वह हाँफ रहा था। हाँफते ही पूछा, ‘‘फेकना आया?’’
          मनभौका से पहले बुचनी ने ही पूछा, ‘‘सो बात क्या है? बोलो न। क्या हुआ फेकना को? बोलो न। मेरा कलेजा उलट रहा है।’’
          मनभौका और चायवाला चुप। दोनों एक दूसरे को आशंका से देख रहे थे। चायवाले की साँसें लम्बी हो रही थीं।
          बुचनी की साँसों की गति बढ़ गयी। बोली, ‘‘आखिर बात क्या है? तुमलोग कुछ बोलते क्यों नहीं? क्या हुआ है?’’
          मनभौका की ओर देखते हुए चायवाला बोला, ‘‘पूरा-पूरा तो कोई पहचान नहीं पाया। पर, अपरिचित लाश को देखकर चौक के लोगों का कहना है कि कोई अपना ही आदमी है। मुँह थकुचा हुआ है, सो ठीक-ठीक पता ही नहीं चलता। मुझे भी लगा कि कोई अपना ही है।’’ बुचनी से कहा, ‘‘भौजी! चिन्ता मत कीजिए। स्थिर होइए।’’
          ‘‘स्थिर क्या रहें? बात नहीं बोलते हो तुमलोग और कहते हो स्थिर रहिये।’’ बुचनी बोली, ‘‘तुमको मेरी कसम। बोलो न! क्या हुआ है?’’
          मनभौका की देह डोलने लगी। चायवाला बोला, ‘‘जरूरी नहीं है कि अपना ही आदमी हो। अन्दाजा ही लगाते हैं सभी।’’
          बहू बरामदे पर आकर घूंघट की ओट से बोली, ‘‘मोबाइल रात से ही नहीं लग रहा है। पहुँच से बाहर कह रहा है। अभी भी वही कहता है।’’
          बहू के साथ पोता भी निकला था।
          चायवाले मनभौका को खींचते हुए बाहर ले जाने लगा, ‘‘चलिए। टेम्पू पकड़ लेते हैं। चौक के लोग भी गए हैं। अस्पताल में रखा है...।’’
          मनभौका के हाथ से बैलून छूट गया। बैलून उड़ गया।
          बुचनी उसी जगह बैठकर रोनी लगी।
          बहू ने सास को संभाला, ‘‘ऐसा क्यों करती हैं? जरूरी है कि वह भोलुए के पप्पा हों?’’
          लय में रोती हुई बुचनी बोली, ‘‘किसी का भी पप्पा ही होगा न गे रनियाँ। किसी का सोना जैसा बेटा ही होगा न गे रनियाँ...।
         भोलू दादी के कन्धे पर हाथ रखकर अवाक् था। मानों पूछ रहा हो- यह क्या हो गया?

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मैथिली से अनुवाद: अरुणाभ सौरभ